Kachchhawa
| Author: Laxman Burdak, IFS (R) |


Kachchhawa (कच्छवा) Kachhwaha (कछवाहा) [1] [2][3] Kachhwala (कछवाला)[4][5] gotra Suryavanshi Jats live in Rajasthan, Punjab and Uttar Pradesh.This is a Jat gotra which has Rana Jat sub-clan based on lineage and title. [6]
Origin
- Kachchhawa (कछवाहा) - कछवाहा जाटों के बारे में मत है कि वे कश्यप हैं जो कश्यप ऋषि की संतान हैं. कश्यप सूर्यवंश के आदि पुरुष भी थे.[7] [8]
- Kachhwala (कछवाला) - कछवाहा का शब्दार्थ वाची है.[9]
Ancestry of Kachchhawas of Jaipur & Shekhawats of Sikar, Jhunjhunu
स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.128-130
कछवाहों के पूर्वज सोन नदी पर स्थित रोहतास की ओर से चले आए. कई सदियों पश्चात इसी देश के राजा नल ने नरवर में अपने को स्थापित किया.[10]
नल (इस वंश का 121 वां राजा) → ढोला → लक्ष्मण → वज्रदामा → मंगलराय → ऋतुराज → मूलदेव → पद्मपाल → सूर्यपाल → महिपाल → 19 नामों के बाद ईसासिंह → सोढदेव ((966-1006) (976 ई. में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की) → दूल्हराय (1006-1036) → काकिल (1036-1046) → हणूदेव → जानड़देव → पजवनदेव → मलेसी (1095-1147) → बिजलदेव (1147-1180) → राजादेव (1180-1216) → कीलन (1216-1276) → जोणसी (1318-1367) → उदयकरण (1367-1389)
Reference - Annals of Amber (James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, p.318-328
Jaipur Branch:
1.Dhola Rae (1036-1046) → 2.Kankal → 3.Maidul Rao → 4.Hundeo → 5.Kuntal → 6.Pujun ()→ 7.Malesi(1095-1147) → 8.Bijul (1147-1180) → 9.Rajdeo (1180-1216) → 10.Kitun (1216-1276) → 11.Kontul (1276-1318) → 12.Junsi (1318-1367) → 13.Udaikurn (1367-1389) → 14.Nursing → 15.Bunbir → 16.Udharun → 17.Khundrasen → 18.Pirthi Raj → 19.Baharma → 20.Bhagwan Dass → 21.Maan Singh → 22.Rao Bhao Singh → 23.Maha → 24.Jai Singh → 25.Ram Singh → 26. Bishen Singh → 27.Sawai Jai Singh → 28.Bahadur Shah → 29.Ishwari Singh → 30.Pirthi Singh II → 31.Pratap Singh → 32.Raja Jagat Singh → 33.Mohan Singh → 34.Jai Singh → Raja 35.Ram Singh (1842)
Sikar Branch:
1.Dhola Rae (1036-1046) → 2.Kankal → 3.Maidul Rao → 4.Hundeo → 5.Kuntal → 6.Pujun ()→ 7.Malesi(1095-1147) → 8.Bijul (1147-1180) → 9.Rajdeo (1180-1216) → 10.Kitun (1216-1276) → 11.Kontul (1276-1318) → 12.Junsi (1318-1367) → 13.Udaikurn (1367-1389) → Rao Bala (d.1430) → Rao Mokal (d.1445) → Rao Shekha (b.1433 r.1445 - 1488) → Raimal (r. 1488-1537) → Sooja → Loonkuran → Raisal (1539-1615) → Tirmal (d. S. 1674) → Ganga Ram → Shyam Singh → Jaswant Singh → Daulat Singh (d.S.1778) (Founded Sikar in S.1744=1687 AD) → Sheo Singh (r.1721-1748) → Chand Singh (d.1763) → Devi Singh (1753-1795) → Laxman Singh (1787-1833) → Pratap Singh (d.1850) → Bhairu Singh (d.1865) → Madho Singh → Kalyan Singh (1902-1967)
