Amber
| Author:Laxman Burdak, IFS (R) |


Amber (आमेर) is town and tahsil in Jaipur district in Rajasthan.
Variants
- Amer
- Ambar (अंबर)= Amber (आमेर) (AS, p.6)
- Ambarishpur/Ambarishapura (अंबरीषपुर) = Abmer (आमेर) (AS, p.6)
- Amrapura (आम्रपुर)
- Ambanagara (अंबानगर) (AS, p.67)
- Amaradadari (अमरदादरी) (आमेर) [1]
Jat Gotras
History
Its ancient name was Amrapura (आम्रपुर). Founded by the Meena Raja Alan Singh (He was from Chanda clan of Meenas), Amber was a flourishing settlement as far back as 967 AD. Around 1037 AD, it was conquered by the Kachwaha clan of Rajputs. Much of the present structure known as Amber fort is actually the palace built by the great conqueror Raja Man Singh I who ruled from 1590 - 1614 AD.
Jain History
Amer - [p.157]: Amer is situated at a distance of 9 km from Jaipur. Amer remained a capital of the Kachhawa rulers for a long time. After the foundation of Jaipur, it gradually became depopulated. Looking at its ancient monuments it can be sad that the place was a prosperous site during the medieval times. The beautiful Jain icons with fragmentary inscriptions of 11th and 12th century AD now in worship in a Jain temple on the Delhi Road corroborate the above. Epigraphical evidence tells us that there was a Chandra Prabha-
[p.158]: Chaityalaya, in the precincts of Galataji. The inscriptions of 12th century AD were noticed by the author from an ancient Temple situated on a hillock near the Balaji Temple new Ghat (Jaipur). These were obviously removed from some ancient shrines. One bearing the date Vikram era 1212, records the names of Sagar Sena, Brahma Sena, Chhatra Sena and Ambar Sena. The Other inscription contains the names of Amrita Sena, Sanyam Sena, Brahma Sena, Yoga Sena etc. In Sanwalaji Temple of Amer there are several ancient icons and Yantras. A bronze dated Vikram era 1234 was carved under the orders of Bhattarak Bhavan Kirti. On a bronze Chaubisi, there is an inscription of Vikram era 1469 of Kashtha Sangh. Several Yantras bearing the inscriptions of Vikram era 1548, 1573, 1593, 1651 etc have also been noticed. These were brought from Chatsu. The inscription of Vikram era 1548 relates that during the reign of Sultan Gayasuddin of Malwa over Chatsu, a yantra was consecrated. Other inscriptions refer to the reign of Maharana Sanga and the Solankis of Toda. Thus these inscriptions give us a glimpse into the political upheavals in the area.
The Kachhawas rose to power during Akbar's reign. Digambar Jains strove hard to propagate the religious thoughts. The fervour they created in the Delhi area for coping old religious MSS. permeated also in Dhundhar area. Bhonsa Mohandas, a trusted minister of Mirza Raja Jaisingh constructed a Vimal Nath Jain temple at Amer in Vikram era 1716. This temple is now famous as Jhuntharam's Temple. One of the inscriptions of this Temple bears the dates Vikram era 1714 and 1716 and is only detailed Jain inscriptions known from Amer:
Among shwetambar temples, the Chandraprabha Temple contain several ancient sculptures bearing inscriptions of Vikram era 1411, 1437, 1484, 1493, 1501, 1501, 1505, 1507, 1510, 1515, 1519, 1522 etc.
[p.159]: From Jay Singh Pura Khor an inscription of Vikram Era 1780 (1723 AD) from the reign of Sawai Jaisingh has been noticed, which records the construction of a temple by Godha Nathu's descendant Kunwar Pal under the instructions of Bhattarak Devendra Kirti.
Jaipur was founded by Sawai Jay Singh. It has several Jain temples of both Jain sects. The temple of Sirmoriya (Digambar) has an interesting inscription of Vikram era 1813 (1756 AD) recording the visit of Sawai Madhav Singh in person during the foundation ceremony of the temple and donation of rupees 2000 towards its construction.
