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Barwada

From Jatland Wiki
(Redirected from Barwara Jaipur)
Note - for village in Bharatpur district, please click → Barwara

Barwara (बरवाड़ा) is a village in Viratnagar tahsil in Jaipur district in Rajasthan.

Location

Jat Gotras in the village

History

राव शेखा (1433–1488 ई.)

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.130-134

[पृ.130]: उदयकरण (1367-1389 ई.) का तृतीय पुत्र बाला था जिसके पोते से शेखावत वंश का प्रारंभ हुआ. बाला को चतुर्थ पुत्र भी कहा गया है. [1]

उदयकरण का समय विक्रम संवत 1423 से 1445 माना गया है. यही स्थिति सीकर के इतिहास की है. माधोवंश प्रकाश में उदयकरण के गद्दी पर बैठने का समय माह बदी 3 संवत 1423 दिया गया है और मृत्यु संवत फागण बदी 3, 1445 है. इस प्रकार इस ग्रंथ के अनुसार इसने 22 वर्ष एक माह राज्य किया. एक आधुनिक पुस्तक में भी यही समय स्वीकार किया गया है [2]


[पृ.131]: उदयकरण का उपयुक्त समय ठीक नहीं प्रतीत होता है. उदयकरण का ठीक समय वस्तुतः (1367-1389) ई अथवा विक्रम 1424 - 1446 है जिसका उल्लेख अनेक आधुनिक ग्रंथों में किया गया है. [3]

उदयकरण ने बाला को जीवन निर्वाह हेतु बरवाड़ा 12 गांवों सहित दिया. शेखावाटी प्रकाश के रचयिता ने 25 गांवों सहित बरवाड़ा स्थानाधिकार माना है. अन्यत्र उन्होंने 12 गांवों सहित बरवाड़ा मिलने की बात कही है. कुछ गांव पर आगे चलकर बालाजी ने अधिकार कर लिया था अतः संभवत: है उनके अधिकार में 25 गांव बताए गए हैं. बाला के दो रानियां से 12 पुत्र हुए - 1. मोकल, 2. खींवराज (बाला पोता), 3. खरथजी (करनावत), 4. मोकाजी (मोकावत), 5. भीलोजी (भीलावत), 6. झामाजी (झामावत), 7. डूंगरसिंह (जीवावत), 8. गोविन्द दास (बालापोता), 9. नाथाजी (बाला पोता), 10. बीझाजी (बीझाणी), 11. सान्गाजी (सान्गानी ), 12 चान्दाजी (निस्संतान)

बाला की मृत्यु पर इसका बड़ा पुत्र मोकल बरवाड़ा में गद्दी पर बैठा. मोकल एक धर्मात्मा वृत्ति का शासक था. इसने अपने पिता के जीवन काल में ही नाण गांवों को डाहलिया राजपूतों से जीतकर अपने अधिकार में कर लिया था. मोकल के वृद्धावस्था तक कोई पुत्र नहीं हुआ था. अतः मन से दुखी रहता था.

एक दिन उसकी भेंट शेख बुरहान चिश्ती से हुई. यह फकीर तैमूर लंग के साथ हिंदुस्तान में आया था और क्षत्रियों में इस्लाम का प्रचार करने के लिए यहां ठहर गया था. शेख के आशीर्वाद से मोकल को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ जिसका नाम शेख के नाम से साम्य रखते हुए शेखा रखा गया. वैसे राजपूतों में शेखा नाम असामान्य नहीं है. [4] इस वंश के बच्चे के गले में बद्दी तथा झंडे में नीला निशान भी कहते हैं इस फकीर की यादगार में है. शेख बुरहान का मकबरा अमरसर से 14 मील दूर टीला ढोला नामक स्थान में है जो शेखावतों की जियारतगाह है. कुछ लेखकों को मिथ्या जातीय अभियान के कारण शेख बुरहान की कृपा से शेखा की उत्पत्ति की बात स्वीकार्य नहीं लगती अतः वे तरह-तरह की कल्पना कर इसे हिंदू साधु की कृपा का फल बताते हैं.

