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Shekhawati Ka Navin Itihas/7.Kayamkhani Shasan

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Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998

रतन लाल मिश्र - शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन, मंडावा, झुंझुनू, राजस्थान, 1998

कायमखानी शासन अध्याय-7

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.105-117


फतेहपुर का जलालखां (1474-1489)

[पृ.105]:फतेहखां (1436-1474) की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र जलालखां (1474-1489) गद्दी पर बैठा. रासो में इसके गद्दी पर बैठने का समय सं. 1531 (1474 ई.) दिया हुआ है. जलालखां ने अपने पिता द्वारा बनाए हुऎ किले में कुछ और भवन बनाए. किले का दक्षिणाभिमुखद्वार भी उसी ने बनवाया था.[1] इस द्वार पर एक शिलालेख लगा हुआ था जिसे किले का आधा भाग खरीदने वाले लोगों ने कहीं उतार कर रख दिया था जो अभी मिल नहीं रहा है. इस लेख में इन निर्माण कार्यों का समय दिया गया है.

जलालखां (1474-1489) भी पिता की तरह शूरवीर था. दिल्ली के बादशाह से अभी भी अनबन चल रही थी.[2] उधर नागौर के खान से भी सद्भाव नहीं था. नागौर के खान की ओर से मुगल चौपान ने फतेहपुर के दक्षिण में सीकर के पास कटराथल में डेरे किए. यहां दोनों सेनाओं की मुठभेड़ हुई. जलालखां के आगे मुगल भाग गया. उसका सारा सामान जलालखां के कब्जे में आ गया.

इसके बाद जलालखां ने छापोली (उदयपुरवाटी, झुंझुनू जिला) पर आक्रमण किया और भोमियों को मारा. आमेर के कुछ भाग पर भी उसका आक्रमण होना रासो से ज्ञात होता है. [3]

उधर झूंझूनू में समसखां के मरने पर उसका पुत्र फतेहखां गद्दी पर बैठा. यह बहलोल लोधी का जंवाई था. इसने अपने भाई विमाता को कोई हक नहीं दिया. इस पर उसका भाई मुबारकशाह अपने नाना जोधा के पास सहायतार्थ गया पर उसने उसे मामा बीका और बीदा के पास जाने की सलाह दी. उन्होंने भी कोई मदद नहीं की. इस पर वाह जलालखां के पास आया. उसने मुबारकशाह की मदद में झूंझूनू पर

[पृ.106]: चढ़ाई कर दी. लड़ाई में फतेहखां हार कर भाग गया और झूंझूनू पर मुबारकशाह का अधिकार हो गया.[4]

फतेहखां (झुंझुनू) की मृत्यु होने के बाद उसके टीकाई पुत्र महमदखां ने मुबारक को हटाकर फिर झुंझुनू पर कब्जा कर लिया. [5]

इधर जलालखां लोहागर के पहाड़ों की ओट लेकर रहने लगा और बराबर नागौर पर छापे मार कर खान को तंग करता रहा. उस समय मुजाहिद का पुत्र सल्लखां और तदुपरांत फिरोजखां द्वितीय नागौर के शासक थे. वाकयात में फतेहखां द्वारा मुबारकशाह को कत्ल करना बताया गया है. झुंझुनू में किले के पहाड़ी दामन में मुबारकशाह का मजार है जिसे मुबारकशहीद कहते हैं.

जलालखां (1474-1489) ने फतेहपुर शहर के दक्षिण की ओर एक बीहड छोड़ा जिसका क्षेत्रफल 24 मील था. [6] इस बीहड़ में हजारों जानवर चरिंद व परिन्द रहकर परवरिश पाते हैं. उसने फतेहपुर के तीन कोस दक्षिण में मौजा जलालसर अपने नाम पर बसाया जो बीहड़ के पास स्थित है. [7] संवत 1546 (1489) तक राज्य पर अपनी कीर्ति फैला कर जलालखां परलोक गया. इसके चार औरतें थीं जिनसे 10 लड़के हुए.

फतेहपुर का दौलतखां (1489-1513)

[पृ.107]: जलालखां के मरने के बाद संवत 1546 में उसका बड़ा पुत्र दौलतखां (1489-1513) नवाब हुआ. यह हरदिल अज़ीज़ और नेक नाम था. [8] यह नवाब सिद्धि संपन्न धार्मिक पुरुष था.

