Shekhawati Mein Jat Ganarajyon Ka Itihas
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शेखावाटी में जाट गणराज्य
रतनलाल मिश्र[1] ने लेख किया है... पृ.43: नरहड में प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि विग्रहराज चतुर्थ का राज्य शेखावाटी में दूर-दूर तक फैला हुआ था. कालांतर में केंद्रीय शक्ति के संरक्षण से वंचित होकर चौहानों के लघु राज्य शेखावाटी में नाम शेष हो गए. इस सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि इन राजपूत कुलों के शासन के पूर्व इस क्षेत्र में जाट जाति उपस्थित थी जिसका शासन गणराज्य की पंचायत पद्धति पर चलता था.
शेखावाटी का भूभाग बीकानेर के पास ही है तथा बीकानेर की तरह भौगोलिक स्थिति आदि भी उससे भिन्न नहीं है. अतः यह निष्कर्ष सहज में ही निकाला जा सकता है कि सुदूर पूर्व काल में यहां जाट बसे हुए थे. बीकानेर का क्षेत्र अधिक सघन रूप में मरुस्थलीय क्षेत्र होने के कारण अधिक शासक जातियां विक्रम की 16वीं सदी तक इस और आकर्षित नहीं हुई. सांखले जांगलू में अवश्य उपस्थित थे. भाटियों के अधिकार में भी कुछ भूभाग था. इसी प्रकार जोहिये भी कुछ भाग पर काबिज थे.
[p.44] इधर शेखावाटी के क्षेत्र में रेगिस्तानी परिस्थितियों उतनी उग्र नहीं थी अतः 16वीं सदी विक्रमी के प्रारंभ तक अनेक राजपूत कुल इस भूभाग पर शासन करने लगे थे. विग्रहदेव चतुर्थ के संवत 1215 के नरहड शिलालेख से यद्यपि इस भूभाग पर उसके अधिकार की बात ज्ञात होती है पर यह अधिकार संघन नियंत्रण के रूप में ने होकर नाम मात्र का कर संग्रह करने के लिए था. स्थानीय शासन यहां बसने वाली जातियां अपनी पद्धति पर चलाती थी और आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वतंत्रता थी.
शेखावाटी में जाट गणराज्यों पर अनुसंधान की आवश्यकता
रतनलाल मिश्र[2] ने लेख किया है ... शेखावाटी में राजपूत शासन के पूर्व इस क्षेत्र में जाट जाति उपस्थित थी जिसका शासन गणराज्य की पंचायत पद्धति पर चलता था. इन जाट गणराज्यों का इतिहास अभिलेखित नहीं होने से प्रकाश में नहीं आ सका है. यद्यपि सम्बंधित गोत्र के बड़वा की बहियों में यह इतिहास लिपिबद्ध है जिसको प्रकाश में लाने की आवश्यकता है.
इस विस्तृत क्षेत्र की जाट धरोहरों का परिरक्षण हमारा पुनीत कर्तव्य है. इसके लिए संस्थागत प्रयत्न करना होगा. जाट इतिहास और साहित्य पर बिखरी सामग्री यथा बडवा/भाट की बहियाँ, पांडुलिपियां, पुराने कागजात, शिलालेख, ख्यातें, बातें, प्रवाद आदि को संकलित कर हमारी प्राचीन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सामग्री का प्रकाशन करना होगा.
संस्थागत वित्तीय संसाधन जुटाकर हमारे प्राचीन तालाबों, कुवों, भवनों, देवालयों, मस्जिदों, मठों, छतरियों, दरगाहों, हवेलियों आदि को संरक्षित कर उनको संवर्धित करना होगा.
विविध रूप में विनष्ट होती हुई यह सामग्री का अगर संरक्षण आदि का एक विस्तृत एवं त्वरित और सघन कार्यक्रम हाथ में नहीं लिया गया तो फिर यह सामग्री नाम-शेष ही हो जाएगी.
शेखावाटी में जाट गणराज्यों का इतिहास
शेखावाटी भूभाग में जाट गोत्रों के कुछ जाट गणराज्यों का इतिहास प्रकाश में आया है. शेखावाटी में जाट गणराज्यों की आंशिक सूची को यहाँ संकलित किया गया है जिसके विस्तार की आवश्यकता है. बधाला भूखर (9-16 ई.), बुरडक (975 - 1258 ई.), बिजारनिया (1078-1515 ई.), ढाका (1258 ई.), गढ़वाल (c.13 ई.), जाखड़ (985 ई.), कटेवा , खीचड़ (778 ई.) मान, मील, महरिया, नाग, नेहरा, निठारवाल, रणवा,
बधाला
ठाकुर देशराज[3] लिखते हैं कि... [पृ.613]: बधाला नाम एक गांव के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है। तोमर जाटों का वह समूह, जो राजस्थान में बधाल नामक स्थान पर बसा था, वह बधाला के नाम से मशहूर हुआ। [पृ.614]: इनके भाट-ग्रन्थों में लिखा है कि दिल्ली से खडगल नामक सरदार ने अपने साथियों समेत राजस्थान में जहां अपने रहने के लिए छावनी बनाई, वहीं आगे चलकर खंडेल नाम से मशहूर हुई। यह भी कहा जाता है कि खडगल के नाम से ही कुल खंडेलावाटी प्रसिद्ध हुआ। खडगल के कई पीढ़ी बाद, बधाल नाम का एक पुत्र हुआ। उसने बधाल में अपना प्रभुत्व कायम किया। खंडेल और बधाल में लगभग 30 मील का अन्तर है। इन लोगों के दसवीं सदी से लेकर चौदहवीं तक, भूमियां ढंग के शासन-तंत्र इस भू-भाग पर रहे हैं।
भूखर
भूखर (c. 9-16 ई.): गोठड़ा के भूखर - आरम्भ में यह सांभर के निकट आबाद थे। इनके राज्य की शैली भोमियाचारे की थी, किन्तु आगे चलकर अन्य लोगों से यह जमीन का कर लेने लग गए। इससे इनका नाम भूमि-कर लेने से भूकर हुआ। चाहुमान के वंशजों का एक दल नवीं शताब्दी में जब सांभर की ओर आया तो इन्हें नये धर्म में दीक्षित चौहानों ने वहां से निकल जाने पर बाध्य कर दिया। कहा जाता है, भूकर और चौहान उस समय तक एक ही थे जब तक कि चौहान लोग आबू के यज्ञ में जाकर नवीन हिन्दू धर्म में दीक्षित न हुए थे। भाट लोगों के हस्त-लिखित ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि खेमसिंह और सोमसिंह दो भाई थे। इन्ही की अध्यक्षता में भूकर लोगों ने सांभर प्रदेश को प्रस्थान कर दिया। हिरास नामक स्थान बसाकर खेमसिंह के साथी अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। सोमसिंह ने जंगल देश में पहुंचकर भूकर नाम का नगर बसाया। कई पीढ़ियों के बाद इनमें से कुछ लोग पानीपत की ओर चले गए। जिस समय अजमेर और दिल्ली से चौहानों का राज नष्ट हो गया और देहली के तख्त पर बैठकर गुलाम बादशाह शासन करने लगे, उस समय भूकरों के एक लड़ाकू योद्धा उदयसिंह को बख्शी बनाया गया। उदयसिंह योद्धा होने के अलावा भूमि सम्बन्धी प्रबन्ध में बड़ा निपुण था। उदयसिंह का पुत्र कौलासिंह अजमेर का तहसीलदार बनाया गया। उन दिनों सीकर में प्रदेश पर कालू नाग राज करता था। उसकी राजधानी गोठड़ा में थी। कालू नाग ने प्रजा की भलाई के लिए एक बड़ा किन्तु कच्चा तालाब भी खुदवाया था। वह देहली के बादशाह की ओर से अपने प्रदेश का माना हुआ मालिक था। उसे अपने राज्य की आय पर बादशाह को खिराज देना पड़ता था। खिराज देने के लिए वह देहली जाया करता था। उसने कौलासिंह को देखा और अपनी लड़की की सगाई उसके साथ कर दी। चूंकि कालू निःसन्तान था, इसलिए गोठरा का प्रदेश उसके धेवते (दौहित्रा) कन्दरसिंह को जो कि कौलासिंह का पुत्र था, मिला। कन्दर के जो पुत्र हुआ उसका नाम डालूसिंह रखा। वह 25 गांवों का सरदार था। बेटे उसके 12 थे। गोठरा गांव में आज तक डालूसिंह की प्रस्तर मूर्ति मौजूद है। डालूसिंह के बेटे का नाम सायरसिंह था। उसके बड़े बेटे का नाम कौलासिंह द्वितीय रखा गया। उसके जो राजकुमार हुआ, उसका नाम नरवद रखा गया। आरम्भ में नरवद अपनी ननसाल रौरू चला गया था। अपने बाप की मृत्यु के पश्चात् इसने गोठरा की सरदारी संभाली। इस प्रदेश पर जब शेखावतों के आक्रमण हुए तो इनका भी छोटा-सा राज्य नष्ट कर दिया गया। किन्तु भविष्य में असन्तोष न बढ़े इसलिए शेखावतों ने ‘करग्राहक’ (तहसील करने वाला अर्थात् लगान लगाने वाला) इन्हीं को रखा। पीछे से इनका दर्जा केवल चौधरी का रह गया। चौधरी की हालत में भी पचोतरा नाम का हिस्सा इन्हें मिलता रहता था। चारागाह के लिए जमीन मुफ्त मिलती थी। जागा (भाट) लोगों के ग्रन्थ को देखने से पता चलता है कि नरवद अब से 11 पीढ़ी अर्थात् लगभग 300 वर्ष पहले पैदा हुए थे। चौधरी रामबक्स उसी के खानदान में से हैं जो कि नरवद से दसवीं पीढ़ी पर है। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृ.597-598)
बुडानिया
बुडानिया जाट गोत्र भारत के राजस्थान और हरियाणा प्रान्त में मिलते हैं। राजस्थान में चूरु, सीकर, झुन्झुनूं, जयपुर, हनुमानगढ, जोधपुर जिलों में मिलते हैं. हरियाणा में भट्टू कलां, दरबा, सिरसा, आदमपुर में मिलते हैं।
गोत्र का नाम बुडिया राज्य के नाम से होना बताया गया है।[4] स्थानीय परम्परा के अनुसार यह नाम बुधा जी के नाम से बताया गया है। बुधाजी का एक मन्दिर चिचरोली गांव तहसील खेतडी में स्थित है। ठाकुर देशराज ने मेगष्थनिज़ की पुस्तक इंडिका में वर्णित Ordabae से बुड़िया की पहचान की है ।[5]
बड़वा श्री शिशुपाल सिंह और महीपाल सिंह[6] ने बुडानिया गोत्र का इतिहास और वंशावली उपलब्ध कराई है.