शेखा के जन्म के कुछ वर्षों बाद मोकल की मृत्यु हो गई. माधो वंश प्रकाश में मोकल की मृत्यु संवत् 1502 में होने का उल्लेख है. 'केसरी सिंह समर', जो शेखावतों के इतिहास पर बड़ी प्रामाणिक पुस्तक है, में आमेर नरेश चंद्रसेन के समय में मोकल की उपस्थिति की बात कही गई है. चंद्रसेन का समय ई. 1467 से 1503 (विक्रम 1524 से 1560) माना जाता है. चंद्रसेन का मोकल पर क्रोध करना आदि बातों का उल्लेख समर में किया गया है. [5] इससे मोकल का विक्रम 1524 तक विद्यमान होना मानना पड़ेगा. यह तिथि असंगत नहीं है. इस पर किए गए एतराज सारहीन हैं. संभव प्रतीत होता है कि अपने वृद्धावस्था और धार्मिक प्रवृत्ति के कारण मोकल ने शेखा को वस्तुत: सारा राजकाज सौंप दिया था. इस तरह की बात के इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं. शेखा के काका खींवराज को इसका अभिभावक और संरक्षक बना दिया गया होगा. [6]


[पृ.132]: शेखा के जन्म की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है. सामान्यतः शेखा का जन्म मोकल की निर्वाण रानी से आसोज सुदी 10 गुरुवार विक्रम संवत 1490 (1433 ई.) में माना जाता है. [7] इसका जन्म नाण के पास स्थित अमरा धाभाई के निवास स्थान पर हुआ था. इस अमरा को जाति का खासौदा जाट भी बताया गया है. राज्य गद्दी संभालने के समय शेखा की अवस्था 12 वर्ष की थी. ऐसी अवस्था में इसका काका खींवराज राज्य का भार संभालता था.

राव शेखा द्वारा राज्य विस्तार

शेखा वीर प्रकृति का महत्वकांक्षी पुरुष था. उसने 16 वर्ष की अवस्था होते-होते राज्य विस्तार की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी. उसने सर्वप्रथम निकटतम सांखलों के भूभाग पर आक्रमण किया जिनका राज्य नाण के आसपास था. जाजा पर भी उसका अधिकार हो गया. आगे चलकर सांईवाड़ ठाकुर नापा सांखला से उसका मुकाबला हुआ जिसमें भी शेख की विजय हुई. [8] शेखा ने मेंड और बैराठ के यादवों के ठिकानों पर भी हमला किया तथा टॉक राजपूतों के कुछ गांवों को दबा लिया.

इन आसपास के भूभागों पर कब्जा करने के बाद शेखा ने नाण के उत्तर में एक गांव बसाया जिसका नाम अमरसर रखा. संभव है अमरसर के वर्तमान स्थान पर कोई छोटा गांव पहले बसा हुआ हो और उसे सुव्यवस्थित कर शेखा ने उसको राजधानी बनाया हो. अमरा जाट के नाम पर इसे अमरसर नाम दिया गया.

शेखा की इन विजयों में उसके पठान सहायकों का बड़ा हाथ रहा है. 'केसरीसिंह समर' के अनुसार दावल पठान गुजरात के बादशाह के रुष्ट होकर मुल्तान जा रहे थे. इनकी संख्या 500 दी गई है. वे पठान अमरसर आकर ठहरे. इस पर शेखा उनसे मिला और उन्हें अपने पास रख लिया. पठान सदैव से पेशेवर लड़ाकू रहे हैं. उन्होंने शेखा की सेवा स्वीकार कर ली.[9] एक बार राजपूतों और इन पठानों में मोर को मारने के कारण संघर्ष की स्थिति बन गई थी पर इसे शांतिपूर्ण संभाल लिया गया.

