Bhageshwar
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Bhageshwar (भागेश्वर) is a is a famous pilgrim in Neem Ka Thana tehsil in Sikar district in Rajasthan.
Variants
- Bageshwar (बागेश्वर)
- Bagheshwara (बाघेश्वर)
Location
Bhageshwar is located at a distance of 15 km east of Neem Ka Thana. Bagheshwara is a famous pilgrim situated about 10 km from Jasrapur village in Khetri tahsil of Jhunjhunu district in Rajasthan.
History
Ganeshwar & Bageshwar both 15 km. away from Neem Ka Thana on different roads and 80 km. from Sikar via Udaipurwati. Ganeshwar is a pilgrimage as well as a salubrious Picnic spot. The hot sulphur springs here is a major draw. A dip in the spring, it is believed, cures skin diseases. It is an ancient site. Excavations in the Ganeshwar areas have revealed the remains of a 4000 years old civilizations. Close by is Bageshwar (Baleshwar), and Tapakeshwar yet another worth visiting sites, ponds and old Shiva temple is there surrounded by Aravali Hills.
बाघेश्वर जीण और शाकंभरी
रतन लाल मिश्र[1] ने लिखा है...[पृ. 276]: जसरापुर (खेतड़ी) से प्राय: 6 मील की दूरी पर बाघेश्वर का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. यहां प्राचीन काल के तीन मंदिर हैं. यहां प्राचीन सामग्री बिखरी पड़ी है. कई प्राचीन मूर्तियां भी पाई जाती है. तूंदा गांव के पास प्राचीन प्रतिमाएं मिली है जिन्हें खेतड़ी नगर के पन्नालाल के तालाब की दीवारों में लगा दिया है. तूंदा गांव के पास प्राचीन पट्टण का टीला है. यह नगर पूर्ण रूप से विध्वंसित हो गया है.
जीण शेखावाटी का प्राचीन मंदिर है. इसके जीर्णोद्धार संबंधी अनेकों शिलालेख मंदिरों के स्तंभों पर लगे हैं पर निर्माण कल का द्योतक कोई शिलालेख नहीं मिला है. अर्णोराज के समय का एक शिलालेख (विक्रम 1196) है जिसमें मंदिर के आल्हण द्वारा जीर्णोद्धार कराये जाने का उल्लेख है.
जीण का मंदिर आज भी खड़ा है पर विभिन्न समय पर मंदिर के प्रांगण में निर्माण कार्य होते रहने के कारण पूर्व स्वरूप लुप्त हो गया है. केवल मंडप एवं गर्भ मात्र शेष है. स्तंभों पर अलंकरण की व्यवस्था निश्चय ही चौहान काल की है. अत्यधिक अलंकरण की और रुझान है. मंडप उन्नत आधार पर बना है. इस मंदिर में इतने जीर्णोद्धार हुए कि पूर्व स्वरूप का कुछ ही शेष रहा है.
शाकंभरी का मंदिर शेखावाटी का प्राचीन मंदिर है. यहाँ तीन शिलालेख है. सबसे प्राचीन शिलालेख इंडियन एपीग्राफिस्ट छाबड़ा द्वारा 699 संवत का माना गया है. भंडारकर इसे 879 विक्रम का और ओझा विक्रम 749 का बताते हैं. इसमें 11 महाजनों द्वारा गोष्ठिक बनाकर शंकरा देवी के मंदिर का मंडप जो खंडेला से 14 मील उत्तर पूर्व में है बनाने का उल्लेख है. इससे ज्ञात होता है कि इसके पूर्व काल में देवी का मंदिर बन चुका था. मंदिर का मंडप या तो भग्न हो गया होगा या मंदिर मंडप विहीन स्वरूप वाला होगा. इस मंडप उत्तम के स्वरूप के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिलती है.
इसी प्रकार खंडेला के हर्ष संवत 201 के शिलालेख में बोद्दा के पुत्र आदित्यनाग द्वारा मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है. यह शिव पार्वती का मंदिर वर्तमान में स्थित नहीं है अतः इसके संबंध में कुछ कहना कठिन है. शाकंभरी में ही संवत 1155 का शिलालेख है जिसमें उल्लेख है कि ईंटों से विनिर्मित घोसायिका के इस मंदिर के शिखर टूट गए थे और मंदिर भग्न अवस्था को प्राप्त हो गया था तब देयिनी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया. संवत 1056 के अन्य शिलालेख में मंडप बनाए जाने का उल्लेख है.
[पृ.277]: मंदिर आज पूर्ण रूप से नया स्वरूप लिए खड़ा है. शिखरबंद मंदिर का यह निर्माण ईंटों और चूने का है शिला पट्टिकाओं का नहीं. मंडप भी है पर सब कुछ नया है. निज मंदिर पूर्वाभिमुख है जिसमें देवी की दो मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंभ में देवी के दोनों और गणेश और कुबेर की मूर्तियां थी. इस तथ्य की पुष्टि शिलालेख से होती है जिसमें देवी के साथ गणेश और कुबेर की भी स्तुति है. आगे चलकर ब्रह्माणी नाम से एक मूर्ति देवी के पास स्थापित कर कुबेर और गणेश को हटाकर मंडप में निज मंदिर के बाहर स्थापित कर दिया गया जहां वे आज भी प्रतिष्ठित है.