आजना जाटों में एक वंश बुडराव (Budrao) जी का हुआ इनके एक लड़का बलूराम ने जन्म लिया। बलूराम जी के दो लड़के हुए- एक बलदेव और दूसरे रायसिंह जी थे। दोनों लड़कों से दो गोत्र प्रारंभ हुई। बड़े लड़के बलदेव जी का वंश बुडानिया जाट और छोटे लड़के रायसिंह जी का वंश रायल गोत्र के जाट प्रसिद्ध हुए। इसलिए बुडानिया और रॉयल गोत्र के जाट आज भी आपस में भाई कहलाते हैं तथा आपस में रिश्ता नहीं हो सकता।
बाबा बनदेव जी : बुडानिया परिवार की वंशावली को जानने पर ज्ञात होता है कि इस वंश में आगे चलकर एक सिद्ध पुरुष का जन्म हुआ-बाबा बनदेव जी। उस सिद्ध पुरुष की जीवनी के बारे में यह इतिहास प्रस्तुत है। संवत 1202 (1145 ई.) में बुडानिया गोत्र के प्रमुख श्री बरसिंह ने ग्राम बनगोठड़ी कला, तहसील चिड़ावा, जिला झुंझुनू की स्थापना की थी। उस समय के अनुसार यह बसावट सुंदर व सभ्य थी।
इसी गोत्र के परिवार में एक लड़के का जन्म हुआ। इसका जन्म पूरे गांव के लिए बड़ा ही शुभ रहा। जन्म लेते ही गांव की हवा में एक मनमोहक महक आने लगी और गांव के हर व्यक्ति के चेहरे पर मानो खुशी की आभा चमक उठी- जननी जने तो ऐंडा जने, क दाता के सूर। नहीं रहीजे बाँझ ही, मति गवा जे नूर।।
पंडितों को बुलवाया गया तो पंडितों ने उसके नक्षत्र देख कर कहा कि लड़का बड़ा ही होनहार व भाग्यशाली है। पंडितों द्वारा उसका नाम बलबीर सिंह उर्फ बने सिंह रखा गया। नाम के अनुसार बड़े ही बलिष्ट, बलवान, बहादुर और धर्मनीतिज्ञ बनेंगे। यह उनकी बाल्यावस्था में लगने लग गया- बचपन से ही गाय की रक्षा करना और तप, यज्ञ पर विश्वास करना उनके आचरण का अभिन्न अंग बन चुका था। उम्र बढ़ने लगी तो धर्म के प्रति आस्था ज्यादा बढ़ने लगी और गुरु के रूप में एकलव्य की तरह गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य के रूप में रहने लगे और संवत 1221 में गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य बने- 'गुरु को ज्ञान और महादेव को मंत्र' यह कहावत तभी से प्रसिद्ध है।
संवत 1225 (=1168 ई.) में सिद्धि प्राप्त कर ली। जबसे ही बाबा बनदेव जी केवल सफेद वस्त्र व सफेद घोड़े का प्रयोग करते थे। लगन और चेष्ठा से उनके हर कदम सिद्ध होने लगे। एक सिद्ध पुरुष के रूप में जाने जाने लगे और वरदान देने लगे। उनके आशीर्वाद से सभी के काम संवरने लगे। जो कोई भी अपनी कामना लेकर आता उसी की मनोकामना पूर्ण होने लगी। इस कारण से, लोग बलवीर जी को वरदान देने के कारण, बलवीर जी से बनदेव जी कहने लगे। उनके नाम से बनी छोड़ी गई। वे बनी में तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या और उनके तप को देखकर हरकोई दंग रह जाता था। उनके धुणी की महक से वहां की आबोहवा वातावरण एकदम शुद्ध और निरोग हो गया। किसी को भी किसी रोग की चिंता नहीं थी। किसी को कोई बीमारी हो जाती तो बाबा बलदेव जी की धूनी में से थोड़ी सी राख लाकर उसे पानी में मिलाकर पिला देते तो वह तैयार हो जाता। दूरदराज के एवं आसपास के लोग बाबा की धूनी पर आया करते थे।
बाबा उन्हें अच्छी बातें बताते, उन्हें सत्य और धर्म पर चलने को कहते थे। सत्य बोलो, धर्म की रक्षा करो अत्याचार सहन मत करो, अन्याय के खिलाफ बोलो, जीवन की मूल जड़ को समझो, मांस मदिरा का सेवन मत करो।
उस समय बादशाह का शासन था। बादशाह ने हजूरिये और नवाब लोगों पर अत्यधिक लगान लगाते और अत्याचार करते और गायों पर अत्याचार भी करने लगे। गायों को ले जाने लगे। गौ हत्या करने लगे। आसपास के गांवों एवं बनगोठड़ी कला के लोग बाबा के पास फरियाद लेकर आए कि आप ही कहते थे कि धर्म की रक्षा करो गाय की रक्षा करो। लेकिन आज गायों पर अत्याचार हो रहा है। गाय के ऊपर हो रहे अत्याचारों के लिए वे बादशाह के हजूरिये गायों को लेकर चले गए। आप अब हमारी और गाय की रक्षा करो। इतना सुनते ही बाबा अपने साथियों सहित घोड़े पर बैठकर गायों को छुड़वाने के लिए वहां से रवाना हो गए और वहां जाकर गायों को छोड़ने का निवेदन किया। लेकिन उन्होंने बाबा की बात की बिल्कुल ही परवाह नहीं की। इस पर बाबा ने हार नहीं मानी और लगातार निवेदन करते रहे। लेकिन जब देखा कि उनके निवेदन का उन पर कोई असर नहीं हो रहा है तो बाबा ने फिर अपनी बल-शक्ति का परिचय दिया तथा उनसे लड़ने लगे। बाबा की सिद्धि के सामने कोई नहीं टिक सका और गायों को वहीं छोड़कर भाग गए। इस लड़ाई में बाबा के शरीर पर भी काफी जख्म आए तथा शरीर से काफी खून बह गया तथा उनका घोड़ा भी जख्मी हो गया।
बाबा बनदेव जी बनगोठड़ी कला आए और संवत 1252 (1195 ई.) की साल चैत्र महीने सुदी पक्ष तेरस को बाबा ने घोड़े, हथियार आदि सहित जीवित समाधि ली। समाधि लेने से पूर्व बुडानिया गोत्र के सभी बंधुओं को यह कहा कि--
कोई मांस मदिरा का सेवन नहीं करेगा। अगर करेगा तो उसकी गति भी नहीं होगी। बुडानिया वंश में सबसे बड़ा धर्म गऊ को माना गया और बुडानिया वंश का धर्म और मर्यादा की कुल का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
- आन बची, शान बची, गऊ की ओ जान बची।
- हे वन देवा तुम जीत गए, सारे जहान की लाज बची।।
आगे चलकर गांव बनगोठड़ी में बाबा की समाधि पर लोगों का ताता सा लगा रहता था। तेरस और चौदस के दिन लोग बाबा के नाम का प्रसाद और दूध देने लगे। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा और किसी कारण बस बुडानिया परिवार वहां से पलायन कर गया और ग्राम चूलीखेड़ा (हरयाणा) में रहने लगा।
चूलीखेड़ा ग्राम को संवत 1385 (1328 ई.) में हरयाल जी, हरचंद जी बुडानिया ने बसाया था। इस गांव को बसाने के बाद एक जोड़ा जिसका नाम धमाणू है जो कि गांव बसने पर छोड़ा गया। कुआं, खेल, कोठे का भी निर्माण करवाया गया और बाबा बनदेव जी के चबूतरे का भी निर्माण करवाया गया। इस गांव से ही कई गांव निकलकर बसे हैं जैसे - अरडावता, बुडानिया, चिचडोली, भापुर, सलारपुरी आदि।
बुडानिया गोत्र द्वारा बसाए गए गांव
- बनगोठड़ी - चौधरी बरसिंह जी बुडानिया पुत्र श्री सोम सिंह जी के 3 पुत्र हुए- बिजल जी, बीर सिंह, व बलवीर जी जो सिद्ध पुरुष हुए और आगे चलकर बनदेव बुडानिया के नाम से प्रसिद्ध हुए। बरसिंह जी, सोम सिंह जी ने संवत 1202 (1145 ई.) में इस ग्राम को बसाया तथा संवत 1252 में चैत्र माह सुदी पक्ष तेरस को बनदेव जी बुडानिया ने जीवित समाधि ग्रहण की। बुडानिया लोग इस गांव से उठकर गए चूलीखेड़ा (हिसार, हरयाणा) व बलोद (झुन्झुनू)।
- चूलीखेड़ा (हिसार, हरयाणा) - इस गांव को हरपाल जी, हरचंद जी बुडानिया द्वारा संवत 1385 (1328 ई.) में बसाया गया था। समय के साथ-साथ बुडानिया वंश के लोग इस गांव से उठकर अरडावता, बुडानिया, भापुर, चीचडोली, सलारपुरी गांवों को बसाया।