Jhunjhunu Branch: Raisal → Bhojraj (b.1567- ) (Udaipurwati) → Todar Mal → Jujhar Singh → Jagram Singh → Shardul Singh (1681-1742) (Jhunjhunu)
Khandela Branch: Raisal → Girdhar (Khandela) → Birsingdeo (Khandela) → Bahadoor Sing (Khandela)→ Kesri Singh (Khandela)
Note - Periods are based on Ratan Lal Mishra: Shekhawati ka Naveen Itihas, 1998, pp. 130-138
ढुंढार
विजयेन्द्र कुमार माथुर[11] ने लेख किया है ...ढुंढार, आमेर (जयपुर, राजस्थान) की रियासत का मध्य युगीन तथा परवर्ती नाम है। इस रियासत की स्थापना कछवाहों ने ग्वालियर से निष्कासित होने के पश्चात् जंगली मीनाओं की सहायता से की थी। 'ढुंढार' राजस्थान की राजधानी जयपुर का पुराना नाम था। ढुंढार का उल्लेख तत्कालीन साहित्य तथा लोक कथाओं में है- 'मेवार ढुंढार मारवाड़ औ बुंदेलखंड, झारखंड बांधौधनी चाकरी इलाज की।'[12] कहा जाता है कि 1129 ई. के लगभग जब ग्वालियर से कछवाहों को परिहारों ने निष्काषित कर दिया तो उन्होंने आमेर के इलाके में मीनाओं की सहायता से ढुंढार रियासत की नींव डाली। ढुंढार के स्थान पर बाद में आमेर की प्रसिद्ध रियासत बनी। (दे. आमेर, जयपुर)
आमेर के कछवाहा
स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.123-126
[पृ.123]: आमेर के कछवाहा अपनी उत्पत्ति अयोध्या के भगवान राम के पुत्र कुश से मानते हैं. प्राचीन भारत में अनेकों ऐसे कबीले थे जो एक गण-चिन्ह रखते थे. यह गण-चिन्ह या तो पशु का होता था या फिर किसी पक्षी या पौधे का. इसे पवित्र माना जाता था. हर कबीला इसी गण-चिन्ह से जाना जाता था. प्रसिद्ध विद्वान मॉर्गन की मान्यता है कि प्राचीन समाज की वह एक अपरिहार्य पहचान है कि इस समाज के लोग अपना नाम पशुजगत या वृक्षजगत के आधार पर रखते हैं. अमेरिका के सारे देश में प्राचीन कबीले अपना नाम पशु या पौधे पर रखते थे. ये कभी भी व्यक्ति के नाम से नहीं जाने जाते थे. समाज की इस स्थिति में व्यक्ति की पहचान समाज में खो जाती थी. ऐसा समाज टोटेमिस्टिक सोसाईटी के नाम से जाना जाता था. मत्स्य, अज, गौतम, वत्स , शुनाक, कापेय, मांडूक्य आदि कबीलों के नाम गण-चिन्ह के आधार पर ही हैं. [13]
आगे चलकर विकास के क्रम में भी अनेकों कबीले इसी गण-चिन्ह से जाने जाते रहे. इस बात को मानना साधार लगता है कि कछवाहा जाति कच्छप के गण-चिन्ह
[पृ.124]: वाली जाति थी जो कछवाहा के नाम से प्रसिद्ध हुई. आगे चलकर आमेर में या उसके पूर्व ग्वालियर में प्रस्थापित हो गए और शासन सत्ता से संयुक्त हो गए तो अपना संबंध अन्य शासकों की तरह पूर्व क्षत्रियों से जोड़ने लगे. कुश और कच्छप में समानता के कारण यह संबंध सहज ही जोड़ा जा सकता था..... डॉक्टर डीसी गांगुली की मान्यता है कि कछवाहा राजपूत वंश के पूर्वजों को कछवाहा कहा जाता है पर इस मान्यता का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है.
