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Lohargal

From Jatland Wiki
(Redirected from Lohargala)
Author: Laxman Burdak IFS (R)

Akwa - Mailasi - Kudan - Jerthi - Kolida - Dadia - Bhadhadar - Sinhasan -Raghunathgarh - Lohargal in Sikar, Rajasthan
Chirana -Kirodi Dham - Lohargal - Kot in Jhunjhunu
Lohargal Bawdi

Lohargal (लोहार्गल) is a beautiful place of great tourist interest, situated in the Jhunjhunu District, Rajasthan. It is famous for its natural scenic beauty.

Location

Lohargal is 68 km from Jhunjhunu via Nawalgarh and Udaipurwati. It is situated at a distance of 10 km from Udaipurwati.

Variants

History

Lohargal has great historical importance – regarded as the place of Bhima, one of the heroes of the great epic of India – the Mahabharata. The holy shrine of Lohargal is situated at the foot hills of the Aravalli Ranges.

In the Varāha Purana, a place named Lohārgala is stated to be ruled over by the Mleccha kings. [3]

There is a holy water tank at Lohargal, where pilgrims who cannot afford to go all the way to Varanasi come to wash away their sins. According to myth a mighty and huge army of Pandavas came to bathe here after their glorious victory on the battle fields only to find that their weapons and armours dissolved in the water. The literal meaning of Lohargal is Loha (Iron)+Gal (To melt), means that melts the iron.

Other tourist attractions worth visiting include Malket, Barkhandi, Gyan Bawari, Bhim Kund and Chetan Das Bawari. A large fair, held here every year from Krishna Janmashtami to Amawashya, is a major draw.

The nearest bus station is at Golyana. Regular buses are available to Nawalgarh, Udaipurwati and Sikar.

Lohargal Jat Dharmsala

Shri Navrang Singh Jakhar along with Sahib Singh Verma, the Chief Minister of Delhi inaugurated the Lohargal Jat Dharmsala on 30 June 2004. The attempts of Navrang Singh Jakhar to develop this site have succeeded in making it a good centre for tourist attraction.

Jaina sources

From Lohārgalā the Lord Mahavira moved to Purimatāla and stood in meditation at the ‘Śakaṭamukha’ garden outside the city. From there, passing through 'Unnāga' and ‘Gobhūmi’, he arrived at Rājagṛha.[4][5]

लोहार्गल

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है ...लोहार्गल (1) (AS, p.824) = लुहारू (AS, p.821) सीकर से 20 मील की दूरी पर स्थित राजस्थान का प्राचीन तीर्थ है। यह स्थान रामानंद संप्रदाय का विशिष्ट स्थान है। लुहारू में भगवान सूर्य देव का एक प्राचीन मंदिर स्थिति है। पर्वत के नीचे पुराणों में प्रसिद्ध 'ब्रह्मसर' बताया गया है। ऐसी प्रचीन अनुश्रति प्रचलित है कि पांडवों ने महाभारत के युद्ध के पश्चात् इस तीर्थ की यात्री की थी।

लोहार्गल (2) (AS, p.824) = वराह पुराण 15 में उल्लिखित है. यह स्थान संभवतः कुमायूं में चंपावत के निकट लोहाघाट है. यह वैष्णव तीर्थ है.

ब्रह्मह्रद

विजयेन्द्र कुमार माथुर[7] ने लेख किया है ...ब्रह्मह्रद = लोहार्गल (AS, p.651): लुहारू या प्राचीन लोहारगल पर्वत की तलहटी में यह पुराण प्रसिद्ध तीर्थ है। कहा जाता है कि पांडवों ने महाभारत के युद्ध के पश्चात् इस तीर्थ की यात्री की थी।

कर्कोटकी नदी

रतन लाल मिश्र[8] ने लिखा है कि लोहार्गल क्षेत्र में शोभावती, कर्कोटकी आदि छोटी नदियां अपना शिप्र प्रवाह लिए आती हैं और शीघ्र कुछ दूर बहकर विलीन हो जाती हैं. अजीतगढ़ के पास पवित्रतोया त्रिवेणी है जो इस क्षेत्र में बड़ी प्रसिद्ध मानी जाती है. रघुनाथगढ़ की नदी 15 किलोमीटर लंबी है जो आगे चलकर रानोली की नदी में मिल जाती है. [9]

