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Jhunjhunu

From Jatland Wiki
(Redirected from झुंझुनू)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Statue of Jujhar Singh Nehra, founder of Jhunjhunu town
Jhunjhunu district Map
Jhunjhunu district Map

Jhunjhunu (झुन्झुनू), is a town and district in Rajasthan. It was founded in the memory of Jat Chieftain Jhunjha or Jujhar Singh Nehra in 1730.

Variants of name

  • Jhinjhuyanava (झिन्झुयाणय) : Siddhasena Suri mentions name Jhinjhuyanava (झिन्झुयाणय) in Sarvatirthamala written in Vikram Samvat 1123 (1066 AD). (खंडिल्ल झिन्झुयाणय नराण हरसउर खट्टउएसु । नायउर सुद्ध देही सु सभरि देसेसु वंदामि ।। सिद्धसेन सूरि द्वारा विक्रमी 1123 में रचित सर्वतीर्थमाला)

झुंझुनू की प्राचीनता

झुंझुनू की प्राचीनता का उल्लेख अनेक जैन ग्रंथों में मिलता है. यह अनुसंधान का विषय है कि मूल झुंझुनू की स्थापना कब हुई लेकिन यह कहा जा सकता है कि झूंझा जाट के नाम पर इसकी स्थापना हुई तथा आगे चलकर कालांतर में उसने नगरीय रूप धारण कर लिया. यहाँ झुंझुनू से सम्बंधित सभी अभिलेखों/तथ्यों का क्रमवार विवरण दिया जा रहा है-

  • 79: ठाकुर देशराज ने लिखा है कि नेहरा गोत्र की उत्पत्ति वैवस्वत मनु के पुत्र नरिष्यंत (नरहरी) से मानी जाती है. पहले ये पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में नेहरा पर्वत पर निवास करते थे. मैगस्थनीज़ (350BC- 290BC) और प्लिनी (23–79 AD) ने इनको नरेई लिखा है, जो कि नेहरा के नाम से प्रसिद्ध हैं, कैपटेलिया नाम से घिरी हुई जगह में उनका स्थान बताया गया है. वहां से चल कर राजस्थान के जांगलदेश भू-भाग में बसे और झुंझुनू में नेहरा पहाड़ पर आकर निवास करने लगे. राजस्थान में नेहरा जाटों का तकरीबन 200 वर्ग मील भूमि पर किसी समय शासन रहा था. उनके ही नाम पर झुंझुनू के निकट पर्वत आज भी नेहरा पहाड़ कहलाता है. दूसरा पहाड़ जो मौरा (मौड़ा) है, मौर्य लोगों के नाम से मशहूर है.नेहरा लोगों में सरदार झुन्झा अथवा जुझार सिंह बड़े मशहूर योद्धा हुए हैं. उनके नाम से झूंझनूं जैसा प्रसिद्ध नगर विख्यात है. [1]
  • दलीप सिंह अहलावत[2] लिखते हैं: सूर्यवंशी वैवस्वत मनु के इक्ष्वाकु, नरिष्यन्त (उपनाम नरहरि) आदि कई पुत्र हुए। नरहरि की सन्तान सिंध में नेहरा पर्वत के समीपवर्ती प्रदेश के अधिकारी होने से नेहरा नाम से प्रसिद्ध हुई। इस तरह से नेहरा जाटवंश प्रचलित हुआ। जयपुर की वर्तमान शेखावाटी के प्राचीन शासक नेहरा जाट थे जिन्होंने सिंध से आकर नरहड़ में किला बनाकर दो सौ वर्ग मील भूमि पर अधिकार स्थिर कर लिया था। यहां से 15 मील पर इन्होंने नाहरपुर बसाया। उनके नाम से झुंझनूं के निकट का पहाड़ आज भी नेहरा पहाड़ कहलाता है। दूसरे पहाड़ का नाम मौड़ा (मौरा) है जो मौर्य जाटों के नाम पर प्रसिद्ध है। मुगल शासन आने से पूर्व शेखावत राजपूतों ने नेहरा जाटों को पराजित कर दिया और इनका राज्य छीन लिया। नेहरा जाटों की यह नेहरावाटी[3] आवासभूमि शेखावतों के विजयी होते ही शेखावाटी के नाम पर प्रसिद्ध हो गई।
  • 7वीं सदी: नेहरा पहाड़ नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है. इसके लिए किसी ने बोर्ड नहीं लगाया था. इससे जाहिर है कि झूंझा नेहरा गोत्र का था. झुंझुनू में 'नू' शब्द आता है जो गुजराती से सम्बन्ध रखता है. गुर्जर काल में स्वाभाविक रूप से इस क्षेत्र पर गुजराती का प्रभाव रहा है. जैन संस्कृति और जैन मुनि भी गुजरात से आते थे. इससे प्रकट है कि झुंझुनू छठी-सातवीं सदी में बस गया था. हमारे यहां नू शब्द के बहुत कम गांव या शहर हैं जैसे लाडनूं आदि. यह शब्द प्राचीनता को प्रकट करता है. [4]
  • 7वीं सदी: इतिहासकार मोहन सिंह के अनुसार उन्होंने और लेखक कवि राम अवतार शर्मा ने एक पुरानी बही देखी. जिसके आरंभ में संस्कृत में लिखा था- झुंझा मेरी रक्षा करे. इससे प्रकट होता है कि झुंझा न केवल एक वीर योद्धा था बल्कि लोक देवता के रूप में भी पूजा जाता था. ऐसा व्यक्ति स्वतंत्र सत्ता के आधार पर ही उभर सकता था जिसने स्वयं ने आम-प्रजा के हित में कार्य किए हों. उसका नाम पीढ़ी दर पीढ़ी मिथक के रूप में चलता रहा. यह प्राचीनता को प्रकट करता है.[5]
  • 7वीं सदी: प्रसिद्ध इतिहासकार ठा. हरनाथसिंह डूंडलोद ने अपनी पुस्तक झुन्झुणु में झुंझुनू की स्थापना गुर्जर काल में सातवीं सदी में मानी है.[6]
  • 8वीं सदी: इतिहासकार मोहन सिंह का मानना है कि जैन मुनियों की पट्टावली के आधार पर यह सुनिश्चित है कि झुंझुनू आठवीं सदी से आबाद है.[7]
  • 8वीं सदी: जाट परिवेश[8] के अनुसार प्राचीन नरहड़ क्षेत्र एवं जैन प्रमाणों के आधार पर कुछ इतिहासकार झुंझुनू का अस्तित्व 8वीं शताब्दी में बताते हैं।
  • 10वीं सदी: सुविख्यात शोधक श्री अमरचंद नाहटा लिखते हैं की दसवीं सदी में झुंझुनू एक बड़ी आबादी वाला शहर था.
  • 961-973: सुप्रसिद्ध इतिहास का डॉ. दशरथ शर्मा का उल्लेख करते हुए ठा. हरनाथ सिंह ने लिखा है कि नौवीं शताब्दी के हर्ष के शिलालेख में झुंझुनू के नाम का उल्लेख हुआ है. (?)
  • 983 : सुरजन सिंह शेखावत ने 'शेखावाटी प्रदेश का प्राचीन इतिहास' (पृष्ट. 113) में लिखा है कि जोड़ चौहानों के पुरखा राणा सिद्धराज ने विक्रम शब्द 1040 (=983 ई.) में झुंझुनू तथा उसके आसपास के प्रदेश का अधिकार डाहलियों का पराभव करके हस्तगत किया था. [9]
  • 988: झुंझुनू मंडल का इतिहास पुस्तक में इतिहासकार कुंवर रघुनाथ सिंह शेखावत ने वर्णन किया है कि आसलपुर के चौहान बड़वों की बही से ज्ञात होता है कि विक्रम संवत 1045 (=988 ई.) में झुंझुनू का राजा सिद्धराज चौहान था. [10]
  • 1019 : सन 1019 में कविवर वीर ने 'जम्बू चरित्र' नमक अपभ्रंश काव्य की रचना की जो झुंझुनू में ही लिखा गया. इसमें झुंझुनू के जैन मंदिरों का उल्लेख मिलता है.[12]
  • 1024: झुंझुनू की प्राचीनता का उल्लेख जैन ग्रंथों में मिलता है. यह बात पूरी तरह ज्ञात नहीं है कि इसकी स्थापना कब हुई लेकिन यह कहा जा सकता है कि जूझा जाट के नाम पर इसकी स्थापना हुई तथा आगे चलकर कालांतर में उसने नगरीय रूप धारण कर लिया. भाटों और चारणों के अनुसार झुंझुनू क्षेत्र पर 12वीं सदी में जोड़ चौहानों का अधिकार रहा था तथा उस समय इस स्थान को जोड़ी झुंझुनू कहते थे. इस मान्यता के अनुसार कुछ काल पश्चात जोड़ यहां से विस्थापित होकर बेरी तारपुरा के आसपास बस गए. [13]
  • 1024: :Chauhan Dhandhu had founded Dhandhu. Indra could not become Rana on death of his father. Indra had descendants Arjan and Sarjan. Arjan and Sarjan fought with Goga for Dadrewa when Rana Jhawer died. Goga defeated them. This war took place before 1024 AD since Goga died in 1024 AD fighting with Mohammad Ghazni. Arjan and Sarjan moved to a place named Jodi in Churu district. Their descendants were called Jod Chauhans. After death of Arjan and Sarjan their descendants moved in south and established in Narhar and Jhunjhunu. (Devi Singh Mandawa, p.138-39)
  • 1066 : Siddhasena Suri mentions name Jhinjhuyanava (झिन्झुयाणय) in Sarvatirthamala written in Vikram Samvat 1123 (1066 AD). (खंडिल्ल झिन्झुयाणय नराण हरसउर खट्टउएसु । नायउर सुद्ध देही सु सभरि देसेसु वंदामि ।। सिद्धसेन सूरि द्वारा विक्रमी 1123 में रचित सर्वतीर्थमाला)
  • 1066: रतन लाल मिश्र लिखते हैं कि कई पुस्तकों में महमूदखां द्वारा झुंझुनूं बसाने की बात झूंझा जाट के प्रसंग से कही गयी है. [15] झुंझुनूं नगर के इसके पूर्व के बसने के प्रमाण जैन ग्रंथों में मौजूद हैं. 14 वीं शती के कई उद्धरण जैन ग्रंथों में मौजूद हैं जिससे इस नगर की प्राचीनता सिद्ध होती है. सिद्धसेन सूरि द्वारा विक्रमी 1123 (1066 ई.) में रचित सर्वतीर्थमाला में झुंझुनूं का वर्णन इस प्रकार किया गया है - "खंडिल्ल झिन्झुयाणय नराण हरसउर खट्टउएसु । नायउर सुद्ध देही सु सभरि देसेसु वंदामि ।। "[16]
  • 1243: We also find mention the name of Jhunjhunu (झुंझुणु) in a document of V.S. 1300 (1243 AD) in Magazine 'वरदा '. (संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य साह गोपाल प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु वास्तव्य - वरदा वर्ष 7 अंक 1)
  • 1243: गोविंद अग्रवाल ने 'चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास' (फुटनोट-4, p.70) में लिखा है कि वास्तव में झुंझुनू विक्रम संवत 1300 (सन् 1243 ई.) से पूर्व का बसा हुआ है. खतरगच्छीय युग प्रधानाचार्य गुरुवावली में संवत 1300 (सन् 1243 ई.) में झुन्झुनुका उल्लेख मिलता है....संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य सा. गोपाल प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु - वरदा वर्ष 7 अंक 1.
  • 1243: रघुनाथ सिंह शेखावत ने अपनी इसी पुस्तक में माना है कि जैन मुनियों की गुरुवावलीसे सिद्ध है कि 1243 ई. में झुंझुनू आबाद था. खतरगच्छीय युग प्रधानाचार्य गुरुवावली (चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पृष्ठ.70) का एक श्लोक रघुनाथ सिंह ने उद्धत किया है- संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य सा. गोपाल-प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु वास्तव्य - वरदा वर्ष 7 अंक 1. इसमें नुआं और झुंझुनू का नाम आया है.[19]
  • 1243: विद्वान लेखक और इतिहासकार उदयवीर शर्मा ने अपनी खोज पत्रिका 'वरधा' के वर्ष 7 अंक 1 में खतरगच्छीय प्रधानाचार्य गुरुवावली के संदर्भ में उल्लेख किया है कि झुंझुनू 1243 ई. से बहुत पहले स्थापित हो चुका था[20].....संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य सा. गोपाल प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु - वरदा वर्ष 7 अंक 1.
  • 1243 :इसी प्रकार वरदा में प्रकाशित जानकारी से संवत 1300 (1243 ई.) में झुंझुनूं का उल्लेख इस प्रकार किया गया है- "संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य साह गोपाल प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु वास्तव्य - [21]
  • 1328-1332 : जैन मुनि जिनप्रभ सूरि ने उनके ग्रंथ विविध तीर्थ कल्प में जैन तीर्थों का विवरण दिया है जिसमें झुंझुनू भी सम्मिलित है. यह मुनि मोहम्मद तुगलक से संवत 1385 (1328 ई.) में दिल्ली में मिला था और पुस्तक का अंतिम भाग 1332 में लिखा था.[23] [24][25]
  • 1443: नैणसी की ख्यात में उल्लेख है कि मोहम्मदखां क्यामखानी ने विक्रम संवत 1500 (=1443 ई.) के लगभग झुंझा चौधरी के नाम पर झुंझुनू बसाया था. नैणसी की ख्यात के अनुसार कायम खां हिसार का फौजदार हुआ. तब उसने अपने लिए कोई ठिकाना बांधना विचारा. झुंझुनू का स्थान उसके चित पर चढ़ा और वहां के चौधरी को बुलाकर कहा कि यदि तुम्हारी इजाजत हो तो हम यहां अपने रहने को एक मकान बनवा लें. चौधरी ने कहा, "बहुत अच्छी बात है यहां आबादी करो परंतु इस स्थान के साथ मेरा भी कुछ नाम रहना चाहिए". चौधरी का नाम झूंझा था इसी से कस्बे का नाम झुंझुनू दिया. झुंझुनू की भूमि में ही फतेहपुर बसाया. इस कायम खां के वंश के कायम खानी कहलाए. (नैणसी की ख्यात, भाग 1, पृ.196; गोविंद अग्रवाल, 'चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास', p.70)
  • 1443: पंडित झाबर मल शर्मा ने 'सीकर का इतिहास' (पृ.61, 62,64, फूट नोट) में नैणसी की ख्यात के सन्दर्भ से झूंझा जाट के नाम पर झुंझुनू बसाना लिखा है. (गोविंद अग्रवाल, 'चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास', p.70)
  • 1387 : रतन लाल मिश्र लिखते हैं कि 'वाकयात कौम कायमखानी' में झुंझुनूं का बसना 1444 (=1387 ई.) वि. माह बदी 14 शनिवार बताया गया है. इस बात की संभावना हो सकती है कि कायमखानियों ने झुंझुनूं को नए सिरे से भवनादिकों से सज्जित किया हो. फ़तेहखां के साथ-साथ ही मुहम्मदखां का पुत्र शम्सखां आया जिसने शेखावाटी के उत्तरी भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित किया. [28]
  • 1459 : शम्सखां के झुंझुनूं में अपना शासन स्थापित करने संबंधी एक उल्लेख त्रैलोक्य दीपक की प्रशस्ति में भी मिला है. इसके अनुसार सं. 1516 (=1459 ई.) में झुंझुनूं में शम्सखां का शासन था.[29]
"स्वस्ति संवत 1516 आषाढ़ सुदी पांच भोमवासरे झुंझुनूं शुभ स्थाने शाकी भूपति प्रजापालक समस्खान विजय राज्ये"
रतन लाल मिश्र लिखते हैं कि 'वाकयात कौम कायमखानी' के अनुसार शम्सखां ने एक तालाब बनवाया जो आज भी शम्स तालाब के नाम से प्रसिद्ध है. इसके पक्के घाट और सीढियां हैं. इसने 20 वर्ग मील क्षेत्र में एक बीड़ छोड़ा जिसमें जानवर चरते हैं. इसने कुछ पुख्ता कूवे भी बनवाए. इसी नवाब ने शम्सपुर नामक गाँव आबाद किया जो झुंझुनूं से 4 मील पूर्व में बसा हुआ है. शम्सखां कि मृत्यु झुंझुनूं में हुई जहाँ इसका एक पुख्ता गुम्बद मौजूद है. [30]
  • 1459: विक्रम की 16वीं सदी में कायमखानी नवाबों ने झुंझुनू पर अधिकार कर लिया. संवत 1516 (=1459 ई.) में झुंझुनू नगर में भट्टारक जिनचंद्र सूरी और मुनि सहस्त्र कीर्ति के शिष्य तिहुणा ने 'त्रलोक्य दीपक' की प्रतिलिपि करके अपने गुरु जिनचंद्र को भेंट की. पंचमी व्रत के उद्यापन के उपलक्ष में प्रस्तुत ग्रंथ की प्रतिलिपि कराकर जिनचंद्र को भेंट किया गया था. इस ग्रंथ की पुष्पिका के अनुसार संवत 1516 में शम्सखां कायमखानी झुंझुनू का शासक था. खतरगच्छीय युग प्रधानाचार्य गुरुवावली में शेखावाटी के नवहा (नुआं), नरभट (नरहड़) और झुंझुनू का उल्लेख आता है. [31]
  • 1558: रतन लाल मिश्र[32] ने लिखा है: [पृ.116]: मुनि अनंत कीर्ति के शिष्य ब्रह्म रायमल थे जिन्होंने झुंझुनू नगर में रहकर वहां संवत 1615 (1558 ई.) में श्रावण बदि 13 बुधवार को नेमीश्वर रास नामक रचना समाप्त की थी. कवि ने झुंझुनूं नगर का वर्णन करते हुए वहां के शासक के बारे में एक असाधारण बात कही है. साधारणतया राजा के नाम का उल्लेख किया जाता है पर कवि कहता है ग्राम का साहिब चौहान जाति का है. उसने सारे परिवार के राज करने की बात कही है. यह कवि का कथन सार युक्त है जो झुंझुनू राजघराने की कलह की ओर संकेत करता है. यह फरमान बादशाह ने अप्रेल 1604 में बीकानेर के राजा रायसिंह को भेजा था. इस में समसखां की सेवाओं की प्रशंसा करते हुए रायसिंह को आदेश दिया गया था कि वह समसखां के सम्बन्धी और पुत्र जो झुंझुनू में रहते हैं उनकी अच्छी प्रकार देखभाल करें ताकि समस खां निश्चिन्त होकर शाही सेवा और भी निष्ठापूर्वक करता रहे. इससे उसकी स्थिति की जानकारी मिलती है. [33]
  • ठाकुर देशराज[34] ने लिखा है ...नेहरा लोगों के प्रसिद्ध सरदार जुझार सिंह का जन्म संवत 1721 (=1664 ई.) विक्रमी श्रावण महीने में हुआ था. उनके पिता नवाब के यहाँ फौज के सरदार यानि फौजदार थे. युवा होने पर सरदार जुझार सिंह नवाब की सेना में जनरल बन गए. सरदार जुझार सिंह ने झुंझुनू और नरहड़ के नवाबों को परास्त कर दिया और बाकि मुसलमानों को भगा दिया. सरदार जुझार सिंह का तिलक करने के बाद एकांत में पाकर विश्वास घात कर शेखावतों ने सरदार जुझार सिंह को धोखे से मार डाला. झुंझुनू का मुसलमान सरदार जिसे कि सरदार जुझार सिंह ने परास्त किया था, सादुल्ला नाम से मशहूर था. झुंझुनू किस समय सादुल्लाखान से जुझार सिंह ने छीना इस बात का वर्णन निम्न काव्य में मिलता है सत्रह सौ सत्यासी, आगण मास उदार, सादे लीन्हो झूंझणूं, सुदी आठें शनिवार. अर्थात - संवत 1787 (=1730 ई.) में अघन मास के सुदी पक्ष में शनिवार के दिन झुंझुनू को सादुल्लाखान से जुझार सिंह ने छीना. जुझार अपनी जाति के लिए शहीद हो गया. वह संसार में नहीं रहे , किन्तु उनकी कीर्ति आज तक गाई जाती है. झुंझुनू शहर का नाम जुझार सिंह के नाम पर झुन्झुनू पड़ा है.