शेखा के पिता एवं पितामह के समय से ही आमेर के मुख्य राज्य को कर स्वरूप घोड़े भेजने पड़ते थे. जागीर प्रथा की इस मूलभूत बात को ठीक तरह नहीं समझने के कारण भाटों और चरणों ने तरह-तरह की काल्पनिक बातें गढली और आगे के लेखकों ने उसका अंधानुकरण करना प्रारंभ कर दिया. राजपूतों में प्रचलित प्रथा के अनुसार पाटवी पुत्र को राजगद्दी मिलती थी. राजा के दूसरे पुत्रों को छुटभैया मानकर जीवन निर्वाह के लिए जागीर मिलती. यद्यपि इन छुटभैया का मान सम्मान अन्य जागीरदारों से अधिक रहता पर कर स्वरूप जागीर की आय के अनुपात में उन्हें घोड़े या हाथी राज्य की सेवा में भेजने पड़ते. एक हजार की आय पर एक हाथी और ₹500 की आय पर एक घोड़ा तय होता था. सबसे छोटी आय की जागीर 'डीलों' की जागीर कहलाती थी.


[पृ.133]: बाला एवं उसके पश्चात मोकल को भी इस कर के रूप में घोड़े भेजने पड़ते थे....शेखा ने इस कर को बंद कर दिया. यह केंद्रीय सत्ता को खुली चुनौती थी. इसके फल स्वरुप आमेर नरेश चंद्रसेन से उनकी कई लड़ाईयां हुई. शेखावाटी प्रकाश के अनुसार धोली गांव में तीन बार लड़ाईयां हुई जिसमें शेखा विजयी रहे. इन लड़ाईयों की संख्या 6 भी बताई गई है. [10] अंतिम लड़ाई कुकस के तट पर हुई. आगे चलकर दोनों में संधि हो गई जिसके फलस्वरुप शेखा की स्वतंत्रत सत्ता स्वीकार कर ली गई तथा जिन गांवों पर उसने अधिकार कर लिया था वह उसी के अधिकार में रहे.

शेखा ने इसके पश्चात संवत 1530 (1473 ई.) में उत्तर की ओर बढ़ना आरंभ कर दिया. उस समय दादरी के क्षेत्र के आसपास जाटू तंवर बसे हुए थे. शेखा ने पठानों की सहायता से इनका दमन किया और हिसार के आसपास के क्षेत्र पर हमला कर अलफखां बागड़ी जो अखन खां का पुत्र था को हराया. इसी क्रम में शेखा ने नोप सिंह को हराकर दादरी को लूट लिया. [11] यह विजय अभियान सिर्फ अधिकार प्रदर्शन और लूट मार के लिए था. इससे इन गांवों पर स्थाई अधिकार नहीं हुआ था.

शेखा ने इस प्रकार अपनी स्थिति सुदृढ़ कर और लूटमार से धन प्राप्त कर अमरसर में शिखरगढ़ नामक सुदृढ़ दुर्ग बनवाया. शेखावाटी प्रकाश के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण विक्रम संवत 1534 में हुआ था. [12]

राव शेखा की मृत्यु: राव शेखा ने अब पश्चिम के गौड़ावाटी प्रदेश की ओर बढ़ना आरंभ किया. इस पर गौडों से, जो उस समय इस गौड़ावाटी क्षेत्र में स्थित थे, उसकी 11 लड़ाइयां हुई. गौडों से हुई अंतिम लड़ाई में बुरी तरह घायल हो जाने पर जीणमाता के पास रलावता गांव में उसका देहांत हो गया. मृत्यु के समय उसका छोटा पुत्र रायमल सेना सहित उपस्थित था. शेखा की मृत्यु वैशाख सुदी तीज विक्रम 1545 में हुई थी. [13]

घाटवा युद्ध (1488 ई.) में राव शेखा अपने पुत्रों सहित वीरगति को प्राप्त हुए. इस युद्ध में गौड़ राजपूतों को भी भारी क्षति पहुँची.[14]

शेखावत शासन की नींव: राव शेखा ने अपने बाहुबल से कुछ ग्रामों पर अधिकार कर एक सुदृढ़ शासन की स्थापना की थी. वस्तुत: शेखा से ही शेखावत शासन की नींव पड़ी है. शेखा के अधीन भूभाग में गौड़ावाटी, तोरावती, आमेर आदि क्षेत्रों के कुछ गांव थे पर जिसे विशुद्ध रूप से शेखावाटी का भूभाग कहा गया है वहां उसका प्रवेश नहीं हुआ था. इस क्षेत्र में आगे चलकर उसके वंशजों ने अपना राज्य स्थापित किया.