राजपूताना गजेटियर के अनुसार कछवाहों के पूर्वज के रूप में कुश का नाम लिया जाता है जिसने अपने आप को सोन नदी के तट पर स्थापित किया. कई शताब्दियों के बाद इसी वंश के नल ने नरवर में सत्ता स्थापित की. [14] कछवाहों की वंशावली में कच्छवाहों के पूर्वजों के रूप में कश्यप, सूर्य, वैवत्स, मनु, इक्षवाकु आदि का नाम लिया गया है. कछवाहों का प्रारंभिक शिलालेखों से प्राप्त वृतांत इस वंश के रहस्यमय उद्गम की बात नहीं कहता है पर एकाएक इस वंश की विभिन्न शाखाओं के नाम प्रस्तुत करता है.[15] इन लेखों में इन्हें 'कच्छपघाट वंश तिलक' अथवा 'कच्छपघाटनव्य सर कमल मार्तंड' कहा गया है. कुश से निसृत होने की बात का यहां सर्वथा अभाव है. [16]
[पृ.125]: एक बात उभर कर सामने आती है वह यह है कि प्राचीन क्षत्रीय कुल से अपने आप को संबंधित करने की भावना ही मूल रूप से इस धारणा के पीछे है कि कछवाहों के पूर्वज कुश थे. वास्तुत: यह निरी कल्पना है. तथ्य यह प्रतीत होता है कि नरवर के स्थान के आसपास कच्छप जाति या कबीला निवास करता था जिसका नाम अपने गणचिन्ह (टोटम) कच्छप या कछुआ से रखा गया था. ऐसे अनेक कबीले मूषक, मातंग, अज, कुकर आदि गणचिन्ह से अभिहित हुए हैं. कच्छपघाटों से इनका कोई संबंध प्रतीत नहीं होता है. शिलालेखों आदि के वृतों के प्रकाश में इस धारणा को बल मिलता है जिसके अनुसार कच्छप और कच्छपघाट अलग-अलग माने जा सकते हैं. सर जदुनाथ की हिस्ट्री ऑफ जयपुर के अनुसार यह एक मिथ्या धारणा मात्र है कि ग्वालियर और नरवर के प्रसिद्ध
[पृ.126]: कच्छपघाट शासक कछवाहा वंश के थे. कछवाहा वंश की पीढ़ी में उनके नाम इसी भ्रांत धारना के कारण सम्मिलित कर दिए गए हैं. [17] अन्यत्र उन्होंने यह भी कहा है कि कछवाहों के गोत्र प्रवर आदि कच्छपघाटों से नहीं मिलते हैं तथा उन में विभेदक विभिन्नता है. बहुत संभव है कि कच्छपघाटों ने कच्छपों को हराया या मारा हो फलस्वरुप इनका नाम कच्छपघाट पड़ा हो. आगे चलकर कच्छावा कबीले के लोग सत्ता संपन्न हो गए तो कुश से अपना संबंध स्थापित करने लगे. कछवाहों के पूर्वज अयोध्या छोड़ने के बाद रोहतासगढ़ आए और वहां से नरवर चले आए. कालांतर में इस शाखा के सोढदेव (966-1006 ई.) ने ग्वालियर छोड़ दिया और मीनों से ढूंढाड़ का प्रदेश जीता और और दौसा को अपनी राजधानी बनाया.