रासो से हमें ज्ञात होता है कि ढोसी के आस-पास बीका जब गया तो हारकर भागकर आया. यह भिवानी विजय के सम्बन्ध में है. रासो का कथन विश्वसनीय है. [9]

बीका की हार के कारण क्रुद्ध होकर राव लूणकरण जो उस समय बीकानेर की गद्दी पर था, ढोसी की ओर से ससैन्य चला. उसने मार्ग में फतेहपुर के पास दौलतखां (1489-1513) के पास प्रधान भेज कर उसे बुलाया. खान ने उसे अपमानित कर निकाल दिया. लूणकरण क्रुद्ध होकर ढोसी की ओर चला गया. इस युद्ध में स्वयं लूणकरण अपने पुत्रों के साथ मारा गया.

[पृ.109]: निकटस्थ भूभागों के स्वामी गौड़ और निर्वाण भूमिका बिगाड़ करते थे. दौलतखां एक बार उनका पीछा कर सारा लूट का माल वापस ले आया. हिसार का सिकंदर मुहब्बतखां साराखानी भी दौलतखां के आगे से भाग गया.

इस समय सिकंदर लोदी (r. 1489-1517) दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया था. उससे दौलतखां का सद्भाव हो गया था.

उधर झुंझुनू में महमदखां था. उसे हटाकर फिर मुबारकशाह काबिज हो गया था. इसका बड़ा पुत्र कमालखां था जिसे झुंझुनू मिला और छोटे साहबखां को नूआ (मंडावा से 8 मील दूर स्थान). वह बराबर अपने भाई का सहायक रहा. इस कमालखां का पुत्र भीखनखां था जो झुंझुनू की गद्दी पर बैठा.

और उधर साहबखां के मरने पर मोहब्बतखां नूआ का शासक बना. इसकी भीखनखां से अनबन रहती थी. इसके फल स्वरुप मोहब्बत खां नूआ छोड़कर दौलतखां के पास आया. उसने अपने पुत्री का फदनखां (नाहरखां का पुत्र) से विवाह कर दिया. इसके बाद सहायता का आश्वासन लेकर वह नूआ लौट गया.

भीखनखां ने इस पर हमला किया तब फतेहपुर से नाहरखां उसकी सहायतार्थ गया. आबूसर (झुंझुनू के पश्चिम में स्थित गांव) के ताल में दोनों सेनाओं का सामना हुआ. इस लड़ाई में भीखन खां हार गया तब मोहब्बत खां को नाहरखां ने झुंझुनू की गद्दी पर स्थापित कर दिया.

दौलतखां (1489-1513) की मृत्यु फतेहपुर में संवत 1570 (1513 ई.) में हुई. किले के दक्षिण भाग में इसकी कब्र बनाई गई थी जिस पर जुम्मेरात को नगारे बजते थे. [10] दौलतखां गुणी और दयालु प्रकृति का नवाब था. इसने फतेहपुर के उत्तर में दौलताबाद बसाया जो अब फतेहपुर का ही एक भाग है.

[पृ.110]: नवाब दौलतखां के संबंध में बीकानेर के इतिहास में श्री ओझा जी ने लिखा है कि बीकानेर के राव लूणकरण ने संवत 1569 (1512 ई.) में फतेहपुर पर आक्रमण किया. दौलतखां, रंगखां कायमखानी और बैर भाव भुलाकर लड़ने आए पर हार गए. फल स्वरूप उन्हें 120 गांव देकर संधि करनी पड़ी.[11]

दौलतखां (1489-1513) द्वारा 120 गांव देकर संधि करने की बात सच है तो यह वही गांव होंगे जो फतेहखां के समय में वर्तमान चूरू और गंगानगर जिलों के भूभाग में पढ़ते थे. गांवों की यह संख्या देखते हुए यह प्रतीत होता है की फतेहखां की मृत्यु के शीघ्र बाद राव बीका ने भाडंग, साहवा आदि पर अधिकार कर लिया था. शेष 120 गांव दौलतखां ने संधि के फलस्वरूप दिए. इस प्रकार सारा उत्तरी भूभाग कायमखानियों के हाथ से निकल गया था. 'छंद राव जैतसीरो' से ज्ञात होता है कि बीका ने भाडंग के किले को नष्ट कर डाला था. (छन्द 42)

इसके तीन पुत्र नाहरखां, होबन खां और वाजीदखां थे जिनमें से नाहरखां (1513-1545) दौलतखां की मृत्यु पर सं. 1570 में गद्दी पर बैठा. [12]

फतेहपुर का नाहरखां (1513-1545)

