Raimal
| Author:Laxman Burdak, IFS (R) |


Raimal (रायमल) (r. 1488-1537 ई.) was thikanedar of Shekhawati in Rajasthan.
रायमल (r. 1488-1537 ई.)
स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.134-136
राव शेखा ने मृत्यु के पूर्व ही रायमल को अपनी ढाल तलवार देदी थी जो राज्याधिकार का सूचक चिन्ह था. शेखा की मृत्यु के बाद उसका कनिष्ठ पुत्र रायमल गद्दी पर बैठा.
[पृ.135]: रायमल अपने पिता की मृत्यु पर अमरसर में वैशाख सुदी 15 सं. 1545 (1488 ई.) में गद्दी पर बैठा. वह अपने पिता की सबसे छोटी संतान था पर पिता ने इसकी माता के प्रेम और इसके वीरत्व के कारण औरों को अधिकार से वंचित कर इसे अपना उत्तराधिकारी बनाया. रायमल ने गद्दी पर बैठते ही गौडों से पिता का बदला लेने की ठानी. आमेर के कछवाहों का भी इसमें सहयोग था. निदान गौडों ने रायमल से विवाह संबंध स्थापित कर संधि कर ली. गौड़ राव रिड़मल ने अपने पुत्री के दहेज के रूप में 51 गांव देकर बैर-भाव को शांत किया. [1]
रायमल ने ढ़ोसी के प्रसिद्ध युद्ध में भाग लिया था और युद्ध के समय इसने सहसा पक्ष परिवर्तन कर शेख अबीमीरा का साथ दिया था. ढ़ोसी की यह लड़ाई बीकानेर नरेश लूणकरण और शेख अबीमीरा के बीच हुई थी. लूणकरण नारनौल लूटने जाता था जो उस समय पठानों के अधिकार में था. बीकानेर के इतिहास (ओझा) के अनुसार यह लड़ाई वैशाख बदी तीज 1583 में हुई थी जिसमें छापर
[पृ.136]: द्रौणपुर के शासक कल्याणमल बिदावत और शेखावत रायमल के लूणकरण की शक्ति से भयभीत होकर पक्ष परिवर्तन करने के कारण लूणकरण अपने तीन पुत्रों के साथ मारा गया. [2]
रायमल का देहांत समान्यता विक्रम 1594 (1537 ई.) से माना जाता है. 'केसरी सिंह समर' में एक पद्य दिया गया है इसके अर्थ में भ्रांति उत्पन्न की गई है. [3] समर के उपयुक्त पद्य के अनुसार विक्रम संवत 1588 पोष सुदि 7 को इसकी मृत्यु होना माना जा सकता है. रायमल के 7 रानियां थी जिनसे सात पुत्र पैदा हुए:
- 1. गौड़ जी - मारोठ के राव रिड़मल की पुत्री,
- 2. सोलंकी जी - टोडा के राव मोकल की पुत्री,
- 3. निर्वाण जी - खंडेला के राव धीर सिंह की पुत्री,
- 4. निर्वाण जी - छापोली के राव आसल की पुत्री,
- 5. जोधा जी - सीमाऊ के राव नाहरसिंह की पुत्री,
- 6. टांकन जी - कुचोरा के रावत सुरजन की पुत्री,
- 7. भटियानी जी - खेजडली के राव जगत सिंह की पुत्री.
अमरसर पर रासा टांक का अधिकार
रायमल का बड़ा पुत्र सूजा अमरसर में अपने पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा. इसके गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद रासा टांक ने उस पर आक्रमण कर अमरसर पर अधिकार कर लिया था.
नागौर और गुजरात के सुल्तान मुस्लिम धर्म स्वीकार करने से पूर्व है टांक राजपूत थे. लाडनू के हिजरी 879 (1482 ई.) के शिलालेख में इस जाति का उल्लेख है. धर्म परिवर्तन के बाद भी वह टांक के नाम से जाने जाते रहे. रासा टांक नागौर के तत्कालीन शासक फिरोज तृतीय का कोई सरदार हो सकता है.
'रायमल जस सरोज' से ज्ञात होता है कि तत्कालीन बादशाह है शेरशाह (r.1540-1545) ने अमरसर को खालसा पर रासा टांक नमक सरदार को दे दिया था. इस पर सूजा बसई (बानसूर बसई) जाकर रहने लगा और वहां विक्रम 1604 के आसपास इसकी मृत्यु हुई.
सूजा की पुत्री सूरज कंवर का विवाह जैसाजी के पुत्र मांडण चंपावत से हुआ था जो रिणसी का अधिकारी था. (चंपावतों का इतिहास, 511)
इस प्रकार 17 वीं शती के प्रारंभ तक शेखावत का राज्य वर्तमान जिला जयपुर और वर्तमान राज्य के कुछ भूभाग, गौड़वाटी और तंवरवाटी के कुछ भूभागों तक फैल गया था. प्रचलित मान्यता के अनुसार उपर्युक्त भू-भागों में रायमल के समय तक 455 गांव शेखावतों के शासन अधिकार में हो गए थे. शेखावत शासन धीरे-धीरे विशुद्ध माने जाने वाले शेखावाटी के भूभाग की ओर बढ़ता जा रहा था.
See also
External links
References
- ↑ माधोवंश प्रकाश - जून्थाराम, पृ.39, शेखावाटी प्रकाश पंचम अध्याय, पृ.11
- ↑ बीकानेर का इतिहास - गौरीशंकर हीराचंद ओझा
- ↑ बरस अट्ठासी मास नव दीह सात दुयजाम। घड़ी चार गए तन तजहि गौ वैकुण्ठ धाम ॥