- अरडावता - इस ग्राम को बालाराम जी बुडानिया के बेटे धन्नाराम जी व लालाराम जी बुडानिया द्वारा संवत 1477 (1420 ई.) में बसाया गया। क्यामसर, खापड़ का बास, गडानिया, सोराणा जोहड़ की ढाणी (नरहड़), तालसांखण इस ग्राम से निकले ग्राम हैं। जिनके दो लड़की हुई राजा और छाजा। दोनों के नाम से 2 जोड़ी छोड़ी गई- राजाणी और छाजाणी।
- लालडिया बुडानिया - संवत 1551 (1494 ई.) में चौधरी नागराज जी बुडानिया ने इस ग्राम को बसया था। इसी ग्राम से बाद में छोटी थीरपाली (चूरु), लारनोद (? = नारनौंद, हिसार ), छोटा घरड़ाना (झुन्झुनू), पनिहार (?= पनिहार चक, हिसार, बाजला की ढाणी (झुन्झुनू), बीजेपुर (?), रावलवास बड़ी (हिसार), श्योपुरा, जोहड़ छोटा नाम है। इस गांव में एक जोहड़ छोड़ा गया जिसका नाम मोटाणु है। चौधरी भोजाराम जी बुडानिया ने एक कुएं का निर्माण करवाया व एक जोहड़ भोजाणु छोड़ा जो गांव के उत्तर दिशा में स्थित है।
- भापर - संवत 1657 (1600 ई.) में चौधरी भाऊराम जी महाराज द्वारा बसाया गया था। इसी ग्राम से भिवानी, दोराला का बास, गुड़ाना निकले।
- चिचडोली - इस ग्राम को संवत् 1535 (1478 ई.) में चौधरी राणूराम जी बुडानिया और इसकी औरत चिड़ीया द्वारा बसाया गया। बाबा बनदेव जी की बणी और अब एक विशाल मंदिर है। इस गांव से जाने वाले गांव पीपल का बास, गोवली, पिलाणी, थिरपाली, रावलवास बड़ी, आबूसर, पेरासी (?=पाण्डासी), मरोत का बास, कुतकपूरा (?), माकड़ा, धतरवाला, पगाल का बास (?=पंघाल गांव, हिसार), भोभिया का बास, चारास, ठीचोली, गुडाना, भोड़की, रसोड़ा का बास, खारा दुधवा, सिरोही (?), बाजला, दिलावरपुरा, मालिया की ढाणी (?), डागरा, बढ़ई खेड़ा (फतेहाबाद), देवराला (सीकर), खाजपुर, हेतमसर, बेरासर (?), ढाका मांडी, छोटा भडुन्दा।
- सिलारपुरी (झुन्झुनू) - चौधरी धामाराम जी बुडानिया द्वारा संवत 1625 (1568 ई.) के लगभग बसाया गया। यह गाँव बुहाना तहसील, जिला झुन्झुनू, राजस्थान में स्थित है.
- रतनपुरा (चुरू) - चौधरी हीरा राम जी बुडानिया द्वारा संवत 1844 में बसाया गया। इससे निकले ग्राम गढ़ भोपजी, जोरावर सिंह की ढाणी।
- पदेवा (झुन्झुनू) - चौधरी कुतल राम जी बुडानिया द्वारा संवत 1780 के लगभग बसाया गया। यह गाँव खेतड़ी तहसील, जिला झुन्झुनू, राजस्थान में स्थित है।
- धींगपुर -दांता रामगढ तहसील जिला सीकर, राजस्थान। बुडानिया जाटों द्वारा बसाया गया।
- देवना (?) बुडानिया जाटों द्वारा बसाया गया।
चिचड़ोली गाँव का इतिहास : गांव चिचड़ोली के इतिहास के पीछे लोगों की मान्यता है कि चिचड़ोली गांव राणुराम जी बुडानिया द्वारा बसाया गया था। वह श्री डालूराम जी बुडानिया के पुत्र थे। इनकी दो शादी हुई पहली पत्नी का नाम धर्माणी अर्थात धर्मा था जो सेवदा गोत्र की थी। उनके पिताजी का नाम टीलाराम था। दूसरी भड़ुन्दा ग्राम की रहने वाली चिड़ीया थी जो झाझड़िया गोत्र की थी। इनके पिताजी का नाम नाथूराम जी झाझड़िया था। चिड़ीया का ससुराल चूलीखेड़ा था।
दोनों ही औरतों से संतान नहीं थी। इस कारण राणुराम जी हमेशा उदास रहते थे और इस चिंता के कारण चिड़ीया अक्सर अपने पीहर भड़ुन्दा में ही रहती थी। चौधरी राणूराम जी गांव चूलीखेड़ा को छोड़कर गांव भड़ुन्दा आकर रहने लगे। समय निकलता गया। एक दिन रात को चिड़िया सो रही थी तब उसको सपने में बाबा बनदेव जी के दर्शन हुए। बाबा सपने में बोले कि यदि तुम मेरी समाधि में से जोत लेकर आओ तो तुम्हारे पुत्र प्राप्त हो जाएगी क्योंकि गांव बनगोठड़ी में मेरी समाधि पर कोई धूप करने वाला भी नहीं है। मेरे वंश का कोई भी परिवार वहां नहीं रह रहा है। अगर तुम मेरी पूजा अर्चना कर सकती हो तो तुम्हें पुत्र प्राप्ति हो जाएगी। तुम जाओ और समाधि से जोत लेकर आओ। इतने में चिड़िया की नींद उड़ गई। उसने अपने पति राणू राम जी बुडानिया से सपने का सारा किस्सा सुनाया। रानू राम और चिड़ीया दोनों सुबह नहा-धोकर जोड़े से बाबा का ध्यान कर बाबा की समाधि की ओर रवाना हो गए और बनगोठड़ी जाकर बाबा की समाधि पर जोतली। जोत को लेकर वहां से रवाना हो गए। उस जोत को लेकर जैसे ही भड़ुन्दा के कांकड़ पर पहुँचे, जहां वर्तमान में बनदेव जी का मंदिर है, वहां आकर जोत रुक गई। वहां बाबा बनदेव जी का चबूतरा बनवाया और बनी छोड़ी गई। भगवान की कृपा और बाबा बन देव जी के आशीर्वाद से चिड़िया के चार संतान हुई- दो लड़के और दो लड़कियां। एक का नाम लुहण राम और दूसरे का नाम दुर्जन राम। चिड़ीया के नाम से भड़ुन्दा के कांकड़ को तोड़कर गांव चिचड़ोली बसाया। चिड़ीया के नाम से गांव का नाम चिचड़ोली रखा। चिचड़ोली बसाई संवत 1535 में वैसाख के महीने में आखा तीज के दिन। बाबा बनदेव जी की बनी छोड़ी गई।
उसके बाद में चिचड़ोली गांव में तीन बार बाबा की चबूतरे का निर्माण हुआ और बाद में एक विशाल मंदिर का निर्माण हुआ। 1. पहली बार संवत 1535 में गांव बसाया गया। दूसरी बार संवत 1713 लगभग चबूतरे का निर्माण हुआ, 3. तीसरी बार संवत 2003 में चबूतरे का निर्माण हुआ और 4. अब एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ है जो शिखर बंध है।
यह जगह एसे स्थान पर है जो कि 8-10 किलोमीटर से भी देख सकते हैं। इस जगह का वातावरण बहुत ही सराहनीय है। इस मंदिर की मर्यादा यह है कि इसकी जो बनी है उस बनी में कोई भी मदिरा का सेवन नहीं कर सकता। औरतें व पुरुष अपने जूते-चप्पल बाहर ही खोलते हैं। यह मंदिर गांव चिचड़ोली से उत्तर दिशा में है और गांव में सबसे ऊंची जगह पर है। इस मंदिर तक जाने के लिए इस्लामपुर से भड़ुन्दा रोड पर एक बड़े दरवाजे का निर्माण कराया गया है। यह निर्माण रामनारायण बुडानिया पूर्व विधायक और उनकी पुत्री रीटा सिंह पुत्री श्री राजेंद्र सिंह गांव हेतमसार वालों ने करवाया। इसके आगे जो सड़क है जोहड़ से निकलने के बाद जमीन सड़क के लिए दी जो चौधरी हनुमान राम पुत्र श्री राम, रोहिताश्व, विद्याधर, हरिराम, धर्मपाल, अमीलाल पुत्र माधाराम जी ने। गेट से जो सड़क बनी बनदेव जी के मंदिर तक जाती है इस सड़क का निर्माण करवाया सांसद शीशराम ओला ने। बनी के अंदर दो पानी टंकी हैं जिसमें से पहली टंकी का निर्माण रामकुमार जी पुत्र खम्मा राम जी बुडानिया ने करवाया और दूसरी टंकी का निर्माण ग्राम रुकणसर वाले बुडानिया परिवार ने करवाया। इसके अलावा एक कुआं भी है जिसका निर्माण हरियाणा सरकार में मंत्री संपत सिंह जी द्वारा करवाया गया। उसके बाद कई भामाशाहों ने मंदिर प्रांगण और बनी में कमरों का निर्माण करवाया।
स्रोत:- पुस्तक 'बुडानिया (जाट) इतिहास', 2010, लेखक बड़वा श्री शिशुपाल सिंह और महीपाल सिंह, दादिया, किशनगढ़, आजमेर-305813. Mob:9829846234, 9829807064
बुरडक