झुंझुनूं के नवाबों की सूची

झुंझुनूं के नवाबों की सूची इस प्रकार है -

1. मोहम्मदखां 2. समसखां 3. फ़तेहखां
4. मुबारकशाह 5. कमालखां 6. भीकनखां
7. मोहब्बतखां (1552) 8. खिज्रखां 9. बहादुरखां
10. समसखां सानी (1599) 11. सुल्तानखां 12. वाहिदखां
13. सादतखां 14. फाजिलखां (1721) 15. रोहिल्लाखां (1730)

झुंझुनूं के अंतिम नवाब रोहिल्लाखां थे. यह 1730 में शार्दूलसिंह शेखावत के अधीन हुआ.

Location

Jhunjhunu is located at 29°6' North, 75°25' East. Jhunjhunu is the administrative headquarters of Jhunjhunu District. It is located 180 km from Jaipur, 230 km from Bikaner and 245 km from Delhi. The town is famous for the frescos on its grand Havelis and special artistic feature of this region.

Jat Gotras

See complete List of Jat Gotras in Jhunjhunu District

Tahsils in Jhunjhunu district

Villages in Jhunjhunu tahsil

Location of villages around Jhunjhunun in north
Location of villages around Jhunjhunu district in south

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History

Rani Sati Temple Jhunjhunu

It is said that is was ruled over by the Chauhan Dynasty in the Vikram era 1045, and Sidhraj was a renowned king. In the year 1450 Mohammed Khan & his son Samas Khan defeated the Chauhans and conquered Jhunjhunu.[35]

The Sundha inscription of Chachigadeva Chauhan of year S.V. 1319 (1263 AD) mentions about the Naharachala (नहराचल) mountain. [36]

Dasharatha Sharma in "Early Chauhan Dynasties" [Page-176] writes about Jalor Chauhan ruler - Chachigadeva, the son and successor of Udayasimha of him we have five inscriptions ranging from V. 1319 to V.1333. The earliest is the Sundha Inscription of V. 1319 edited by Dr. Kielhorn in EI, IX. pp. 74ff.

"Hating his enemies as thorns" states the Sundha Inscription "he destroyed the roaring Gurjara lord Virama," enjoyed the fall of the tremulous (or leaping) Patuka, deprived Sanga of his colour and acted as a thunderbolt for the mountain, the furious Nahara".
स्फूर्जद्-वीरम-गूर्जरेश-दलनो य: शत्रु-शल्यं द्विषंश्-
चञ्चत-पातुक-पातनैकरसिक: संगस्य रंगापह:
उन्माद्दन्-नहराचलस्य कुलिशाकर:.... (Verse-50)

Dasharatha Sharma writes that The "furious Nahara" of the inscription is unidentifiable. But we know that Naharachala (नहराचल) means Nehra Mountain and that there is a mountain in Jhunjhunu called Nehra-Pahad which in Sanskrit is called Naharachala (नहराचल). Thus the existence of name Naharachala, obviously after Nehras, proves that they were rulers in Jhunjhunu in Vikram Samvat 1319 (1263 AD). [37]

The antiquity of Name Jhunjhunu is proved from the fact that Jhunjhunu finds mention in two Digambara literary records of 15th century, as a place full of Jina temples.[38][39]

Kayamkhani ruler Mohammed Khan was first Nawab of Jhunjhunu. Then his son Samas Khan ascended the throne in the year 1459. Samas khan founded the village Samaspur and got Samas Talab constructed. [40]

Jhunjhunu was ruled over by of the following Nawabs in succession:

Mohammed Khan Samas Khan Fateh Khan
Mubark Shah Kamal Khan Bheekam Khan
Mohabat Khan Khijar Khan Bahadur Khan
Samas Khan Sani Sultan Khan Vahid Khan
Saad Khan Fazal Khan Rohilla Khan

Rohilla Khan was the last Nawab of Jhunjhunu. The Nawabs ruled over Jhunjhunu for 280 years. Shardul Singh occupied jhunjhunu, after the death of Rohilla Khan in 1730.


Jhunjhunu is an old and historical district, having its own district headquarter, no authentic proof as yet, when this city was founded and by whom. It is said that it was ruled over by the Chauhan Dynasty in the Vikram era 1045, and Sidhraj was a renowned king. [41]

In the year 1450 Mohammed Khan & his son Samas khan defeated the Chauhans and conquered Jhunjhunu. Mohammed Khan was first Nawab of Jhunjhunu. Then his son Samas khan ascended the throne in the year. 1459. Samas khan founded the village Samaspur and got Samas Talab constructed. Rohilla Khan was the last Nawab of Jhunjhun. The Nawabs ruled over Jhunjhunu for 280 years. [42]

Shardul Singh was Diwan of Rohilla Khan. Shardul Singh was a very courageous, bold, brave and efficient administrator. He occupied Jhunjhunu, after the death of Rohilla Khan in 1730. Shardul Singh had occupied (usurped) Jhunjhunu & ruled over it for twelve years. After his death, the estate was divided equally among his five sons & they continued to rule over it till India achieved freedom Shardul Singh was a man of religious bent of mind, as he built many temples such as Kalyan Ji Mandir & Gopinath Ji Ka mandir at Jhunjhunu. To commemorate the sweet memory of his father, his sons made a monumental dome at Parasrampura. Its “fresco painting” is worth seeing.[43]

Shardual Singh had three marriages. He had six sons from them namely 1. Jorawar Singh, 2. Kishan Singh, 3. Bahadur Singh, 4. Akhay Singh, 5. Nawal Singh and 6. Keshri Singh. Unfortunately, his son Bahadur singh had expired in an early age. As a result his estate was divided into five equal shares. The administration by his five sons was cumulatively known as “Panchpana”. All the five sons of Shardul Singh were very brave and capable and efficient rulers. They raised many new villages, towns, forts and palaces; they encouraged the Seths (Merchants) for trade. As a result, they grew rich and made many Havelies. The fresco-paintings of these havelies clearly speak about that glorious period & prosperity. Moreover the rich merchants made the wells ponds, bawaries, temples and inns at various places. They are the examples of industrial architectural excellence. These havelies hails a large number of tourists every year. They keep wonder struck at the paintings etc. The fresco-painting probably came in to existence in the eighteenth century. It was during the period of Shardual Singh that fresco painting was in much vogue. [44]

There are hundreds of such havelies in the prominent towns of the district such as Jhunjhunu, Nawalgarh, Mandawa, Mukundgarh, Dundlod, Chirawa, Bissau, Mahansar, Pilani etc. which bear the wonderful fresco painting in various everlasting colours and designs. In Nutshell Jhunjhunu is very rich in presenting the glorious ancient monument. The temples, mosques, forts, palaces, tombs, wells, step wells, cenotaphs and havelies of excellent fresco-paintings of Junjhunu speak with full throated ease about the glorious past of district. They are the master pieces of art and architecture. [45]

शार्दूलसिंह शेखावत (1681-1742)

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.152, पृ.166-172


[पृ.152]: जुझार सिंह मृत्यु के बाद जगरामसिंह पहले गुढा में स्थापित हुआ. आगे चलकर इसे उदयपुर का भी आधा भाग मिला. यह भी शाही सेवा में था. इसने हरिपुरा की लड़ाई से पलायन किया था. इसकी दो स्त्रियों से पांच पुत्र पैदा हुए: 1.कुशलसिंह, 2.सुखसिंह, 3.गोपासिंहल, 4.शार्दूलसिंह, 5.सलहदीसिंह


[पृ.166]: पिछले अध्याय में जगराम सिंह तक का वृत्त दिया गया है. जगराम सिंह के पांच पुत्रों में शार्दूलसिंह प्रतापी हुआ. बाकी भाइयों में पूर्व निश्चित विभाजन सिद्धांत के अनुसार जगराम सिंह की जागीर का बटवारा हुआ. आगे चलकर शार्दुल सिंह ने झुंझुनू नरहड़ और उदयपुर आदि महालों के भूभाग सवाई जय सिंह से इजारे पर ले लिए जिसका संक्षिप्त विवरण पिछले पृष्ठों में किया गया है.