[पृ.134]: राव शेखा के 5 रानियों से 12 पुत्र पैदा हुए.

1. टांकण जी - नगरकोट के किल्हन जी टांक की पुत्री,
2. तंवर जी - पाटन के राव गाहड़मल की पुत्री,
3. तंवर जी - गांवडी के पिचियान तंवर की पुत्री,
4. गौड़ जी - जून्थरी के जादम गौड़ की पुत्री,
5. चौहान जी - चौबारे के राव स्योबक्ष की पुत्री.
रायमल (r. 1488-1537 ई.)

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.134-136

राव शेखा ने मृत्यु के पूर्व ही रायमल को अपनी ढाल तलवार देदी थी जो राज्याधिकार का सूचक चिन्ह था. शेखा की मृत्यु के बाद उसका कनिष्ठ पुत्र रायमल गद्दी पर बैठा.


[पृ.135]: रायमल अपने पिता की मृत्यु पर अमरसर में वैशाख सुदी 15 सं. 1545 (1488 ई.) में गद्दी पर बैठा. वह अपने पिता की सबसे छोटी संतान था पर पिता ने इसकी माता के प्रेम और इसके वीरत्व के कारण औरों को अधिकार से वंचित कर इसे अपना उत्तराधिकारी बनाया. रायमल ने गद्दी पर बैठते ही गौडों से पिता का बदला लेने की ठानी. आमेर के कछवाहों का भी इसमें सहयोग था. निदान गौडों ने रायमल से विवाह संबंध स्थापित कर संधि कर ली. गौड़ राव रिड़मल ने अपने पुत्री के दहेज के रूप में 51 गांव देकर बैर-भाव को शांत किया. [15]

रायमल ने ढ़ोसी के प्रसिद्ध युद्ध में भाग लिया था और युद्ध के समय इसने सहसा पक्ष परिवर्तन कर शेख अबीमीरा का साथ दिया था. ढ़ोसी की यह लड़ाई बीकानेर नरेश लूणकरण और शेख अबीमीरा के बीच हुई थी. लूणकरण नारनौल लूटने जाता था जो उस समय पठानों के अधिकार में था. बीकानेर के इतिहास (ओझा) के अनुसार यह लड़ाई वैशाख बदी तीज 1583 में हुई थी जिसमें छापर


[पृ.136]: द्रौणपुर के शासक कल्याणमल बिदावत और शेखावत रायमल के लूणकरण की शक्ति से भयभीत होकर पक्ष परिवर्तन करने के कारण लूणकरण अपने तीन पुत्रों के साथ मारा गया. [16]

रायमल का देहांत समान्यता विक्रम 1594 (1537 ई.) से माना जाता है. 'केसरी सिंह समर' में एक पद्य दिया गया है इसके अर्थ में भ्रांति उत्पन्न की गई है. [17] समर के उपयुक्त पद्य के अनुसार विक्रम संवत 1588 पोष सुदि 7 को इसकी मृत्यु होना माना जा सकता है. रायमल के 7 रानियां थी जिनसे सात पुत्र पैदा हुए:

1. गौड़ जी - मारोठ के राव रिड़मल की पुत्री,
2. सोलंकी जी - टोडा के राव मोकल की पुत्री,
3. निर्वाण जी - खंडेला के राव धीर सिंह की पुत्री,
4. निर्वाण जी - छापोली के राव आसल की पुत्री,
5. जोधा जी - सीमाऊ के राव नाहरसिंह की पुत्री,
6. टांकन जी - कुचोरा के रावत सुरजन की पुत्री,
7. भटियानी जी - खेजडली के राव जगत सिंह की पुत्री.

अमरसर पर रासा टांक का अधिकार

रायमल का बड़ा पुत्र सूजा अमरसर में अपने पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा. इसके गद्दी पर बैठने के कुछ समय बाद रासा टांक ने उस पर आक्रमण कर अमरसर पर अधिकार कर लिया था.

नागौर और गुजरात के सुल्तान मुस्लिम धर्म स्वीकार करने से पूर्व है टांक राजपूत थे. लाडनू के हिजरी 879 (1482 ई.) के शिलालेख में इस जाति का उल्लेख है. धर्म परिवर्तन के बाद भी वह टांक के नाम से जाने जाते रहे. रासा टांक नागौर के तत्कालीन शासक फिरोज तृतीय का कोई सरदार हो सकता है.

