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Nath

From Jatland Wiki
(Redirected from Nath Panth)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Nath (नाथ) are a Shaiva sub-tradition within Hinduism in India and Nepal which emerged in the 12th and 13th centuries.[1]

Variants

Nath Traditions

It combined influnces from Buddhism, Shaivism, Tantra and Yoga traditions of the Indian subcontinent.[2] The Naths have been a confederation of devotees who consider Shiva as their first lord or guru, with varying lists of additional gurus.[3] Of these, the 9th or 10th century Matsyendranatha and the ideas and organization mainly developed by Gorakhnath are particularly important. Gorakhnath is considered the originator of the Nath Panth.[4]

The Nath tradition has an extensive Shaivism-related theological literature of its own, most of which is traceable to the 11th century CE or later.[5] They are a subgroup of the Siddha tradition, and related to heterodox ascetic Shaivite traditions[1] especially the Kapalika[6][8] and the Kaula,[6] but also the Pashupata and the Saktas.[7] A notable aspect of Nath tradition practice has been its refinements and use of Yoga, particularly Hatha Yoga, to transform one's body into a sahaja siddha state of an awakened self’s identity with absolute reality. An accomplished guru, that is, a yoga and spiritual guide, is considered essential,[8] and the Nath tradition has historically been known for its esoteric and heterodox practices.[9]

The unconventional ways of the Nath tradition challenged all orthodox premises, exploring dark and shunned practices of society as a means to understanding theology and gaining inner powers. They formed monastic organizations, itinerant groups that walked great distances to sacred sites and festivals such as the Kumbh Mela as a part of their spiritual practice. The Nath also have a large settled householder tradition in parallel to its monastic groups. Some of them metamorphosed into warrior ascetics during the Islamic rule of the Indian subcontinent.

The Nath tradition was influenced by other Indian traditions such as Advaita Vedanta monism,[14] and in turn influenced it as well as movements within Vaishnavism, Shaktism and Bhakti movement through saints such as Kabir and Namdev.

नाथ सम्प्रदाय

नाथ सम्प्रदाय भारत का हिन्दू धर्म का एक पन्थ है। इसे सन्यासी, योगी, जोगी, नाथ आदि नामों से भी जाना जाता है।

मध्ययुग में उत्पन्न इस सम्प्रदाय में शैव तथा योग की परम्पराओं का समन्वय दिखायी देता है। यह हठयोग की साधना पद्धति पर आधारित पंथ है। शिव इस सम्प्रदाय के प्रथम गुरु एवं आराध्य हैं। इसके अलावा इस सम्प्रदाय में अनेक गुरु हुए जिनमें गुरु मत्स्येंद्रनाथ तथा गुरु गोरखनाथ सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। नाथ सम्प्रदाय समस्त भारत में फैला हुआ हैं। नाथसम्प्रदाय में 'योगी','जोगी', एक जो संन्यासी जीवन जीता है और दूसरा गृहस्थ जीवन।

गुरु गोरखनाथ जी ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया, अतः इसके संस्थापक गोरखनाथ माने जाते हैं।