शेखावाटी के इतिहास की यह एक बड़ी विसंगति है कि कुछ लेखकों ने विस्तृत परिपेक्ष में बात को पूरी तरह नहीं समझ सकने के चारण भाटों के अनुसार एवं जातीय प्रेम के आग्रह के कारण इस इजारे में लेने की बात को विजय की संज्ञा दी है. वास्तुत: यह विजय नहीं थी, यह खरा इजारा था. साधारण कोटि के लोगों के लिए राजस्व वसूली के अधिकार और प्रशासनिक अधिकार में कोई विशेष अंतर नहीं था. अत: इसे विजय की संज्ञा से अभिहित किया गया. देश की तत्कालीन परिस्थितियों में यह विजय की बात हास्यास्पद लगती है.[46]

उस समय के झुंझुनू क्षेत्र की स्थिति का विहंगावलोकन करने से स्थिति स्पष्ट हो सकेगी. उस समय मुग़ल साम्राज्य तीव्र गति से अवनति की ओर अग्रेसित हो रहा था. प्रांतीय प्रशासन के निर्बल होने से पडौसी राज्यों को हड़पने और लूट मार करने की प्रवृति छोटे-छोटे सरदारों में निरंतर बढ़ रही थी.

झुंझुनू क्षेत्र पर उस समय मोहम्मद रूहेलाखां का मुगल मनसबदार के रूप में प्रशासन था. सारा क्षेत्र तीन तरह से बंटा हुआ था. कुछ भाग मुस्लिम जागीरदारों की जागीर में था, कुछ भाग रुहेलाखां के अधीन था और कुछ भाग सीधा खालसे में था.


[पृ.167]: सवाई जय सिंह ने सर्वप्रथम सन 1726 (विक्रम 1783) और ई.1727 (विक्रम 1784) में झुंझुनू में हस्तक्षेप किया. उसने इन जगीरों को इजारे पर ले लिया. इस्लाम खां की जागीर के गांवों में से कुछ गांव महाराजा के प्रतिनिधि हरिसिंह ने सन 1727 में फाजिल खां कायमखानी नवाब को राजस्व वसूली के लिए इजारे पर दिए. छोटी जागीर में राजस्व वसूली अमीलों द्वारा करवाई जाती रही. बड़ी जागीर में से 19 गांव आगे चलकर रूपवास आदि के शेखावतों को इजारे पर उठा दिए गए. 23 गांवों को शार्दूलसिंह को तथा 35 गांव कायमखानियों को राजस्व वसूली हेतु दिए गए थे. कायमखानी उप-इजारेदार अपने आप को नवाब कहते थे तथा कर वसूली करते थे.

सन 1727 (1784 विक्रम) में नवाब मुजफ्फरखां अजमेर का सूबेदार नियुक्त हुआ. यह सवाई जयसिंह का खास समर्थक था. अगले वर्ष जयसिंह ने सारा अजमेर सूबा (हवेली को छोड़कर) इजारे पर ले लिया. यह इजारा पौने दो लाख रुपए में था जिसकी अवधि शुरू में एक वर्ष की थी. इसके साथ ही एक लाख की राशि में सवाई जयसिंह ने गांवड़ी, बवाई, झुंझुनू, उदयपुर और नरहड़ के पांच महाल भी इजारे पर प्राप्त कर लिए. इन्हें इजारे पर लेने की कार्यवाही पोष सुदी 7 संवत 1787 (दिसंबर-जनवरी 1730-31) को संपन्न हुई थी. [47]

उपर्युक्त महालों को इसी साल इजारेदारों में बांट दिया गया. यह उप-इजारेदार थे हरिसिंह छाबड़ा, मोहनसिंह नाथावत व शार्दूलसिंह शेखावत. जयपुर कागजातों से सिद्ध है कि मंगसिर बदी 12 संवत 1787 को मोहन सिंह नाथावत ने अपने इजारे की जमानत दी थी. इसी के आसपास 10 दिन बाद जमानत देखकर शार्दूलसिंह ने भी झुंझुनू एवं कुछ अन्य गांव इजारे पर ले लिए. इसी इजारे पर लेने की बात को शार्दुलसिंह द्वारा झुंझुनू की विजय बताया गया है.[48] नरहड़ पर भी इसी प्रकार विजय बताई गई है. तथ्य का यह विकृत प्रकाशन है.

इजारे के गांवों में परिवर्तन होता रहता था. विजय होती तो यह परिवर्तन संभव नहीं था. सन 1731-32 में शार्दुल सिंह से नरहड़ का क्षेत्र वापस ले लिया गया और गांवड़ी, बवाई और उदयपुर के साथ हरिसिंह को दे दिया गया. [49]


[पृ.168]: शार्दूलसिंह को इसके बदले पौने 28 गांवों का इजारा उदयपुर, गांवड़ी और बवाई महालों से दिया गया. इन गांवों तथा झुंझुनू के लिए ₹520001 की राशि निर्धारित की गई. [50]

एक साल के इजारे की अवधि समाप्त होने पर इस राशि को रु. 71000/- कर दिया गया. शार्दुल सिंह ने इस बढ़ी हुई राशि पर इजारा लेना अस्वीकार कर दिया. इस संबंध में रिखबदास ने शाह विजेराम को जो पत्र लिखा है उससे स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है. इससे अच्छी प्रकार ज्ञात होता है कि वस्तुत: यह इजारा था. [51]

शार्दूलसिंह ने बाद में इजारा लेना स्वीकार कर लिया जब उसने देखा कि उसका लड़का जोरावर सिंह ₹10000/- अधिक देखकर आधा झुंझुनू का इजारा लेने पर उतारू है.

इस इजारे की बात को विजय बताते हुए झुंझुनू के नवाब रूहेलाखां के मरने के बाद संवत 1787 में शार्दुल सिंह द्वारा झुंझुनू लेने की बात कही गई है.[52] यह निराधार बात है. सही स्थिति यह है कि नवाब रूहेलाखां के 1788 तक वर्तमान रहने एवं फतेहपुर की लड़ाई में लड़ने के प्रमाण विद्यमान हैं. [53] ऐसी स्थिति में नवाब की मृत्यु कोरी कल्पना है.

कर्नल टॉड द्वारा शार्दुल सिंह के सिंघाना लेने की बाद कही गयी है जो बिल्कुल निराधार है. वास्तव में सिंघाना बादशाही खालसे में था जो सन 1750 (1807 विक्रम) में जयपुर के महाराजा को इजारे पर मिला था. सन 1765 में अंतिम रूप से सिंघाना भोपाल सिंह, नवल सिंह, केसरी सिंह (शार्दुल सिंह के पुत्र) को इजारे में दिया गया.

शार्दूलसिंह के समय फतेहपुर में सरदारखां (सवाई क्यामखां) का शासन था. यह सैयद बंधुओं का समर्थक , जय सिंह का प्रबल विरोधी और शक्तिशाली सरदार था. इसने बघौरा नामक स्थान पर अनेकों शेखावत सरदारों को मरवा डाला था और उदयपुर पर अधिकार कर लिया था. आगे चलकर सवाई जयसिंह ने शार्दुलसिंह और शिवसिंह के अधीन सेना भेज कर उसका राज्य अपने अधीन कर लिया. इसका वृतांत सीकर के वर्णन के अंतर्गत लिखा जाएगा.


[पृ.169]: शार्दूलसिंह का बड़ा लड़का जोरावरसिंह था जिसे अपने पिता के साथ संयुक्त रूप से नरहड़ इजारे पर दिया गया था. [54] यह बात इन दोनों को जयपुर राज्य से लिखे एक पत्र से ज्ञात होती है.

शार्दुलसिंह का नाम जयपुर की सैनिक सेवा सूची में भी था. उसे तथा उसके पुत्रों, पौत्रों को निम्नलिखित रूप से सवार आदि रखने पड़ते थे. 1. किशन सिंह -984, 2.नवल सिंह-905, 3. शार्दुल सिंह-451, 4. जोरावर सिंह-106, 5. बख्त सिंह-61.

शार्दुल सिंह ने जयपुर के कुछ सैनिक अभियानों में महत्वपूर्ण भाग लिया था. इनमें गगवाना की लड़ाई एवं जोधपुर पर आक्रमण प्रमुख हैं.


शार्दूलसिंह धार्मिक प्रवृत्ति का ठाकुर था. इसे झुंझुनू नगर के श्री सुखलाल जी मिश्र नित्य भागवत की कथा सुनाते थे.

शार्दुल सिंह की मृत्यु चैत्र सुदी 13 विक्रम संवत 1799 (ई. 1742) में परसरामपुर में हुई जहां उस पर एक सुंदर कलात्मक छतरी बनी हुई है. [55]


शार्दुलसिंह के पुत्र

शार्दुलसिंह के तीन ठुकरानियों से 6 पुत्र थे- 1. जोरावरसिंह, 2. किशनसिंह, 3. बहादुरसिंह (मृत), 4. अखैसिंह, 5. नवलसिंह, 6. केसरीसिंह


शार्दुलसिंह के मरने पर उसके अधीन इजारे का भूभाग उसके पांच पुत्रों में बांट दिया गया. यह बंटवारा संवत 1800 में हुआ था. वैसे शार्दुल सिंह ने अपने जीवन काल में ही पुत्रों को गांव बांट दिए थे. कुछ भाग अपने स्वयं के पास रखा था जो उसके मरने पर दो वर्षों तक खालसे में रहा. [56]


[पृ.170]: पंचपना का क्षेत्र विस्तृत था. इसमें झुंझुनू, नरहड़, सिंघाना के परगनों का प्राय: 1200 वर्ग मील भूभाग आता था जिसमें प्राय: 500 गांव आबाद थे. इनमें कुछ गांव भोम के थे जिनका लगान अलग तरह से तय होता था.

1. जोरावर सिंह (d.1745): शार्दुलसिंह के बड़े पुत्र जोरावर सिंह ने झुंझुनू में एक गढ़ बनवाया यद्यपि उसका पिता इसे नाराज था. इस गढ़ का निर्माण विक्रम 1797 में शुरू किया था. इसे जोरावर सिंह के पुत्र बख्तर सिंह ने पूरा करवाया. कुछ लेखकों ने जोरावर सिंह को अलीकुलीखां, जो नारनौल का हकीम था, द्वारा विक्रम संवत 1788 (1743 ई.) में नरहड़ का पट्टा देने की बात कही है [57] वह निराधार है. जोरावर सिंह की मृत्यु विक्रम संवत 1802 (1745 ई.) में हुई थी. इसने अपने पिता को बड़ी मदद दी थी तथा कई लड़ाइयों में भाग लिया था. इसकी मृत्यु चला में हुई. इसके चार ठुकरानियों से 11 पुत्र थे. इसके वंशजों का मुख्य स्थान चौकड़ी रहा.

जोरावर सिंह के मरने पर उसका बड़ा पुत्र बख्त सिंह चौकड़ी में स्थापित हुआ. यह बड़ा वीर और प्रतापी था. अनेकों लड़ाइयों में इसने बहादुरी दिखाई थी. इसने चौकड़ी में गढ़ बनाया. जयपुर में आगे चलकर गद्दी के लिए हुए संघर्ष में इसने माधो सिंह का पक्ष लिया था. सन 1750 (विक्रम 1807) में इसे सिंघाना परगना किशन सिंह के पुत्र भोपाल सिंह के साथ इसारे में दिया गया था. अंत में सिंघाना आधा भोपाल सिंह और आधा नवल सिंह को मिला. यह बात ई. 1765 की है. यह इजारा 1,56,000/- का था. विक्रम 1811 में बख्त सिंह की मृत्यु हो गई. उसके बाद क्रमशः अर्जुन सिंह, जय सिंह, श्याम सिंह, अभय सिंह हुए.

2. किशन सिंह (1709-1745): शार्दुलसिंह का दूसरा पुत्र किशन सिंह था इसने अपने पिता के साथ कई लड़ाइयों में भाग लिया था. इसका पुत्र पहाड़ सिंह था. किशन सिंह की मृत्यु विक्रम 1802 (1745 ई.) में हो गई. इसके आठ पुत्र थे. इसी के वंशजों ने खेतड़ी पर शासन किया. भूपाल सिंह खेतड़ी की गद्दी पर बैठा जहां इसने अधिकार कर लिया था. इसने विक्रम 1812 में खेतड़ी की पहाड़ी पर एक गढ़ बनाया जिसका नाम भूपालगढ़ रखा गया. इसे 1000 का मनसब प्राप्त होना बताया गया है. [58]

भोपालसिंह ने जयपुर की मराठा से हुई लड़ाई में भाग लिया था. इसने मावण्डा के युद्ध में भी वीरता का प्रदर्शन किया था, इसने खेतड़ी दुर्ग में सुंदर महल बनवाये थे. विक्रम 1828 में यह लुहारू में मारा गया.


[पृ.171]: भोपालसिंह के संतान नहीं थी अतः उसका भाई बाघसिंह खेतड़ी की गद्दी पर बैठा. खेतड़ी के ठिकाने में बराबर बंटवारे की प्रथम नहीं थी अतः ठिकाना धीरे-धीरे समृद्ध होकर शेखावाटी का बड़ा ठिकाना बना. पहले हरिसिंह को गद्दी पर बैठाया गया था जो बाघ सिंह का पुत्र था पर बाद में उसे मारकर बाघसिंह स्वयं गद्दी पर बैठ गया. इसने मांडण नामक स्थान पर हुई लड़ाई में भाग लिया था. [59] विक्रम संवत 1837 में इसे अन्य सरदारों के साथ नजफकुलीखां पड़कर ले गया और अच्छी रकम लेकर छोड़ा. बाघसिंह की मृत्यु विक्रम 1856 में हुई.

3. अखैसिंह (1713-1750): शार्दुल सिंह का एक पुत्र अखैसिंह था जो अत्यंत मदिरापान से जल्दी ही संवत 1802 (?) में मर गया. इसने झुंझुनू में विशाल अखैगढ़ बनाया प्रारंभ किया था जिसे आगे चलकर नवल सिंह ने पूरा करवाया.