लोहार्गल परिचय

लोहार्गल राजस्थान के शेखावाटी इलाके के झुंझुनू ज़िले से 70 कि.मी. दूर अरावली पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से क़रीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है। लोहार्गल का अर्थ होता है- "जहाँ लोहा गल जाए"। पुराणों में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है। लोहार्गल में पर्यटन की दृष्टि से कई महत्त्वपूर्ण स्थल हैं।

पौराणिक उल्लेख: लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है। भक्तों का यहाँ आना-जाना लगा रहता है। लोहार्गल के विषय में कथा है कि जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया, तब पांडव अपने स्वजनों की हत्या के पाप से व्यथित थे। श्रीकृष्ण के निर्देश पर वह सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करते भटक रहे थे। श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार जल में गल जायेंगे, वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांडव लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुंड में स्नान किया उनके सारे हथियार गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझा और इसे 'तीर्थराज' की उपाधि से विभूषित किया। फिर भगवान शिव की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।

दर्शनीय स्थल: पहले लोहार्गल में केवल साधु-संन्यासी ही रहा करते थे, पर अब गृहस्थ लोग भी यहाँ रहने लगे हैं। यहाँ एक बहुत विशाल बावड़ी है, जो महात्मा चेतन दास जी ने बनवाई थी। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। साथ के पहाड़ पर प्राचीन सूर्यमंदिर बना हुआ है। साथ ही वनखंड़ी जी का मंदिर भी है। कुंड़ के पास ही प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर तथा पांडव गुफ़ा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढियाँ चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किये जा सकते हैं। यहाँ समय-समय पर मेले लगते रहते हैं। हज़ारों नर-नारी यहाँ आकर कुंड में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

राजस्थान के शेखावटी इलाके के झुंझुनूं जिले से 70 कि. मी. दूर आड़ावल पर्वत की घाटी में बसे उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. की दूरी पर स्थित है लोहार्गल। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। झुंझुनू जिले में अरावली पर्वत की शाखाये उदयपुरवाटी तहसील से प्रवेश कर खेतडी, सिंघाना तक निकलती है, जिसकी सबसे उंची चोटी 1050 मीटर लोहार्गल में है ।

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव स्वजनों की हत्या के पाप से व्यथित थे। श्री कृष्ण के निर्देश पर वह सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन करते भटक रहे थे। श्री कृष्ण ने उन्हें बताया था कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांण्ड़व लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्य कुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की।

लोहार्गल में सिर्फ पांडवों ने ही कुल हत्या का पाप नहीं धोया था, बल्कि ये जगह गवाह है परशुराम के पश्चाताप की भी. विष्णु के छठें अंशअवतार परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शांत होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ.

पहले यहां सिर्फ साधू-सन्यासी ही रहा करते थे, पर अब गृहस्थ लोग भी रहने लगे हैं। यहां एक बहुत विशाल बावड़ी है जो महात्मा चेतन दास जी ने बनवाई थी, यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। साथ के पहाड़ पर प्राचीन सूर्यमंदिर बना हुआ है। साथ ही वनखंड़ी जी का मंदिर है। कुंड़ के पास ही प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर तथा पांड़व गुफा स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन किये जा सकते हैं। यहां समय-समय पर मेले लगते रहते हैं। हज़ारों नर-नारी यहां आ कुण्ड़ में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल है। लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है। भक्तों का यहां आना-जाना लगा रहता है फिर भी इस क्षेत्र की हालत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। चारों ओर गंदगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इंतजाम नहीं है। यदि इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहां देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरु हो सकता है।

भूतपूर्व विधायक नवलगढ़ श्री नवरंग सिंह ने 30 जून 2004 को दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री साहिब सिंह वर्मा के साथ जाट धर्मशाला लोहार्गल का उद्घाटन किया. आपके प्रयास से इस स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए गति प्रदान की गई.