बुरडक (975 - 1258 ई.): सरणाऊ के बुरडक (975-1258 ई.) इतिहासकार अनंतगोचार को हर्ष के आस-पास का क्षेत्र मानते हैं.[7] अनंतगोचार में जाटों के छोटे-छोटे कई गणराज्य थे. बुरडक जाटों का ठिकाना सरणाऊ तहसील दांतारामगढ जिला सीकर में था. बड़वा (भाट) के अनुसार इनको चौहान संघ की शासन व्यवस्था का हिस्सा बतलाया गया है. दिल्ली पति महीपाल तंवर के अधीन सरनाउ को रावराजा बुरड़कों की राजधानी संवत 1032 (975 ई.) में बनाया. बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ संवत 1032 से संवत 1315 (975-1258 ई.) तक रही. ददरेवा के राव बुरडकदेव (d.1000 ई.) महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के विरुद्ध हिन्दुशाही राज्य के राजा जयपाल की मदद के लिए लाहोर गए. वहां लड़ाई में संवत 1057 (1000 ई.) को वे जुझार हुए. इनकी पत्नी तेजल शेकवाल ददरेवा में तालाब के पाल पर संवत 1058 (1001 ई.) में सती हुई. राव बुरडकदेव के बड़े पुत्र समुद्रपाल राजा जयपाल के पुत्र आनंदपाल की मदद के लिए 'वैहिंद' (पेशावर के निकट) गए और वहां पर जुझार हुए. संवत 1067 (1010 ई.) में इनकी पत्नी पुन्याणी साम्भर में सती हुई. संवत 1315 (1258 ई.) में सरनाऊ दिल्ली के बादशाह शमसुद्दीन इलतुतमिश (1211–1236) के पुत्र नसिरुदीन महमूद (1246–1266) के अधीन हुई. बादशाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को मनसबदार बनाया. उस समय सरनाऊ कोट राजधानी चौधरी कालूरामजी बुरडक के पुत्र पदमसिंहजी बुरडक तथा जगसिंहजी बुरड़क के अधिकार में थी. इस जागीर में 84 गाँव थे. मोम राज ढाका ने संवत 1308 से 1315 के बीच 6 बार बुरड़कों पर हमला किया पर बुरड़क अविजित रहे. अंत में संवत 1315 (1258 ई.) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरड़क जब निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया. सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया. सरनाउ-कोट के राजा 'पदम सिंह बुरड़क की खर्रा गोत्र की पत्नी, जिसका नाम रम्भा था, वह उस समय सरनाउ-कोट से बाहर अपने पीहर खर्रा का गोठडा गयी हुई थी. रम्भा बच गयी. वह उस समय तीन माह की गर्भवती थी. गोसाईंजी के आशीर्वाद से चैत सुदी नवमी संवत 1316 को रम्भा को 10 बजे खर्रा के गोठडा डूंगर की घाटी पर एक लड़का हुआ. उसका नाम नानक रखा. नानक के बड़े होने पर उसकी शादी कुशलजी तेतरवाल की बेटी मानकौरी से की. सभी बुरड़क नानकजी से फले-फूले हैं. (अधिक जानकारी के लिए देखें - बुरड़क गोत्र का इतिहास)
बिजारनिया
बिजारनिया (1078-1515 ई.): विजयराणिया सिकन्दर महान् के समय के प्रतीत होते हैं। यूनानी लेखकों ने जो कि सिकन्दर के साथ भारत में आये थे, विजयराणिया लोगों का हाल लिखते समय उनके नाम का अर्थ लिख डाला। विजयराणिया यह इनका उपाधिवाची नाम है। रण-क्षेत्र में विजय पाने से इनके योद्धाओं को विजयराणिया की उपाधि मिली थी। जागा (भाट) लोगों ने इन्हें तोमर जाटों में से बताया है। हम उन्हें पांडुवंशी मानते हैं। कुछ लोगों का ऐसा मत है कि तोमर भी पांडुवंशी हैं। भाट लोगों ने इनके सम्बन्ध में लिख रखा है-‘‘सोमवंश, विश्वामित्र गोत्र, मारधुने की शाखा, 3 प्रवर’’। कहा जाता है संवत् 1135 विक्रमी (1078 ई.) में नल्ह के बेटे विजयसिंहराणिया ने बीजारणा खेड़ा बसाया। फिर संवत् 1235 में (1178 ई.) लढाना में गढ़ बनवाया। लढाने में गढ़ के तथा घोड़ों की घुड़साल के चिन्ह अब तक पाए जाते हैं। उस समय देहली में बादशाह अल्तमश (1211–1236 ई.) राज्य करता था। अन्य देशी रजवाड़ों की भांति विजयराणिया लोग भी विद्रोही हो गये। इस कारण अल्तमश को उनसे लड़ना पड़ा। इन्हीं लोगों में आगे जगसिंह नाम का योद्धा हुआ, उसने पलसाना पर अधिकार कर लिया और कच्ची गढ़ी बनाकर आस-पास के गांवों पर प्रभुत्व कायम कर लिया। यह घटना संवत् 1312 (1255 ई.) विक्रमी की है। संवत् 1572 (1515 ई.) में इस वंश में देवराज नाम का सरदार हुआ। इस समय शेखावतों और कछवाहों के राज्य का विस्तार हो रहा था। जयपुर राज्य के कई स्थानों में ये लोग पाये जाते हैं। इस वंश के लोग बहादुर होते हैं, साथ ही जाति-भक्त भी। यद्यपि इस समय उनके पास राज्य नहीं है, फिर भी वंश गौरव अब तक उनके हृदय में है। उसके उदाहरण मा. भजनलाल अजमेर और चौ. लादूराम गोवर्धनपुरा के हृदयों मे टटोले जा सकते हैं।
ढाका
ढाका (1258 ई.): गानोड़ा के ढाका - बुरडक गोत्र के इतिहास में उल्लेख है कि गानोड़ा गाँव के मोमराज ढाका को संवत 1315 (1258 ई.) में नसिरुदीन महमूद (1246–1266) बादशाह ने मनसबदार बनाया. मोम राज ढाका ने संवत 1308 से 1315 के बीच 6 बार बुरड़कों की राजधानी सरनाउ-कोट पर हमला किया पर बुरड़क अविजित रहे. अंत में संवत 1315 (1258 ई.) की आसोज माह के अमावस को सभी बुरड़क जब निशस्त्र हालाणी बावडी पर श्राध के लिये एकत्रित हुये उस समय मोमराज ढाका ने 25000 की फ़ौज लेकर उनपर तोपों से हमला किया. सभी बुरड़क मारे गए और किला नष्ट कर दिया गया. सरनाउ-कोट में कोई भी नहीं बचा. गाँव की सातों जातियां ख़त्म कर दी गयी. मामराज ढाका खुश होकर दिल्ली चला गया. मोमराज का उल्लेख इतिहास में मिलता है. इतिहासकार एच. ए. रोस [8] लिखते हैं कि सोनीपत जिले के आहूलाणा गाँव का सम्बन्ध राजस्थान से है. आहूलाणा परंपरा के अनुसार उनके पूर्वज दिल्ली की तरफ उसके दो भाई मोम और सोम के साथ आये. घाटा नदी के किनारे उनके स्वजातियों से भीषण संघर्ष हुआ जिनका नास कर वे दिल्ली आये जहाँ बादशाह ने उनका अच्छा स्वागत किया और भूमि आवंटित की । सोम को गंगा किनारे का इलाका दिया जहाँ उनके वंसज आज राजपूतों में मिलते हैं। मोम को रोहतक, हांसी और जींद का इलाका दिया गया जहाँ उनके वंसज आज जाटों में मिलते हैं।
मालूजी ढाका ने मगलूणा गांव का बसाया 1394 ई.: शिक्षा संत स्वामी केशवानंद का जन्म सीकर जिले के लक्ष्मणगढ़ तहसील में मगलूणा गांव में पौष माह संवत 1940 (1883 ई.) में ढाका जाट गोत्र में हुआ. इनके पिता ठाकरसी ढाका और माता का नाम सारां था जो खेरवा गोत्र की थी. मगलूणा गांव की स्थापना स्वामी केशवानंद के 13 पीढ़ी पहले पूर्वज मालूजी ढाका ने मंगलवार वैशाख सुदी पंचमी संवत 1451 (1394 ई.) में की थी. यह जानकारी ढाका गोत्र के भाट बालू सिंह गांव लोरड़ी तहसील दूदू जिला जयपुर से प्राप्त जानकारी के आधार पर है. यहां ढाका परिवार जूलियासर गांव से आए थे.
जूलिया ढाका ने जूलियासर बसाया: कहा जाता है कि सिधमुख के पास हुई लड़ाई में सभी ढाका लोग मारे गए थे. ढाका परिवार में ब्याही गयी एक चाहर गोत्र की महिला के कोख में पल रहा बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम जूलिया ढाका था. जूलिया ढाका सिधमुख से चलकर सीकर जिले की तहसील लक्ष्मणगढ में जूलियासर नामक गांव बसाया. जूलिया ढाका के 18 पुत्र हुए जिनके नाम से 18 गांव बसाए गए. ढाका गोत्र के जाटों द्वारा कुल 45 गांव बसाये गए हैं. सभी ढाका जूलियासर से निकलकर फैले हैं.