नाहरखां (1513-1545) - [पृ.110]: दौलतखां के मरने पर उसका बड़ा पुत्र नाहरखां (1513-1545) गद्दी पर बैठा. यह बड़ा सुंदर युवक था तथा रसीली तबीयत का भी था. नाहरखां में सरसता के साथ वीरता भी काफी मात्रा में थी. आसपास के भोमिये उससे भय खाते थे. उस समय अमरसर में शेखावत रायमल था जिसकी मृत्यु पर सूजा सं. 1594 (वस्तुत:1589 विक्रम) में गद्दी पर बैठा. रासो ने लूणकरण द्वारा नाहरखां को लड़की देने की बात कही जय. [13] नाहरखां (1513-1545) के समय में सिकंदर के मरने पर इब्राहिम लोदी, बाबर, हुमायूं और शेरशाह दिल्ली के सिंहासन पर आए. शेरशाह ने नाहरखां को बड़ा आदर दिया और उसे प्रेम भाव बनाए रखा. वह उसे 'मामू' कहता था. उसने उसे फतेहपुर की जागीर प्रदान की.

फतेहपुर में कायमखानियों के किले के सामने एक प्राचीन मंदिर है जिस पर लगे शिलालेख में इस मंदिर का निर्माण काल विक्रम 1578 ज्ञात होता है. इस मंदिर

[पृ.111]: में एक गुफा है जो किले तक जाती है. नवाबों की स्त्रियां अधिकांश हिंदू ही थी और उन्हें अपने धर्म के अनुसार पूजन आराधन: की पूरी छूट थी. इस गुफा से वे मंदिर में देव-दर्शन को आती थी. पहले मंदिर का गर्भगृह नीचे ही था. आगे चलकर शेखावतों के काल में निज मंदिर ऊपर बनवाया गया था.

नाहरखां ने किले में एक भव्य महल बनाया जो अब नष्ट हो गया है. यह महल नाहरखां ने रासो के अनुसार सं. 1593 (1536 ई.) में बनाया था. [14]

फतेहपुर का फदनखां (1545-1552)

फदनखां (1545-1552) - [पृ.111]: नाहरखां की मृत्यु पर उसका बड़ा पुत्र फदनखां (1545-1552) गद्दी पर बैठा. यह भी अपने पिता की तरह रसिक और वीर था. दिल्ली के सूरवंशीय एवं मुगलवंशीय बादशाहों से इसे बराबर सम्मान और प्रेम मिलता रहा. [15] रासो में फदन खां की प्रशस्ति में लिखा है कि अकबर इस पर बहुत कृपा करता था. इस पर बीरबल ने उससे इस असाधारण मेहरबानी का कारण पूछा. इस पर उत्तर मिला कि और लोग मेरे द्वारा बड़े हुए हैं पर फदन खां को भगवान ने बड़ा बनाया है. [16]

अकबर ने चौहान कुल की प्रमुखता देखकर फदनखां से विवाह संबंध स्थापित करने की इच्छा प्रकट की. इस पर फदन खां ने अपनी पुत्री अकबर को दी. इस पर प्रेम प्रसंग और भी बढ़ गया. रासो में लिखा है कि शेखावत रायसल को फदनखां की जमानत पर मनसबदार बनाया गया.

[पृ.112]: फदनखां ने बीदावतों द्वारा भूमि का बराबर बिगाड़ करने पर बीदावाटी पर आक्रमण किया.

उधर झुंझुनू में उसके पिता के समय से मोहब्बतखां राज कर रहा था. उसने अपने नाम पर मोहब्बतसर नामक गांव बसाया. भीखनखां झुंझुनू फिर कभी नहीं ले सका. भीखनखां का मकबरा झुंझुनू से उत्तर में पहाड़ी के दामन में मौजूद है. यह भीखन शहीद के नाम से मशहूर है.

मोहब्बतखां के मरने पर खिज्रखां नवाब हुआ. इसके संवत 1609 (1552 ई.) में झुंझुनू की गद्दी पर होने का विवरण मिलता है. इसके बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती है. झुंझुनू की गद्दी के लिए बराबर संघर्ष चलता रहा. संभवत: खिज्र खां के मरने पर उसके लड़के बहादुरखां को झुंझुनू से निकाल दिया गया. इस पर फदन खां ने उसकी मदद की और उसे झुंझुनू में पुन: स्थापित किया. [17] वाकयात कौम कायमखानी में खिज्र खां के बाद उसके भाई मोहम्मदखां का गदी पर बैठना लिखा है.

फदनखां ने फतेहपुर से उत्तर में तीन कोस की दूरी पर फदनपुरा गांव बसाया था. रासो की भूमिका के अनुसार इसकी मृत्यु संवत 1609 (1552 ई.) में हुई. उधर फखरूतवारीख

[पृ.113]: में इसका 960 हिजरी (विक्रम 1613) में मरना लिखा है. [18] जो अधिक उपयुक्त लगता है. इसका कारण यह है कि इसने बहादुर खां की मदद की थी जो 1609 विक्रम के बाद गद्दी पर बैठा था.