4. नवल सिंह (1715-1804): शार्दुल सिंह का अन्य पुत्र नवल सिंह था इसने झुंझुनू से दक्षिण की ओर 24 मील दूर रोहिली नामक स्थान पर गढ़ बनाकर एक गांव बसाया जिसे नवलगढ़ नाम दिया गया. यह बात विक्रम माघ सुदी 2 संवत 1794 (1738 ई.) की है. इसने भी गगवाना की लड़ाई में भाग लिया था. इसने अनेकों लड़ाइयों में भाग लिया जिसमें बहल, सिहानी एवं ढूंढ मुख्य हैं. विक्रम संवत 1812 में इसने मांडू जाट की बस्ती में एक गढ़ बनाकर गांव बसाया तथा उसे मंडावा नाम दिया गया. मंडावा नगर शेखावतों के आने से पूर्व बस गया था. यह बात मांडावा के बाइयों के मंदिर के नाम से विख्यात देवालय के विद्वान संत बृजदास जी की बही के उल्लेख से ज्ञात होती है. उस समय इसका नाम मांडवा या मांडवी था. नगर में भागचंद के लड़िया, गोयनका और हरलाल का बस गए थे. बही के कुछ उल्लेख निम्न प्रकार से हैं- मंदिर रघुनाथजी का सभा मंडप बनाया. 6)8 मजूरी का, 8) सामान का लाग्या, 15) शिवालय तिबारो तथा सभा मंडप का, 3) मूर्ति जयपुर स आई, 3) रुपए 11 आने मांडू जाट की कूई की नाल की चक सं. 1788 चैत्र बदी 8. कुछ उल्लेख बाद के भी वही में हैं. इससे ज्ञात होता है कि संवत 1788 तक मांडू जाट की कच्ची कूई विद्यमान थी और मांडू ने इस स्थान को काफी वर्षों पहले बसाया था जो धीरे-धीरे विकसित होकर नगर का स्वरूप ग्रहण कर रहा था. (रतन लाल मिश्र, फुटनोट 27 क,पृ.182-183)

मावंडा की लड़ाई से यह भाग कर चला आया था. [60]

संवत 1832 की मांडण की लड़ाई में यह वीरता पूर्वक लड़ा था.

मांडण की लड़ाई में बादशाही फौज के साथ भीमसेन अहीर, कालेखां पठान आदि थे. इसका मुकाबला करने जयपुर से भी फ़ौज आई थी. इधर नवल सिंह के नेतृत्व में शेखावत फ़ौज थी. इस लड़ाई में नवल सिंह का पुत्र लाल सिंह मारा गया. इसमें दोनों और के कई योद्धा मारे गए. शाही फौज पीछे हटने को बाध्य हुई. [61] इसकी मृत्यु विक्रम 1836 (1804 ई.) में हुई थी. इसके चार ठुकरानियों से 10 पुत्र थे.

इसका बड़ा पुत्र नरसिंहदास इसके स्थान पर बैठा . इसने 1844 विक्रम में हुई तूंगा की लड़ाई में भाग लिया. यह वीर पुरुष था. इसकी मृत्यु विक्रम 1847 में हुई. इसके चार पुत्र थे जिनमें उदयसिंह, मोहब्बत सिंह नवलगढ़ और पदम सिंह, ज्ञान सिंह मंडावा रहे. विक्रम 1860 में मोहब्बत सिंह के वंशज मुकुंद सिंह ने मौजा साहेबसर को मुकुंदगढ़ नाम देकर एक किला बनाया.

5. केसरी सिंह (1728-1768): शार्दुल सिंह का तीसरी पत्नि से पुत्र केसरी सिंह था. इसे भी पैतृक संपत्ति का भाग मिला. इसने डुंडलोद में एक गढ़ विक्रम संवत 1807 में बनाया. सं. 1812 में इसने विशाला जाट की ढाणी को आबाद किया तथा इसका नाम बिसाहू रखा. सुरक्षा के लिए परकोटा भी बनाया गया तथा महल बनाए गए. इसने बूंदी और जयपुर की लड़ाईयों में भाग लिया था. इसकी मृत्यु विक्रम 1825 (1768 ई.) में हुई. [62]

केसरी सिंह के पुत्रों में हनुवंत सिंह को डुंडलोद


[पृ.172]: और अन्य पुत्र सूरजमल को बिसाहू प्राप्त हुआ. सूरजमल ने अड़िचा नामक गांव में एक किला संवत 1839 विक्रम में बनाया तथा इस गांव का नाम सूरजगढ़ रखा. यह तुंगा की लड़ाई में जयपुर के पक्ष में लड़ा था और वहीं वीरगति को प्राप्त हुआ. इसकी स्मृति में एक छतरी बनाई गई थी. इसके लिए 25 बीघा भूमि जयपुर राज्य की तरफ से दी गई थी. पांच बीघा छतरी के लिए व 20 बीघा बाग के लिए. इसी समय छतरी की नींव भी रखी गई थी.

डुंडलोद का हनुवंत सिंह अनेक लड़ाइयों में लड़ा था. जिसमें में मावंडा, खाटू, माण्डण आदि की लड़ाइयां आती हैं. इसकी मृत्यु के बाद रणजीत सिंह गद्दी पर बैठा. यह अपने पिता का इकलौता लड़का था. इसने संवत 1844 की तुंगा की लड़ाई में भाग लिया. इसकी पुत्री का विवाह बीकानेर के रतनसिंह के साथ हुआ था. यह अपने बड़े पुत्र प्रताप सिंह के साथ श्याम सिंह बिसाऊ के षड्यंत्र का शिकार होकर सं. 1865 में मारा गया.

Nehra clan history

Thakur Deshraj writes that Jhunjhunu gets name after Jujhar Singh Nehra (1664 – 1730) or Jhunjha, a Jat chieftain of Rajasthan. The Jats through Jujhar Singh and Rajputs through Sardul Singh agreed upon a proposal to fight united against Muslim rulers and if the Nawab were defeated Jujhar Singh would be appointed the Chieftain. Jujhar Singh one day found the right opportunity and attacked Nawabs at Jhunjhunu and Narhar. He defeated the army of Nawab Sadulla Khan on Saturday, aghan sudi 8 samvat 1787 (1730 AD). According Kunwar Panne Singh[63], Jujhar Singh was appointed as Chieftain after holding a darbar. After the ‘tilak’ ceremony of appointment as a sardar or chieftain, the Rajputs through conspiracy killed Jujhar Singh in 1730 AD at a lonely place. Jujhar Singh thus became a martyr and the town Jhunjhunu in Rajasthan was named so after the memory of Jujhar Singh or Jhunjha.[64]

Jujhar Singh Nehra conquered the city in samvat 1787 (1730 AD). This is clear from the following poetry in Rajasthani Language -

Satrahso Satashiye,Agahan Mass Udaar,

Sadu linhe jhunjhunu,Sudi Athen Sanivaar.

Prior to this, Jhunjhunu was controlled by the Muslim Nawab Rohella Khan. The Muslim Nawab 'Sadulla Khan', incharge of Jhunjhunu, was defeated jointly by Shardul Singh and Jujhar Singh Nehra. But, as per Kunwar Panne Singh's book 'Rankeshari Jujhar Singh', Jujhar Singh was killed by Shekhawats after he was appointed the chieftain. It is clear from the poetry in Rajasthani Language -

Sade, linho Jhunjhunu, Lino amar patai,

Bete pote padaute pidhi sat latai.

Jhunjhunu town was established in the memory of Jujhar Singh, the above Jat chieftain of Nehra gotra. The town was made the capital of the new Shekhawati. The town is famous for frescos on grand Havelis, which is speciality of the Shekhawati region.

झुंझुनू परिचय

झुंझुनू शेखावाटी, राजस्थान का सबसे बड़ा शहर और ज़िला मुख्यालय है। यह शहर जुझारसिंह नेहरा के नाम पर सन 1730 में बसाया गया था। यह जयपुर से 180 कि.मी. तथा दिल्ली से 245 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। कायमखानी नवाबों ने पंद्रहवीं शताब्दी में इस शहर की स्थापना की थी। झुंझुनू में आने वाले पर्यटकों के रहने की अच्छी व्यवस्था है तथा शेखावाटी प्रदेश देखने के लिये यह एक आदर्श स्थान है।[65]

पर्यटन स्थल: झुंझुनू में कमरुद्दीनशाह की दरगाह का विशाल और विहंगम परिसर देखने लायक़ है। वहीं पर बना मनसा माता का मन्दिर भी दर्शनीय है। इन दोनों स्थानों से शहर का नयनाभिराम दृश्य बहुत आकर्षक लगता है। इशावार्दास मोदी की हवेली में भित्ति चित्रों की भव्यता के साथ-साथ सैकड़ों झरोखों की चित्ताकर्षक छटा भी दर्शनीय है। शहर में बना खेतड़ी महल एक प्रकार का हवामहल है तो मेदत्नी बावड़ी और बदलगढ़ भी नज़रों में कैद हो जाने वाले स्थल हैं।[66]

समस तालाब, चंचल्नाथ टीला, जोरावार्गढ़, बिहारी जी का मन्दिर, बंधे का बालाजी, रानी सटी मन्दिर, खेमी शक्ति मन्दिर, लक्ष्मीनाथ जी का मन्दिर, दादाबाड़ी, अरविन्द आश्रम, मोडा पहाड़, खेतान बावड़ी, शेखावत शासकों की छतरियाँ, तीब्देवालों की हवेलियाँ, नवाब रुहेल ख़ान का मक़बरा, जामा मस्जिद तथा झुंझुनू के निकट आबूसर में नव स्थापित शिल्पग्राम व ग्रामीण हाट जैसे अनेक अन्य दर्शनीय स्थल भी झुंझुनू में हैं। पर्यटकों के आवागमन में हो रही वृद्धि के कारण गत एक दशक में यहाँ होटल व्यवसाय भी काफ़ी बढ़ा है। सीकर, चुरू और झुंझुनू, ये तीनों ज़िले राजस्थान में पर्यटन के विकास के लिए प्रयत्नशील हैं। [67]

शेखावाटी में जैन धर्म

शेखावाटी में वैष्णव एवं शैव धर्म का जोर रहा है. जैन धर्म का यहाँ व्यापक प्रचार नहीं था. नरहड़, खंडेला, फतेहपुर, झुंझुनू और चिड़ावा में उनके धार्मिक संस्थान विभिन्न समय पर बने. खंडेला में पहले शैव धर्म प्रबल बने. अपराजित के समय जिनसेनाचार्य यहां आए थे और उन्होंने चौहान शासक को जैन धर्म में दीक्षित किया. [68] धर्म रत्नाकर (998 ई.) के लेखक जयसेन खंडेला में आए थे और उन्होंने जैन धर्म की शिक्षा दी. 1287 ईस्वी में जिनप्रभुसूरी खंडेला आए और धर्म का प्रचार किया. [69] इस प्रकार इस क्षेत्र में जैन धर्म के प्रसार में वृद्धि हुई.[70]

नरहड़ का पुराना नाम नरभट था. खरतरगच्छ पट्टावाली के अनुसार यह बागड़ देश का प्रमुख स्थान था. 14 वीं में शती यहां टकसाल थी. चौहान काल में जिनदत्तसूरी ने पार्श्वनाथ की प्रतिमा यहाँ प्रतिष्ठित की थी. यह बात खरतरगच्छ वृहद् गुरुवाव्ली से ज्ञात होती है. आगे चलकर नेमीनाथ और शांतिनाथ की प्रतिमाएं भी स्थापित की गई. यह जैन धर्म का तीर्थ स्थल माना जाता था. 1323 ईस्वी में जिनकुशलसूरी नरहड़ में रह रहे थे. तीर्थ यात्रा स्तवन में इसे पवित्र स्थान माना जाता है. जैन धर्म का प्रचार समिति ही रहा. यहाँ जैनों की जनसंख्या भी कम ही रही. [71]

शेखावाटी में नाथ पंथ

रतन लाल मिश्र [72] ने लिखा है....नाथ पंथ का प्राचीन काल से शेखावाटी में बड़ा जोर रहा है. इस पंथ के अनेकों वीतराग सिद्धि संपन्न महात्माओं ने धर्म के प्रति लोगों की श्रद्धा को घनीभूत किया है. नाथ पंथ प्राचीन पंथ है जो ब्राह्य आडंबर में विश्वास न कर सहज भक्ति का अनुगामी है. सिद्ध और नाथ द्वैताद्वैत विकल्पना माया और मोह जनित मानते हैं.

शेखावाटी क्षेत्र में फतेहपुर, टांई, मंडावा, झुंझुनू आदि में नाथ पंथ के स्थान हैं जिनमें अनेकों महात्मा हो चुके हैं. संवत 1600 में चंचल नाथ जी ने झुंझुनू में अपना आश्रम बनाया. उनके शिष्य मोती नाथ और उनके शिष्य चंपानाथ जी हुए. ये फतेहपुर में देवडों के शिवालय में रहे. उनके शिष्य अमृत नाथ जी सिद्धि संपन्न परोपकारी महात्मा थे. उन्होंने 1945 में चंपानाथ जी का शिष्यत्व स्वीकार किया. सं. 1958 में यह फतेहपुर आए और खाकी टीले पर रहे. 1916 ई.= वि. 1973 आश्विन शुक्ला 15 को 64 वर्ष की आयु में इनका निधन हुआ. उनके गुरु भाई छोटे नाथ जी मंडावा में रहे. इस परंपरा में ज्योति नाथ, शुभ नाथ हुए जिनके शिष्य हनुमान नाथ जी हुए.

टांई के भानीनाथ जी, केसरी नाथ जी बहुत बड़े महात्मा हुए जिनकी शिष्य परंपरा में अनेकों साधु हुए. स्वामी श्रद्धानंद जी ने लक्ष्मणगढ़ में एक सघन वृक्षों से आच्छादित रमणीय आश्रम बनाया. टांई के शिष्य परंपरा के रतीनाथ जी ने रामगढ़ के पास एक सुंदर आश्रम का निर्माण कराया. उन्हीं के प्रयत्न से महात्मा गंगानाथ जी के प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ.

इस पंथ के साधु पारंपरिक सेवा पूजा के पंथ के अनुयाई होने के साथ-साथ समाज कल्याण के कार्य में आगे चलकर बहुत रुचि लेने लगे. उनके प्रयत्नों के फल स्वरुप अनेकों सार्वजनिक स्थान बने. महात्मा सेवानाथ जी गंगानाथ जी के शिष्य थे जिन्होंने 1549 सं. में जीवित समाधि ली.