नाथ सम्प्रदाय के प्रमुख गुरु

  • आदिगुरू - आदियोगी आदिनाथ सर्वश्वर भगवान महादेव सदाशिव है।। (हिन्दू देवता)
  • महर्षि मच्छेन्द्रनाथ - 8वीं या 9वीं सदी के योग सिद्ध, "तंत्र" परंपराओं और अपरंपरागत प्रयोगों के लिए मशहूर
  • महायोगी गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) - प्रथम शताब्दी में प्रगट, मठवादी नाथ संप्रदाय के संस्थापक, व्यवस्थित योग तकनीकों, संगठन , हठ योग के ग्रंथों के रचियता एवं निर्गुण भक्ति के विचारों के लिए प्रसिद्ध है
  • कानीफनाथ - 14वीं सदी के सिद्ध, मूल रूप से बंगाल निवासी, नाथ सम्प्रदाय के भीतर एक अलग उप-परंपरा की शुरूआत करने वाले
  • चौरंगीनाथ - बंगाल के राजा देवपाल के पुत्र, उत्तर-पश्चिम में पंजाब क्षेत्र में ख्यातिप्राप्त, उनसे संबंधित एक तीर्थस्थल सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में है
  • चर्पटीनाथ - हिमाचल प्रदेश के चंबा क्षेत्र में हिमालय की गुफाओं में रहने वाले, उन्होंने अवधूत का प्रतिपादन किया और बताया कि व्यक्ति को अपनी आन्तरिक शक्तियों को बढ़ाना चाहिए क्योंकि बाहरी प्रथाओं से हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है
  • भर्तृहरिनाथ - उज्जैन के राजा और विद्वान जिन्होंने योगी बनने के लिए अपना राज्य छोड़ दियाl
  • गोपीचन्दनाथ - बंगाल की रानी के पुत्र जिन्होंने अपना राजपाट त्याग दिया था.
  • रत्ननाथ - 13वीं सदी के सिद्ध, मध्य नेपाल और पंजाब में ख्यातिप्राप्त, उत्तर भारत में नाथ और सूफी दोनों सम्प्रदाय में आदरणीय
  • धर्मनाथ - 15वीं सदी के सिद्ध, गुजरात में ख्यातिप्राप्त, उन्होंने कच्छ क्षेत्र में एक मठ की स्थापना की थी, किंवदंतियों के अनुसार उन्होंने कच्छ क्षेत्र को जीवित रहने योग्य बनाया था।
  • मस्तनाथ - 18वीं सदी के सिद्ध, उन्होंने हरियाणा में एक मठ की स्थापना की थी।

जीवन शैली

नाथ साधु-सन्त परिव्राजक होते हैं। वे भगवा रंग के बिना सिले वस्त्र धारण करते हैं। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं। उनके एक हाथ में चिमटा, दूसरे हाथ में कमण्डल, दोनों कानों में कुण्डल, कमर में कमरबन्ध होता है। ये जटाधारी होते हैं। नाथपन्थी भजन गाते हुए घूमते हैं और भिक्षाटन कर जीवन यापन करते हैं। उम्र के अंतिम चरण में वे किसी एक स्थान पर रुककर अखण्ड धूनी रमाते हैं। कुछ नाथ साधक हिमालय की गुफाओं में चले जाते हैं।

साधना-पद्धति

नाथ सम्प्रदाय में सात्विक भाव से शिव की भक्ति की जाती है। वे शिव को 'अलख' (अलक्ष) नाम से सम्बोधित करते हैं। ये अभिवादन के लिए 'आदेश' या आदीश शब्द का प्रयोग करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या 'परम पुरुष' होता है। नाथ साधु-सन्त हठयोग पर विशेष बल देते हैं।

प्रारम्भिक दस नाथ

  • आदिनाथ,
  • आनंदिनाथ,
  • करालानाथ,
  • विकरालानाथ,
  • महाकाल नाथ,
  • काल भैरव नाथ,
  • बटुक नाथ,
  • भूतनाथ,
  • वीरनाथ और
  • श्रीकांथनाथ। इनके बारह शिष्य थे जो इस क्रम में है- नागार्जुन, जड़ भारत, हरिशचंद्र, सत्यनाथ, चर्पटनाथ, अवधनाथ, वैराग्यनाथ, कांताधारीनाथ, जालंधरनाथ और मालयार्जुननाथ

चौरासी सिद्ध एवं नौ नाथ

8वी सदी में 84 सिद्धों के साथ बौद्ध धर्म के वज्रयान की परम्परा का प्रचलन हुआ। ये सभी भी नाथ ही थे। सिद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के अनुयायी सिद्ध कहलाते थे। उनमें से प्रमुख जो हुए उनकी संख्या चौरासी मानी गई है।

नौ नाथ गुरु: 1. मच्छेंद्रनाथ, 2. गोरखनाथ, 3. जालंदरनाथ, 4. नागेशनाथ, 5. भर्तरीनाथ, 6. चर्पटीनाथ, 7. कानीफनाथ, 8. गहनीनाथ, 9. रेवननाथ,