ढुंढार
विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...ढुंढार, आमेर (जयपुर, राजस्थान) की रियासत का मध्य युगीन तथा परवर्ती नाम है। इस रियासत की स्थापना कछवाहों ने ग्वालियर से निष्कासित होने के पश्चात् जंगली मीनाओं की सहायता से की थी। 'ढुंढार' राजस्थान की राजधानी जयपुर का पुराना नाम था। ढुंढार का उल्लेख तत्कालीन साहित्य तथा लोक कथाओं में है- 'मेवार ढुंढार मारवाड़ औ बुंदेलखंड, झारखंड बांधौधनी चाकरी इलाज की।'[4] कहा जाता है कि 1129 ई. के लगभग जब ग्वालियर से कछवाहों को परिहारों ने निष्काषित कर दिया तो उन्होंने आमेर के इलाके में मीनाओं की सहायता से ढुंढार रियासत की नींव डाली। ढुंढार के स्थान पर बाद में आमेर की प्रसिद्ध रियासत बनी। (दे. आमेर, जयपुर))
इतिहास
जयपुर शहर की स्थापना 18.11.1727 को महाराजा सवाई जयसिंह ने की थी. जयपुर शासकों के पूर्वज कछवाहों की प्राचीन राजधानी आमेर थी. कहा जाता है कि 1129 ई. के लगभग कछवाहों को परिहारों ने ग्वालियर से निकाल दिया था. ग्वालियर से निष्कासित होने के बाद कछवाहों ने आमेर के मीणा शासकों की सहायता से ढूंढार रियासत की स्थापना की. आमेर ढूंढार की ही राजधानी थी. आमेर का काली मंदिर बहुत प्राचीन है. कछवाहों के आमेर बसाने से पूर्व काली यहाँ के आदि शासक मीणा लोगों की इष्ट देवी थी. आमेर नाम की व्युत्पत्ती भी अंबानगर नगर से हुई मानते है. न.ला. डे के अनुसार आमेर का असली नाम अंबरीशपुर था और इसे पौराणिक नरेश अंबरीश ने बसाया था. [5]
कुछ इतिहासकार आमेर का प्राचीन नाम आम्रपुर भी बताते हैं. दशरथ शर्मा[6] ने हम्मीरमहाकाव्य (IV. 82) में उल्लिखित आम्रपुर का संज्ञान आमेर के रूप में लिया है.[7]
मीणा शासकों ने अनेक स्थानों के नाम भी दिये हैं. जयपुर शासकों की छतरी गेटोर का नाम गेटा मीणा और झोटवाड़ा का नाम झोटा मीणा के नाम पर पड़ा है.[8] आमेर की स्थापना मीणा राजा आलनसी ने की थी. यह स्थान 967 ई. में भी आमेर के आबाद होने के प्रमाण हैं. 1037 ई. में कछवाहा शासकों ने इसे विजित किया. यहाँ की अधिकांश संरचनाएं राजा मानसिंह प्रथम (1590-1614 ई.) के समय में निर्मित की गई थी. जयसिंह द्वितीय ने 1727 ई. में जयपुर शहर बसाकर अपनी राजधानी नए नगर में बनाई.
आमेर का किला बहुत वर्षों पहले मैंने देखा था. दिनांक 31.10.2018 को सीकर के श्री गणेश बेरवाल आर्किओलोजिस्ट जयपुर पधारे तो उन्होने बताया कि आमेर के किले में कुछ नए स्थानों की खोज हाल के वर्षों में हुई है. सो दोपहर बाद उनके साथ आमेर किले में गए. वहाँ अधीक्षक पंकज धीरेंद्र जी ने घुमाने की व्यवस्था की. पंकज धीरेंद्र जी बेरवाल साहब के पूर्व परिचित और सहयोगी हैं. उन्होने शेखावाटी के पुरातत्व महत्व के स्थानों पर हाल ही में पीएच.डी. की है. सबसे पहले हमने आमेर किले के पश्चिमी भाग में स्थित सुरंग देखी जो जयगढ़ तक जाती है. यह रंगमहल के कुछ पहले तक भूमिगत है. इसके आगे भूमि सतह से ऊपर आ जाती है और इस लम्बाई में छत नहीं है. महल क्षेत्र में यह सुरंग महल की पश्चिमी मुख्य दीवार की नीव बनाती है. मानसिंह महल का टांका देखा. महल में वर्षा जल संग्रह के लिए निर्मित तीन टांकों में से यह एक है. अन्य टाँके दीवान-ए-आम और जलेब चौक में बने हैं.