सीधमुख के पास ढाका गांव में जाट और राठौरों की लड़ाई: ठाकुर देशराज लिखते हैं कि जोहिया यौधेय-वंशीय हैं। प्रजातंत्री समुदायों में यौधेय बहुत प्रसिद्ध रहे हैं | जैसलमेर, जांगल और मारवाड़ के बहुत से प्रदेश पर किसी समय इनका राज रहा है। राठौरों से पराजित होने से पहले उनका 600 गांवों पर अधिपत्य था। शेरसिंह इनका राजा था। जैसा नाम था, वैसा ही वह शूरवीर भी था। राठौरों को नाकों चने शेरसिंह ने ही चबाए थे। भूरूपाल में उसकी राजधानी थी।
गोदारों से सन्धि हो जाने के बाद बीका जी ने कुछ समय अपनी व्यवस्था ठीक करने और शक्ति संचय करने में लगाया। जब अवकाश मिला तो गोदारों की ओर अपनी सेनाएं लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण किया। शेरसिंह ने अपनी सेनाएं इकट्ठी करके दोनों शक्तियों का मुकाबला किया। शेरसिंह बड़ा बांका योद्धा था। भय उसके पास तनिक भी न फटकता था। वास्तव में यह निरन्तर लड़ने वाले शूरों मे से था। ‘देशी राज्यों के इतिहास’ में सुखसम्पत्ति राय भंडारी ने लिखा है-
- “शेरसिंह ने अपनी समस्त सेना के साथ बीका जी के खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी। बीका जी जो कई युद्धों के विजेता थे इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके। शत्रुगण अद्भुत् पराक्रम दिखाकर आपके छक्के छुड़ाने लगे। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, आपने षड़्यन्त्र द्वारा शेरसिंह को मरवा डाला।”[9][10]
शेरसिंह के मारे जाने के बाद भी जोहिया जाट विद्राही बने रहे। उन्होंने सहज ही में अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रत्येक युवक प्राणों की बाजी लगाकर स्वाधीनता की रक्षा करना चाहता था। जब भी उनका कोई दल संगठित हो जाता, विद्रोह खड़ा कर देते। शेरसिंह के बाद उन्हें कोई उतना योग्य नेता नहीं मिला। जोहिया जाट राठौरों को जांगल-प्रदेश से अवश्य ही खदेड़ देते यदि गोदारे उनके साथ न होते। गोदारों की भी शक्ति जोहियों से कम नहीं थी। दो प्रबल शत्रुओं के मुकाबले में आखिर उन्हें विवश होना पड़ा। धीरे-धीरे उनका विद्रोही स्वभाव भी जाता रहा। जाटों से अब राठौर निष्कंटक हो गए। जाट और राठौरों की सबसे बड़ी लड़ाई सीधमुख के पास ढाका गांव में हुई थी।[11][12]
ढाका एवं सिद्धमुख को लूट कर नष्ट-भ्रस्त करके 30 पीढ़ी तक गुलामी भोगते रहे। ढाका गाँव जाट समाज का तीर्थस्थल है, जहाँ युद्ध में लड़ते हुए काम आये वीरों के स्मारक अभी भी मौजूद हैं। [13]
ढाका का युद्ध (1488) और जाट गणराज्यों का पतन: इधर गोदारों की और से पांडू का बेटा नकोदर राव बीका व कान्धल राठोड़ के पास पुकार लेकर गया जो उस समय सीधमुख को लूटने गए हुए थे. नकोदर ने उनके पास पहुँच कर कहा कि तंवर नरसिह जाट आपके गोदारा जाटों को मारकर निकला जा रहा है. उसने लाघड़िया राजधानी के बरबाद होने की बात कही और रक्षा की प्रार्थना की. इसपर बीका व कान्धल ने सेना सहित आधी रात तक नरसिंह का पीछा किया. नरसिंह उस समय सीधमुख से 6 मील दूर ढाका नमक गाँव में एक तालाब के किनारे अपने आदमियों सहित डेरा डाले सो रहा था. रास्ते में कुछ जाट जो पूला सारण से असंतुष्ट थे, ने कान्धल व बीका से कहा की पूला को हटाकर हमारी इच्छानुसार दूसरा मुखिया बना दे तो हम नरसिंह जाट का स्थान बता देंगे. राव बीका द्वारा उनकी शर्त स्वीकार करने पर उक्त जाट उन्हें सिधमुख से 6 मील दूरी पर उस तालाब के पास ले गए, जहाँ नरसिंह जाट अपने सैनिकों सहित सोया हुआ था.[14] [15]
राव कान्धल ने रात में ही नरसिंह जाट को युद्ध की चुनोती दी. नरसिंह चौंक कर नींद से उठा. उसने तुरंत कान्धल पर वार किया जो खाली गया. कान्धल ने नरसिंह को रोका और और बीका ने उसे मार गिराया. [16] घमासान युद्ध में नरसिंह जाट सहित अन्य जाट सरदारों कि बुरी तरह पराजय हुई. दोनों और के अनेक सैनिक मरे गए. कान्धल ने नरसिह जाट के सहायक किशोर जाट को भी मार गिराया. इस तरह अपने सरदारों के मारे जाने से नरसिह जाट के साथी अन्य जाट सरदार भाग निकले. भागती सेना को राठोड़ों ने खूब लूटा. इस लड़ाई में पराजय होने के बाद इस एरिया के सभी जाट गणराज्यों के मुखियाओं ने बिना आगे युद्ध किए राठोड़ों की अधीनता स्वीकार कर ली और इस तरह अपनी स्वतंत्रता समाप्त करली. फ़िर वहाँ से राव बीका ने सिधमुख में डेरा किया. वहां दासू बेनीवाल राठोड़ बीका के पास आया. सुहरानी खेड़े के सोहर जाट से उसकी शत्रुता थी. दासू ने बीका का आधिपत्य स्वीकार किया और अपने शत्रु को राठोड़ों से मरवा दिया. [17] इस तरह जाटों की आपसी फूट व वैर भाव उनके पतन का कारण बना.[18]
गढ़वाल
गढ़वाल (c.13 ई.): गढ़मुक्तेश्वर का राज्य जब इनके हाथ से निकल गया, तो झंझवन (झुंझनूं) के निकटवर्ती-प्रदेश मे आकर केड़, भाटीवाड़, छावसरी पर अपना अधिकार जमाया। यह घटना तेरहवीं सदी की है। भाट लोग कहते हैं जिस समय केड़ और छावसरी में इन्होंने अधिकार जमाया था, उस समय झुंझनूं में जोहिया, माहिया जाट राज्य करते थे। जिस समय मुसलमान नवाबों का दौर-दौरा इधर बढ़ने लगा, उस समय इनकी उनसे लड़ाई हुई, जिसके फलस्वरूप इनको इधर-उधर तितर-बितर होना पड़ा। इनमें से एक दल कुलोठ पहुंचा, जहां चौहानों का अधिकार था। लड़ाई के पश्चात कुलोठ पर इन्होंने अपरा अधिकार जमा लिया। सरदार कुरडराम जो कि कुलोठ के गढ़वाल वंश-संभूत हैं नवलगढ़ के तहसीलदार हैं। यह भी कहा जाता है कि गढ़ के अन्दर वीरतापूर्वक लड़ने के कारण गढ़वाल नाम इनका पड़ा है। इसी भांति इनके साथियों में जो गढ़ के बाहर डटकर लड़े वे बाहरौला अथवा बरोला, जो दरवाजे पर लड़े वे, फलसा (उधर दरवाजे को फलसा कहते हैं) कहलाये। इस कथन से मालूम होता है, ये गोत्र उपाधिवाची है। बहुत संभव है इससे पहले यह पांडुवंशी अथवा कुन्तल कहलाते हों। क्योंकि भाट ग्रन्थों में इन्हें तोमर लिखा है और तोमर भी पांडुवंशी बताये जाते हैं। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृ.599-600)
जाखड़
जाखड़ (985 ई.): जाखड़ एक प्रसिद्ध गोत्र है। इसक गोत्र के जाट पंजाब, राजस्थान ओर देहली प्रान्तों में पाये जाते हैं। मि. डब्लयू. क्रुक ने-‘उत्तर-पश्चिमी प्रान्त और अवध की जातियां’ नामक पुस्तक में लिखा है कि “द्वारिका के राजा के पास एक बड़ा भारी धनुष और बाण था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि इसे कोई तोड़ देगा, उसका दर्जा राजा से ऊंचा कर दिया जाएगा। जाखर ने इस भारी कार्य की चेष्टा की और असफल रहा। इसी लाज के कारण उसने अपनी मातृ-भूमि को छोड़ दिया और बीकानेर में आ बसा।”। जाखड़ ने रिडी को अपनी राजधानी बनाया। भाट के ग्रन्थों में लिखा है कि द्वारिका के राजा के परम रूपवती लड़की थी। उसने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मनुष्य धनुष को तोड़ देगा, उसी के साथ में लड़की की शादी कर दी जाएगी। साथ ही उसे राजाओं से बड़ा पद दिया जाएगा। जाखड़ सफल न हुआ। जाखड़ एक नरेश था। इस कहानी से यह मालूम होता है कि जाखड़ लोगों का इससे भी पहले अजमेर प्रान्त पर राज्य था, यह भी भाट के ग्रन्थों से पता चलता है। हमें उनके राज्य के होने का पता मढौली पर भी चलता है। मढौली जयपुर राज्य में सम्भवतया मारवाड़ की सीमा के आस-पास कहीं था। उस समय फतहपुर के आस-पास मुसलमान राज्य करते थे। इन मुसलमानों और जाखड़ों में मढौली के पास युद्ध हुआ था। जिला रोहतक में लडान नामक स्थान पर जाखड़ों के सरदार लाड़ासिंह का राज्य था। एक बार पठानों ने उनसे लडान छीन लिया। जाखड़ लोगों ने इसे अपना अपमान समझा और सम्मिलित शक्ति से उन्होंने लडान को फिर पठानों से ले लिया। इस तरह उनके कई सरदारों ने औरंगजेब के समय तक राजस्थान और पंजाब के अनेक स्थानों पर राज किया है। अन्तिम समय में उनके सरदारों के पास केवल चार-चार अथवा पांच-पांच गांव के राज्य रह गये थे। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृ.594-595)
कैप्टन दलीपसिंह अहलावत [19]लिखते हैं कि जाखड़ जाटों के बीकानेर में भी कई छोटे-छोटे राज्य थे[20]। जब राजस्थान में राजपूतों के राज्य स्थापित हो गये तब जाखड़ जाटों का एक दल रोहतक जिला (हरयाणा) में आ गया। इनका नेता लाढसिंह था। यहां पर जाखड़ों ने साहलावास, लडान आदि बहुत गांव बसाये।
कटेवा
कटेवा - खुडाना के कटेवा : इन्हीं लोगों के नाम से उस नदी का नाम काटली प्रसिद्ध हुआ, जिसके किनारे यह जमकर बैठ गए। झंझवन से आगे काटली नदी बहती थी। बरसात में वह अब भी बहती है। उसी के किनारों पर कटेवा लोगों का जनपद था। काटली नदी के किनारे खुडाना नामक एक गढ़ है। अब सिर्फ वहां भी मिट्टी का एक टीला अवश्य है। आस-पास के लोग कहते हैं, यह पहले गढ़ था। कटेवा लोगों का यहां राज्य था। ऐसा कहते हैं कि यवनों से युद्ध में लड़ते समय देश की रक्षा के लिए अत्यधिक संख्या में सिर कटाने के कारण ये कटेवा मशहूर हुए हैं, जिस भांति कि शिशोदिया। वास्तव में यह कर्कोट या वाकाटक यादव हैं। (जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृ.614)
रतन लाल मिश्र[21] ने लिखा है कि लोहार्गल क्षेत्र में शोभावती, कर्कोटकी आदि छोटी नदियां अपना शिप्र प्रवाह लिए आती हैं और शीघ्र कुछ दूर बहकर विलीन हो जाती हैं. अजीतगढ़ के पास पवित्रतोया त्रिवेणी है जो इस क्षेत्र में बड़ी प्रसिद्ध मानी जाती है. रघुनाथगढ़ की नदी 15 किलोमीटर लंबी है जो आगे चलकर रानोली की नदी में मिल जाती है. [22]
खीचड़ 778 ई.