सूर्यकुण्ड (लोहार्गल)

सूर्यकुण्ड राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, जिसकी धार्मिक मान्यता है। यह लोहार्गल की पहाड़ियों में स्थित है, जिसका अर्थ होता है- "जहाँ लोहा गल जाए"। यह राजस्थान में पुष्कर के बाद दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ है। इस तीर्थ का सम्बन्ध पांडवों, भगवान परशुराम, भगवान सूर्य और भगवान विष्णु से है। झुंझुनू ज़िले के दक्षिण में ज़िला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर अरावली पर्वत शृंखला में स्थित यह पवित्र स्थल सीकर-नीम का थाना सड़क मार्ग पर सीकर से लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यहाँ का अनुपम प्राकृतिक सौन्दर्य दर्शनीय है, जो यात्रियों को सहज ही आकर्षित करता है। भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी से अमावस्या तक प्रत्येक वर्ष लोहार्गल के पहाड़ों में हज़ारों लाखों नर-नारी पैदल परिक्रमा करते हैं और अमावस्या के दिन सूर्यकुण्ड में पवित्र स्नान के साथ यह परिक्रमा विधिवत संपन्न होती है।

पांडवों को पाप से मुक्ति: महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों के पाप का दर्द देख श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे, वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुँचे तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गये। इसके बाद शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ राज की उपाधि से विभूषित किया। मान्यता

यह क्षेत्र पहले ब्रह्मक्षेत्र था। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने शंखासुर नामक दैत्य का संहार करने के लिए मत्स्य अवतार लिया था। शंखासुर का वध कर विष्णु ने वेदों को उसके चंगुल से छुड़ाया था। इसके बाद इस जगह का नाम ब्रह्मक्षेत्र रखा।

यहां प्राचीन काल से निर्मित सूर्य मंदिर लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसके पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई। राजा ने भूत-भविष्य के ज्ञाताओं को बुलाकर उसके पिछले जन्म के बारे में पूछा। तब विद्वानों ने बताया कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी अर्थात बंदरिया थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया, क्योंकि बंदरिया का मांस अभक्ष्य होता है। हवा और धूप के कारण वह सूख कर लोहार्गल धाम के जलकुंड में गिर गई किंतु उसका एक हाथ पेड़ पर रह गया। बाकी शरीर पवित्र जल में गिरने से वह कन्या के रूप में आपके यहाँ उत्पन्न हुई है। विद्वानों ने राजा से कहा, आप वहां पर जाकर उस हाथ को भी पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। राजा इस चमत्कार से अति प्रसन्न हुए। विद्वानों ने राजा को बताया कि यह क्षेत्र भगवान सूर्यदेव का स्थान है। उनकी सलाह पर ही राजा ने हजारों वर्ष पूर्व यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।

परशुराम की प्रायश्चित स्थली: विष्णु के छठे अंशअवतार भगवान परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शान्त होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। तब उन्होंने यहां आकर पश्चाताप के लिए यज्ञ किया तथा पाप मुक्ति पाई थी। [10]

रायसल

रायसल वीर होने के साथ-साथ अति धार्मिक पुरुष था इसने मौजा सांवली की जमीन 13000 बीघा ठाकुर जी के भोग में लगाई थी. इसका एक तांबा पत्र प्राप्त हुआ है जिसके अनुसार इसने स्वामी रामरिख को लोहागर में 451 बीघा भूमि दी थी. यह तांबा पत्र वैशाख सुदी 15 संवत 1639 का है.[11]

बालानंदी पंथ

बालानंदी पंथ का स्थान लोहागर में विद्यमान है. रामानंदी साधु भी शेखावाटी में मिलते हैं.[12]

शेखावाटी की पहाड़ी श्रेणियां

रतन लाल मिश्र[13] ने लिखा है: [पृ.2]:शेखावाटी गौरी बालुका राशि के उन्नति टीलों से भरा-पूरा भूभाग है जहां केवल दक्षिणी भाग सघन वनावली से छाई गिरिपंक्तियों से आवृत्त है. यह पंक्ति