महल की जल उत्थान प्रणाली बहुत उन्नत है. महल की जल आपूर्ति मावठा झील के पानी पर निर्भर थी. केशर क्यारी बगीचे की पूर्वी दीवार के सहारे पशुबल से पानी ऊपर खींचा जाता था और केशर क्यारी के ऊपरी तल पर बने टांकों में डाला जाता था. तीन चरणों में पानी महल में पहुँचता था. तीसरी और अंतिम चरण की प्रणाली देखी. यह पर्सियन वाटर व्हील प्रणाली थी. फ़ार्सि में यह प्रणाली साकिया नाम से जानी जाती थी. इसमें एक लकड़ी का विशाल स्तंभ है जिसको घुमाने पर ऊपर जुड़ी घिर्रियों से रस्सा ऊपर नीचे घूमता है और इसके साथ बंधी मिट्टी की सुराहियों से पानी ऊपर आता है.
महल के शौचालय को भी देखा. महल में कोई 99 शौचालय बने हुये हैं. शीशमहल और मानसिंह महल के मध्य बने शौचालय राजा और राजपरिवार के सदस्यों द्वारा काम लिए जाते थे. शीशमहल देखा. पर्यटक इसी में ज्यादा रुचि लेते हैं.
जलेब चौक में फौज बक्शी के नेतृत्व में राजा का निजी सुरक्षा दस्ता कवायद के लिए इकट्ठा होता था. यहा राजा दस्ते का निरीक्षण करता था. अरबी भाषा में जलेब का अर्थ होता है कवायद (परेड). यह चौक राजा जयसिंह (1699-1743) ने बनाया था. चौक के चारों ओर स्थित भूतल पर अस्तबल थे तथा प्रथम तल पर सुरक्षा दस्ते के सिपाही (जलेबदार) रहा करते थे.
आमेर के कछवाहा
स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.123-126
[पृ.123]: आमेर के कछवाहा अपनी उत्पत्ति अयोध्या के भगवान राम के पुत्र कुश से मानते हैं. प्राचीन भारत में अनेकों ऐसे कबीले थे जो एक गण-चिन्ह रखते थे. यह गण-चिन्ह या तो पशु का होता था या फिर किसी पक्षी या पौधे का. इसे पवित्र माना जाता था. हर कबीला इसी गण-चिन्ह से जाना जाता था. प्रसिद्ध विद्वान मॉर्गन की मान्यता है कि प्राचीन समाज की वह एक अपरिहार्य पहचान है कि इस समाज के लोग अपना नाम पशुजगत या वृक्षजगत के आधार पर रखते हैं. अमेरिका के सारे देश में प्राचीन कबीले अपना नाम पशु या पौधे पर रखते थे. ये कभी भी व्यक्ति के नाम से नहीं जाने जाते थे. समाज की इस स्थिति में व्यक्ति की पहचान समाज में खो जाती थी. ऐसा समाज टोटेमिस्टिक सोसाईटी के नाम से जाना जाता था. मत्स्य, अज, गौतम, वत्स , शुनाक, कापेय, मांडूक्य आदि कबीलों के नाम गण-चिन्ह के आधार पर ही हैं. [9]
आगे चलकर विकास के क्रम में भी अनेकों कबीले इसी गण-चिन्ह से जाने जाते रहे. इस बात को मानना साधार लगता है कि कछवाहा जाति कच्छप के गण-चिन्ह
[पृ.124]: वाली जाति थी जो कछवाहा के नाम से प्रसिद्ध हुई. आगे चलकर आमेर में या उसके पूर्व ग्वालियर में प्रस्थापित हो गए और शासन सत्ता से संयुक्त हो गए तो अपना संबंध अन्य शासकों की तरह पूर्व क्षत्रियों से जोड़ने लगे. कुश और कच्छप में समानता के कारण यह संबंध सहज ही जोड़ा जा सकता था..... डॉक्टर डीसी गांगुली की मान्यता है कि कछवाहा राजपूत वंश के पूर्वजों को कछवाहा कहा जाता है पर इस मान्यता का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है.