सभी इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि दौलत सिंह शेखावत (r.1687-1721) ने वर्त्तमान सीकर नगर की नींव रखी. जसवंत सिंह की मृत्यु पर उसका पुत्र दौलत सिंह उसकी जगह राज काज चलाने लगा. खंडेला के बहादुर सिंह ने वीरभान का बास नामक एक छोटा सा गांव इसको बैर भाव की शांति के लिए दिया. यहां पर राव दौलत सिंह ने वर्तमान सीकर नगर की नींव विक्रम संवत 1744 (1687 ई.) में रखी.
वीरभान का बास किसने बसाया इसकी जानकारी हमें बुरड़क गोत्र के इतिहास से मिलती है. इसके संस्थापक बीरभाण चोहान 778 ई. में हांसी के राव राजा थे. बीरभाण चौहान वस्तुत: खीचड़ गोत्र के थे उनको वीरभान खीचड़ भी कहा गया है. सीकर के आसपास खीचड़ गोत्र की अधिक जनसंख्या होना इसको प्रमाणित करता है.
बड़वा (भाट) श्री भवानीसिंह राव, गाँव: हेशवास, पोस्ट: बिचून, तहसील: फूलेरा, जिला: जयपुर (फोन-7742353459) की बही में बुरडक इतिहास के सम्बन्ध में निम्न विवरण उपलब्ध है: चौधरी बालणसिंह बुरड़क साम्भर से उठकर आये और माघ सुदी बसंत पंचमी के दिन संवत 821 (765 ई.) को बालरासर गाँव बसाया. 85 हाथ गहरा पूणी पांच हाथ चोडा पक्का कुवा चिनवाया. इसकी गूण अगुणी (पूर्व) दिशा में रखी. गाँव से उत्तर दिशा में बालाणु नाम से जोहड़ खुदवाया. इसके नीचे सवा पांच सौ बीघा जमीन छोड़ी. शिव बद्रीनारायण का मंदिर बनवाया. संवत 825 (768 ई.) में बालरासर से उठकर चौधरी मालसिंह ने चैत सुदी राम-नवमी के दिन कारी गाँव बसाया. गाँव में 90 हाथ गहरा पूणी पांच हाथ चोडा पक्का कुवा और पनघट कराया. चार मरवे बनाये और इसकी गूण उत्तर दिशा में रखी. गोपीनाथजी का मंदिर बनवाया. ब्राह्मण धनराज ने पूजा की. 51 बीघा जमीन मंदिर के लिए दी. कारंगा गाँव से आथुनी सवा दो सौ बीघा जमीन बीरभाण चोहान के समय छोड़ी. संवत 835 (778 ई.) में कारी गाँव हांसी के राव राजा बीरभाण चुहान के अधीन था. (See:Burdak Gotra Ka Itihas)
मान
गोरीर के मान: ठाकुर देशराज[23] ने लिखा है .... पटियाला राज्य की सरहद पर शेखावाटी का प्रसिद्ध गांव है गोरीर। यहीं मान गोत्र के जाटों ने अब से 800 से 900 वर्ष पहले अपनी-2 अधिष्ठात्री देवी गोरी के नाम पर जो गांव बसाया वही आज तक गोरीर के नाम से मशहूर है। मान जाटों की जब स्वतंत्रता नष्ट हो गई और शेखावतों का आगमन हुआ तब भी गौरीर के मान जाटों ने अपने स्वाभिमान को कायम रखा। चौधरी जीतराम जी इनही मान जाटों के विक्रमी बीसवीं शताब्दी के प्रतिनिधि थे। उनके सात पुत्र हुए- 1 तारा सिंह, 2 नेतराम सिंह, 3 बुधराम, 4 मनीराम, 5 नारायण सिंह 6 इंदराज और 7 हीरालाल
ठाकुर देशराज[24] लिखते हैं - [पृ.605]: यह भाटी जाटों की एक शाखा है, ऐसा भाट-ग्रन्थ मानते हैं। इनकी वंशावली जो जाटों की लिखी हुई है, उसमें भाटियों को सूर्यवंशी लिखा है। साथ ही यह भी लिखा है कि भक्त पूरनमल के पिता शंखपति का विवाह इन्हीं लोगों में हुआ था। लगभग पन्द्रह सौ वर्ष पहले इनका एक समूह देहली के पास बलवांसा नामक स्थान में गजनी से आकर आबाद हुआ था। मानसिंह जिसके नाम पर इस वंश की प्रसिद्धि बताई जाती है, उसका पुत्र बीजलसिंह ढोसी ग्राम में आकर अवस्थित हुआ। ढोसी नारनौल के पास पहाड़ों में घिरा हुआ नगर था। इस स्थान पर अब भी दूर-दूर के यात्री आते हैं, मेला लगता है। कई मन्दिर और कुंड यहां पर उस समय के बने हुए हैं। पहले यहां गंडास गोत्र के जाटों का अधिकार था। इसने नागल की पुत्री गौरादेवी से सम्बन्ध किया और फिर ढोसी से 3 मील हटकर [पृ.606]: गौरादेवी के नाम पर गोरीर नाम का गांव बसाया। आगे उनसे जितना भी हो सका, अपना राज्य बढ़ाया। वीजलसिंह से 20 पीढ़ी पीछे सरदार रूपरामसिंहजी हुए। उस समय इस प्रदेश पर शेखावत आ चुके थे। खेतड़ी के शेखावतों से रूपरामसिंहजी का 10, 12 वर्ष तक संघर्ष रहा, किन्तु इन्होंने अधीनता स्वीकार न की। मान लागों के अनेक दल थे और वे अनेक प्रदेशों में बसे हुए हैं। खेतड़ी के शेखावतों से रूपरामसिंह का युद्ध अब से लगभग 80-90 वर्ष पहले हुआ था, क्योंकि कुं. नेतरामसिंहजी गोरीर वालों से रूपरामसिंहजी चार पीढ़ी पहले हुए थे। उस समय सुखरामसिंहजी के पास कितना इलाका था, भाट लोगों की पोथियों से इतना पता नहीं लगता है।
मील
मील - लक्ष्मणगढ़ के मील - [पृ.188]: सीकर के राव लक्ष्मण सिंह ने संवत 1862 (1805 ई.) में बेड़गांव की पहाड़ी पर गढ़ बनवाया और दो वर्ष बाद लक्ष्मणगढ़ नगर बसाया. मनसुख रणवां [25] ने अनुसंधान कर लेख किया है कि बेड़गांव पूर्व में मील जाटों की राजधानी रही है.