[पृ.3]: सिंघाना से सांभर तक फैली हुई है तथा इसे राज्य के और भागों से अलग कर देती. [14] कुछ दूर उत्तर की तरफ लोहार्गल के पहाड़ हैं जिनके सबसे ऊंचे शिखर को मालकेतु कहते हैं.[15] यह पहाड़ी श्रृंखला सिंघाना से खंडेला, उदयपुर, शाकंभरी, लोहार्गल, रघुनाथगढ़, सांगरवा, रेवासा, हर्ष आदि स्थानों से निकलती हुई सांभर झील तक चली जाती है. इस पहाड़ी श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी रघुनाथगढ़ की चोटी है जो 3450 फीट ऊंची है. हर्ष पर्वत शिखर 2998 फीट तथा लोहार्गल की बरखंडी की चोटी लगभग 3000 फीट ऊंची है. [16]

ये पहाड़ी पंक्तियां उदयपुरवाटी में बहुत घनी हो जाती हैं. लोहार्गल के चारों ओर विकट गिरिश्रृंखलाएं हैं जो शाकंभरी देवी मंदिर के आगे तक अपनी अनवरत ऊंचाई लिए चली जाती हैं. यहां पहाड़ों की कई श्रृंखलाएं हैं जिन पर सघन वृक्षावली छाई हुई है. वर्षा ऋतु में जब नीले बादलों से सारा आकाश ढक जाता है तो इन पहाड़ों पर छाई हरीतिमा पूर्ण वृक्षावली एक मनोहारी दृश्य उपस्थित कर देती है. इन पहाड़ी श्रृंखलाओं में अनेकों देव मंदिर हैं अतः धार्मिक मान्यता के कारण लोग वृक्षों को काटते सकुचाते हैं.

इन्हीं गिरि पंक्तियों का एक सिलसिला सीकर से दक्षिण की और कुछ दूरी से प्रारंभ होता है. इस सिलसिले में हर्ष की उन्नत पहाड़ी श्रृंखला है जिस पर कलानिधि हर्ष का प्रसिद्ध मंदिर अवस्थित है. बाजोर से कुछ ऊपर उठकर यह श्रृंखला निरंतर आगे बढ़ती जीण के मंदिर से आगे तक निकल जाती है. यहां स्थान-स्थान पर गौर बालू के टीले इन पहाड़ों से अड़े हुए हैं. कहीं-कहीं तो यह स्पर्धा संघर्ष आतीव दर्शनीय हो गया है. रेवासा का नगर एवं दुर्ग इसी श्रेणी पर है.

शेखावाटी के जल भंडार

रतन लाल मिश्र[17] ने लिखा है: शेखावाटी के क्षेत्र को शुष्क प्रदेश माना जाने पर भी यहां जल के अगाध भंडार हैं. शाकंभरी एवं लोहार्गल का 12 महीना बहने वाला सतत जल प्रवाह, किरोड़ी एवं गणेश्वर के गर्म एवं ठंडे जल प्रवाह, बाघेश्वर का सतत प्रवहमान जल स्रोत यहां की भूमि को आर्द्र रखते हैं तथा वृक्षावलियों को संचित करते हैं. खेतड़ी के पास अजीत समंद झील सन 1891 में राजा अजीत सिंह द्वारा बनवाई गई थी. इसका क्षेत्रफल 8-71 वर्ग मील का है. बंध रैवा, बंध बैरी छोटे बड़े जल स्रोत हैं. [18]

शेखावाटी के क्षेत्र में कुछ जगह भूमि क्षारयुक्त समतल एवं नीची हैं. इसमें वर्षा कालीन जल भर जाता है जिससे सर, झील या खारडा कहते हैं. इनमें अनेकों छोटे नदी नाले आकर गिरते हैं. जीण माता का सर प्रसिद्ध है तथा बड़ा विस्तृत है. इनके

[पृ.5]: अलावा पीथमपुरी (नीम का थाना तहसील) और रैवासा की झीलें हैं. रैवासा की झील में नमक पैदा होता है. इसका ठेका ब्रिटिश सरकार ने 1878 में लिया था. [19]

बाघेश्वर जीण और शाकंभरी

रतन लाल मिश्र[20] ने लिखा है...[पृ. 276]: जसरापुर (खेतड़ी) से प्राय: 6 मील की दूरी पर बाघेश्वर का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. यहां प्राचीन काल के तीन मंदिर हैं. यहां प्राचीन सामग्री बिखरी पड़ी है. कई प्राचीन मूर्तियां भी पाई जाती है. तूंदा गांव के पास प्राचीन प्रतिमाएं मिली है जिन्हें खेतड़ी नगर के पन्नालाल के तालाब की दीवारों में लगा दिया है. तूंदा गांव के पास प्राचीन पट्टण का टीला है. यह नगर पूर्ण रूप से विध्वंसित हो गया है.