राजपूताना गजेटियर के अनुसार कछवाहों के पूर्वज के रूप में कुश का नाम लिया जाता है जिसने अपने आप को सोन नदी के तट पर स्थापित किया. कई शताब्दियों के बाद इसी वंश के नल ने नरवर में सत्ता स्थापित की. [10] कछवाहों की वंशावली में कच्छवाहों के पूर्वजों के रूप में कश्यप, सूर्य, वैवत्स, मनु, इक्षवाकु आदि का नाम लिया गया है. कछवाहों का प्रारंभिक शिलालेखों से प्राप्त वृतांत इस वंश के रहस्यमय उद्गम की बात नहीं कहता है पर एकाएक इस वंश की विभिन्न शाखाओं के नाम प्रस्तुत करता है.[11] इन लेखों में इन्हें 'कच्छपघाट वंश तिलक' अथवा 'कच्छपघाटनव्य सर कमल मार्तंड' कहा गया है. कुश से निसृत होने की बात का यहां सर्वथा अभाव है. [12]
[पृ.125]: एक बात उभर कर सामने आती है वह यह है कि प्राचीन क्षत्रीय कुल से अपने आप को संबंधित करने की भावना ही मूल रूप से इस धारणा के पीछे है कि कछवाहों के पूर्वज कुश थे. वास्तुत: यह निरी कल्पना है. तथ्य यह प्रतीत होता है कि नरवर के स्थान के आसपास कच्छप जाति या कबीला निवास करता था जिसका नाम अपने गणचिन्ह (टोटम) कच्छप या कछुआ से रखा गया था. ऐसे अनेक कबीले मूषक, मातंग, अज, कुकर आदि गणचिन्ह से अभिहित हुए हैं. कच्छपघाटों से इनका कोई संबंध प्रतीत नहीं होता है. शिलालेखों आदि के वृतों के प्रकाश में इस धारणा को बल मिलता है जिसके अनुसार कच्छप और कच्छपघाट अलग-अलग माने जा सकते हैं. सर जदुनाथ की हिस्ट्री ऑफ जयपुर के अनुसार यह एक मिथ्या धारणा मात्र है कि ग्वालियर और नरवर के प्रसिद्ध
[पृ.126]: कच्छपघाट शासक कछवाहा वंश के थे. कछवाहा वंश की पीढ़ी में उनके नाम इसी भ्रांत धारना के कारण सम्मिलित कर दिए गए हैं. [13] अन्यत्र उन्होंने यह भी कहा है कि कछवाहों के गोत्र प्रवर आदि कच्छपघाटों से नहीं मिलते हैं तथा उन में विभेदक विभिन्नता है. बहुत संभव है कि कच्छपघाटों ने कच्छपों को हराया या मारा हो फलस्वरुप इनका नाम कच्छपघाट पड़ा हो. आगे चलकर कच्छावा कबीले के लोग सत्ता संपन्न हो गए तो कुश से अपना संबंध स्थापित करने लगे. कछवाहों के पूर्वज अयोध्या छोड़ने के बाद रोहतासगढ़ आए और वहां से नरवर चले आए. कालांतर में इस शाखा के सोढदेव (966-1006 ई.) ने ग्वालियर छोड़ दिया और मीनों से ढूंढाड़ का प्रदेश जीता और और दौसा को अपनी राजधानी बनाया.