झुंझा नेहरा की वंशावली

राजस्थान के सीकर जिले में फतेहपुर के समीप हरसावा गाँव में नेहरा गोत्र के लोग काफी संख्या में हैं. लेखक (लक्ष्मण बुरडक) की हरसावा में स्वर्गीय हरदेव सिंह नेहरा की पुत्री गोमती से सन 1970 में शादी हुई. दिनांक 19.07.2015 को लेखक के हरसावा प्रवास के दौरान हरसावा निवासी श्री सुलतान खां मिरासी (Mob: 9929263766) से मुलाक़ात हुई. श्री सुलतान खां मिरासी का परिवार प्रारंभ से नेहरा लोगों के साथ रहा है. श्री सुलतान खां मिरासी ने हरसावा के नेहरा गोत्र की वंशावली जबानी इस प्रकार बताई.

फतेहपुर के समीप हरसावा गाँव में नेहरा गोत्र के लोग काफी संख्या में हैं. लेखक (लक्ष्मण बुरडक) की हरसावा में स्वर्गीय हरदेव सिंह नेहरा की पुत्री गोमती से सन 1970 में शादी हुई. दिनांक 19.07.2015 को लेखक के हरसावा प्रवास के दौरान हरसावा निवासी श्री सुलतान खां मिरासी (Mob: 9929263766) से मुलाक़ात हुई. श्री सुलतान खां मिरासी का परिवार प्रारंभ से नेहरा लोगों के साथ रहा है. श्री सुलतान खां मिरासी ने हरसावा के नेहरा गोत्र की वंशावली जबानी इस प्रकार बताई.

नरहड़ के राजा नरपाल नेहरा थे और उसके भाई हरपाल थे. हरपाल का क्षेत्र काटली नदी के उस पार था. हरपाल के पुत्र झुंझा (1664 – 1730) ने झुञ्झुणु बसाया. किन्हीं कारणों से हरपाल का नरपाल से मतभेद हो गया इसलिए हरपाल फतेहपुर के समीप हरसावा की तरफ प्रस्थान कर गए. हरसा नेहरा ने सन 1287 में हरसावा बसाया. झुंझा के पुत्र देवा, देवा के पुत्र पाला, पाला के पुत्र माना हुए.

पाला का ससुराल बांठोद गाँव में भड़िया जाटों में था. देवा के नाम से बांठोद में देवलाणु जोहड़ छोड़ा. माना के नाम से हरसावा में मानाणु जोहड़ छोड़ा, जहां आज स्कूल बनी है. माना के पुत्र खेता हुये और उनके पुत्र गांगा हुये. गांगा के 12 पुत्र थे जिनमें से बीरमा सरदार बने। बीरमा के पुत्र मुकना, मुकना के पुत्र धर्मा भींवा और उनके पुत्र मगना हुये. मगना के चंदरा और उनके पुत्र हरदेव सिंह नेहरा (1925 – 1998) हुये.

नरपाल नेहरा + हरपाल (नरहड़) → हरपाल → झुंझा (1664 – 1730) (झुञ्झुणु बसाया) → देवा → पाला → माना → खेता → गांगा (12 पुत्र) → बीरमा → मुकना → धर्मा → भींवा → मगना → चंदरा → हरदेव सिंह नेहरा (1925 – 1998)

झुंझा का जन्म ठाकुर देशराज द्वारा 1664 ई. में बताया गया है. झुंझा वास्तव में हरदेव सिंह से 12 पीढ़ी पहले हुए हैं. एक पीढ़ी का औसत काल 22 वर्ष मानें तो 1925 - 264 = 1661 में झुंझा का जन्म होना चाहिए जो सही बैठता है. इस प्रकार झुंझा के काल की पुष्टि होती है.

सुल्तान खां मीरासी ने हरसावा के सम्बन्ध में एक दोहा सुनाया जो इसके इतिहास के बारे में प्रकाश डालती है -

सदा हरयो हरसावो, गांगावत को गाँव,
बारां को ओ बीरमों, नेहरो खाट्यो नाँव।

झुंझुनू के बारे में राजेन्द्र कसवा द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्य

राजेन्द्र कसवा द्वारा लिखित पुस्तक झुन्झुनूं के संस्थापाक झूंझा जाट - प्रकाशक: वीरवर जुंझार सिंह संस्थान झुंझुनू, प्रथम संस्करण:2024, पृ.134-135 से झुंझुनू के इतिहास की प्राचीनता दर्शाने वाले कुछ अंश यहाँ दिए जा रहे हैं:

परिशिष्ट: अ - झूंझा के बारे में ऐतिहासिक तथ्य

[पृ.134]: झुंझुनू, नवलगढ़, चूरू, मंडावा, बीकानेर आदि शहरों में प्रतिष्ठित पुस्तकालयों में एक पांच सदस्य टीम ने खोजबीन की और उपलब्ध पुस्तकों का अध्ययन किया. इसमें निम्न तथ्य निकला:

1. प्रसिद्ध इतिहासकार ठा. हरनाथसिंह डूंडलोद ने अपनी पुस्तक झुन्झुणु में झुंझुनू की स्थापना गुर्जर काल में सातवीं सदी में मानी है.

2. इतिहासकार मोहन सिंह का मानना है की जैन मुनियों की पट्टावली के आधार पर यह सुनिश्चित है कि झुंझुनू आठवीं सदी से आबाद है.

3. सुविख्यात शोधक श्री अमरचंद नाहटा लिखते हैं की दसवीं सदी में झुंझुनू एक बड़ी आबादी वाला शहर था.

4. सन 1019 में कविवर वीर ने जम्बू चरित्र नमक अपभ्रंश काव्य की रचना की जो झुंझुनू में ही लिखा गया. इसमें झुंझुनू के जैन मंदिरों का उल्लेख मिलता है.

5. सुप्रसिद्ध इतिहास का डॉ. दशरथ शर्मा का उल्लेख करते हुए ठा. हरनाथ सिंह ने लिखा है कि नौवीं शताब्दी के हर्ष के शिलालेख में झुंझुनू के नाम का उल्लेख हुआ है. इससे प्रकट है कि झुंझुनू पहले स्थापित था.

6. झुंझुनू मंडल का इतिहास पुस्तक में इतिहासकार कुंवर रघुनाथ सिंह शेखावत ने वर्णन किया है कि आसलपुर के चौहान बड़वों की बही से ज्ञात होता है कि विक्रम संवत 1045 (=988 ई.) में झुंझुनू का राजा सिद्धराज चौहान था. इससे प्रकट है कि झुंझुनू पहले से स्थापित था.

7. रघुनाथ सिंह शेखावत ने अपनी इसी पुस्तक में माना है कि जैन मुनियों की गुरुवावली से सिद्ध है कि 1243 ई. में झुंझुनू आबाद था. खतरगच्छीय व्युवा प्रधानाचार्य गुरुवावली (चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पृष्ठ.70) का एक श्लोक रघुनाथ सिंह ने उद्धत किया है- संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य सा. गोपाल-प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु वास्तव्य - वरदा वर्ष 7 अंक 1. इसमें नुआ और झुंझुनू का नाम आया है. झुंझुनू के बारे में यह एक ठोस प्रमाण है. जाहिर है उस समय तक झुंझुनू में जैन संस्कृति काफी विकसित हो चुकी थी.

8. जैन मुनि जिनप्रभ सूरि का जन्म झुंझुनू में हुआ था. उनके मुख्य ग्रंथ न्याय कंदली, पंजिनाड, तीर्थ कल्प आदि हैं. यह मुनि मोहम्मद तुगलक से संवत 1385 (1328 ई.) में दिल्ली में मिला था. (संदर्भ - ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह पृष्ठ 69 लेखक अमरचंद व भंवरलाल नाहटा.)


[पृ.135]: इसका अर्थ है कि झुंझुनू उस दौर में विकसित हो चुका था.

9. गोविंद राम अग्रवाल ने चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास लिखा है. अपने ग्रंथ में पृष्ठ 70 पर उन्होंने झुंझुनू के बारे में नैणसी की ख्यात को सही नहीं माना है. अपने फुटनोट में उन्होंने लिखा है कि वास्तव में झुंझुनू 1243 ई. से बहुत पहले का बसा हुआ है.

10. इसी प्रकार विद्वान लेखक और इतिहासकार उदयवीर शर्मा ने अपनी खोज पत्रिका वरधा के वर्ष 7 अंक 1 में खतरगच्छीय प्रधानाचार्य गुरुवावली के संदर्भ में उल्लेख किया है कि झुंझुनू 1243 ई. से बहुत पहले स्थापित हो चुका था.

11. शेखावाटी प्रदेश का प्राचीन इतिहास नामक पुस्तक के लेखक सुरजन सिंह शेखावत ने अपनी इसी पुस्तक के पृष्ट 113 पर लिखा है कि जोड़ चौहानों के पुरखा राणा सिद्धराज ने विक्रम शब्द 1040 (=983 ई.) में झुंझुनू तथा उसके आसपास के प्रदेश का अधिकार डाहलियों का पराभव करके हस्तगत किया था. पृष्ट 142 पर सुरजन सिंह शेखावत ने लिखा है नैणसी की ख्यात का वह उल्लेख निराधार है कि मोहम्मदखां क्यामखानी ने विक्रम संवत 1500 (=1443 ई.) के लगभग झुंझा चौधरी के नाम पर झुंझुनू बसाया था.

12. नेहरा पहाड़ नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा है. इसके लिए किसी ने बोर्ड नहीं लगाया था. इससे जाहिर है कि झूंझा नेहरा गोत्र का था.

13. झुंझुनू में 'नू' शब्द आता है जो गुजराती से सम्बन्ध रखता है. गुर्जर काल में स्वाभाविक रूप से इस क्षेत्र पर गुजराती का प्रभाव रहा है. जैन संस्कृति और जैन मुनि भी गुजरात से आते थे. इससे प्रकट है कि झुंझुनू छठी-सातवीं सदी में बस गया था. हमारे यहां नू शब्द के बहुत कम गांव या शहर हैं जैसे लाडनूं आदि. यह शब्द प्राचीनता को प्रकट करता है.

14. नेहरा पहाड़ बोलता उपन्यास झुंझुनू के इतिहास पर आधारित है जो 2006 में प्रकाशित हुआ था. इस पुस्तक के चार संस्करण छप चुके हैं और हजारों प्रतियां बिक चुकी हैं. किसी ने भी आज तक इसे चुनौती नहीं दी.

15. इतिहासकार मोहन सिंह के अनुसार उन्होंने और लेखक कवि राम अवतार शर्मा ने एक पुरानी बही देखी. जिसके आरंभ में संस्कृत में लिखा था- झुंझा मेरी रक्षा करे. इससे प्रकट होता है कि झुंझा न केवल एक वीर योद्धा था बल्कि लोक देवता के रूप में भी पूजा जाता था. ऐसा व्यक्ति स्वतंत्र सत्ता के आधार पर ही उभर सकता था जिसने स्वयं ने आम-प्रजा के हित में कार्य किए हों. उसका नाम पीढ़ी दर पीढ़ी मिथक के रूप में चलता रहा. यह प्राचीनता को प्रकट करता है.

झुंझुनू के बारे में इतिहासकारों द्वारा प्रस्तुत तथ्य

झुंझुनू की प्राचीनता का उल्लेख जैन ग्रंथों में मिलता है। इसकी स्थापना जूझा जाट पर हुई तथा आगे चलकर कालांतर में इसने नगरीय स्वरुप ग्रहण किया। भाटों और चारणों के अनुसार झुंझुनू क्षेत्र पर 12 वीं शती में जोड़ चौहानों का अधिकार रहा। उस समय इसको जोड़ी-झुंझुनू कहते थे। कुछ समय पश्चात जोड़ यहाँ से विस्थापित होकर बेरी-तारपुरा के पास बस गए. विक्रम 16वीं शती में कायमखानी नवाबों ने इस पर अधिकार कर लिया। संवत 1516 (1459 ई.) में झुंझुनू नगर में भट्टारक जिनचन्द्र को भेंट की। इस ग्रन्थ की अनुसार संवत 1516 (1459 ई.) में शम्सखां कायमखानी झुंझुनू का शासक था। खतरगच्छीय युग प्रधानाचार्य गुर्वावली में नवहा (नूआं) नरमट (नरहड़) और झुंझुनू का उल्लेख आता है. इससे 14 वीं सदी में इसकी उपस्थिति ज्ञात होती है । सिद्धसेनसूरी की वि. सं. 1123 (1066 ई.) में रचित सर्वतीर्थमाला में अपभ्रंश कथाग्रन्थ 'विलासवर्दूकहां' में झुंझुनू के साथ-साथ खण्डिल्ल, नराणा, हरसऊद और खट्टउसूस (खाटू) के नाम आये हैं। इससे इसकी उपस्थिति विक्रम की 12 वीं शती में भी ज्ञात होती है।[73]

सिद्धसेन सूरि द्वारा विक्रमी 1123 (1066 ई.) में रचित सर्वतीर्थमाला में झुंझुनूं का वर्णन इस प्रकार किया गया है -

"खंडिल्ल झिन्झुयाणय नराण हरसउर खट्टउएसु । नायउर सुद्ध देही सु सभरि देसेसु वंदामि ।। "[74]

जाट परिवेश[75] के अनुसार प्राचीन नरहड़ क्षेत्र एवं जैन प्रमाणों के आधार पर कुछ इतिहासकार झुंझुनू का अस्तित्व 8वीं शताब्दी में बताते हैं। नरहड़ से प्राप्त वि. स. 1215 (1159 ई.) के अजमेर के चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ का अभिलेख साबित करता है कि 13वीं सदी के आरंभ में इस क्षेत्र का अस्तित्व था। आसलपुर के बड़वों की बही से पता चलता है कि वि. स. 1045 (988 ई.) में झुंझुनू का का राजा सिद्धराज चौहान था।

इसी प्रकार वरदा में प्रकाशित जानकारी से संवत 1300 में झुंझुनूं का उल्लेख इस प्रकारकिया गया है-

