Kirodi Dham
| Author: Laxman Burdak, IFS (R) |

Kirodi Dham is a religious place in Chirana Panchayat in Nawalgarh tehsil of Jhunjhunu district of Rajasthan. It is Known for its peaceful and spiritual environment and is frequently visited for worship.
Variants
- Kirodiji (किरोड़ीजी)
Kirodi Dham
Kirodi Dham is a prominent religious site located in the Sikar district of Rajasthan, featuring Mahadev Mandir, Radhakrishna Mandir, and Shakambari Mata Sakrai. It is a popular, serene place for devotees looking for spiritual peace, often referred to as Kirodi Dham Sikar.
Deities: Mahadev (Shiva), Radha-Krishna, and Sakrai Mata.
किरोड़ी धाम
किरोड़ी धाम झुन्झुनूं जिले की चिराणा पंचायत का अरावली पहाडियों से घिरा तीर्थ स्थल है.
कैसे पहुंचे किरोड़ी धाम: किरोडी राजस्थान के सीकर-नीमकाथाना-दिल्ली रोड पर रोड से पांच किलोमीटर अंदर की तरफ स्थित है. किरोडी पहुंचने के लिये दो रास्ते है. प्रथम - चिराणा से पहाडी रास्ता जो की पहाडी घाटी से होकर आता है. दूसरा - उदयपुरवाटी से पांच किलोमीटर का सडक मार्ग है. सीकर उदयपुरवाटी रोड पर किरोडी के लिये सडक निकलती है. जहां नवलगढ़ के उद्दोगपती कमल मोरारका द्वारा द्वार भी बनाया गया है.
उदगम्
किरोडी धाम के उदगम् के बारे में माना जाता है कि ककोर्टक नाग ने सघन वृक्षावली व झरनों के मध्य यहां तपस्या की थी । कुलीन वंश के इस तपस्वी नाग को तपश्चर्या के दौरान रिषी द्वारा वरदान प्रदान किया तथा इस तीर्थ को कर्कोटिका नाम भी दिया ।[1]
एक अन्य दृष्टांत के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात पाण्डवो ने अपने सगोत्रियों की हत्या के पाप से छुटकारा पाने के लिये इस क्षैत्र मे तीर्थो का भ्रमण किया था तथा पास ही स्थित लोहार्गल पहुंचे जहां उनके लोहे से बने अस्त्र-शस्त्र गलने लगे । इनके गलने से ही इस तीर्थ का नाम लोहार्गल पडा. बताया जाता है कि पाण्डवो की माता कुन्ती ने अपने मानसिक विवाद के निवारण के लिये पवित्र स्थल किरोडी तीर्थ में तपस्या प्रारम्भ की जहां उनको काफी शांति मिली.
प्रकृति की अदभुद् देन किरोडी धाम मे पाण्डवो की माता कुन्ति की चरण पादुकायें गर्म जल के कुण्ड पर आज भी स्थित है तथा कुण्डो मे झरनों के शीतल व गर्म जल का प्रवाह निरन्तर बना रहता है. अब एक कुण्ड मे शीतल तथा दूसरे कुण्ड मे गर्म जल विद्यमान है. किरोडी मे एक ही स्थान पर गर्म व ठंडे जल के झरने है स्नान की सुविधा के लिये झरनो को पा़ँच कदम की की दूरी पर दो कुण्डो मे विभाजित कर दिया गया ।
अरावली की पहाडियों मे प्रकृती की गोद मे बसा है किरोडी तीर्थ: शेखावाटी का आबू तीर्थ-स्थल किरोडी धाम लोहार्गल की चोबीस कोसीय परिक्रमा का प्रथम पडाव है. चिराणा से किरोडी की घुमावदार घाटी मे खडी चढ़ाई के कारण थोडी कठिनाईयां होती है परन्तु प्राकृतिक दृश्यावली के कारण कठिनाईयां महसूस नही होती यहां का सुरम्य वातावरण हरियाली से लदे पहाड बहुत ही मनमोहक है यहा देशी-विदेशी पर्यटक आते रहते हैं.
इतिहास
दर्शनीय स्थल व मंदिरों का इतिहास प्राचीनता के साथ भी जुडा है. किरोडी मे प्रसिद्ध मंदिर श्री गिरधारी जी का है. ज्योतिषाचार्य श्री रणजीत स्वामी के अनुसार इसका निर्माण संवत् 1652 से 1684 के बीच हुआ तत्पश्चात वैशाख सुदी तृतिया (अक्षय त्रितिया) सवंत 1684 को मूर्ति स्थापना हुई. मंदिर मे भगवान कृष्ण व राधा की काली व सफेद चित्ताकर्षक मुर्तियां विराजमान हैं.