कछवाहों का प्राचीन इतिहास
स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.128-130
[पृ.128]: कछवाहों का प्राचीन इतिहास अंधकार में है. नैणसी ने अपने ख्ताय में कछवाहों के वंशक्रम का उल्लेख किया है.[18] कछवाहों के पूर्वज प्रचलित मान्यता के अनुसार सोन नदी पर स्थित रोहतास की ओर से चले आए. कई सदियों पश्चात इसी देश के राजा नल ने नरवर में अपने को स्थापित किया.[19] ग्वालियर शाखा के महिपाल का विक्रम 1150 के सास बहू मंदिर का शिलालेख कछवाहों के इतिहास के लिए बड़ा महत्वपूर्ण माना गया है.[20]
इस लेख में लक्ष्मण को प्रथम शासक माना गया है. लक्ष्मण के पुत्र वज्रदामन ने ग्वालियर जीता. यह शिलालेख महिपाल देव का है जिससे कच्छपघाट वंश के ग्वालियर और इसके आसपास के स्थान पर अधिकार की बात ज्ञात होती है. यह समय 10वीं और 11वीं सदी ईसवी का है. वज्रदामा इस वंश का दूसरा राजा था जिसको ग्वालियर दुर्ग पर जीत का श्रेय दिया जाता है. गोपाद्रि दुर्ग को उसने गाधीनगराधीश से जीता था. यह बात शिलालेख से ज्ञात होती है. यह गाधीनगराधीश विद्वानों द्वारा गुर्जर प्रतिहार नरेश माना गया है. इसका नाम ज्ञात नहीं है. सुहानिया के एक जैन प्रतिमा लेख से जो संवत 1034 (977 ई.) का है, वज्रदामा की उपस्थिति की बात ज्ञात होती है (जे ए एस बंगाल 31,पृ. 411). इससे यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि यह विजय 977 ई. से पूर्व में हो चुकी थी.
गुर्जर प्रतिहारों के विवरण से ज्ञात होता है कि ग्वालियर के आसपास का भूभाग कम से कम 942-43 तक उनके अधिकार में था. इसके लिए विनायक पाल देव के राखेत्र शिलालेख को (विक्रम 999-1000) देखा जा सकता है. इससे इस निर्णय
[पृ.129]: पर पहुंचना सहज है कि गुर्जर प्रतिहरों ने इस भूभाग को 944-977 ई. के बीच खो दिया था. राष्ट्रकूटों के आक्रमण के कारण इस समय उनकी स्थिति डावांडोल थी.[21]
उधर खजुराहो शिलालेख (विक्रम 1011) के पद्य 45 से यह ज्ञात होती है कि ग्वालियर दुर्ग को चंदेल राजा धंग ने जीता था. उसने एक गुर्जर प्रतिहार नरेश को भी हराया था. (निखिल नृप य: कान्यकुब्जम् नरेद्रं समरभुवि विजित्य प्राप: साम्राज्यमुच्च:).
इस प्रकार ग्वालियर पर प्राय: एक ही समय में दो राजाओं के विजय की बात सामने आती है. सारी स्थिति का विश्लेषण करने के बाद विद्वानों की अवधारणा बनी कि चंदेलों और कच्छपघाटों ने मिलकर इस दुर्ग को जीता था. वस्तुतः यह दुर्ग वज्रदामन ने चंदेलों के लिए हस्तगत किया था.
