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Gaurawati

From Jatland Wiki
(Redirected from Gaurwati)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Gaurawati was area ruled by Gaur Kshatriyas around Maroth in Nagaur was known as Gaurawati.

Variants

गौड़ावाटी भू-भाग

राजस्थान के नागौर पट्टी का गौड़ावाटी भू-भाग दीर्घ काल तक गौड़ क्षत्रियों के आधिपत्य में रहा. गौडों द्वारा शासित होने के कारण ही इस भाग का गौड़ावाटी नाम प्रसिद्ध हुआ. गौडों की काव्य-बद्ध वंशावली में वर्णन है कि चौहान सम्राट पृथ्वीराज तृतीय के शासन-काल में बंगाल की और से अच्छराज तथा बच्छराज नामक दो भाई राजस्थान में आये और पृथ्वीराज ने उन उभय गौड़ भ्राताओं को साम्भर के पास मारोठ नामक भू-भाग जागीर में दिया | उस समय मारोठ के समीपस्थ गांवों में दहिया शाखा के क्षत्रियों का अधिकार था. तब दहियों का मुखिया बिल्हण था. गौड़ भ्राताओं ने दहियों पर आक्रमण कर वह भू-खंड भी हस्तगत किया. गौड़ भ्राता साहसी तो थे, पर उदार भी थे. उनकी उदारता प्रशंसा कालांतर में भी राजस्थान में प्रचलित रही. कवि दुर्गादत्त बारहट ने अपनी "निशानी दातारमाला " रचना में दोनों गौडों की उदार वृति की उन्मुक्त भाव से सराहना की है - अच्छा बच्छा गौड़ था अजमेर नगर कादान दिए तिस अरबदा कव द्रव्य अमर का[1]

इतिहास

राजस्थान के नागौर जिले का मारोठ परगना दीर्घ काल तक गौड़ क्षत्रियों के आधिपत्य में रहने के कारण गौड़ावाटी भू-भाग के नाम से आज भी प्रसिद्ध है.

1400-1410 ईस्वी में नयचन्द्र सूरि ने अपनी पुस्तक 'हम्मीर महाकाव्य' में मारोठ को 'महाराष्ट्र नगर' लिखा है. मारोठ का यह संस्कृत निष्ट नाम अठारहवीं शती तक की पुस्तकों और लेखों में मिलता है. अपभ्रंश में इसे महारोठ (मरुकोट्ट) लिखा गया है. चौदहवीं शताब्दी के किसी कालखंड गौड़ों ने यह क्षेत्र दहियों से छीन लिया.[2] [3] [4] [5]

मारोठ एक बहुत प्राचीन क़स्बा है जो संप्रति मारवाड़ के नागौर जिले में है. मारोठ पर पहले गौडों का राज्य था. [6] तवाराखां के अनुसार मरोठ को संवत 1114 (सन् 1057) में बछराज गौड़ ने माठा गौड़ के नाम से बसाया था. पहले यहाँ माठा गौड़ की ढाणी थी.[7]

गौड़ाटी के महाराजा रघुनाथ सिंहजी पुनलौता के ठाकुर राव सांवलदास मेड़तिया के छोटे पुत्र, व मीरा बाई के चचेरे भाई राव जयमल के पुत्र गोविन्ददास के पौत्र थे. वो दक्षिण में औरंगजेब के साथ थे और उत्तराधिकार के उज्जैन और धोलपुर के युद्धों में भी उनके पक्ष में लड़े थे और बादशाह औरंगजेब ने महाराजाधिराज महाराजा की पदवी व मारोठ–गौडावाटी सात परगनों सहित राजा रघुनाथ सिंह मेड़तिया को 140 गावों के वतन के रूप में दिया.[8] मारोठ का मान मंदिर व दुर्ग भारतीय कला के लिये विख्यात है.[9]

रायमल के समय शेखावत शासन

इस प्रकार 17 वीं शती के प्रारंभ तक शेखावत का राज्य वर्तमान जिला जयपुर और वर्तमान राज्य के कुछ भूभाग, गौड़वाटी और तंवरवाटी के कुछ भूभागों तक फैल गया था. प्रचलित मान्यता के अनुसार उपर्युक्त भू-भागों में रायमल के समय तक 455 गांव शेखावतों के शासन अधिकार में हो गए थे. शेखावत शासन धीरे-धीरे विशुद्ध माने जाने वाले शेखावाटी के भूभाग की ओर बढ़ता जा रहा था. [10]

गौड़ राजपूतों का पतन

गौड़ राजपूतों के वास्तविक पतन का कारण घाटवा युद्ध (1488) नहीं है , बल्कि धर्मत युद्ध (1658) है. गौड़ राजपूतों के इतिहास को लेकर सोशल मीडिया पर वर्षों से एक भ्रांति फैलाई जा रही है कि उनका पतन घाटवा के युद्ध (1488 ई.) के बाद हो गया था. यह धारणा ऐतिहासिक रूप से गलत है.

घाटवा युद्ध (1488 ई.) अवश्य हुआ था, जिसमें राव शेखा अपने पुत्रों सहित वीरगति को प्राप्त हुए. इस युद्ध में गौड़ राजपूतों को भी भारी क्षति पहुँची, किंतु यह युद्ध गौड़ राजपूतों के पतन का कारण नहीं बना.