'रायमल जस सरोज' से ज्ञात होता है कि तत्कालीन बादशाह है शेरशाह (r.1540-1545) ने अमरसर को खालसा पर रासा टांक नमक सरदार को दे दिया था. इस पर सूजा बसई (बानसूर बसई) जाकर रहने लगा और वहां विक्रम 1604 के आसपास इसकी मृत्यु हुई.

सूजा की पुत्री सूरज कंवर का विवाह जैसाजी के पुत्र मांडण चंपावत से हुआ था जो रिणसी का अधिकारी था. (चंपावतों का इतिहास, 511)

इस प्रकार 17 वीं शती के प्रारंभ तक शेखावत का राज्य वर्तमान जिला जयपुर और वर्तमान राज्य के कुछ भूभाग, गौड़वाटी और तंवरवाटी के कुछ भूभागों तक फैल गया था. प्रचलित मान्यता के अनुसार उपर्युक्त भू-भागों में रायमल के समय तक 455 गांव शेखावतों के शासन अधिकार में हो गए थे. शेखावत शासन धीरे-धीरे विशुद्ध माने जाने वाले शेखावाटी के भूभाग की ओर बढ़ता जा रहा था.


रायसल (1539-1615)

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.137-138

[पृ.137]: सूजा की मृत्यु पर लूणकरण अमरसर का शासक हुआ. इसके छोटे भाई रायसल को लाम्या गांव जागीर में मिला. इसी रायसल के समय में शेखावाटी के कुछ भूभाग पर इस वंश का अधिकार हुआ था.

खंडेला के इतिहास में रायसल द्वारा संवत 1580 (1523 ई.) वैशाख सुदी को चार घड़ी दिन चढे लाम्या पर अधिकार करना लिखा है. यह बात पूर्णतया निराधार है. इस समय तक तो रायसल का जन्म भी नहीं हुआ था.

रायसल के जन्म के समय के संबंध में अब तक अनुमान से ही काम चलाया जाता था. पर अब लेख की शोध के फल स्वरुप जयपुर के महाराजा की पोथीखाने से एक जन्मपत्री का प्राप्त हो गई है जिसके अनुसार उसका जन्म फागण कृष्णा 8, संवत 1595 (1539 ई.) में हुआ था. [18]

उस समय अकबर (1542–1605) शासन कर रहा था. मुगल राज्य अभी पूरी तरह नहीं जम पाया था. अनेक लोग मुगलों की सेवा स्वीकार कर उनके मनसबदार बन रहे थे. अपने भूभाग को मुगलों से बचाने का एकमात्र यही रास्ता था. रायसल ने भी मुगल सेवा स्वीकार कर ली.

रायसल दीर्घ देह का बलशाली पुरुष था जिसने गढ़ गागरोन, भटनेर, नागौर, भडोंच, जूनागढ़, पाटन आदि के युद्ध में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था. शेखावतों में यह सबसे प्रबल सरदार था. बादशाह अनेकों मुहिमों पर इसे भेजा करता था. [19] रायसल ने शेखावाटी के पास तोरावाटी प्रदेश के तंवरों को भी हराकर पहाड़ की कंदराओं में छुपने को बाध्य किया था. [20]

इसके वीर कार्यों के कारण इसे खंडेला और रैवासा की जागीरें मिली. खंडेला उस समय निर्वाणों के अधिकार में था. [21] रैवासा पर चंदेलों का अधिकार था. निर्वाणों से उसकी अंतिम लड़ाई विक्रम 1638 में हुई बताई जाती है. [22] अबुलफजल इसे 1850 का एवं तबकाते अकबरी 2000 का मनसबदार बताती है. [23] रायसल का मनसब प्रारंभ में 1250 का ही था. यह बात आईने अकबरी से ज्ञात होती है. आगे चलकर उसका मनसब अकबर के राज्य काल में 47 वें वर्ष में 2500


[पृ.138]: का हो गया था. तुजुके जहांगीरी के अनुसार जहांगीर ने उसका मनसब बढाकर 3000 का कर दिया था. यह कथन कि अकबर के समय में इसका मनसब 3000 का एवं जहांगीर के समय में 5000 तक पहुंच गया था इतिहास सम्मत नहीं है.