वज्रदामन का समय ठीक तरह से ज्ञात नहीं है. सास बहू शिलालेख विक्रम 1150 (1093 ई.) महिपाल के समय का है जो लक्ष्मण से आठवीं पीढ़ी का है. अगर हम महिपाल से वज्रदामन तक 6 पीढियों की गणना करते हैं और औसत 25 वर्ष हर राजा के लिए मान लेते हैं तो 940 ई. तक पहुंच जाते हैं. यह वज्रादामन का मोटे रूप से समय है. वस्तुत 950 से 980 ई. तक माना जा सकता है.[22] इस वंश का शासक पद्मपाल छोटी अवस्था में ही मर गया था. (युवैव देव प्रतिकूल-भावात् सकन्द अंक-आसन भाग्वभूव) (इंडियन एंटीक्वेरी वॉल्यूम 14 पृष्ठ 36,46 पद्य 30)
वज्रदामन के बाद मंगलराज, कीर्तिराज (1015-35 ई. के लगभग) मूल देव, देवपाल, पद्मपाल और महिपाल हुए.[23] प्रचलित धारणा के अनुसार सोढदेव नल से 33वां वंशज था जिसने पिता द्वारा निष्कासित होने पर 976 ईस्वी में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की. इस बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है.[24] विक्रम 1034 के शिलालेख से ज्ञात होता है कि उस समय ग्वालियर पर लक्ष्मण का पुत्र वज्रदामन राज्य करता था.[25] डॉक्टर गौरी शंकर हीराचंद ओझा ने सोढदेव का दोसा में आने का समय विक्रम संवत 1194 माना है. [26] श्यामल दास ने विक्रम संवत 1033 कार्तिक कृष्णा 10 को सोढदेव का राजा होना माना है.[27] एडवर्ड थॉर्टन [28] व कर्नल टॉड ने 967 ई (विक्रम 1024) माना है.[29]
कछवाहों की वंशावली
मोहता नैणसी ने कछवाहों की दो वंशावलियां दी हैं. उदही के भाट राजपण ने नैणसी को वंशावली लिखाई थी. इसके अनुसार नल इस वंश का 121 वां राजा था.
नल के बाद ढोला, लक्ष्मण, वज्रदामा, मंगलराय, ऋतुराज, मूलदेव, पद्मपाल, सूर्यपाल, महिपाल फिर 19 नामों के बाद ईसासिंह, सोढदेव, दूलह देव (सं 152) के नाम थे.
इस वंशावली के अनुसार दूलह देव ने आमेर बसाया था. कुछ विद्वानों की मान्यताओं के अनुसार ढोला राय ने बड़ गुजरों से दोसा (जयपुर से 30 मील दक्षिण पूर्व) और मीनाओं से माची (रामगढ़) व खोह छीन लिए. उसने अलवर के निकट देवती किले पर भी अधिकार कर लिया. उसके पुत्र काकिल ने (1036 ई.) मीनाओं से आमेर ले लिया.[30]
[पृ.130]: प्रचलित मान्यता, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है, के अनुसार सोढ़देव (966-1006 ई.) ने ग्वालियर से आकर मीना लोगों से ढ़ूंढ़ाड़ जीता, दौसा को अपनी राजधानी बनाया. उसके पुत्र दूल्हराय (1006-1036 ई.) ने मीणों से मांच जीता और रामगढ़ का किला बनाया.[31] उसके पुत्र काकिल (1036-1046 ई.) ने सुसावत मीनों से आमेर जीती और उसे अपनी राजधानी बनाई. [32] आमेर के प्राचीन नाम अमरपुरी, आम्रदादरी, अम्वबावती आदि शिलालेखों से मिलते हैं.[33]
काकिल का पुत्र हणूदेव फिर जानड़देव और उसके पजवनदेव गद्दी पर बैठे. कुछ लोगों ने दूल्हराय को कछवाहों के राज्य की नींव डालने वाला बताया है.
पजवन के बाद मलेसी (1095-1147 ई.) बिजलदेव (1147-1180 ई.) राजादेव (1180-1216 ई.) कीलन (1216-1276 ई.) जोणसी (1318-1367 ई.) राजा हुए. [34]
जोणसी के बाद उसका उत्तराधिकारी उदयकरण हुआ इसने 1367-1389 ई. तक शासन किया. राजपूताने के इतिहास में कहा गया है कि इसमें शेखावाटी प्रदेश को कायमखानियों से जीता. [35] यह कथन निराधार है. इस समय तक कायमखानियों का अधिकार शेखावाटी पर नहीं हो पाया था.