कछवाहों का प्राचीन इतिहास
स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.128-130
[पृ.128]: कछवाहों का प्राचीन इतिहास अंधकार में है. नैणसी ने अपने ख्ताय में कछवाहों के वंशक्रम का उल्लेख किया है.[14] कछवाहों के पूर्वज प्रचलित मान्यता के अनुसार सोन नदी पर स्थित रोहतास की ओर से चले आए. कई सदियों पश्चात इसी देश के राजा नल ने नरवर में अपने को स्थापित किया.[15] ग्वालियर शाखा के महिपाल का विक्रम 1150 के सास बहू मंदिर का शिलालेख कछवाहों के इतिहास के लिए बड़ा महत्वपूर्ण माना गया है.[16]
इस लेख में लक्ष्मण को प्रथम शासक माना गया है. लक्ष्मण के पुत्र वज्रदामन ने ग्वालियर जीता. यह शिलालेख महिपाल देव का है जिससे कच्छपघाट वंश के ग्वालियर और इसके आसपास के स्थान पर अधिकार की बात ज्ञात होती है. यह समय 10वीं और 11वीं सदी ईसवी का है. वज्रदामा इस वंश का दूसरा राजा था जिसको ग्वालियर दुर्ग पर जीत का श्रेय दिया जाता है. गोपाद्रि दुर्ग को उसने गाधीनगराधीश से जीता था. यह बात शिलालेख से ज्ञात होती है. यह गाधीनगराधीश विद्वानों द्वारा गुर्जर प्रतिहार नरेश माना गया है. इसका नाम ज्ञात नहीं है. सुहानिया के एक जैन प्रतिमा लेख से जो संवत 1034 (977 ई.) का है, वज्रदामा की उपस्थिति की बात ज्ञात होती है (जे ए एस बंगाल 31,पृ. 411). इससे यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि यह विजय 977 ई. से पूर्व में हो चुकी थी.
गुर्जर प्रतिहारों के विवरण से ज्ञात होता है कि ग्वालियर के आसपास का भूभाग कम से कम 942-43 तक उनके अधिकार में था. इसके लिए विनायक पाल देव के राखेत्र शिलालेख को (विक्रम 999-1000) देखा जा सकता है. इससे इस निर्णय
[पृ.129]: पर पहुंचना सहज है कि गुर्जर प्रतिहरों ने इस भूभाग को 944-977 ई. के बीच खो दिया था. राष्ट्रकूटों के आक्रमण के कारण इस समय उनकी स्थिति डावांडोल थी.[17]
उधर खजुराहो शिलालेख (विक्रम 1011) के पद्य 45 से यह ज्ञात होती है कि ग्वालियर दुर्ग को चंदेल राजा धंग ने जीता था. उसने एक गुर्जर प्रतिहार नरेश को भी हराया था. (निखिल नृप य: कान्यकुब्जम् नरेद्रं समरभुवि विजित्य प्राप: साम्राज्यमुच्च:).
इस प्रकार ग्वालियर पर प्राय: एक ही समय में दो राजाओं के विजय की बात सामने आती है. सारी स्थिति का विश्लेषण करने के बाद विद्वानों की अवधारणा बनी कि चंदेलों और कच्छपघाटों ने मिलकर इस दुर्ग को जीता था. वस्तुतः यह दुर्ग वज्रदामन ने चंदेलों के लिए हस्तगत किया था.
वज्रदामन का समय ठीक तरह से ज्ञात नहीं है. सास बहू शिलालेख विक्रम 1150 (1093 ई.) महिपाल के समय का है जो लक्ष्मण से आठवीं पीढ़ी का है. अगर हम महिपाल से वज्रदामन तक 6 पीढियों की गणना करते हैं और औसत 25 वर्ष हर राजा के लिए मान लेते हैं तो 940 ई. तक पहुंच जाते हैं. यह वज्रादामन का मोटे रूप से समय है. वस्तुत 950 से 980 ई. तक माना जा सकता है.[18] इस वंश का शासक पद्मपाल छोटी अवस्था में ही मर गया था. (युवैव देव प्रतिकूल-भावात् सकन्द अंक-आसन भाग्वभूव) (इंडियन एंटीक्वेरी वॉल्यूम 14 पृष्ठ 36,46 पद्य 30)
वज्रदामन के बाद मंगलराज, कीर्तिराज (1015-35 ई. के लगभग) मूल देव, देवपाल, पद्मपाल और महिपाल हुए.[19] प्रचलित धारणा के अनुसार सोढदेव नल से 33वां वंशज था जिसने पिता द्वारा निष्कासित होने पर 976 ईस्वी में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की. इस बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है.[20] विक्रम 1034 के शिलालेख से ज्ञात होता है कि उस समय ग्वालियर पर लक्ष्मण का पुत्र वज्रदामन राज्य करता था.[21] डॉक्टर गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने सोढदेव का दोसा में आने का समय विक्रम संवत 1194 माना है. [22] श्यामल दास ने विक्रम संवत 1033 कार्तिक कृष्णा 10 को सोढदेव का राजा होना माना है.[23] एडवर्ड थॉर्टन [24] व कर्नल टॉड ने 967 ई (विक्रम 1024) माना है.[25]
कछवाहों की वंशावली
मोहता नैणसी ने कछवाहों की दो वंशावलियां दी हैं. उदही के भाट राजपण ने नैणसी को वंशावली लिखाई थी. इसके अनुसार नल इस वंश का 121 वां राजा था.