रायसल बराबर मुगलों के दरबार में अधिक सम्मानजनक स्थिति प्राप्त करता रहा. मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह को अधीन करने के लिए जहांगीर ने सेना भेजी थी उसमें रायसल भी शामिल था.

यह एक विडम्बना ही थी कि शेखावतों के इस सबसे प्रबल शासक की न जन्मतिथि तथा न मृत्यु तिथि ठीक तरह से ज्ञात थी. अब जन्म पत्रिका के कारण जन्मतिथि सुनिश्चित हो गई है. मृत्यु तिथि के संबंध में भी प्राय: सही तथ्य कुछ पट्टों की प्राप्ति के बाद ज्ञात हो गए हैं. जहांगीर-नामा के अनुसार 1024 हिजरी (1615 ई.) को रायसल के पुत्र गिरधर को आठशती स्वार और जात का मनसब प्रदान किया गया था. संभवत: यह उसके राजा होने के अवसर पर दिया गया था. इससे विक्रम 1672 (1615 ई.) में रायसल की मृत्यु मानी जा सकती है. विल्स रिपोर्ट सीकर परिशिष्ट में भी रायसल की मृत्यु 1615 ई. के आसपास मानी गई है.

इसके अलावा विक्रम 1674 का एक पट्टा मिला है जिसमें राजा गिरधर द्वारा 51 बीघा भूमि दिए जाने का उल्लेख है. गिरधर के लिए राजा शब्द का प्रयोग महत्वपूर्ण है. इसी प्रकार राव तिरमल का भी एक पट्टा राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय में है जो संवत 1674 का है. उक्त आधार पर यह मानने में कोई आपत्ति अब नहीं है कि रायसल की मृत्यु संवत 1672 में 77 वर्ष की अवस्था में संभवत: दक्षिण में हो गई थी. रायसल के संवत 1617 से 1662 तक के पट्टे एवं ताम्रपत्र प्राप्त हो गए हैं.

रायसल वीर होने के साथ-साथ अति धार्मिक पुरुष था इसने मौजा सांवली की जमीन 13000 बीघा ठाकुर जी के भोग में लगाई थी. इसका एक तांबा पत्र प्राप्त हुआ है जिसके अनुसार इसने स्वामी रामरिख को लोहागर में 451 बीघा भूमि दी थी. यह तांबा पत्र वैशाख सुदी 15 संवत 1639 का है.

रायसल का एक शिलालेख रैवासा में विक्रम संवत 1661 (1604 ई.) का मिला है जिसमें रायसल और देवीदास मंत्री का नाम अंकित है.

रायसल के 6 रानियां थी जिसे 12 पुत्र पैदा हुए. खण्डेला के इतिहास पृ.38 फुटनोट में इनकी रानियों और पुत्रों का विवरण इस प्रकार दिया है -

1. किसनावत जी खण्डेला की पुत्री निर्वाण जी - पुत्र हरिराम, बाबू, बिहारी;
2. किसनावत जी नीमराना की पुत्री राजा सागरमान जी - पुत्र गिरधर जी तिरमलजी ,
3. अनूपशहर के बडगुजर राजा लखधीर जी की पुत्री अमरावती जी - पुत्र लाडोजी, ताजोजी परसरामजी,
4. मेड़ता के जगमाल जी की पुत्री आसावती जी - पुत्र भोजराज जी ,
5. ईडर के राव मान सिंह जी की पुत्री अर्जुन सिंह की पोती सोनागिरी जी - पुत्र उदय सिंह स्वर्ग सिधारे,
6. मारोठ के राजा कुम्भकरण जी की पुत्री उदाजी की पोती लाड कँवर - पुत्र वीर भान , कुशल सिंह,
6. दिल्ली से लाये गए खबास जी के पुत्र दयाल दास जी इनके अतिरिक्त सिसोदनी, हाड़ी, तंवर, जादूण और चहूंवाण जी रानियों का उल्लेख किया गया है.