जाट इतिहास:ठाकुर देशराज
ठाकुर देशराज[36] लिखते हैं....कछवाहा : राजपूत-कछवाहे अपने को लव की सन्तान बताते हैं। इस तरह से वे सूर्यवंशी हैं। कुछ लोग कछवाहा शब्द को कुशवाहा अथवा कच्छपघाति का रूपान्तर मानते हैं, किन्तु हमारा जाट-कछवाहों के लिए मत है कि वे काश्यप हैं और महाभारत-काल में प्रजातंत्री थे। जाटों का एक दल अपने लिए शिव गोत्री और दूसरा काश्यप गोत्री या काश्यप ऋषि की संतान मानता है। इस विषय का एक अंग्रेज विद्वान का मत भी हमने पिछले किसी पृष्ठ में उद्धृत कर दिया है। वैदिक साहित्य में काश्यप का बड़ा ऊंचा स्थान है। काश्यप सूर्यवंश के आदि पुरुष हैं। काश्यप शब्द से कछवाह बनना बिल्कुल संभव बात है। कछवाहे जाटों की युक्त-प्रदेश में अनेक शाखा-प्रशाखायें हैं। मौर्य-बुद्ध के समय में चन्द्रगुप्त मौर्य का नाम आया है। किन्तु पुराणवालों ने उसे मुरा नाम शूद्रा से उत्पन्न हुआ माना है। चन्द्रगुप्त बौद्ध-धर्मावलंबी था, इसीलिए पुराणकार ने उसे बदनाम किया हो तो अचम्भे की बात नहीं। वरना पिप्पलिवन में मौर्यों का एक प्रजातंत्र था। बौद्ध-जातकों में पिप्पलिवन के क्षत्रियों का पर्याप्त परिचय मिलता है1। इस गोत्र के जाट युक्त-प्रान्त और राजपूताना में अनेक स्थानों पर पाये जाते हैं। अब से बहुत पहले झुंझनूं के पास के प्रदेश पर उनका पंचायती राज था।
निठारवाल गोत्र
राजस्थान राज्य की वर्तमान राजधानी जयपुर जिले के विराटनगर के नजदीक निठारा गांव के जाट निठारवाल कहलाए. निठारवाल मूल रूप से कछवाहा वंशी हैं. निठारा गांव से प्रस्थान कर हांसपुर बसाया तत्पश्चात भारणी, रींगस, सीतारामपुर निठारवाल गोत्र के जाटों ने बसाये. रींगस के निठारवाल परिवार में लगभग 1804 ईस्वी में लोठू निठारवाल नाम के बालक का जन्म हुआ. लोठू के एक भाई पेमाराम वह एक बहन थी. उसके माता-पिता स्वाभिमानी इंसान थे. [37] (देखो: लोठू निठारवाल)
Distribution of Kachchawas
Villages in Jodhpur district
Villages in Nawanshahr district
History
James Tod[38] writes that The warriors assembled under Visaladeva Chauhan against the Islam invader included the ruler of Kachhwaha. The Mori and Bargujar also joined with the Catchwahas of Anterved.
Ram Sarup Joon[39] writes that General Cunningham has proved that the Kachwaha Rajputs are also from the Pratihars and were not the descendants of Ram Chandraji's son Kush as they claim to be.
Ram Sarup Joon[40] writes that ...The Pehwa edict describes the rule of three Tomar kings. It is mentioned that they were the descendants of 'Jabala', the Hun who had ruled there before them- the third edict narrates the rule of Jabla Toraman.
There is an old saying in Rohilkhand that the Chief Toraman Kachwaha attacked Iran in 943 A.D. He conquered the territory from Iran to Bhopal. He constructed a fort at Gwalior. The descendants of Bhur Sen came to be called Kachhwaha in 945 A.D., and ruled Gwalior till 933 A.D., when Pratihars seized power. Therefore, if we accept this the Kachwaha Rajputs are the descendants of Torman, Jabla Gujars.