फदनखां संभवत: इसके बाद भी कुछ समय तक जिंदा रहा. रासो के अनुसार अकबर को उसने अपने लड़की दी थी तथा अकबर ने फदन खां की जिम्मेदारी पर रायसल शेखावत को मनसब प्रदान किया था. अकबर ई. 1556 (विक्रम 1615) में गद्दी पर बैठा था.

फतेहपुर का ताजखां (1552-1570)

ताजखां (1552-1570) - [पृ.113]: फदनखां की मृत्यु पर उसका पुत्र ताजखां (1552-1570) गद्दी पर बैठा. यह भी अतीव सुंदर शरीर वाला तेजस्वी पुरुष था. साथ ही बहादुर भी था. इसने वर्तमान अलवर और रेवाड़ी पर चढ़ाईयां की और विजय पाई. [19] इसने पठान ताजखां को लूटा और रेवाड़ी का थाना नष्ट कर डाला. इसने फतेहपुर से पूर्व में ताजसर (तायसर) नामक गांव बसाया था.

इस नवाब के आठ पुत्रों में मोहम्मद खां सबसे बड़ा था. इसने अपने पिता के काल में राठ प्रदेश बैराठ आदि स्थानों पर विजय प्राप्त की तथा कुंपावत राठौर कुंभकरण को हराया. इसकी पूर्ण यौवन अवस्था में मौत हो गई. उस समय ताजखां जिंदा था. वह उसके पुत्र अल्फखां को बादशाह के पास ले गया और उसे सम्मान दिलवाया. अकबर ने अलफ खां को बड़ा प्यार और स्नेह दिया. तथा ताजखां के बाद उसके अधिकार को स्वीकृति प्रदान की.[20]

उधर झुंझुनू में रासो के अनुसार खिज्रखां का बेटा बहादुर खां नवाब बना. वाकयात कौम कायमखानी में खिज्र खां के बाद उसके भाई मोहब्बत खां के गद्दी पर बैठने की बात कही गई है. इसके मरने पर इस्लामखां शासक हुआ और उसके बाद उसका एकमात्र पुत्र समसखां गद्दी पर आया.

इस प्रकार विक्रम की 16वीं सदी के अंत से उसके कुछ बाद तक कायमखानी शासन सुदृढ़ रूप से शेखावाटी में स्थापित हो गया था. फतेहपुर और झुंझुनू में उनका शासन दृढ़तर होता जा रहा था. अमरसर के आस पास के भूभाग पर शेखावत काबिज थे. उधर नरहड़ के आसपास के क्षेत्र में नागड़ पठान अपना अधिकार जमाए हुए थे. जिसे विशुद्ध रूप से शेखावाटी का क्षेत्र माना जाता रहा है उस पर इस समय तक पठान और कायमखानी ही काबिज थे. कुछ स्थान निर्वाणों के अधिकार में थे.

फतेहपुर का अलफखां (1570-1626)

अलफखां (1570-1626) - [पृ.113]: ताजखां की मृत्यु के बाद अलफखां (1570-1626) नवाब हुआ. रासो के भूमि का भाग में इसका सं. 1627 में गद्दी पर बैठना बताया गया है. [21] जो उचित नहीं लगता है क्योंकि अलफखान की पैड़ी के अनुसार इसका जन्म सं. 1621 (1564 ई.) में हुआ था. बादशाह ने

[पृ.114]: इसको फतेहपुर का पट्टा दिया. उसे समय सूजा शेखावत का पौत्र श्याम दास वहां पर अधिकार किए हुए था. उसे सिकदार ने वहां से निकाल दिया. श्याम दास पूजा के पुत्र गोपाल का पुत्र था.

अलफखां के समय झुंझुनू में समसखां नवाब था पर उसे उसके भाई निरंतर तंग कर रहे थे. इस पर अलफ खां उसे बादशाह के पास ले गया और मनसब प्रदान करवाया. [22]

अलफखां पहाड़ी राजाओं पर जगत सिंह के साथ गया और अपनी वीरता से राजा वसु, तिलोकचंद आदि को वश में किया. यह घटना सं. 1650 (1593 ई) की है.

सलीम ने जब राणा पर आक्रमण किया तो अलफ खां और समसखां भी साथ गए. अकबरनामा में इस मुहिम पर अलफ खां के जाने की बात कही गई है. [23] सलीम ने मेवाड़ में प्रवेश कर मांडल मोही, मदारिया, ऊंटाला आदि में अपने थाने स्थापित कर दिए. राणा के हमले के समय भी अलफखां डटा रहा. अलफखां सादड़ी थाने पर था. यह नाथद्वारा से 24 किलोमीटर दूरी पर स्थित है.