मन्दिर व्यवस्था हेतु लगभग 250 बीघा जमीन जागीर के रूप मे प्रदान की गई. मंदिर मे महंत परम्परा के चलते यहां के महंत को 108 की उपाधि से विभुषित किया जाता है. स्वतंत्रता के पश्चात जागीर होने के बाद मंदिर के प्रथम महंत श्री 108 गोवर्धन दास जी थे वर्तमान मे महंत श्री 108 राधेश्याम दास है जो की तीर्थ स्थल के व्यवस्थापक भी है ।
अन्य मंदिरों मे गंगा माता का मंदिर है व दर्शनीय स्थलों मे उदयपुरवाटी के राजा टोडरमल व उनके मुनीम मुनसाह की छतरियां स्थित हैं.
साथ ही हिन्दु-मुस्लिम समन्वय की प्रतीक पीर बाबा की दरगाह भी स्थित है जो करीब 400 साल पुरानी है साथ ही साथ बरखण्डी बाबा का आश्रम व हनुमान मंदिर भी अपने आप मे दर्शनीय हैं. यहां कल्पवृक्ष के पेड़ हैं जहां कई लोग दर्शन करने आते हैं. हनुमान मंदिर के पास ही नवलगढ के प्रसिद्ध उधोगपती कमल मोरारका द्वारा एक यात्री निवास बनाया गया है.
शेखावाटी के जल भंडार
रतन लाल मिश्र[2] ने लिखा है: शेखावाटी के क्षेत्र को शुष्क प्रदेश माना जाने पर भी यहां जल के अगाध भंडार हैं. शाकंभरी एवं लोहार्गल का 12 महीना बहने वाला सतत जल प्रवाह, किरोड़ी एवं गणेश्वर के गर्म एवं ठंडे जल प्रवाह, बाघेश्वर का सतत प्रवहमान जल स्रोत यहां की भूमि को आर्द्र रखते हैं तथा वृक्षावलियों को संचित करते हैं. खेतड़ी के पास अजीत समंद झील सन 1891 में राजा अजीत सिंह द्वारा बनवाई गई थी. इसका क्षेत्रफल 8-71 वर्ग मील का है. बंध रैवा, बंध बैरी छोटे बड़े जल स्रोत हैं. [3]
शेखावाटी के क्षेत्र में कुछ जगह भूमि क्षारयुक्त समतल एवं नीची हैं. इसमें वर्षा कालीन जल भर जाता है जिससे सर, झील या खारडा कहते हैं. इनमें अनेकों छोटे नदी नाले आकर गिरते हैं. जीण माता का सर प्रसिद्ध है तथा बड़ा विस्तृत है. इनके
[पृ.5]: अलावा पीथमपुरी (नीम का थाना तहसील) और रैवासा की झीलें हैं. रैवासा की झील में नमक पैदा होता है. इसका ठेका ब्रिटिश सरकार ने 1878 में लिया था. [4]
जनसंख्या
किरोडी मे तीन सौ से उपर तक परिवारों की संख्या निवास करती है. परन्तु पहाडी संग होने के कारण कृषी योग्य भूमि बहुत कम है. यहां के युवा काफी संख्या मे नोकरी करते है शिक्षा विभाग, सैना, विद्दुत विभाग,वन विभाग, चिकित्सा एवं जलदाय विभाग आदी मे कार्यरत हैं. यहां स्वामी परिवार अधिक है साथ ही माली, गुर्जर, मीणा, बलाई, सांसी, बावरिया व जोगी परिवार हैं. तत्कालीन महंत के द्वारा बताया गया है की वि. स. 1144 (1087 ई.) मे खण्डेला राजा के भाणजों द्वारा स्थित किया गया था. उस समय यहा ब्राम्हण, राजपूत, पुरोहित, कुम्हार, धोबी, माली आदी जातियां रहती थी. Source - https://shakambharimata-sakrai.in/kirodi-dham/
References
- ↑ ज्योतिषाचार्य श्री रणजीत स्वामी - वैंकटेश्वर प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘लोहार्गल महातम्य’ तथा “पदमपुराण’ मे किरोडी का उल्लेख तीर्थ के रूप मे किया गया है.
- ↑ Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar, p.4-5
- ↑ खेतड़ी का इतिहास, झाबरमल शर्मा
- ↑ शेखावाटी का भूगोल - नारायणसिंह पृ.13