इसके अलावा ये भी हैं: 1. आदिनाथ 2. मीनानाथ 3. गोरखनाथ 4. खपरनाथ 5.सतनाथ 6.बालकनाथ 7.गोलक नाथ 8.बिरुपक्षनाथ 9. भर्तृहरि नाथ 10. अईनाथ 11. खेरची नाथ 12. रामचंद्रनाथ।

ओंकार नाथ, उदय नाथ, सन्तोष नाथ, अचल नाथ, गजबेली नाथ, ज्ञान नाथ, चौरंगी नाथ, मत्स्येन्द्र नाथ और गुरु गोरक्षनाथ। सम्भव है यह उपयुक्त नाथों के ही दूसरे नाम है। बाबा शिलनाथ, दादाधूनी वाले, , गोगा नाथ, पंढरीनाथ और श्री स्वामी समर्थ, गजानन महाराज को भी नाथ परंपरा का माना जाता है। वैष्णोवी देवी धाम के भगवान भैरवनाथ भी नाथ संप्रदाय के अग्रज माने जाते हैं। और विशेष इन्हे योगी भी कहते और जोगी भी कहा जाता हैं। देवो के देव महादेव जी स्वयं शिव जी ने नवनाथो को खुद का नाम जोगी दिया हैं। इन्हें तो नाथो के नाथ नवनाथ भी कहा जाता हैं।

संन्यास‌‌‍ दीक्षा

नाथ सम्प्रदाय में किसी भी प्रकार का भेद-भाव आदि काल से नहीं रहा है। इस संप्रदाय को किसी भी जाति, वर्ण व किसी भी उम्र में अपनाया जा सकता है। संन्यासी का अर्थ काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि बुराईयों का त्याग कर समस्त संसार से मोह छोड़ कर शिव भक्ति में समाधि लगाकर लीन होना बताया जाता है। प्राचीन काल में राजा-महाराजा भी अपना राज-पाठ छोड़ संन्यास इसी लिए लिया करते थे ताकि वे अपना बचा हुआ जीवन सांसारिक परेशानियों को त्याग कर साधुओ की तरह साधारण जीवन बिताते थे। नाथ संप्रदाय को अपनाने के बाद 7 से 12 साल की कठोर तपस्या के बाद ही सन्यासी को दीक्षा दी जाती थी। विशेष परिस्तिथियों में गुरु अनुसार कभी भी दीक्षा दी जा सकती है‍‌‍‍‍‍‍। दीक्षा देने से पहले वा बाद में दीक्षा पाने वाले को उम्र भर कठोर नियमो का पालन करना होता है।

  • वो कभी किसी राजा के दरबार में पद प्राप्त नहीं कर सकता ,
  • वो कभी किसी राज दरबार में या राज घराने में भोजन नहीं कर सकता परन्तु राज दरबार वा राजा से भिक्षा जरुर प्राप्त कर सकता है।
  • उसे बिना सिले भगवा वस्त्र धारण करने होते है ।
  • हर साँस के साथ मन में आदेश शब्द का जाप करना होता है किसी अन्य नाथ का अभिवादन भी आदेश शब्द से ही करना होता है ।
  • सन्यासी योग व जड़ी- बूटी से किसी का रोग ठीक कर सकता है पर एवज में वो रोगी या उसके परिवार से भिक्षा में सिर्फ अनाज या भगवा वस्त्र ही ले सकता है।
  • वह रोग को ठीक करने के लिए किसी भी प्रकार के आभूषण , मुद्रा आदि ना ले सकता हैऔर न इनका संचय कर सकता।

सिद्धों और नाथों में भेद

सिद्ध अनीश्वरवादी थे, जबकि नाथ ईश्वरवादी। सिद्ध नारी भोग में विश्वास करते थे जबकि नाथपन्थी उसके विरोधी थे। गुरु महिमा, पिण्ड-ब्रह्माण्डवाद तथा हठयोग नाथ साहित्य का वैशिष्ट्य है। नाथों ने निरीश्वरवादी शून्य को ईश्वरवादी शून्य में प्रतिष्ठित किया।