जीण शेखावाटी का प्राचीन मंदिर है. इसके जीर्णोद्धार संबंधी अनेकों शिलालेख मंदिरों के स्तंभों पर लगे हैं पर निर्माण कल का द्योतक कोई शिलालेख नहीं मिला है. अर्णोराज के समय का एक शिलालेख (विक्रम 1196) है जिसमें मंदिर के आल्हण द्वारा जीर्णोद्धार कराये जाने का उल्लेख है.

जीण का मंदिर आज भी खड़ा है पर विभिन्न समय पर मंदिर के प्रांगण में निर्माण कार्य होते रहने के कारण पूर्व स्वरूप लुप्त हो गया है. केवल मंडप एवं गर्भ मात्र शेष है. स्तंभों पर अलंकरण की व्यवस्था निश्चय ही चौहान काल की है. अत्यधिक अलंकरण की और रुझान है. मंडप उन्नत आधार पर बना है. इस मंदिर में इतने जीर्णोद्धार हुए कि पूर्व स्वरूप का कुछ ही शेष रहा है.

शाकंभरी का मंदिर शेखावाटी का प्राचीन मंदिर है. यहाँ तीन शिलालेख है. सबसे प्राचीन शिलालेख इंडियन एपीग्राफिस्ट छाबड़ा द्वारा 699 संवत का माना गया है. भंडारकर इसे 879 विक्रम का और ओझा विक्रम 749 का बताते हैं. इसमें 11 महाजनों द्वारा गोष्ठिक बनाकर शंकरा देवी के मंदिर का मंडप जो खंडेला से 14 मील उत्तर पूर्व में है बनाने का उल्लेख है. इससे ज्ञात होता है कि इसके पूर्व काल में देवी का मंदिर बन चुका था. मंदिर का मंडप या तो भग्न हो गया होगा या मंदिर मंडप विहीन स्वरूप वाला होगा. इस मंडप उत्तम के स्वरूप के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिलती है.

इसी प्रकार खंडेला के हर्ष संवत 201 के शिलालेख में बोद्दा के पुत्र आदित्यनाग द्वारा मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है. यह शिव पार्वती का मंदिर वर्तमान में स्थित नहीं है अतः इसके संबंध में कुछ कहना कठिन है. शाकंभरी में ही संवत 1155 का शिलालेख है जिसमें उल्लेख है कि ईंटों से विनिर्मित घोसायिका के इस मंदिर के शिखर टूट गए थे और मंदिर भग्न अवस्था को प्राप्त हो गया था तब देयिनी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया. संवत 1056 के अन्य शिलालेख में मंडप बनाए जाने का उल्लेख है.

[पृ.277]: मंदिर आज पूर्ण रूप से नया स्वरूप लिए खड़ा है. शिखरबंद मंदिर का यह निर्माण ईंटों और चूने का है शिला पट्टिकाओं का नहीं. मंडप भी है पर सब कुछ नया है. निज मंदिर पूर्वाभिमुख है जिसमें देवी की दो मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंभ में देवी के दोनों और गणेश और कुबेर की मूर्तियां थी. इस तथ्य की पुष्टि शिलालेख से होती है जिसमें देवी के साथ गणेश और कुबेर की भी स्तुति है. आगे चलकर ब्रह्माणी नाम से एक मूर्ति देवी के पास स्थापित कर कुबेर और गणेश को हटाकर मंडप में निज मंदिर के बाहर स्थापित कर दिया गया जहां वे आज भी प्रतिष्ठित है.