महरिया
ठाकुर देशराज[26] ने लिखा है ....[पृ.495]: सीकर राज्य में मेहरिया जाटों का भी स्थान काफी ऊंचा है। शिवि लोगों की अनेक शाखाओं में एक शाखा मेहरिया लोगों की है। शिवि लोगों की शासन व्यवस्था की काफी प्रशंसा गाई गई है। उनके मंत्रिमंडल में सेनापति को वीरभद्र कहा जाता था और रेवेन्यू मिनिस्टर (मालमंत्री) को ‘महि हेरक’ कहा जाता था। यही महि हेरक शब्द आज महेरिया बन गया। जिसे आज कल लोग महेरिया नाम से पुकारने लगे हैं।
[पृ.496]: कूदन को जिन महरियों ने आबाद किया उनमें भीमजी नाम का जो प्रसिद्ध महेरिया जाट था उसकी तीसरी पीढ़ी में रामनारायण जी हुए। रामनारायण जी के बड़े पुत्र चौधरी जीवनराम जी थे जो गणेशराम जी के बड़े भाई थे। उन्हीं जीवनराम जी के पुत्र चौधरी दलेलसिंह जी हैं।
कई विद्वानों के अनुसार माही नदी के किनारे बसने वाले तथा कुछ के अनुसार यूनान के मोरिया नामक स्थान से आने के कारण महरिया कहलाए। महरिया-बड़वा (वंशावली लेखक) अनुसार महरियों का निकास क्षत्रिय कुल के चौहानों से है। सांभर उनकी राजधानी थी। वहां से जाकर अजयराज ने अजय मेरु (अजमेर) बसाया । अजयराज के कुल में महीभान राजा हुआ । उन्हीं के कुल में हुए 'लालमहर' से जाट 'महरिया' कहलाए ।
कूदन के महरिया का इतिहास: बड़वा-बही के अनुसार कोदाराम महरिया ने गडेरा से आकर विक्रम संवत् 1353 अक्षय तृतीया (वैसाख शुक्ल पक्ष तृतीया) के दिन (सन 1296 ई.) अपने नाम से कूदन गांव बसाया । उनके वंशज किसनाराम पर अष्ट-आधार छतरी संवत् 1932 (सन् 1875 ई.) में बनाई। किसनाराम के रामू (निःसंतान), भींवा व बोहित हुए । भींवा के भाना, नोला, गुमाना व मोटा हुए। बोयत के उदा व माना हुए।
स्रोत: - दयाराम महरिया, कूदन ,सीकर (राजस्थान)
नाग
नाग: रतन लाल मिश्र [27] ने लिखा है - [पृ.25]: गणराज्य: राजस्थान एवं उसके समीपस्थ प्रदेशों में अर्जुनेय, उदेहिक, मल्लव, शिवि, राजन्य, यौधेय, नाग आदि गणराज्य थे. राजस्थान के गणराज्य यौधेय, नाग आदि ने कुषाणों की अधीनता स्वीकार कर ली थी. कुषाण शक्ति के पतन के बाद अर्जुनेय, मल्लव और यौधेय पुन: उठ खड़े हुए. पश्चिमी भारत के शक क्षत्रपों का शासन भी इस इस प्रदेश पर रहा.[28] यवनों ने राजस्थान का उस समय बड़ा भाग जीत लिया था. इस शक अधिकार का अंत राजस्थान में मालव लोगों ने अर्जुनेयों से मिलकर किया. [29] राजस्थान में कुषाणों की शक्ति का अंत यौधेयों के द्वारा हुआ. [30] डी.सी. सरकार की मान्यता है कि मल्लव लोगों ने वर्तमान जयपुर के बरनाला नामक स्थान पर क्षत्रपों को करारी शिकस्त दी. यह घटना 327 ई. की है. [31]
नेहरा
झुंझुनू और नरहड़ का नेहरा राजवंश : नेहरा भारत और पाकिस्तान में जाटों का एक गोत्र है. ये राजस्थान, दिल्ली, हरयाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और पाकिस्तान में पाए जाते है. नेहरा की उत्पत्ति वैवस्वत मनु के पुत्र नरिष्यंत (नरहरी) से मानी जाती है. पहले ये पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में नेहरा पर्वत पर निवास करते थे. वहां से चल कर राजस्थान के जांगलदेश भू-भाग में बसे और झुंझुनू में नेहरा पहाड़ पर आकर निवास करने लगे.
ठाकुर देशराज[32] ने लिखा है : राजस्थान में नेहरा जाटों का तकरीबन 200 वर्ग मील भूमि पर किसी समय शासन रहा था. उनके ही नाम पर झुंझुनू के निकट पर्वत आज भी नेहरा पहाड़ कहलाता है. दूसरा पहाड़ जो मौरा (मौड़ा) है, मौर्य लोगों के नाम से मशहूर है.नेहरा लोगों में सरदार झुन्झा अथवा जुझार सिंह बड़े मशहूर योद्धा हुए हैं, उन्हीं के नाम से झुंझुनू जैसा नगर प्रसिद्द है. कुंवर पन्नेंसिंह ने ‘रण-केसरी सरदार जुझारसिंह’ नाम की पुस्तक लिखी थी। उसी में से नेहरा और सरदार जुझारसिंह का थोड़ा-सा वर्णन यहां पर हम देते हैं ।
पंद्रहवीं सदी में नेहरा लोगों का नरहड़ में शासन था. वहां पर उनका एक किला भी था. उससे 16 मील पश्चिम में नेहरा पहाड़ के नीचे नाहरपुर में उनके दूसरे दल का राज्य था. सोलहवीं सदी के अंतिम भाग में और सत्रहवीं सदी के प्रारंभ में नेहरा लोगों का मुसलमान शासकों से युद्ध हुआ. आखिर नेहरा लोगों ने बादशाहों की अधीनता स्वीकार
[पृ.615]: करली. वे खास वक्त पर बादशाहों को भेंट देते थे. शाहों को भेंट देने के कारण उनकी ‘शाही भेटवाल’ के नाम से पुकारा जाने लगा. आज तक वे ‘शाही भेटवाल’ कहलाते हैं.

जुझार सिंह: नेहरा लोगों के प्रसिद्द सरदार जुझार सिंह का जन्म संवत 1721 विक्रमी श्रावण महीने में हुआ था. उनके पिता नवाब के यहाँ फौज के सरदार यानि फौजदार थे. युवा होने पर सरदार जुझार सिंह नवाब की सेना में जनरल बन गए. उनके दिल में यह बात पैदा हो गयी कि भारत में जाट साम्राज्य स्थापित हो. जुझार सिंह ने पंजाब, भरतपुर, ब्रज के जाट राजाओं और गोकुला के बलिदान की चर्चा सुन रखी थी. उनकी हार्दिक इच्छा थी कि नवाबशाही के खिलाफ जाट लोग मिल कर बगावत करें.
उन्हीं दिनों सरदार जुझार सिंह की मुलाकात एक राजपूत से हुई. वह किसी रिश्ते के जरिये नवाब के यहाँ नौकर हो गया. उसका नाम शार्दुल सिंह था. दोनों का सौदा तय हो गया. शार्दुल सिंह ने वचन दिया कि इधर से नवाबशाही के नष्ट करने पर हम तुम्हें (सरदार जुझार सिंह को) अपना सरदार मान लेंगे. अवसर पाकर सरदार जुझार सिंह ने झुंझुनू और नरहड़ के नवाबों को परास्त कर दिया और बाकि मुसलमानों को भगा दिया.
कुंवर पन्ने सिंह द्वारा लिखित 'रणकेसरी जुझार सिंह' नमक पुस्तक में अंकित है कि सरदार जुझार सिंह को दरबार करके सरदार बनाया गया. सरदार जुझार सिंह का तिलक करने के बाद एकांत में पाकर विश्वास घात कर शेखावतों ने सरदार जुझार सिंह को धोखे से मार डाला. लिखा गया है कि सरदार जुझार के यह पूछने पर कि यह कैसी सरदारी दी जा रही है, जवाब मिला हम मूर्ख नहीं हैं, “तुम्हें जिन्दों का नहीं तो मरे हुए लोगों का सरदार बना रहे हैं. तुम्हें चाहिए था, सावधान रहते.” इस घृणित कृत्य का समाचार ज्यों ही नगर में फैला हाहाकार मच गया. जाट सेनाएं बिगड़ गयी. फिर भी कुछ लोग विपक्षियों द्वारा मिला लिए गए. कहा जाता है कि उस समय चारण ने शार्दुल सिंह के पास आकर कहा था - सादे लीन्हो झूंझणूं, लीनो अमर पटै, बेटे पोते पड़ौते, पीढी सात लटै. अर्थात - सादुल्लेखान से इस राज्य को झून्झा (जुझार सिंह) ने लिया था, वह तो अमर हो गया. अब इसमें तेरे वंशज सात पीढी तक राज करेंगे.
जुझार अपनी जाती के लिए शहीद हो गया. वह संसार में नहीं रहे , किन्तु उनकी कीर्ति आज तक गाई जाती है. झुंझुनू शहर का नाम जुझार सिंह के नाम पर झुन्झुनू पड़ा है.
शेखावतों ने जाट-क्षत्रियों के विद्रोह को दबाने के लिए तथा उन्हें प्रसन्न रखने के लिए निम्नलिखित आज्ञायेँ जारी की गयी [पृ.-616]: -
- लगान की रकम उस गाँव के जाट मुखिया की राय से ली जाया करेगी.
- जमीन की पैमयश गाँव के लम्बरदार किया करेंगे.
- गोचर भूमि के ऊपर कोई कर नहीं होगा.
- जितनी भूमि पर चारे के लिए गुवार बोई जावेगी उस पर कोई कर नहीं होगा.
- गाँव में चोरी की हुई खोज का खर्चा तथा राज के अधिकारियों के गाँव में आने पर उन पर किया गया खर्च गाँव के लगान में से काट दिया जावेगा. जो नजर राज के ठाकुरों को दी जायेगी वह लगान में वाजिब होगी.
- जो जमीन गाँव के बच्चों को पढ़ाने वाले ब्राहमणों को दो जायेगी उसका कोई लगान नहीं होगा. जमीन दान करने का हक़ गाँव के मुखिया को होगा.
- किसी कारण से कोई लड़की अपने मायके (पीहर) में रहेगी तो उस जमीन पर कोई लगान न होगा, जिसे लड़की अपने लिए जोतेगी.