"संवत 1300 तदनंतरं खाटू वास्तव्य साह गोपाल प्रमुख नाना नगर ग्रामे वास्ताव्यानेक श्रावका: श्री नवहा झुंझुणु वास्तव्य - [76]

वाकयात कौम कायमखानी में झुंझुनूं का बसना 1444 वि. माह बदी 14 शनिवार बताया गया है. इस बात की संभावना हो सकती है कि कायमखानियों ने झुंझुनूं को नए सिरे से भवनादिकों से सज्जित किया हो. फ़तेहखां के साथ-साथ ही मुहम्मदखां का पुत्र शम्सखां आया जिसने शेखावाटी के उत्तरी भूभाग पर अपना अधिकार स्थापित किया. शम्सखां के झुंझुनूं में अपना शासन स्थापित करने संबंधी एक उल्लेख त्रैलोक्य दीपक की प्रशस्ति में भी मिला है. इसके अनुसार सं. 1516 में झुंझुनूं में शम्सखां का शासन था.[77]

"स्वस्ति संवत 1516 आषाढ़ सुदी पांच भोमवासरे झुंझुनूं शुभ स्थाने शाकी भूपति प्रजापालक समस्खान विजय राज्ये|"

वाकयात कौम कायमखानी के अनुसार शम्सखां ने एक तालाब बनवाया जो आज भी शम्स तालाब के नाम से प्रसिद्ध है. इसके पक्के घाट और सीढियां हैं. इसने 20 वर्ग मील क्षेत्र में एक बीड़ छोड़ा जिसमें जानवर चरते हैं. इसने कुछ पुख्ता कूवे भी बनवाए. इसी नवाब ने शम्सपुर नामक गाँव आबाद किया जो झुंझुनूं से 4 मील पूर्व में बसा हुआ है. शम्सखां कि मृत्यु झुंझुनूं में हुई जहाँ इसका एक पुख्ता गुम्बद मौजूद है. [78]

झुंझनूं में गढ़वाल गोत्र का इतिहास

गढ़वाल: ठाकुर देशराज लिखते हैं कि आजकल यह राजपूताने में पहुंच गए हैं। गढ़वाल इनकी उपाधि है। अनंगपाल के समय में गढ़मुक्तेश्वर में इनका राज्य था। राजपाल के वंशजों में कोई जाट सरदार मुक्तसिंह थे, उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर का निर्माण कराया था। जब पृथ्वीराज दिल्ली का शासक हुआ तो इन्हें उसके सरदारों ने छेड़ा। युद्ध हुआ। अमित पराक्रम के साथ चौहानों के दल को इन्होंने हटा दिया, किन्तु स्थिति ऐसी हो गई कि इन्हें गढ़मुक्तेश्वर छोड़ना पड़ा और यह राजपूताने की ओर चले गये।1 तलावड़ी के मैदान में जिस समय मुहम्मद गौरी और पृथ्वीराज में लड़ाई हुई तो जाटों ने मुसलमानों पर आक्रमण किया, उन्हें तंग किया, किन्तु पृथ्वीराज से उन्हें कोई सहानुभूति इसलिए नहीं थी कि उसने उनके एक अच्छे खानदान का राज हड़प लिया था। यही क्यों, पूरनसिंह नाम का एक जाट योद्धा मलखान की सेना का जनरल हो गया। उसने मलखान के साथ मिलकर अनेक युद्ध किये। वास्तव में मलखान की इनती प्रसिद्धि पूरनसिंह जाट सेनापति के कारण हुई थी। [79]


ठाकुर देशराज लिखते हैं कि गढ़मुक्तेश्वर का राज्य जब इनके हाथ से निकल गया, तो झंझवन (झुंझनूं) के निकटवर्ती-प्रदेश मे आकर केड़, भाटीवाड़, छावसरी पर अपना अधिकार जमाया। यह घटना तेरहवीं सदी की है। भाट लोग कहते हैं जिस समय केड़ और छावसरी में इन्होंने अधिकार जमाया था, उस समय झुंझनूं में जोहिया, माहिया जाट राज्य करते थे। जिस समय मुसलमान नवाबों का दौर-दौरा इधर बढ़ने लगा, उस समय इनकी उनसे लड़ाई हुई, जिसके फलस्वरूप इनको इधर-उधर तितर-बितर होना पड़ा। इनमें से एक दल कुलोठ पहुंचा, जहां चौहानों का अधिकार था। लड़ाई के पश्चात्


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-599


कुलोठ पर इन्होंने अपरा अधिकार जमा लिया। सरदार कुरडराम जो कि कुलोठ के गढ़वाल वंश-संभूत हैं नवलगढ़ के तहसीलदार हैं। यह भी कहा जाता है कि गढ़ के अन्दर वीरतापूर्वक लड़ने के कारण गढ़वाल नाम इनका पड़ा है। इसी भांति इनके साथियों में जो गढ़ के बाहर डटकर लड़े वे बाहरौला अथवा बरोला, जो दरवाजे पर लड़े वे, फलसा (उधर दरवाजे को फलसा कहते हैं) कहलाये। इस कथन से मालूम होता है, ये गोत्र उपाधिवाची है। बहुत संभव है इससे पहले यह पांडुवंशी अथवा कुन्तल कहलाते हों। क्योंकि भाट ग्रन्थों में इन्हें तोमर लिखा है और तोमर भी पांडुवंशी बताये जाते हैं।[80]

जाट महासभा का झुंझुनू कान्फ्रेंस 1932

गणेश बेरवाल[81] ने लिखा है....जाट महासभा का झुंझुनू कान्फ्रेंस बसंत पंचमी 1932 को हुआ। इस जलसे में 80 हजार आदमी व औरतें इकट्ठे हुये। जलसे में उपस्थित होने वालों में 50 हजार जाट और 30 हजार अन्य कौम के लोग थे। अन्य कौम के लोग भी जाटों से सहानुभूति रखते थे क्योंकि जाट जागीरदारों का मुक़ाबला कर रहे थे। पिलानी कालेज से प्रोफेसर, मास्टर अकान्टेंट आदि इस जलसे में पहुंचे। बिड़ला जी का रुख इस जलसे को सफल बनाने का था। जलसे को सफल बनाने वालों में पिताश्री जीवनराम जी भजनोपदेशक, पंडित हरदत्तराम जी, चौधरी घासीराम जी, हुकम सिंह जी, मोहन सिंह जी आदि ने गांवों में भारी प्रचार किया। चौधरी मूल सिंह जी, भान सिंह जी मुकाम तिलोनिया (अजमेर) आदि इस जलसे को सफल बनाने के लिए आए। उत्तर प्रदेश, हरयाणा से भी कफी लोग आए। अधिवेशन में जुलूस निकाला गया जिसमें चौधरी रिछपाल सिंह जी मुकाम धमेड़ा (उत्तर प्रदेश) से पधारे थे। वे जलसे के प्रधान थे।


[p.45]: इसी जलसे में मास्टर नेतराम गौरीर की बड़ी लड़की जो घरड़ाना के मोहर सिंह राव को ब्याही थी, ने लिखित में भाषण पढ़ा था। उस वक्त शेखावाटी में स्त्री शिक्षा झुञ्झुणु में शुरू हो चुकी थी। स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए पिताश्री जीवन राम जी के निम्नांकित भजनों से बड़ा प्रोत्साहन मिला....

सुनिए ए मेरी संग की सहेली
रीत एक नई चाली। बहन विद्या बिन रह गई खाली री
एक जाने ने दो वृक्ष लगाए सिंचिनिया भी एक माली
बहन विद्या बिन रह गई खाली री......
मैं जन्मी तब फूटा ठीकरा – भाई जन्मा तब थाली री
विद्या बिन रह गई खाली री
भईया को पढ़न बैठा दिया, मैं भैंसा की पाली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
भाई खावे दूध पतासो मैं रूखी रोटी खाली री
विद्या बिन रह गई खाली री.....
भाई के ब्याह में धरती धर दी मेरे ब्याह में छुड़ाली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
भईया पहने पटना का आभूषण मैं पहनू नथ-बाली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
मेरा पति जब आया लेवण ने मैं पहन सींगर के चाली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
जब सासु के पैरों में लागी कपड़ों में उजाली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
देवरानी जिठानी पुस्तक बाँचे मेरे से मजवाई थाली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
मेरे में उनमें इतना फर्क था वो काली मैं धोली री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
जीवन सिंह चलकर के आयो बहन न डिग्री ला दी री
बहन विद्या बिन रह गई खाली री.....
सुनिए ए मेरी संग की सहेली रीत एक नई चाली
बहन स्कूल में चाली री

चौधरी जीवन राम जी के इस गीत ने जादू का सा असर किया। गाँव-गाँव में लड़कियां पढ़ने स्कूल जाने लगी। आज के दिन स्त्री शिक्षा में झुंझुणु जिला राजस्थान में प्रथम है। झुंझुणु अधिवेशन से 4-5 जिलों में भारी जागृति फैली। इस जलसे में राजगढ़ तहसील के 17 आदमी गए थे। महाराजा गंगा सिंह ने हमारे पीछे सी.आई.डी. लगा राखी थी। इस जलसे ने मेहनतकशों व अन्य क़ौमों में जागृति पैदा


[p.46]: कर दी। जागीरदारों के जुल्मों के खिलाफ आवाज उठने लगी और शेखावाटी किसान आंदोलन तेज हो गया। इस दौरान शेखावाटी के नेतागण निम्नांकित थे-

जनता को जगाने में संघर्ष करते भजनोपदेशक जीवन राम आर्य, भजनोपदेशक पंडित दंतू राम (मुकाम पोस्ट डाबड़ी, त. भादरा, गंगानगर) साथी सूरजमल (नूनिया गोठड़ा), तेजसिंह (भडुन्दा), साथी देवकरण (पलोता), स्वामी गंगा राम, हुकम सिंह, भोला सिंह आदि थे। गाँव-गाँव में प्रचारकों की मंडलियाँ प्रचार में जुटी हुई थी जो जनता को जागृत कर रही थी। इस प्रकार शेखावाटी में जन आंदोलन की लहर सी चल पड़ी।

राजस्थान की जाट जागृति में योगदान

ठाकुर देशराज[82] ने लिखा है ....उत्तर और मध्य भारत की रियासतों में जो भी जागृति दिखाई देती है और जाट कौम पर से जितने भी संकट के बादल हट गए हैं, इसका श्रेय समूहिक रूप से अखिल भारतीय जाट महासभा और व्यक्तिगत रूप से मास्टर भजन लाल अजमेर, ठाकुर देशराज और कुँवर रत्न सिंह भरतपुर को जाता है।


[पृ.4]: अगस्त का महिना था। झूंझुनू में एक मीटिंग जलसे की तारीख तय करने के लिए बुलाई थी। रात के 11 बजे मीटिंग चल रही थी तब पुलिसवाले आ गए। और मीटिंग भंग करना चाहा। देखते ही देखते लोग इधर-उधर हो गए। कुछ ने बहाना बनाया – ईंधन लेकर आए थे, रात को यहीं रुक गए। ठाकुर देशराज को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। उन्होने कहा – जनाब यह मीटिंग है। हम 2-4 महीने में जाट महासभा का जलसा करने वाले हैं। उसके लिए विचार-विमर्श हेतु यह बैठक बुलाई गई है। आपको हमारी कार्यवाही लिखनी हो तो लिखलो, हमें पकड़ना है तो पकड़लो, मीटिंग नहीं होने देना चाहते तो ऐसा लिख कर देदो। पुलिसवाले चले गए और मीटिंग हो गई।

इसके दो महीने बाद बगड़ में मीटिंग बुलाई गई। बगड़ में कुछ जाटों ने पुलिस के बहकावे में आकार कुछ गड़बड़ करने की कोशिश की। किन्तु ठाकुर देशराज ने बड़ी बुद्धिमानी और हिम्मत से इसे पूरा किया। इसी मीटिंग में जलसे के लिए धनसंग्रह करने वाली कमिटियाँ बनाई।

जलसे के लिए एक अच्छी जागृति उस डेपुटेशन के दौरे से हुई जो शेखावाटी के विभिन्न भागों में घूमा। इस डेपुटेशन में राय साहब चौधरी हरीराम सिंह रईस कुरमाली जिला मुजफ्फरनगर, ठाकुर झुममन सिंह मंत्री महासभा अलीगढ़, ठाकुर देशराज, हुक्म सिंह जी थे। देवरोड़ से आरंभ करके यह डेपुटेशन नरहड़, ककड़ेऊ, बख्तावरपुरा, झुंझुनू, हनुमानपुरा, सांगासी, कूदन, गोठड़ा


[पृ.5]: आदि पचासों गांवों में प्रचार करता गया। इससे लोगों में बड़ा जीवन पैदा हुआ। धनसंग्रह करने वाली कमिटियों ने तत्परता से कार्य किया और 11,12, 13 फरवरी 1932 को झुंझुनू में जाट महासभा का इतना शानदार जलसा हुआ जैसा सिवाय पुष्कर के कहीं भी नहीं हुआ। इस जलसे में लगभग 60000 जाटों ने हिस्सा लिया। इसे सफल बनाने के लिए ठाकुर देशराज ने 15 दिन पहले ही झुंझुनू में डेरा डाल दिया था। भारत के हर हिस्से के लोग इस जलसे में शामिल हुये। दिल्ली पहाड़ी धीरज के स्वनामधन्य रावसाहिब चौधरी रिशाल सिंह रईस आजम इसके प्रधान हुये। जिंका स्टेशन से ही ऊंटों की लंबी कतार के साथ हाथी पर जुलूस निकाला गया।

कहना नहीं होगा कि यह जलसा जयपुर दरबार की स्वीकृति लेकर किया गया था और जो डेपुटेशन स्वीकृति लेने गया था उससे उस समय के आईजी एफ़.एस. यंग ने यह वादा करा लिया था कि ठाकुर देशराज की स्पीच पर पाबंदी रहेगी। वे कुछ भी नहीं बोल सकेंगे।

यह जलसा शेखावाटी की जागृति का प्रथम सुनहरा प्रभात था। इस जलसे ने ठिकानेदारों की आँखों के सामने चकाचौंध पैदा कर दिया और उन ब्राह्मण बनियों के अंदर कशिश पैदा करदी जो अबतक जाटों को अवहेलना की दृष्टि से देखा करते थे। शेखावाटी में सबसे अधिक परिश्रम और ज़िम्मेदारी का बौझ कुँवर पन्ने सिंह ने उठाया। इस दिन से शेखावाटी के लोगों ने मन ही मन अपना नेता मान लिया। हरलाल सिंह अबतक उनके लेफ्टिनेंट समझे जाते थे। चौधरी घासी राम, कुँवर नेतराम भी


[पृ.6]: उस समय तक इतने प्रसिद्ध नहीं थे। जनता की निगाह उनकी तरफ थी। इस जलसे की समाप्ती पर सीकर के जाटों का एक डेपुटेशन कुँवर पृथ्वी सिंह के नेतृत्व में ठाकुर देशराज से मिला और उनसे ऐसा ही चमत्कार सीकर में करने की प्रार्थना की।

झुझार सिंह नेहरा स्मारक का उद्घाटन :22.02.2009

झुंझुनू शहर के संस्थापक जुझार सिंह नेहरा की याद में झुंझुनू शहर में दिनांक 22 फरवरी 2009 के दिन पद्मश्री श्री शीशराम ओला, खान मंत्री भारत सरकार, के कर कमलों से समारोह पूर्वक जुझार सिंह नेहरा की प्रतिमा का अनावरण किया गया. यह चित्र प्रतिमा पर लगाये गए शिला लेख का है.