शाकंभरी के मंदिर के अतिरिक्त अनेकों शिखर बंद प्राचीन मंदिर इस स्थान के आसपास उपस्थित हैं. स्वयं शाकंभरी के मंदिर के बाहर एवं खोह कुंड में दो प्राचीन मंदिर हैं. लोहार्गल में अनेकों शिखर बंद मंदिर है. रघुनाथगढ़ से लेकर शाकंभरी तक जाने वाले मार्ग में अनेकों मंदिर मिल जाते हैं. वस्तुतः यह भूभाग अतीव प्राचीन है. किरोड़ी जी का मंदिर एवं कुंड भी प्राचीन है. अब इस स्थान पर एक नया मंदिर खड़ा हुआ है.

12वीं सदी के वास्तु कला के प्रतिमान प्राप्त नहीं है. यही बात आगे की दो शतियों के लिए लागू होती है. निर्वाण के समय की प्राचीन बावड़ी (खंडेला के पास) की बात एक तत्कालीन शिलालेख से ज्ञात होती है.

यह शिलालेख फाल्गुन शुक्ल तेरस 1575 का है. इसमें पृथ्वीराज के पुत्र राम और वालहा द्वारा बावड़ी बनाने का उल्लेख है. यह बावड़ी 1592 विक्रम में पूर्ण हुई थी. खंडेला से पलसाना रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर खंडेला से डेढ मील दूर पर यह काली वाय आज छिन्न-भिन्न अवस्था में है. यह निर्वाण शासक नाथूदेव के राज्य काल में बनी थी.

16 वीं शती विक्रम के पश्चात अनेक वास्तु कला के प्रतिमान मिलते हैं. चंदेल काल के दो लघु मंदिर रेवासा और रघुनाथगढ़ में है. ये कला विहीन सीधे साधे हैं. रेवासा के इस मंदिर के कई जीर्णोद्धार हो चुके हैं. एक जीर्णोद्धार संवत 1535 में होने की बात शिलालेख से ज्ञात होती है. इस क्षेत्र में पहाड़ों के अंतराल में अवस्थित मनसा देवी का प्राचीन मंदिर है. जीण, शाकंभरी और मनसा शेखावाटी के शक्तिपीठ है.

प्राचीन मंदिरों के स्थापत्य की इस बात को यहीं छोड़कर जब आगे बढ़ते हैं तो मंदिर वास्तु की परिवर्तित शैली का स्वरूप सामने आता है. इस शैली में बने मंदिरों का प्रारंभ विक्रम की 16वीं सदी से होता है जो 20वीं शती के प्रारंभ तक चलता रहता है. संवत 1578 में फतेहपुर में बना लघु मंदिर इस प्राचीन प्रणाली का प्रतिनिधि है. संवत 1508 में तुहिनमल द्वारा बनाया गया लघु जैन मंदिर का भी अब स्वरूप बदल गया है.

[पृ.278]: लक्ष्मीनाथ जी का फतेहपुर का मंदिर सं. 1621 में बना था. उस समय इसका आकार बहुत छोटा था.

Population

As per Census-2011 statistics, Lohargal village has the total population of 1470 (of which 766 are males while 704 are females).[21]

Notable Persons

Gallery

External Links

References

  1. Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar,p.3
  2. शेखावाटी का भूगोल-नारायण सिंह, पृ.9
  3. Tej Ram Sharma: Personal and geographical names in the Gupta inscriptions, p.152
  4. Source: HereNow4u: Lord Śrī Mahāvīra
  5. https://www.wisdomlib.org/definition/purimatala
  6. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.824
  7. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.651
  8. Ratan Lal Mishra: Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar ,p.4
  9. Rajasthan District Gazetteer Sikar p.6;Shastri p.6
  10. भारतकोश-सूर्यकुण्ड (लोहार्गल)
  11. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.138
  12. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998,p.269
  13. Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar, p.2-3
  14. जयपुर राज्य का भूगोल - अनंत लाल मुखर्जी पृ.45
  15. वही पृ.47; शास्त्री पृ.5
  16. शेखावाटी का भूगोल-नारायण सिंह, पृ.9
  17. Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar, p.4-5
  18. खेतड़ी का इतिहास, झाबरमल शर्मा
  19. शेखावाटी का भूगोल - नारायणसिंह पृ.13
  20. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, pp.276-278
  21. http://www.census2011.co.in/data/village/71675-lohargal-rajasthan.html

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