युद्ध के पश्चात शेखावतों और गौड़ राजपूतों के बीच संधि हुई. यह संधि नारू जी की मध्यस्थता से संपन्न हुई. गौड़ राजपूतों के पट्टी नेता ने अपनी पुत्री का विवाह राव शेखा के पौत्र लूणकरण से किया. दहेज स्वरूप 50 गाँव दिए गए. यह स्पष्ट करता है कि घाटवा युद्ध के बाद गौड़ राजपूत नष्ट नहीं हुए, बल्कि राजनीतिक संतुलन बना रहा. हालाँकि, कछवाहों और गौड़ राजपूतों के बीच वैर आगे भी चलता रहा.

वास्तविक पतन: धर्मत का युद्ध (1658 ई.): गौड़ राजपूतों का वास्तविक और निर्णायक पतन धर्मत के युद्ध (1658 ई.) के बाद हुआ. इस युद्ध में गौड़ राजपूतों ने दाराशिकोह का साथ दिया. जबकि रघुनाथसिंह ने औरंगज़ेब का समर्थन किया. गौड़ राजपूतों के अनेक वीर योद्धा और सेनापति इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए. अर्जुन गौर जैसे महान योद्धा भी इसी युद्ध में शहीद हुए. औरंगज़ेब के बादशाह बनते ही उसके विरोधियों की जागीरें जब्त की जाने लगीं. गौड़ राजपूतों की वतन जागीर ‘मरोठ (गौड़ावाटी)’ छीन ली गई. यह जागीर रघुनाथसिंह मेड़तिया को दे दी गई. गौर राजपूतों ने औरंगज़ेब की अधीनता स्वीकार नहीं की, परिणामस्वरूप उन पर संगठित दबाव बनाया गया.

राजनीतिक गठजोड़ और गौड़ावाटी का विघटन: रघुनाथसिंह लडखानी शेखावतों के दामाद बागरू के राजावतों के भांजे थे. इनके सहयोग से गौड़ राजपूतों को चारों ओर से घेरा गया. कछवाहों, राठौड़ों और शेखावतों के बीच हुआ यह रक्तपात मरोठ–गौड़ावाटी से लेकर सरवार–केकड़ी तक फैल गया.

गौड़ावाटी का विभाजन: इस संघर्ष के बाद गौड़ावाटी का विभाजन इस प्रकार हुआ:

  • उत्तरी गौड़ावाटी: (सिंघासन, हुडील, दांता क्षेत्र) → लडखानी शेखावत
  • पूर्वी गौड़ावाटी: (रींगस, सरगोठ क्षेत्र) → उग्रसेन जी शेखावत व नाथावत
  • दक्षिणी गौड़ावाटी: (सांभर क्षेत्र) → खंगारोत व राजावत
  • पश्चिमी व मध्य गौड़ावाटी: (मरोठ, लिचाना, घाटवा, कुचामन, डेगाना) → रघुनाथसिंह जी मेड़तिया

परिणाम: वीरगति, विस्थापन और अल्पसंख्या - आज भी गौड़ावाटी में गौड़ राजपूत मिलते हैं, किंतु: संख्या अत्यंत कम है. अधिकांश ने जागीर बचाते हुए वीरगति प्राप्त की. जो बचे, वे अपने रिश्तेदारों के क्षेत्रों में चले गए. अलवर के गौड़ राजपूत इनमें प्रमुख हैं: केकड़ी, सरवार, श्रीनगर, फतेहगढ़ (अजमेर क्षेत्र) → किशनगढ़ रियासत के अधीन चले गए. मालपुरा के आसपास के गाँव → जयपुर रियासत में सम्मिलित हुए.

स्रोत: Indian warrior - भारतीय योद्धा army's Post, 4.1.2026

External links

References

  1. Source - Maroth news- मारोठ न्यूज़'s Post, 6.5.2017
  2. Rāghavendrasiṃha Manohara. "Rājasthāna ke rājagharānoṃ kā saṃskr̥tika adhyayana". Pañcaśīla Prakāśana, 1991.
  3. Surajanasiṃha Śekhāvata. "Rāva Śekhā: Śekhāvāṭī-saṅgha tathā Śekhāvata vaṁśa ke pravarttaka Rāva Śekhā kā jīvana-vr̥tta". Mahārāva Śekhā Smāraka Samiti, 1973.
  4. Nārāyaṇadāsa (Swami.). "Śrī Dādū Pantha paricaya: Dādū Pantha kā itihāsa". Śrīdādū Dayālu Mahāsabhā, 1978.
  5. Mannīlāla Śukla. "Nāgaura, unnīsasaupaiṃsaṭha". Economic assistance, Domestic Directorate of Public Relations, Rajasthan (India)., 1965.
  6. "Maru-Bhāratī, Volume 33". Biṛlā Ejyūkeśana Ṭrasṭa., 1985 - Rajasthani philology.
  7. "Maru-Bhāratī, Volume 33". Biṛlā Ejyūkeśana Ṭrasṭa., 1985 - Rajasthani philology.
  8. "महाराजा रघुनाथ सिंह जयन्ती". दैनिक भास्कर न्यूज़. 28 मार्च 2012.
  9. राजस्थानी कला : इतिहास का पूरक साधन". इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर दि आर्ट्स. 2003
  10. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.136