झुंझुनूं के संस्थापक वीर झुंझा की प्रतिमा स्थापना दिवस समारोह दिनांक 22.02.2025

झुंझुनूं के संस्थापक वीर झुंझा नेहरा की प्रतिमा स्थापना दिवस समारोह दिनांक 22.02.2025 को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि नगरीय विकास एवं स्वायत शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा
झुन्झुनू के संस्थापक "वीर झुंझा जाट" की प्रतिमा स्थापना दिवस समारोह का आयोजन दिनांक 22.02.2025

राजस्थान सरकार के नगरीय विकास एवं स्वायत शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा रहे मुख्य अतिथि, नेहरा पहाड़ को पर्यटन स्थल तथा यमुना जल प्राप्त करना मुख्य केंद्र बिंदु रहे, जिले के सर्वसमाज की प्रतिभाओं को सम्मानित किया।

दिनांक 22.02.2025 को जिला मुख्यालय झुन्झुनू पर स्थित वीर झुंझा जाट स्मारक स्थल पर झुन्झुनू के संस्थापक वीर झुंझा जाट का 17वां प्रतिमा स्थापना समारोह बड़ी धूमधाम से मनाया गया। उल्लेखनीय है कि झुंझुनू शहर के संस्थापक जुझार सिंह नेहरा की याद में झुंझुनू शहर में दिनांक 22 फरवरी 2009 के दिन पद्मश्री श्री शीशराम ओला, खान मंत्री भारत सरकार, के कर कमलों से समारोह पूर्वक जुझार सिंह नेहरा की प्रतिमा का अनावरण किया गया था।

समारोह के मुख्य अतिथि नगरीय विकास एवं स्वायत शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा रहे, वहीं अध्यक्षता झुन्झुनू विधायक राजेंद्र भांबू ने की । बतौर विशिष्ट अतिथि जिला प्रमुख श्रीमती हर्षणी कुलहरी, पूर्व उदयपुरवाटी विधायक शुभकरण चौधरी, पूर्व संभागीय आयुक्त अंतर सिंह नेहरा, मदरसा बोर्ड के चेयरमैन एमडी चौबदार, फतेहपुर के पूर्व चेयरमैन मधुसूदन भिंडा, भाजपा राष्ट्रीय परिषद सदस्य विश्वंभर पुनिया, पूर्व प्रधान सुशीला सिगड़ा, चिड़ावा प्रधान रोहितास धांगर और संस्था सरंक्षक बजरंग लाल नेहरा रहे।

झुंझुनू केसंस्थापक वीर झुझा की 17वां प्रतिमा स्थापना दिवस पर संस्थान द्वारा प्रकाशित स्मारिका-2025

व्यवस्थापक महेंद्र चौधरी ने बताया कि सर्वप्रथम आर्य समाज के डीवी शास्त्री द्वारा मंगलाचरण से समारोह का शुभारंभ किया, संस्था अध्यक्ष डॉ महेंद्र नेहरा ने स्वागत भाषण दिया, संस्था सचिव सुरेश जाखड़ ने प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, इसके उपरांत सभी मंचस्थ अतिथि एवं संस्था कार्यकारणी द्वारा स्मारिका का विमोचन किया गया।

झुंझुनू के संस्थापक वीर झुझा की 17वां प्रतिमा स्थापना दिवस पर संस्थान द्वारा स्मारिका का विमोचन
झुंझुनू के संस्थापक वीर झुंझा वार्षिक सम्मेलन 2025 पर प्रकाशित संस्थान विवरणिका को श्रीमान लक्ष्मण राम बुरड़क सेवा निवृत्त मुख्य वन संरक्षक अधिकारी के दिनांक 1 मार्च 2025 गांव बीरमसर (चुरू) आगमन पर श्री मुकन्दाराम नेहरा सेवा निवृत्त प्रधानाचार्य के द्वारा अपने आवास पर विवरणिका की एक प्रति भेंट करते हुए। आप दोनों के इस पुस्तक में आलेख प्रकाशित हैं।

झुंझुनू के संस्थापक वीर झुझा की 17वां प्रतिमा स्थापना दिवस पर संस्थान द्वारा स्मारिका का विमोचन करते हुए समारोह के मुख्य अतिथि श्री झाबर सिंह खर्रा नगरीय विकास एवं स्वायत शासन मंत्री, झुंझुनू के विधायक श्री राजेंद्र जी भामू, जिला प्रमुख हर्षिनी कुलहरी, मदरसा बोर्ड चेयरमैन एम.डी. चौपदार, पूर्व विधायक शुभकरण चौधरी, विशंभर पूनिया, अंतर सिंह नेहरा, पूर्व प्रधान बजरंग लाल नेहरा, अध्यक्ष महेंद्र सिंह नेहरा, सचिव सुरेश जाखड़, मुकेश एस मुंड, महेंद्र चौधरी, विजय हिंद एवं संस्थान के सदस्य गण ।।

समारोह में यूपीएससी में चयनित निम्न प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया ।

  • सचिन राहर पुत्र श्री शुभकरण सिंह बसंत विहार झुन्झनू
  • कुमारी नेहा बगसरा पुत्री श्री मनीष बगसरा काजल,
  • हिमांशु रिवॉर्ड पुत्र श्री बीरबल सिंह झुंझुनू,
  • कुमारी मनीषा नेहरा पुत्र श्री कृपाल सिंह नेहरा तारा का बास,
  • माधव गुप्ता पुत्र श्री राजेश गुप्ता झुंझुनू,

समारोह में आरपीएससी में चयनित निम्न प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया ।

  • रजत श्योराण पुत्र श्री राकेश श्योराण रायपुर जाटान ,
  • कुमारी स्वाति बुरी पुत्री श्री राजेश कुमार बुरी माण्डासी,
  • श्री प्रदीप नेहरा पुत्र श्री घढ़शीराम नेहरा देव रोड,
  • श्रीमती प्रियंका पत्नी श्री विवेक तनानिया बड़ागांव ,
  • श्री विनोद नैण पुत्र श्री विद्याधर नैण कालियासर,

समारोह में आईआईटी में चयनित निम्न प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया ।

  • 1 श्री दर्शन कुमार डूडी पुत्र श्री हरवीर सिंह डूडी शेखसर
  • 2 श्री राहुल कुमार मिल पुत्र श्री राजवीर मिल सुजडोला
  • 3 श्री आरुष चौधरी पुत्र सुनील पचार चिड़ावा
  • 4 श्री सोबित लाम्बा पुत्र श्री बी.आर. लाम्बा लालपुर

समारोह में मेडिकल में चयनित निम्न प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया ।

  • 1 श्री ललित कुमार पुत्र श्री राकेश कुमार बोलियां की ढाणी सीथल
  • 2 श्री अभिषेक रुनला पुत्र श्री मनोज कुमार ढाका की ढाणी नवलगढ़
  • 3 श्री मोहित कुमार पुत्र श्री विद्याधर सिंह रघुनाथपुर देरवाला
  • 4 श्री हर्षित कुमार पुत्र श्री विनोद कुमार 1 / 123 ए पुराना हाउसिंग बोर्ड झुंझुनू
  • 5 कुमारी अनुष्का पुत्री स्व. श्री वीरेंद्र सिंह सोहू सोहू का बास चंद्रपुरा
  • 6 कुमारी पूर्विका राव पुत्री श्री सुनील राव घरडाना खुर्द
  • 7 श्री आदित्य पुत्र श्री प्रभुसिंह सोलाना 8 कुमारी साक्षी चौधरी पुत्री श्री राम सिंह चौधरी हासलसर
  • 9 कुमारी परनिका पुनिया पुत्री श्री रमेश कुमार पुनिया
  • 10 रविंद्र सिंह पुत्र श्री अजीत सिंह पिलानी
  • 11 कुमारी निहारिका पुत्री श्री विजेंद्र सिंह गोकुल का बास
  • 12 आयुष कुमार पुत्र श्री कैलाश तारा का बास
  • 13 नवीना चौधरी पुत्री श्री रामवतार सिंह बाकरा

राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले निम्न खिलाड़िओं को सम्मानित किया गया ।

  • 1 हैप्पी खीचड़ पुत्री श्री राजेश खीचड़ कुमावास
  • 2 कुनाल कुमावत पुत्र श्री पवन कुमार कुमावत झुंझुनू


15 प्रगतिशील किसान एवं कृषि में नवाचार हेतु , 10 वृक्षारोपण एवं जल संरक्षण हेतु , 11 अन्य प्रतिभाएं को सम्मानित किया गया । एवं अन्य विभिन्न क्षेत्रों में सर्व समाज की उत्कृष्ट प्रतिभाओं का सम्मान किया गया।

अपने मुख्य वक्तव्य में नगरीय विकास एवं स्वायत शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने बताया कि आजादी के संक्रांति काल से लेकर विकसित भारत की संकल्पना तक महापुरुषों की तपस्या, बलिदान और संघर्ष ही आधारस्तंभ हैं। हम सबको उनकी शिक्षा, संस्कार और धरोहर को संजोकर रखना और उनके पदचिन्हों पर चलते हुए देश और समाज को समृद्ध बनाना है। उन्होंने आश्वासन दिया कि यमुना जल समझोते के जल्द क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार लगातार सार्थक प्रयास कर रही है और जल्द ही इसके अच्छे परिणाम आपके सामने होंगे।

अध्यक्षीय उद्बोधन में झुन्झुनू विधायक राजेंद्र भांबू ने कहा कि उनका लक्ष्य जिले की जनता के मंशा अनुरूप नेहरा पहाड़ को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना प्राथमिक लक्ष्य है। साथ ही जिले की अन्य मूलभूत सुविधाओं को सरकार से जल्द पूरी करने के लिए संकल्पित है।

जिला प्रमुख हर्षिणी कुलहरी ने बताया कि मुझे गर्व है कि इस जिले की स्थापना एक ऐसे वीर पुरुष ने की जो हर वर्ग, धर्म, जाति के लोगों को साथ लेकर चले और विकास किया। मैं जिले के समग्र विकास के लिए हमेशा सजग हूं।

विधायक शुभकरण चौधरी ने किसानों के चहुमुखी विकास के लिए हमेशा उनके साथ मिलकर आवाज उठाने की बात कही। पूर्व संभागीय आयुक्त अंतर सिंह नेहरा और मदरसा बोर्ड अध्यक्ष एमडी चौबदार ने भी सभा को सम्बोधित किया, चौबदार ने स्मार्क स्थल पर डिजिटल लाइब्रेरी के लिए सहयोग की घोषणा की। समारोह में शिक्षाविद् भामाशाह बीएल रनवा, और श्याम सिंह कटेवा ने एक एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की, रामपाल भेड़ा ने टेंट की व्यवस्था की वहीं सभी आगंतुकों के लिए विधायक राजेंद्र भांबू ने भोजन व्यवस्था की।

इस अवसर पर कृषि वैज्ञानिक डॉ हनुमान प्रसाद, पूर्व सभापति खालिद हुसैन, विजय गोपाल मोटसरा, मनफूल बिजारनीया, पार्षद प्रमोद जानू, प्रमोद बुडानिया, शिवकरण जानू, कृष्ण गावड़िया, राजेंद्र कसवा, कुर्डाराम नेहरा, सेवानिवृत एक्सईएन शुभकरण राहड़, बीरबल रेवाड़, कृपाल सिंह, बबिता चौधरी, संतोष लालपुरिया, सरोज चौधरी, चंद्रकला, कर्णीराम ढिगाल, जयप्रकाश महला, सज्जन कालेर, जमील पठान और डॉ मुकेश एस मुंड, बलबीर नेहरा, गोमाराम, मुकंदा राम नेहरा और रामकुमार उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन नेशनल यूथ आइकॉन वकील विजय हिन्द जालिमपुरा ने किया।

झुंझुनूं के संस्थापक वीर झुंझा नेहरा की प्रतिमा स्थापना दिवस समारोह दिनांक 22.02.2025 के चित्र

झुंझुनू के संस्थापक झुंझा जाट के नाम पर झुझार सिंह सर्किल का लोकार्पण: 19.05.2025

झुंझुनू के संस्थापक वीर झुंझा जाट के नाम पर झुंझार सिंह सर्किल का लोकार्पण हुआ
झुझार सिंह सर्किल झुंझुनू

झुंझुनू के संस्थापक झुंझा जाट के नाम पर झुझार सिंह सर्किल का नामकरण: कार्यालय नगर परिषद् झुंझुनू के आदेश क्रमांक नपझु/सा/2025-26/1148 दिनांक 25.04.2025 से जिला परिषद् व लोकनिर्माण विभाग डाक बंगले के सामने के सर्किल को झुंझार सिंह सर्किल के नाम से किये जाने की स्वीकृति, जिला स्तर पर गठित समिति की बैठक दिनांक 23.04.2025 के निर्णय के अनुसार, प्रदान की गयी। झुझार सिंह सर्किल का लोकार्पण समारोह दिनांक 19.05.2025 को झुंझुनू में आयोजित किया गया।