उधर ऊंटाला में समसखां दृढ़ता से जमा हुआ था. इस थाने पर चूड़ावत शक्तावतों का एक साथ हमला हुआ पर समसखां हटा नहीं. राजप्रशस्ति महाकाव्य में लिखा है कि समसखां वहां मारा गया पर वह मरा नहीं था. राणा पर यह हमला सन 1599 (विक्रम 1656) में हुआ था.

इसके बाद जब सलीम जहांगीर के नाम से गद्दी पर बैठा तो उसने फतेहपुर का लाल मोहर का पक्का पट्टा अलफखां को कर दिया. [24] इसी समय अलफखां राव मनोहर के साथ मेवात गया. [25] वहां मेवातियों को दबाया गया. इधर बीकानेर का दलपत विद्रोही हो गया. उसने शाही सेनापति को हरा दिया. इस पर अलफखां कई सरदारों के साथ गया और उसने दलपत को पड़कर बादशाह के सामने प्रस्तुत किया. [26]

अलफखां ने भिवानी के जाटू जांवलों को मारकर भगा दिया. मेवात में विद्रोह होने पर उसे फिर भेजा गया. [27] बादशाह ने परवेज के साथ अलफ़ खां को दक्षिण में भेजा. खानजहां लोधी इस फौज का का सेनापति था. यह सन 1611 (विक्रम 1668) की घटना है. उस समय अहमदनगर में मलिक अंबर बड़ा प्रबल हो रहा था. बादशाही सेनापति अब्दुल्ला ने हमला किया पर उसकी सेना नष्ट हो गई. उसके हारते ही सारी फौज भी पीछे हटी पर अलफ खान अपने थाने पर दृढ़ता से जमा रहा.

अलफ खां अनेक मुहिमों पर जाता रहता था. तब फतेहपुर में उसका पुत्र दौलतखां राज काज चलाता था. बिदावतों को उसने दंड दिया. पाटोदा और

[पृ.115]: रसूलपुर के कछवाहा चोरी धाड़ा करते थे. उन्होंने सगर से पट्टी भी छीन ली. इस पर बादशाह ने दौलत खान को उन पर भेजा. दोनों पट्टी दौलत खान के नाम इनायत कर दी. इस पर दौलत खान ने आक्रमण कर दिया और माधोदास एवं नरहर दास [28] को भगाकर पट्टी पर अधिकार कर लिया. रासो के अनुसार यह नरहर दास का पुत्र नाहरखां भी भाग गया.[29]

बादशाह ने अलफखां को नरहर का परगना दिया तब उस पर अधिकार करने दौलतखां गया. [30] उसने पठान नवाब को हराकर नरहड़ पर कब्जा कर लिया. अलफ खां की वीरता से प्रसन्न होकर बादशाह ने उदयपुर और बारवा को अलफ खां की जागीर में कर दिया. उस समय शेखावत अलखा टकनेत का वहां पर अधिकार था. लड़ाई होने पर अलखा भाग गया और खोह (रघुनाथगढ़) में घुस गया. [31] दौलत खान की इस जीत से खंडेला में भी खलबली मच गई.

इसके बाद बादशाह ने अलफखां को कांगड़ा भेजा जहां राजा विक्रमाजीत की अध्यक्षता में यह बड़ी वीरता से लड़ा. इसने लखी जंगल में जाकर विजय पाई. इसके बाद फिर बार-बार कांगड़ा जाना पड़ा. उसने वहां पहाड़ियों का सख्ती से दमन किया. इस प्रकार अलफ खान दो बार दक्षिण में, तीन बार मेवात में और चार बार कांगड़ा की लड़ाइयों में गया. उसने तीन बार कच्छावाहों को भगाया. दो बार मेवाड़ और थट्टा में विजय भाई और लखी जंगल के विद्रोहियों का विद्रोह शांत किया. उसने सरसा में दलपत को भी पराजित किया. [32]

चौथी बार जब आलफ खां कांगड़ा था तो पहाड़ियों ने जोरदार आक्रमण किया. इसी समय सादिक खान मुगल सेनापति ने कुछ फ़ौज मदद पर भेजने को कहा. इस पर नाराज होकर उसने फौज भेज दी. अपने पास कम फौज रखी. पहाड़ियों ने जोरदार हमला किया. फल स्वरुप अलफखां वीरता पूर्वक युद्ध करता धाराशाही हो गया. [33] यह घटना 28 रमजान 1035 (विक्रम 1683) (1626 ई.) की है.