Population

Notable persons

External links

References

  1. शेखावाटी प्रकाश में इससे दूसरा पुत्र माना गया है.पृ.6 ;माधो वंश प्रकाश में इसे तीसरा पुत्र माना गया है, पृ. 26
  2. शेखावाटी प्रकाश - पं. शास्त्री पृ.6 ; माधोवंश प्रकाश - जून्थाराम पृ.26; सीकर का इतिहास - झाबरमल शर्मा, पृ.7, शार्दूल प्रकाश - श्री सिंह, पृ.45
  3. Ruling Princes Chiefs and Leading Personages etc- C.S.Vele p.78;Jaipur Past and Present - Department of History 1976,p.9
  4. सीकर का इतिहास- झाबरमल शर्मा पृ.9; शार्दूल वंश प्रकाश - श्री सिंह, पृ.49; शेखावाटी प्रकाश अध्याय 4 पृ.7; माधोवंश प्रकाश-जून्थाराम पृ. 27-28 = बरदियो पीर भूरान; यक पुत्र होय सुजान, तिहि नाम रखियो शेख, अरू वंदिए मम भेष; केसरी सिंह समर पृ.2 हरिनाम उपाध्याय.
  5. केसरी सिंह समर -हरिनाम उपाध्याय पृ.6 - मोसों डरे दिल्लीस इतै माडू धर कम्पे। मोकल को बल कहा नृपति पुनि पुनि इमि जपै। पद्य 8
  6. सीकर के इतिहास में पं. झाबरमल शर्मा ने मोकल का समय संवत 1493 से 1554 दिया है. (पृ.10); माधो प्रकाश में मोकल की मृत्यु संवत 1502 में मानी है. (पृ.29). सीकर के इतिहास का समय स्पष्ट ही अशुद्ध है.
  7. शेखावाटी प्रकाश में शुभ घड़ी उत्तम लग्न संवत 1490 में शेखा का जन्म माना है (पृ.7) शिखर वंशोत्पत्ति में 1490 विजय दशमी रविवार को जन्म दिन माना गया है. माधोवंश प्रकाश में आसोज मॉस शुक्ल पक्ष 10 वीं तिथि और संवत 1490 माना गया है.
  8. जाजा जाण न आजे शेखा यो छै सांईवाडा। यो छै नापो हरिराम को देलो तने बीगाड़॥
  9. केसरीसिंह पृ.4,11,12
  10. शेखावाटी प्रकाश, पृ. 8; सीकर का इतिहास, पृ. 10-11
  11. राव शेखा सुरजन सिंह पृ.82; मधोप्रकाश-जून्थाराम पृ. 61
  12. शेखावाटी प्रकाश I, अध्याय 5, पृ.4
  13. पन्द्रसो चालीस पांच ऊपर परवाणों। शुक्ल पक्ष बैसाख तीज सुरगुर समजाणों॥ नगर घटवे आय गौड़ सेना बहु सज्जी। चढ़े अमरसर नाथ भेरि तामागल बज्जी ॥मरूभारती - राव शेखा रघुवीर सिंह; केसरी सिंह समर हरिनाथ, पृ.14 पद्य 55
  14. Indian warrior - भारतीय योद्धा army's Post, 4.1.2026
  15. माधोवंश प्रकाश - जून्थाराम, पृ.39, शेखावाटी प्रकाश पंचम अध्याय, पृ 11
  16. बीकानेर का इतिहास - गौरीशंकर हीराचंद ओझा
  17. बरस अट्ठासी मास नव दीह सात दुयजाम। घड़ी चार गए तन तजहि गौ वैकुण्ठ धाम ॥
  18. Literary Heritage of Rulers of Jaipur, p.361
  19. बाँकीदास की ख्यात नरोत्तम दास स्वामी,पृ.128,
  20. केसरी सिंह समर पृ.25-26 पद्य 98 - 103
  21. नैणसी री ख्यात, भाग-2, पृ.35
  22. शेखावाटी प्रकाश - अध्याय 6 पृ.12
  23. मुआसिल उमरा - वृजरतनदास,पृ.352 तबकत 11/44

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