झुंझुनू के संस्थापक वीर झुंझा जाट के नाम पर झुंझार सिंह सर्किल का लोकार्पण: 19.05.2025

झुझार सिंह सर्किल का लोकार्पण समारोह - 19.05.2025 : झुंझुनू 19 मई 2025 । हमारी समरसता और भाईचारे की विरासत को कायम रखा जाना चाहिए। सभी जाति धर्म के लोगों को एक दूसरे का सम्मान करना चाहिए। झुंझुनू के विधायक श्री राजेंद्र भाम्बू ने ये उदगार झुंझार सिंह सर्किल के लोकार्पण समारोह में प्रकट किए। वे झुन्झुनू के संस्थापक वीर झुंझा जाट के नाम पर हुए सर्किल का लोकार्पण करने के पश्चात जनसभा में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि झुन्झुनू के आमजन की मांग पर तीन सर्किलों का नामकरण एक साथ किया। आगे भी वे महापुरुषों के नाम पर ऐसा कार्य करते रहेंगे जिनसे आज की और भावी पीढ़ी प्रेरणा लेती रहे। श्री राजेंद्र भाम्बू ने कहा कि जनभावनाओं का सम्मान करना उनका कर्तव्य और दायित्व है।

अपने अध्यक्षीय भाषण में उपभोक्ता मंच के अध्यक्ष मनोज मील ने कहा कि हमें सर्व समाज को साथ लेकर चलना है। संकीर्ण मानसिकता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उन्होंने भामाशाहों से अपील करते हुए कहा कि स्टेशन से लेकर राणी सती मंदिर तक स्टेशन रोड पर ऐसी लाइटें लगाई जानी चाहिए जिससे शहर की सुंदरता रात को भी नजर आए।

इससे पूर्व वीरवर झुझार सिंह संस्थान के सचिव बनवारी जाखड़ ने स्वागत भाषण करते हुए कहा कि यह ऐतिहासिक पल हैं जिसमें सर्व-समाज के अगुआ नागरिक-गण इकट्ठे हुए हैं और झुंझुनूं के संस्थापक वीर झुंझा जाट को याद किया है।

लेखक राजेन्द्र कसवा ने हरनाथ सिंह डूंडलोद, मोहन सिंह, अमरचंद नाहटा, डॉ दशरथ शर्मा, रघुनाथ सिंह शेखावत, गोविंद अग्रवाल आदि इतिहासकारों की किताबों का उल्लेख करते हुए कहा कि वीर झुंझा जाट का आगमन छठी-सातवीं सदी के मध्य में हुआ और धीरे धीरे बड़ी आबादी बसती गयी। राजेन्द्र कसवा ने झुंझुनू की विरासत और इतिहास पर एक गीत का भी वाचन किया।

इससे पूर्व मंच पर आसीन अतिथियों राजेन्द्र भाम्बू, मनोज मील, नगर परिषद आयुक्त दलीप पूनिया, ताराचंद गुप्ता, सीए मनीष अग्रवाल, महावीर सोनेल, रिटायर्ड इंजीनियर मालीराम वर्मा, दोरासर सरपंच दलीप मीणा, संस्था अध्यक्ष डॉ महेन्द्रसिंह, संस्था संरक्षक बजरंग लाल नेहरा का सम्मान झुंझार सिंह संस्थान की ओर से किया गया।

इस अवसर पर डॉ हनुमान प्रसाद, डीवी शास्त्री, हरिराम महण, बाबूलाल थालौड़, एडवोकेट विद्याधर जाखड़, बिरजू सिंह शेखावत, रफीक खान, मोहमद कयूम, आरिफ, मकबूल हुसैन, आबिद, अनूप सिंह, बार संघ अध्यक्ष सुभाष पूनिया, नेमीचंद मीठारवाल, बड़बासी सरपंच विजेंद्र दूत, विशाल सूंडा, श्रीचंद नेहरा, रामनिवास कोलसिया, कैप्टन मोहन लाल, कैलाश सुरा, सहदेव कसवां, नानक पुनिया, जयसिंह पूनिया भारू का बास, सुरेश जाखड़, महेंद्र चौधरी, शिवकरण जानू, गावड़िया, महेश नेहरा, बलबीर नेहरा, डॉ जेपी बुगालिया, विजय गोपाल, भाजपा महिला मोर्चा जिलाअध्यक्ष मंजू श्योराण, अरुणा सिहाग, बबीता चौधरी, भाजपा जिला उपाध्यक्ष प्यारेलाल ढूकिया , नवलगढ़ प्रधान दिनेश सूंडा, पार्षद प्रमोद जानू, प्रेम कसवा, प्रमोद बुडानिया, मनफूल बिजारणियां, भागीरथ सोहु, राय सिंह तोगडा, लेखक राजकुमार सैनी, मास्टर कुरड़ाराम किठाना, रणसिंह लोदीपुरा, दलीप चनाना, कैप्टन मोहर सिंह, दयानंद श्योराण, यादवचंद कसवां, सुरेश मील, सहित जिले भर से आए सर्वसमाज के हजारों स्त्री-पुरुष उपस्थित थे।

सुरेश आर्य एंड पार्टी ने वीर झुंझा जाट पर गीत प्रस्तुत किए।

कार्यक्रम का संचालन नेशनल यूथ आइकॉन विजय हिंद जालिमपुरा ने किया।

झुंझुनू के संस्थापक वीर झुंझा जाट के नाम पर झुंझार सिंह सर्किल का लोकार्पण दिनांक 19.05.2025 के चित्र

Notable persons from Jhunjhunu district

Jhunjhunu in literature

नेहरा पहाड़ बोलता (झुंझुनू के इतिहास पर आधारित उपन्यास)
  • नेहरा पहाड़ बोलता (झुंझुनू के इतिहास पर आधारित उपन्यास) , प्रकाशक:मानव कल्याण संस्था, बी-४, मान नगर, झुंझुनू (राजस्थान), फोन: ०१५९२-२३३०७९, प्रथम संस्करण २००६, मूल्य रु. २५०/-

External links

  • Kunwar Panne Singh: Rankeshari Jujhar Singh
  • Thakur Deshraj:Jat Itihas,Delhi,1934 (pp 614-615)
  • Jat Samaj, Agra : September 2001

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शेखावाटी प्रदेश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का भौगोलिक वितरण, लेखक - सोनिका गुर्जर और डॉ मुकेश कुमार शर्मा, सिंघानिया विश्व विद्यालय, झुंझुनू, पृष्ठ 37 & 40-52, अध्यन और अनुसंधान के लिए साभार निचे दिए गए हैं

Source - International Journal of Geology, Agriculture and Environmental Sciences Volume – 10 Issue – 2 July-December 2022, Website: www.woarjournals.org/IJGAES ISSN: 2348-0254

Link -https://www.woarjournals.org/admin/vol_issue1/upload%20Image/IJGAES101208.pdf

See also

References

  1. Jat History Thakur Deshraj/Chapter V, p.143
  2. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.225-226
  3. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas, p.261,s.n. 83
  4. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.135)
  5. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.135)
  6. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.134)
  7. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.134)
  8. Aruna Jadiya, Research Scholar, Vanasthali Vidyapith, 'Jat Privesh', September 2015,p. 18
  9. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.135)
  10. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.134)
  11. Aruna Jadiya, Research Scholar, Vanasthali Vidyapith, 'Jat Privesh', September 2015,p. 18
  12. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.134)
  13. शेखावाटी प्रदेश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का भौगोलोक वितरण, लेखक - सोनिका गुर्जर और डॉ मुकेश कुमार शर्मा, सिंघानिया विश्व विद्यालय, झुंझुनू, p.52, International Journal of Geology, Agriculture and Environmental Sciences Volume – 10 Issue – 2 July-December 2022, Website: www.woarjournals.org/IJGAES ISSN: 2348-0254
  14. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 219
  15. सीकर का इतिहास-पं. झाबर मल शर्मा,पृ. 64 पाद टिप्पणी
  16. सिद्धसेन सूरि द्वारा विक्रमी 1123 में रचित सर्वतीर्थमाला
  17. "Early Chauhan Dynasties" by Dasharatha Sharma, p.67
  18. "Early Chauhan Dynasties" by Dasharatha Sharma, p.349
  19. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.134)
  20. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.135)
  21. वरदा वर्ष 7 अंक 1
  22. Epigraphia Indica, Vol. IX, p. 74 ff
  23. Vividha Tirth kalpa, Jinaprabha Suri, Hindi Translation by Bhanwarlal Nahta, Shri Jain Shvetambar Nakoda Parshvanath Tirtha, 1978
  24. ऐतिहासिक जैन काव्य संग्रह पृष्ठ 69 लेखक अमरचंद व भंवरलाल नाहटा.
  25. राजेन्द्रसिंह कसवा, झुन्झुनूं के संस्थापक झूंझा जाट, 2024, p.134)
  26. नैणसी की ख्यात:मुंहनोत नैणसी पृ. 196
  27. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.71
  28. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.90
  29. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.90
  30. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.90
  31. शेखावाटी प्रदेश के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का भौगोलोक वितरण, लेखक - सोनिका गुर्जर और डॉ मुकेश कुमार शर्मा, सिंघानिया विश्व विद्यालय, झुंझुनू, p.52, International Journal of Geology, Agriculture and Environmental Sciences Volume – 10 Issue – 2 July-December 2022, Website: www.woarjournals.org/IJGAES ISSN: 2348-0254
  32. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.116
  33. अडेस्क्रिप्टिव लिस्ट ऑफ़ फर्मानस निशास्-निदेशक पुरातत्व बीकानेर पृ.14
  34. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX, pp.614-616
  35. History of Jhunjhunu
  36. Epigraphia Indica, Vol. IX, p. 74 ff
  37. Dasharatha Sharma:"Early Chauhan Dynasties", p.177
  38. See Bhattaraka Sampradaya Nos 253-254
  39. Encyclopaedia of Jainism, Volume-1 By Indo-European Jain Research Foundation p.5522
  40. History of Jhunjhunu
  41. Jhunjhunu District - History
  42. Jhunjhunu District - History
  43. Jhunjhunu District - History
  44. Jhunjhunu District - History
  45. Jhunjhunu District - History
  46. विजय की धारणा के लिए देखिये शेखावाटी प्रकाश पंडित रामचन्द्र शास्त्री, सीकर का इतिहास पंडित झाबरमल शर्मा, राव शेखा -सुरजन सिंह, शार्दूल सिंह, देवी सिंह आदि.
  47. जयपुर स्टेट पेपर्स जगराम का राज्य के दिल्ली स्थित वकील को पत्र पौष सुदी 7 संवत 1787 - जयपुर स्टेट पेपर्स. विल्स रिपोर्ट.
  48. सत्रह सौ सत्यासी, अगहन मास उदार, सादै लीन्हो झूंझणूं, सुदी आठे शनिवार
  49. जयपुर राज्य के कागजात संख्या 47
  50. जयपुर राज्य के कागजात संख्या 47
  51. शार्दूल सिंह का कथन - जो खालसै को अमल कियो चावो तो खालसा को अमल कीजै वा कोई और इजारेदार होय तो और न दीजो । यो माल सरकार को छै और मुल्क महाराज को छै चाहो जै भांत करो-जयपुर पेपर
  52. सत्रह सौ सत्यासी, अगहन मास उदार, सादै लीन्हो झूंझणूं, सुदी आठे शनिवार
  53. 19
  54. बनाम रा. शार्दूल सिंहजी व जोरावर सिंह जी जोग्य मि-कातिक सुदी 10 संवत 1796 अपरंच नरहर की पेश कश बगाही फौजदारी की लगै छै सो थाने सदमंदसू इजारे संवत 1796 में दिया छै उनकी जामनी 30 हजार की भेजोजी साहूकार की आर पाछला बकाया दलेल सिंह की छै तिनको निशा जुदी दीजौ और रैयत वाशि-द की आबादानी राखज्यो व जागीरदार की संरजाम राखज्यो व राह भांति चाल्ज्यो मिति सदर
  55. Shekhawati and Land Col Harnath Singh,p.102
  56. विल्स रिपोर्ट पृ.126-28
  57. शार्दुल वंश प्रकाश, पृ.220
  58. खेतड़ी का इतिहास, पंडित झाबरमल शर्मा, पृ.45
  59. खेतड़ी का इतिहास, पंडित झाबरमल शर्मा, पृ.45
  60. शेखावत झुंझुनू पतन पत्ति। नवल सिंह भज्यो दिखात नत्ति॥
  61. विल्स रिपोर्ट पृ.126 - 128
  62. केसरी सिंह की मृत्यु सामान्यतया संवत 1825 में मानी जाती है. जयपुर के रिकार्ड में टूंगा की लड़ाई सम्बन्धी एक कागज़ में सूरजमल को मृत्यु के समय कुंवर बताया है. यह लड़ाई संवत 1844 में हुई थी.
  63. Kunwar Panne Singh:‘Rankeshari Jujhar Singh’
  64. Thakur Deshraj: Jat Itihas, Delhi,1934 (pp 614-615)
  65. भारतकोश-झुंझुनू
  66. भारतकोश-झुंझुनू
  67. भारतकोश-झुंझुनू
  68. जैन ग्रन्थ प्रशस्ति संग्रह-जुगल किशोर पृ.3
  69. खरतरगच्छ वृहद गुर्वावली-जिन विजय पृ.96
  70. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998,p.269
  71. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998,p.269
  72. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998,p.270
  73. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 219
  74. सिद्धसेन सूरि द्वारा विक्रमी 1123 में रचित सर्वतीर्थमाला
  75. Aruna Jadiya, Research Scholar, Vanasthali Vidyapith, 'Jat Privesh', September 2015,p. 18
  76. वरदा वर्ष 7 अंक 1
  77. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.90
  78. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.90
  79. Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII,p.558
  80. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,pp.599-600
  81. Ganesh Berwal: 'Jan Jagaran Ke Jan Nayak Kamred Mohar Singh', 2016, ISBN 978.81.926510.7.1, p.44-46
  82. ठाकुर देशराज:Jat Jan Sewak, p.1, 4-6

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