जहांगीरनामा में अलफखां के बारे में काफी वृत्त मिलता है. इसके अनुसार अलफ खां को कांगड़ा दुर्ग का अध्यक्ष बनाया गया और उसकी मनसब बढ़ाकर 1500 जात और 1000 स्वार का कर दिया. यह घटना 16 नवंबर, 1620 (1677 विक्रम) की है. आगे चलकर अलफ खान के मनसब में वृद्धि हुई. यह मनसब 2000 जात 1500 स्वार कर दिया गया. [34] यह घटना विक्रम 1678 की है. हिजरी 1032 में अलफ खान को पुन: कांगड़ा दुर्ग का अध्यक्ष बनाया गया. प्रारंभ में जब वह मुगल सेवा में गया तो उसकी मनसब 700/500 से भी कम था पर उसकी वीरता के कारण बराबर आगे बढ़ता गया.

झुंझुनू का समस खां (1599)

[पृ.115]:झुंझुनू का समस खां बराबर अपनी वीरता के कारण बादशाह का कृपा पात्र बना रहा. यह बात एक फरमान से ज्ञात होती है जो बाशाह ने सन 1604 में बीकानेर

[पृ.116]: के रायसिंह को भेजा था. इसमें समसखां के परिवार के देखभाल करने की बात कही गई है. [35] इससे ज्ञात होता है कि झुंझुनू में समस खान के भाई बंधु अब भी बराबर उसको तंग कर रहे थे जिसके फल स्वरुप उसे बार-बार झुंझुनू आना पड़ता और अपने कुटुंब की देखभाल करनी पड़ती थी.

मुनि अनंत कीर्ति के शिष्य ब्रह्म रायमल थे जिन्होंने झुंझुनू नगर में रहकर वहां संवत 1615 (1558 ई.) में श्रावण बदि 13 बुधवार को नेमीश्वर रास नामक रचना समाप्त की थी. कवि ने झुंझुनूं नगर का वर्णन करते हुए वहां के शासक के बारे में एक असाधारण बात कही है. साधारणतया राजा के नाम का उल्लेख किया जाता है पर कवि कहता है ग्राम का साहिब चौहान जाति का है. उसने सारे परिवार के राज करने की बात कही है. यह कवि का कथन सार युक्त है जो झुंझुनू राजघराने की कलह की ओर संकेत करता है. [36]

समसखां का प्रथम उल्लेख वि. 1656 (1599 ई.) और तदुपरांत सं. 1661 (1604 ई.) का मिलता है. उसका एक पट्टा विक्रम 1662 का मिलता है. उसके राज्यारोहण का समय ज्ञात नहीं है. संभव है कवि द्वारा इंगित स्थिति इसी के समय की हो. समस खां की मोहर और दस्तखत पटट्टे पर है. मोहर पर 'बंदादरगाह रहमानी, समसखां कायमखानी' लिखा हुआ है.

अलफखां का शव फतेहपुर लाया गया. जहां उसे दफनाया गया. उसके पुत्र दौलतखां ने इस स्थान पर एक सुंदर मकबरा बनाया जो आज भी फतेहपुर में अच्छी हालत में मौजूद है.

अलफखां कायमखानियों का सबसे प्रबल नवाब था. जिसने अपने भूभाग को शेखावाटी में काफी विस्तृत कर लिया. उसने फतेहपुर के अतिरिक्त पाटोदा, रसूलपुर, उदयपुर, बारवा शेखावतों से छीन लिए और नरहड़ पठानों से छीन ली.

झुंझुनू एवं फतेहपुर के अतिरिक्त कायमखानियों के राज्य

[पृ.116]: शेखावाटी में झुंझुनू एवं फतेहपुर के अतिरिक्त और भी कायमखानियों के राज्य थे जिनका निर्देश पहले किया जा चुका है. केड नामक स्थान शेखावाटी के उदयपुर से 38 किलोमीटर उत्तर में कटली नदी के किनारे बसा हुआ है. कायमखां के साथ उसका भाई जबरूद्दीन भी मुसलमान हो गया . उसका चरखी, दादरी, कल्याणपुर पर अधिकार था जहां उसने वाक्यात के अनुसार संवत 1440 तक शासन किया और फिर अपने भतीजे के पास नागौर चला आया. आपस में रंजिश की शबब से उसने केड़ को अपनी राजधानी बनाया. उन दिनों इधर भयंकर जंगल था. जोड़ों से उसका मुकाबला हुआ जिसमें वह विजई हुआ. उसने यहां एक किले का निर्माण भी किया.