नल के बाद ढोला, लक्ष्मण, वज्रदामा, मंगलराय, ऋतुराज, मूलदेव, पद्मपाल, सूर्यपाल, महिपाल फिर 19 नामों के बाद ईसासिंह, सोढदेव, दूलह देव (सं 152) के नाम थे.
इस वंशावली के अनुसार दूलह देव ने आमेर बसाया था. कुछ विद्वानों की मान्यताओं के अनुसार ढोला राय ने बड़ गुजरों से दोसा (जयपुर से 30 मील दक्षिण पूर्व) और मीनाओं से माची (रामगढ़) व खोह छीन लिए. उसने अलवर के निकट देवती किले पर भी अधिकार कर लिया. उसके पुत्र काकिल ने (1036 ई.) मीनाओं से आमेर ले लिया.[26]
[पृ.130]: प्रचलित मान्यता, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है, के अनुसार सोढ़देव (966-1006 ई.) ने ग्वालियर से आकर मीना लोगों से ढ़ूंढ़ाड़ जीता, दौसा को अपनी राजधानी बनाया. उसके पुत्र दूल्हराय (1006-1036 ई.) ने मीणों से मांच जीता और रामगढ़ का किला बनाया.[27] उसके पुत्र काकिल (1036-1046 ई.) ने सुसावत मीनों से आमेर जीती और उसे अपनी राजधानी बनाई. [28] आमेर के प्राचीन नाम अमरपुरी, आम्रदादरी, अम्वबावती आदि शिलालेखों से मिलते हैं.[29]
काकिल का पुत्र हणूदेव फिर जानड़देव और उसके पजवनदेव गद्दी पर बैठे. कुछ लोगों ने दूल्हराय को कछवाहों के राज्य की नींव डालने वाला बताया है.
पजवन के बाद मलेसी (1095-1147 ई.) बिजलदेव (1147-1180 ई.) राजादेव (1180-1216 ई.) कीलन (1216-1276 ई.) जोणसी (1318-1367 ई.) राजा हुए. [30]
जोणसी के बाद उसका उत्तराधिकारी उदयकरण हुआ इसने 1367-1389 ई. तक शासन किया. राजपूताने के इतिहास में कहा गया है कि इसमें शेखावाटी प्रदेश को कायमखानियों से जीता. [31] यह कथन निराधार है. इस समय तक कायमखानियों का अधिकार शेखावाटी पर नहीं हो पाया था.