- गाँव का मुखिया किसी काम से बुलाया जायेगा तो उसका खर्च राज देगा.
- गाँव के मुखिया को जोतने के लिए जमीन फुफ्त दी जायेगी. सारे गाँव का जो लगान होगा उसका दसवां भाग दिया जायेगा.
- मुखिया वही माना जायेगा जिसे गाँव के लोग चाहेंगे. यदि सरदार गाँव में पधारेंगे तो उन के खान=पान व स्वागत का कुल खर्च लगान में से काट दिया जायेगा.
- गाँव के टहलकर (कमीण) लोगों को जमीन मुफ्त दी जायेगी.
- जितनी भूमि पर आबादी होगी, उसका कोई लगान न होगा.
- इस खानदान में पैदा होने वाले सभी उत्तराधिकारी इन नियमों का पालन करेंगे.
कुछ दिनों तक इनमें से कुछ नियम आंशिक रूप से अनेक ठिकानों द्वारा ज्यों-के-त्यों अथवा कुछ हेर-फेर के साथ माने जाते रहे. कुछ ने एक प्रकार से कतई इन नियमों को मेट दिया.
एक चित्र में सरदार जुझारसिंह घायल अवस्था में टूटी हुई सांग को कंधे पर रखे हुए और घोड़े पर सवार दिखाए गए हैं.
झुंझुनू का मुसलमान सरदार जिसे कि सरदार जुझार सिंह ने परास्त किया था , सादुल्ला नाम से मशहूर था. झुंझुनू किस समय सादुल्लाखान से जुझार सिंह ने छीना इस बात का वर्णन निम्न काव्य में मिलता है: सत्रह सौ सत्यासी, आगण मास उदार, सादे लीन्हो झूंझणूं, सुदी आठें शनिवार. अर्थात - संवत 1787 में अघन मास के सुदी पक्ष में शनिवार के दिन झुंझुनू को सादुल्लाखान से जुझार सिंह ने छीना.
सरदार जुझार सिंह के बाद ज्यों-ज्यों समय बीतता गया उनकी जाट जाति के [पृ.617]: लोग पराधीन होते गए. यहाँ तक कि वह अपनी नागरिक स्वाधीनता को भी खो बैठे. एक दिन जो राजा और सरदार थे उनको भी बादमें पक्के मकान बनाने के लिए जमीन खरीदनी पड़ती थी. उन पर बाईजी का लाग लगा और भेंट, न्यौता-कांसा अदि अनेक तरह की बेहूदी लाग और लगा दी गई.
निठारवाल
मनसुख रणवां[33] ने लिखा है ....[पृ.17]: राजस्थान राज्य की वर्तमान राजधानी जयपुर जिले के विराटनगर के नजदीक निठारा गांव के जाट निठारवाल कहलाए. निठारवाल मूल रूप से कछवाहा वंशी हैं. निठारा गांव से प्रस्थान कर हांसपुर बसाया तत्पश्चात भारणी, रींगस, सीतारामपुर निठारवाल गोत्र के जाटों ने बसाये. रींगस के निठारवाल परिवार में लगभग 1804 ईस्वी में लोठू नाम के बालक का जन्म हुआ. लोठू के एक भाई पेमाराम वह एक बहन थी. उसके माता-पिता स्वाभिमानी इंसान थे.
रणवा
रणवा: सामी खेड़ा के रणवा - नागौर के शासक पीपादेव दहिया ने 1027-1065 ई. तक शासन किया। पीपा देव दहिया का विवाह राजा मैहण जाखड़ की पुत्री देऊ जाखड़ से सम्पन्न हुआ। राव पीपादेव व देऊ जाखड़ के चार पुत्र हुए। जिनमें सहज राव, मंडदेव (मानदेव), गंगदेव, राजदेव हुए। सहज राव के वंशज रणवा, मंडदेव (मानदेव) के वंशज मण्डीवाल, गंगदेव के वंशज गुगल, राजदेव के वंशज रोजा (राज) बने।

सहज राव ने नागौर से प्रस्थान कर विक्रमी सम्वत 1111 (1054 ई.) में वर्तमान खूड के पास माघ सुदी बृहस्पत पंचमी को सामी खेड़ा (बड़ा प्रशासनिक क्षेत्र) बसाया। सामी के पश्चिम में डूंगरी (पहाडी) पर गढ़ बनवाया। गढ़ के उत्तर दिशा में डूंगरी पर शिव मंदिर बनवाया। रणवा गढ़ की बुर्ज व शिव मंदिर आज भी विद्यमान है। रणवा वंश के झुंझार वीर मलेसी रणवां देव स्थल, झुंझार वीर भीम सिंह रणवां व सती माता सन्ध्या की देवली (देवस्थली) व दर्जनों शिलालेख मौजूद है। सामी गाँव में रणवा वंश की कोलडी भी मौजूद है। सामी गाँव में रणवा वंश के प्राप्त शिलालेखों के आधार पर लगभग सेंकड़ों वर्ष तक रणवा वंश का शासन रहा।
शिव मंदिर की पूजा-अर्चना हेतु 200 बीघा जमीन मंदिर के वास्ते रखी गई जो सरकारी रिकॉर्ड में है। - सामी में गोचर भूमि 400 बीघा जमीन छोड़ी गई है जो वर्तमान में भी है।
सामी खेड़ा के अलावा रणवा वंश के वंशजों ने 12 खेड़े और बसाए जिनमें जाचास, भीखणवासी, करकेड़ी, खानड़ी, मौलासर, बाय, बुच्चासी, हीराणी, चौसला, मकराना, भूरभूरा, जाबदी नगर इस तरह 12 खेड़ी से ही रणवा वंश पूरे भारत वर्ष में फैला। [34]
शास्त्रों में कहा भी गया है कि अच्छे काम के लिए विस्तार हो बहुत जरूरी है। इस प्रकार यहाँ से सम्पूर्ण भारत वर्ष में रणवा वंश का विस्तार हुआ है।
रणवा वंश के बही-भाट के रिकॉर्ड के आधार पर सम्पूर्ण भारत वर्ष में लगभग 70 हजार रणवा परिवार निवास करते है। सभी रणवा परिवारों में भावनात्मक जुड़ाव है।
सन 2000 में मनसुख रणवा के नेतृत्व में रणवा परिवार की एक कमेटी गठित की गयी। जिसका उद्देश्य रणवा वंश की जन्मस्थली सामी गाँव अपने पूर्वजों की धरोहर का जीर्णोद्वार कर संजोकर रखना था। सामी गाँव का रणवा शिव मंदिर, धधीमती माता का मंदिर, गढ़ की बुर्ज, मोक्षधाम के समीप स्थित शाही कुँआ, झुंझार वीर मलेसी रणवां देव स्थली, झुंझार वीर भीम सिंह रणवा व सती सन्ध्या माता की देव स्थली आदि का संरक्षण करने हेतु कमेटी को साथ लेकर रणवा परिवारों से सहयोग राशि लेकर जीर्णोद्वार का कार्य करवाया गया था। राजस्थान के अलावा हरियाणा, पंजाब, मध्यदेश के रणवा परिवारों ने सहयोग राशि आहूत की गई थी।
सन्दर्भ
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.43-44
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.44
- ↑ Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX,p.613-614
- ↑ डॉ महेन्द्र सिंह आर्य , धर्मपाल सिंह डूडी , किशन सिंह फौजदार & विजेंद्र सिंह नरवर : आधुनिक जाट इतिहास , आगरा १९९८ पृ . 266
- ↑ Jat History Thakur Deshraj/Chapter V, p.144
- ↑ पुस्तक 'बुडानिया (जाट) इतिहास', 2010, लेखक बड़वा श्री शिशुपाल सिंह और महीपाल सिंह, दादिया, किशनगढ़, आजमेर-305813. Mob:9829846234, 9829807064
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.37-38.
- ↑ A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/D, p.221
- ↑ वाक-ए राजपूताना में भी यही बात लिखी है।
- ↑ जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-621
- ↑ रामरत्न चरण का इतिहास।
- ↑ जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-621
- ↑ Dharati Putra: Jat Baudhik evam Pratibha Samman Samaroh Sahwa, Smarika 30 December 2012, by Jat Kirti Sansthan Churu, p.39
- ↑ नैणसी की ख्यात, भाग 2, पेज 203
- ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 209
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- ↑ Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 210
- ↑ Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III,प.217-219
- ↑ जाट इतिहास उर्दू पृ० 368, लेखक ठा० संसारसिंह।
- ↑ Ratan Lal Mishra: Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar ,p.4
- ↑ Rajasthan District Gazetteer Sikar p.6;Shastri p.6
- ↑ Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.386
- ↑ जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, pp. 605-606
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- ↑ Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, p. 25
- ↑ Select Inscription: Junagarh Inscription: DC Sirkar, Vol.II p.172; Ancient India - Dr. Radha Kumud Mookerji,p.84
- ↑ राजस्थान में पुरातत्व सामग्री - गणराज्यों का युग मरू भारती - पृ. 70
- ↑ Rajasthan Through Ages- Dasharath Sharma, p.55; Ancient India - RC Majoondar, p.130; Rajputana Desert - Its Archaeological Aspect; Bulletin of National Institute of Science No.1-1952
- ↑ Indian Antiquary, Vol.24,p.118
- ↑ Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX, p.614-618
- ↑ मनसुख रणवां - अमर शहीद लोटू जाट, प्रकाशक : जे. सी. रणवां प्रकाशन, सीकर, द्वितीय संस्करण 2001, पृ.17
- ↑ Mansukh Ranwa ‘Manu’ (2001): Amar Shaheed Lothoo Jat, J C Ranwa Prakashan, Jyoti Nagar, Piprali Road, Sikar, p.11.