उसकी मौत होने पर फिरोजखां गद्दी पर बैठा. इसके संबंध में विशेष वृत्त ज्ञात नहीं है. उसके बाद दाऊदखां, मोहनखां, मुजफ्फरखां, हामिदखां, फतेहखां और

[पृ.117]: महावतखां ने क्रमश: शासन किया. वाकया निगारों के अनुसार संवत 1778 में केड़ कयाम्खानियों के कब्जे से निकल गई. जबरदी की औलाद जवबानी कहलाती है.

कायमखां का तीसरा पुत्र मौनखां (मोहनखां) वाकयात के अनुसार फतेहाबाद का हाकिम था. वह राजपूताने में नहीं आया. रासो उसके बगड़ में आने की बात कहता है. उसके पुत्र एलमखां ने बड़वासी (झुंझुनू से 30 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम) में अपनी राजधानी स्थापित की. संभव है उसे यह जागीर समसखां ने दी हो. दूसरा पुत्र वाहिदखां था. इस जागीर में 80 मौजे थे. एलम खां की संतान एलमाण और वाहिदखां की मोहनखानी कहलाई. उसके बाद उसका पुत्र महम्मूदखां इस भूभाग का मालिक हुआ. उसके बाद क्रमश: दरियाखां, मुजाहिदखां, अलफ खां, और निजामखां बड़वासी के नवाब हुए. निजामखां के 6 पुत्र थे उनके नाम अमानुल्लाखां, मदारीखां, राहतखां, नथ्थूखां, सैदुल्लाखां और आमदखां थे. अमानुल्लाखां के शेखावतों के हाथ मरने के बाद यह परिवार फर्रूखनगर (हरियाणा) के बिलोच उमराव के पास चला गया.

कायमखानी शेखावाटी के आसपास के स्थानों पर भी काबिज थे. जैनुद्दीन कायमखां के साथ मुसलमान हो गया था. कहते हैं कि उसकी हुकूमत नारनौल पर रही. इसका पुत्र नसीरुद्दीनखां डीडवाना के पास आ गया. उसके बेटे अलाउद्दीन ने बेरी (डीडवाना से पूर्व में 23 किलोमीटर) में राजधानी स्थापित की और वाक्यात के अनुसार इसने 1494 ईस्वी में यहां एक गढ़ बनाया. विक्रम 1556 तक इसने हुकूमत की. इसके दो पुत्र थे जिनके नाम आसल जी और तोगा जी थे. बड़ा आसाल जी गद्दी पर बैठा. उसने 1528 ई. (1585 विक्रम) में बेरी के पास एक तालाब बनवाया. यह किसी लड़ाई में मारा गया. इसके बाद क्रमशः तोगा जी, अब्दुल खैर, मुल्क फरीद और हबीखां नवाब हुए. इसने अपनी राजधानी बांसा (डीडवाना से दक्षिण पूर्व 9 किलोमीटर) में परिवर्तित कर ली. इसके बाद हयात खान का पुत्र आमिर खान नवाब बना. यह 1785 विक्रम में कुचामन के मेड़तिया ठाकुर जालम सिंह से लड़कर मारा गया. जालम सिंह सालावास की लड़ाई में बख्त सिंह की ओर से लड़ते हुए अपने दो पुत्रों के साथ विक्रम 1808 (ई 1751) में मारा गया था. इस प्रकार झाड़ोद पट्टी के ये गांव कायमखानियों के हाथ से निकल गए थे. जैनुद्दीन की संतान जेनदान कहलाती है. [37] इस वंश में ही मिल्कान, फारान, गौरान, गोदान चामनान, मतावान वगैरा हैं, झाड़ौद की पट्टी में 57 गांव थे जो आगे चलकर जोधपुर के अधीन हो गए.