Villages in Amber tahsil

Achhojai (आछोजाई), Achrol (अचरोल), Akeda Chaud (आकेड़ा चौड़), Akedadoongar (आकेड़ा डूंगर), Akhepura (अखेपुरा), Amer Chak No.1 (आमेर चक नं. 1), Amer Chak No.2 (आमेर चक नं. 2), Ani (आनी), Anoppura (अनोपपुरा), Arniya (अरनिया), Atalbiharipura (अटलबिहारीपुरा), Badanpura (बदनपुरा), Badwala Ki Dhani (बड़वाला की ढाणी), Bagwada (बगवाडा), Ballupura (बल्लूपुरा), Baragaon Jarkhya (बारागांव जरख्या), Barh Jahota (बाढ़ जाहोता), Barna (बरना), Barsinghpura (बरसिन्हपुरा), Bas Baori (बास बावड़ी), Beelpur (बीलपुर), Benar with Daulatpura (बेनाड़ with दौलतपुरा), Bhatton ki Gali (भट्टों की गली), Bheelpura (भीलपुरा), Bheempura (भीमपुरा), Bhoorawali (भूरावाली), Bhuranpura @Nestiwas (भुरानपुरा नेस्टिवास), Bichpari (बिचपड़ी), Biharipura (बिहारीपुरा), Bilochi (बिलोची), Bishangarh (बिशनगढ़), Bishanpura (बिशनपुरा), Boodthal (बूडथल), Bugaliya (बुगाल्या), Chak Degrawas (चक देगडावास), Chak Jaisinghpura (चक जयसिंहपुरा), Chak Jaitpura (चक जैतपुरा), Chak Kothiya (चक कोठिया), Chak Manoharpur (चक मनोहरपुर), Chak Mundiya (चक मुंडिया), Chak Nangal (चक नांगल), Chak Pokharawala (चक पोखरावाला), Chak Rojda (चक रोजदा), Chandawas (चांदावास), Chandrapura Jatan (चन्द्रपुरा जाटान), Chandwaji (चंदवाजी), Chatarpura (चतरपुरा), Chetawala (चेतावाला), Chhanwar Ka Bas (छंवर का बास), Chhaprari (छपरारी), Chimanpura (चिमनपुरा), Chirara (चिरारा), Chitanukalan (चिताणु कलां), Chokhlawas @ Kacherawala (चोखलावास कचेरावाला), Chonp (चोंप), Dabri (डाबड़ी), Dadar Baori (दादर बावड़ी), Dalpura (दलपुरा), Datawata (दतावता), Daulatpura (दौलतपुरा), Degrawas (देगडावास), Deo Ka Harmara (देव का हरमाड़ा), Deogudha (देवगुढ़ा), Dhand (ढंड), Dheengpur (धींगपुर), Disan (दिसान), Dola Ka Bas (दोला का बास), Durga Ka Bas (दुर्गा का बास), Dwarkapura (द्वारकापुरा), Dweeppura (द्वीपपुरा), Ghatwada (घटवाडा), Govindpura (गोविन्दपुरा), Gudha Surjan (गुढ़ा सुरजन), Gunawata (गुणावता), Hanumanpura Chak (हनुमानपुरा चक), Harchandpura Chandwaji (हरचन्दपुरा चंदवाजी), Harchandpura Kankarwala (हरचन्दपुरा कांकड़वाला), Hardattpura (हरदत्तपुरा), Harwar (हरवाड), Ishwarsinghpura (ईश्वरसिंहपुरा), Israwala (इसरावाला), Jagnnathpura (जगन्नाथपुरा), Jahota (जाहोता), Jaipur (जयपुर), Jairampura (जयरामपुरा), Jaisalya (जैसल्या), Jaisingh Nagar (जयसिंह नगर), Jaisinghpura Shekhawatan (जयसिंहपुरा शेखावतान), Jaitpura Amber (जैतपुरा), Jaitpura Kheenchee (जैतपुरा खींची), Jalsoo (जालसू), Jiloi (जिलोई), Jugalpura (जुगलपुरा), Kalighati (कालीघाटी), Kalwad Kalan (कालवाड़ कलां), Kalwad Khurd (कालवाड़ खुर्द), Kalyanpura (कल्याणपुरा), Kankrel (कांकरेल), Kant (कांट), Kanwarpura Amber (कंवरपुरा), Kanwarpura (कंवरपुरा), Khannipura (खान्नीपुरा), Khapariya (खापरिया), Khatiyon Ka Bas (खातियों का बास), Kherwari (खेरवाड़ी), Khora Meena (खोरा मीणा), Khora Shyamdas (खोरा श्यामदास), Khorabeesal (खोराबीसल), Khurad (खुरड़), Kiratpura (कीरतपुरा), Kishanpura (किशनपुरा), Kishanpura @ Lalwas (किशनपुरा लालवास), Kolawato Ki Dhani (कोलावतो की ढानी), Kookas (कूकस), Kotra (कोटड़ा), Kushalpura (कुशलपुरा), Labana (लबाना), Ladana (लदाना), Lakher (लखेर), Lalgarh (लालगढ़), Lalpura (लालपुरा), Lamya Mewal (लाम्या मेवल), Laxminarayanpura (लक्ष्मीनारायणपुरा), Looniyawas (लूनियावस), Maheshpura Rawan (महेशपुरा रावान), Maheshwas Kalan (महेशवास कलां), Maheshwas Khurd (महेशवास खुर्द), Manchwa (मांचवा), Manpura Mancheri (मानपुरा मान्चेडी), Mohanbari (मोहनबाड़ी), Mohanpura (मोहनपुरा), Mori (मोड़ी), Mothoo Ka Bas (मोठू का बास), Mukandpura (मुकंदपुरा), Mukandpura (मुकंदपुरा), Mundiya (मुंडिया), Nakawala (नाकावाला), Nangal Ladi (नांगल लाडी), Nangal Purohit (नांगल पुरोहित), Nangal Siras (नांगल सीरस), Nangal Soosawatan (नांगल सूसावतान), Nangal Turkan (नांगल तुरकान), Nara (नाड़ा), Naradpura (नारदपुरा), Nestiwas (नेस्टिवास), Patti Sitarampura (पट्टी सीतारामपुरा), Peelwa (पीलवा), Pokharawala @ Anandpura (पोखरावाला आनंदपुरा), Pragpura (प्रागपुरा), Pratappura Kalan (प्रतापपुरा कलां), Pratappura Khurd (प्रतापपुरा खुर्द), Punana (पुनाणा), Puth Ka Bas @ Chawa Ka Bas (पूठ का बास चावा का बास), Radha Kishanpura @ Pokharsa Ka Bas (राधा किशनपुरा पोखारसा का बास), Radhakishanpura (राधा किशनपुरा), Radhapura (राधापुरा), Raghunathpura (रघुनाथपुरा), Raithal (रायथल), Raja Rampura (राजा रामपुरा), Rajawas (राजावास), Rajpurwas Chandwaji (राजपुरवास चंदवाजी), Ramgatta @ Harwanshpura (रामगट्टा हरवंशपुरा), Ramlyawala (रामल्यावाला), Rampura Amber (रामपुरा), Rampura (रामपुरा), Rampura @ Baniyawala (रामपुरा), Risani (रिसाणी), Rojda (रोजदा), Roondal (रून्डल), Sahab Rampura (साहब रामपुरा), Salarwas (सालरवास), Sangawala (सांगावाला), Sar (सार), Sardarpura (सरदारपुरा), Seengwana (सींगवाना), Sewapura (सेवापुरा), Sherawatpura (शेरावतपुरा), Shri Govindpura (श्री गोविन्दपुरा), Shripura (श्रीपुरा), Shyampura Amber (श्यामपुरा), Sindolai (सिन्दोलाई), Sirohi (सिरोही), Sirsali (सिरसाली), Sirsi (सिरसी), Sisiyawas (सिसियावास), Subhrampura (सुभरामपुरा), Sudarshanpura (सुदर्शनपुरा), Sundarpura (सुन्दरपुरा), Sunder Ka Bas (सुंदर का बास), Syari (स्यारी), Tadawas (टाडावास), Tantyawas (तांत्यावास), Udaipuriya (उदयपुरिया), Vijaipur (विजयपुर), Yadav Khera (यादव खेड़ा), Yadavkhera (यादवखेड़ा),
Notable persons
External links
References
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- ↑ डॉ एच सी सरकार, वज्रदामन का समय प्राय: 975-995 ई. मानते हैं. (डॉ हि.मो.ई.II, पृ.८३५.) डॉ डी सी गांगुली इसे 977-999 ई. मानते हैं (History of Parmara Dynasty, p.106
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- ↑ राजपूताने का इतिहास जयपुर राज्य शी ज ग गहलोत