शेखावाटी में नाथ पंथ

रतन लाल मिश्र [10] ने लिखा है....नाथ पंथ का प्राचीन काल से शेखावाटी में बड़ा जोर रहा है. इस पंथ के अनेकों वीतराग सिद्धि संपन्न महात्माओं ने धर्म के प्रति लोगों की श्रद्धा को घनीभूत किया है. नाथ पंथ प्राचीन पंथ है जो ब्राह्य आडंबर में विश्वास न कर सहज भक्ति का अनुगामी है. सिद्ध और नाथ द्वैताद्वैत विकल्पना माया और मोह जनित मानते हैं.

शेखावाटी क्षेत्र में फतेहपुर, टांई, मंडावा, झुंझुनू आदि में नाथ पंथ के स्थान हैं जिनमें अनेकों महात्मा हो चुके हैं. संवत 1600 में चंचल नाथ जी ने झुंझुनू में अपना आश्रम बनाया. उनके शिष्य मोती नाथ और उनके शिष्य चंपानाथ जी हुए. ये फतेहपुर में देवडों के शिवालय में रहे. उनके शिष्य अमृत नाथ जी सिद्धि संपन्न परोपकारी महात्मा थे. उन्होंने 1945 में चंपानाथ जी का शिष्यत्व स्वीकार किया. सं. 1958 में यह फतेहपुर आए और खाकी टीले पर रहे. 1916 ई.= वि. 1973 आश्विन शुक्ला 15 को 64 वर्ष की आयु में इनका निधन हुआ. उनके गुरु भाई छोटे नाथ जी मंडावा में रहे. इस परंपरा में ज्योति नाथ, शुभ नाथ हुए जिनके शिष्य हनुमान नाथ जी हुए.

टांई के भानीनाथ जी, केसरी नाथ जी बहुत बड़े महात्मा हुए जिनकी शिष्य परंपरा में अनेकों साधु हुए. स्वामी श्रद्धानंद जी ने लक्ष्मणगढ़ में एक सघन वृक्षों से आच्छादित रमणीय आश्रम बनाया. टांई के शिष्य परंपरा के रतीनाथ जी ने रामगढ़ के पास एक सुंदर आश्रम का निर्माण कराया. उन्हीं के प्रयत्न से महात्मा गंगानाथ जी के प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ.

इस पंथ के साधु पारंपरिक सेवा पूजा के पंथ के अनुयाई होने के साथ-साथ समाज कल्याण के कार्य में आगे चलकर बहुत रुचि लेने लगे. उनके प्रयत्नों के फल स्वरुप अनेकों सार्वजनिक स्थान बने. महात्मा सेवानाथ जी गंगानाथ जी के शिष्य थे जिन्होंने 1549 सं. में जीवित समाधि ली.

यह भी देखो

सन्दर्भ

  1. Jones, Constance; Ryan, James D. (2006). Encyclopedia of Hinduism. Infobase Publishing. ISBN 978-0-8160-7564-5.
  2. Natha: Indian religious sect, Encyclopedia Britannica (2007)
  3. Jones & Ryan 2006, p. 308.
  4. Mallinson, James (2011) 'Nāth Saṃpradāya.' In: Brill Encyclopedia of Hinduism Vol. 3. Brill, pp. 407-428.
  5. Mallinson 2012, pp. 407–421
  6. Muller-Ortega, Paul E. (2010). Triadic Heart of Siva, The: Kaula Tantricism of Abhinavagupta in the Non-dual Shaivism of Kashmir. State University of New York Press. ISBN 978-1-4384-1385-3. p.36
  7. O'Brien-Kop, karen (2022). "Siddha Yoga". In Long, Jeffery D. (ed.). Hinduism and Tribal Religions. SpringerLink. p. 1485
  8. Natha: Indian religious sect, Encyclopedia Britannica (2007)
  9. Mallinson, James (2011) 'Nāth Saṃpradāya.' In: Brill Encyclopedia of Hinduism Vol. 3. Brill, pp. 407-428.
  10. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998,p.270