शाकंभरी के मंदिर के अतिरिक्त अनेकों शिखर बंद प्राचीन मंदिर इस स्थान के आसपास उपस्थित हैं. स्वयं शाकंभरी के मंदिर के बाहर एवं खोह कुंड में दो प्राचीन मंदिर हैं. लोहार्गल में अनेकों शिखर बंद मंदिर है. रघुनाथगढ़ से लेकर शाकंभरी तक जाने वाले मार्ग में अनेकों मंदिर मिल जाते हैं. वस्तुतः यह भूभाग अतीव प्राचीन है. किरोड़ी जी का मंदिर एवं कुंड भी प्राचीन है. अब इस स्थान पर एक नया मंदिर खड़ा हुआ है.
12वीं सदी के वास्तु कला के प्रतिमान प्राप्त नहीं है. यही बात आगे की दो शतियों के लिए लागू होती है. निर्वाण के समय की प्राचीन बावड़ी (खंडेला के पास) की बात एक तत्कालीन शिलालेख से ज्ञात होती है.
यह शिलालेख फाल्गुन शुक्ल तेरस 1575 का है. इसमें पृथ्वीराज के पुत्र राम और वालहा द्वारा बावड़ी बनाने का उल्लेख है. यह बावड़ी 1592 विक्रम में पूर्ण हुई थी. खंडेला से पलसाना रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर खंडेला से डेढ मील दूर पर यह काली वाय आज छिन्न-भिन्न अवस्था में है. यह निर्वाण शासक नाथूदेव के राज्य काल में बनी थी.
16 वीं शती विक्रम के पश्चात अनेक वास्तु कला के प्रतिमान मिलते हैं. चंदेल काल के दो लघु मंदिर रेवासा और रघुनाथगढ़ में है. ये कला विहीन सीधे साधे हैं. रेवासा के इस मंदिर के कई जीर्णोद्धार हो चुके हैं. एक जीर्णोद्धार संवत 1535 में होने की बात शिलालेख से ज्ञात होती है. इस क्षेत्र में पहाड़ों के अंतराल में अवस्थित मनसा देवी का प्राचीन मंदिर है. जीण, शाकंभरी और मनसा शेखावाटी के शक्तिपीठ है.
प्राचीन मंदिरों के स्थापत्य की इस बात को यहीं छोड़कर जब आगे बढ़ते हैं तो मंदिर वास्तु की परिवर्तित शैली का स्वरूप सामने आता है. इस शैली में बने मंदिरों का प्रारंभ विक्रम की 16वीं सदी से होता है जो 20वीं शती के प्रारंभ तक चलता रहता है. संवत 1578 में फतेहपुर में बना लघु मंदिर इस प्राचीन प्रणाली का प्रतिनिधि है. संवत 1508 में तुहिनमल द्वारा बनाया गया लघु जैन मंदिर का भी अब स्वरूप बदल गया है.
[पृ.278]: लक्ष्मीनाथ जी का फतेहपुर का मंदिर सं. 1621 में बना था. उस समय इसका आकार बहुत छोटा था.
शेखावाटी के जल भंडार
रतन लाल मिश्र[2] ने लिखा है: शेखावाटी के क्षेत्र को शुष्क प्रदेश माना जाने पर भी यहां जल के अगाध भंडार हैं. शाकंभरी एवं लोहार्गल का 12 महीना बहने वाला सतत जल प्रवाह, किरोड़ी एवं गणेश्वर के गर्म एवं ठंडे जल प्रवाह, बाघेश्वर का सतत प्रवहमान जल स्रोत यहां की भूमि को आर्द्र रखते हैं तथा वृक्षावलियों को संचित करते हैं. खेतड़ी के पास अजीत समंद झील सन 1891 में राजा अजीत सिंह द्वारा बनवाई गई थी. इसका क्षेत्रफल 8-71 वर्ग मील का है. बंध रैवा, बंध बैरी छोटे बड़े जल स्रोत हैं. [3]
शेखावाटी के क्षेत्र में कुछ जगह भूमि क्षारयुक्त समतल एवं नीची हैं. इसमें वर्षा कालीन जल भर जाता है जिससे सर, झील या खारडा कहते हैं. इनमें अनेकों छोटे नदी नाले आकर गिरते हैं. जीण माता का सर प्रसिद्ध है तथा बड़ा विस्तृत है. इनके
[पृ.5]: अलावा पीथमपुरी (नीम का थाना तहसील) और रैवासा की झीलें हैं. रैवासा की झील में नमक पैदा होता है. इसका ठेका ब्रिटिश सरकार ने 1878 में लिया था. [4]
Population
As per Census-2011 statistics, Bhageshwar village has the total population of 621 (of which 338 are males while 283 are females).[5]
Notable persons
External links
References
- ↑ Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, pp.276-278
- ↑ Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar, p.4-5
- ↑ खेतड़ी का इतिहास, झाबरमल शर्मा
- ↑ शेखावाटी का भूगोल - नारायणसिंह पृ.13
- ↑ http://www.census2011.co.in/data/village/82256-bhageshwar-rajasthan.html
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