सन्दर्भ

  1. फखरू तवारीस - मोलवी मोहम्मद रमजान फारुखी पृ.4
  2. कायमखां रासो - दशरथ शर्मा 5-38 प1 449
  3. वही - पृ.38 पद्य 452 - 456
  4. वही - पृ.40 पद्य 473
  5. वही - पृ.40 पद्य 474; चिरागे हयात - सैयद हैयात अली, रेवाड़ी
  6. फखरू तवारीख - फारुखी पृ.4-5
  7. फखरू तवारीख - फारुखी पृ.4-5
  8. फखरू तवारीख - फारुखी पृ.6
  9. कायम खां रासो पद्य 499 - बीका ढ़ोसी गयो हो उतते आयो भाजि। लून करण चित चोख धरी चल्यो उतही दलसाजि ॥ लूणकरण पाटोधा (लक्षमनगढ़ से 16 किमी दूर), नूआं , झुंझुनूं, नरहड़, सिंघाना, पचेरी होता हुआ ढोसी पहुंचा था. पाटोधे डेरा भयो तब पठए परधान। लून करण चिठ्ठी लिखी, करिके बहुत गुमान॥ रासो पृ. 500; नहवा निजाम झुंझुनूं झंप, काबाल नरहड़ि काढि कंप। सिंघाणउ पाअ गहि सैन मेल्हाण पचेरौ दीन्ह मेन॥ छंद राव जैतसीरो 81
  10. फखरू तवारीख - फारुखी पृ.6
  11. बीकानेर का इतिहास - ओझा प्रथम भाग ; दयालदास की ख्यात जिल्द 2 पत्र 8; मुंशी देवी प्रसाद - राव लूणकरण का जीवन चरित पृ. 51-52; वीर विनोद भाग 2 पृ. 48 ; पाऊलेट गजेटियर ऑफ़ बीकानेर स्टेट पृ. 11
  12. रासो - पृ. 41 पद्य 490, फ़तेहपुर परिचय - दिनमणि पृ. 28
  13. बीकावत ने सोचिके दूरि करि चित चोख, लूण करण बेटी दई , उपज्यो अति संतोष ॥ पद्य 581 पृ. 49
  14. कायम खां रासो - पद्य 621-628; फखरू तवारीख - फारुखी पृ.79
  15. कायम खां रासो - पद्य 621-628; फखरू तवारीख - फारुखी पृ.79
  16. कायम खां रासो - पद्य 621-628; फखरू तवारीख - फारुखी पृ.79
  17. कायम खां रासो पृ.55 पद्य 650
  18. फखरू तवारीख - फारुखी पृ.7-8
  19. कायमखां रासो छंद 658, p.56; फखरू तवारीख - फारुखी पृ.8-9
  20. कायमखां रासो छंद 668, p.47
  21. रासो पृ.47 , फतेहपुर परिचय दिनमणि पृ.33
  22. रासो - दशरथ शर्मा, सं, पद्य 679, p.58
  23. अकबर नामा - अंग्रेजी अनुवाद खण्ड 3 पृ. 1115
  24. लाल मोहर का पक्का पट्टा वस्तुत: स्थाई अधिकार का द्योतक अधिकार-पत्र था. यह अंत्यंत विश्वसनीय व्यक्तियों को ही मिलता था; दिल्ली पतेर्भृत्यवरं जघ्ने कायमखांनकम्
  25. यह लूण करण शेखावत का पुत्र था इसका मनसब 1500 जात और 600 सवार था.
  26. रासो पद्यांक 702 से 718
  27. रासो पद्यांक 702 से 718
  28. सूजा के पुत्र गोपाल के 6 पुत्र थे. इन्में माधोदास बड़ा था. नरहर दास भैरू का पुत्र था. नाहर खां इसी नरहर दास का पुत्र था. इन पट्टियों पर इनका अधिकार था.
  29. नाहरखां ऐसे गयो जैसे जात सियार। यह नाहर खां वस्तुत: नरहर दास का पुत्र था जो उस समय इस पट्टी पर काबिज था.
  30. फखरू तवारीख - फारुखी पृ.5-10
  31. अलखा जी टकणैत राजपूत थे. वे दुर्गा के पुत्र नारायण दास के पुत्र थे. खोह, गूंगारा, पिपराली, और बारवा उनके अधिकार में थे. कहते हैं कि वे सिद्ध पुरुष थे.
  32. 43
  33. रासो पद्य सं. 933
  34. जहाँगीरनामा - ब्रजरलदास - काशी नगरी प्रचारिणी पृ.696
  35. वही पृ. 733
  36. यह फरमान बादशाह ने अप्रेल 1604 में बीकानेर के राजा रायसिंह को भेजा था. इस में समसखां की सेवाओं की प्रशंसा करते हुए रायसिंह को आदेश दिया गया था कि वह समसखां के सम्बन्धी और पुत्र जो झुंझुनू में रहते हैं उनकी अच्छी प्रकार देखभाल करें ताकि समस खां निश्चिन्त होकर शाही सेवा और भी निष्ठापूर्वक करता रहे. इससे उसकी स्थिति की जानकारी मिलती है. अडेस्क्रिप्टिव लिस्ट ऑफ़ फर्मानस निशास्-निदेशक पुरातत्व बीकानेर पृ.14
  37. रिपोर्ट मर्दुमशुमारी राव मारवाड़, 1894, पृ. 76,77

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