Charak Rai (the Bhat] who lived during the reign of Emperor Shah Jehan writes that the king of Iran was Torman. Shri Bhanderkar and General Cunningham and Mr. Smith all prove that Torman, Kachwaha and Pratihars are all descendants of Jabla Gujars. One of the edicts of Hun Chief Jabla was excavated in Malwa, at Mandsor, and is said to have been inscribed in 533 A.D.
According to this edict King Meharkul was the son of Torman, who was defeated and driven out by Yashodharaman.
Architectural Survey Of Kachchhapaghata Temples
Architectural Survey Of Kachchhapaghata Temples At Thoban, District Ashoknagar & Surwaya, Terahi, Mahua and Rannod, District Shivpuri, Madhya Pradesh
In the year 2010-11 Ashoknagar and Shivpuri districts were intensively surveyed and many temples were studied.
This work was the second segment of the study of architectural survey on Kachchhapaghata temples of districts Ashoknagar and Shivpuri of Madhya Pradesh. The Kachchhapaghata rulers extended their role in Thoban, Terahi, Mahua, Rannod and Surwaya and constructed temples in their own style. However, some impact of Pratihara temple style is also seen in their temples.
The work was carried out in order to know the specific regional style, compare it with to its main central Indian temple art & architecture and its development. The temples of Kachchhapaghata dynasty are less known and not studied much by scholars hence temples have been studied in detail and brought to light new ones. The temples under study speak about the socio-cultural, and economic status of contemporary society particularly of this region. All temples have been systematically studied through documenting them by photographs and Auto-CAD drawing with plan and elevation, and describing them with their architectural and sculptural details. Along with temples, mathas, tanks, and baolis and other secular structures have also been brought to light during the survey.
In the course of exploration total 46 temples of Kachchhapaghata period have been documented. The table below gives statistical data on these temples:
- Kuti Area, Village - Thoban, District - Ashoknagar ...7 temples, six cells
- Kuti Extension, Village - Thoban, District - Ashoknagar ...4 No’s of Temples
- Village Thoban Area, District - Ashoknagar... 5 No’s of Temples
- Garhi Surwaya, District - Shivpuri...3 No’s of Temples
- Total ...46
Source - Temple Survey Project Northern Region Bhopal
Notable persons
- Padam Shree Moti Singh Rana
- Nar Singh Kachhwaha (नरसिंह कछवाह), from ----, Jodhpur, was a social worker in Marwar, Rajasthan. He was a fredom fighter and hero of The Dabra farmers movement-1947 for abolition of Jagirs in Rajasthan. [41]
External links
References
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- ↑ Dr Ompal Singh Tugania: Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p.29,sn-172.
- ↑ Dr Ompal Singh Tugania: Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p.31,sn-329.
- ↑ Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. क-135
- ↑ Dr Ompal Singh Tugania: Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p.29,sn-172.
- ↑ Jat History Thakur Deshraj/Chapter VIII,s.n. 215, p. 586
- ↑ Jat Gotra Shabdawali, p.7. क-7
- ↑ Adhunik Jat Itihas, VI, p.226, क-7
- ↑ Adhunik Jat Itihas, VI, p.233, sn-216
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- ↑ Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.384
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- ↑ AI, Vol 3, p.237,line-10
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- ↑ Dynastic History of Modern India, Dr. HC Ray,p.588
- ↑ डॉ एच सी सरकार, वज्रदामन का समय प्राय: 975-995 ई. मानते हैं. (डॉ हि.मो.ई.II, पृ.८३५.) डॉ डी सी गांगुली इसे 977-999 ई. मानते हैं (History of Parmara Dynasty, p.106
- ↑ Indian Antiquary Part 15,p.33-46
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- ↑ मनसुख रणवां - अमर शहीद लोटू जाट, प्रकाशक : जे. सी. रणवां प्रकाशन, सीकर, द्वितीय संस्करण 2001, पृ.17
- ↑ James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II,Annals of Haravati,p.414-416
- ↑ History of the Jats/ChapterVIII,p. 135-136
- ↑ Ram Sarup Joon: History of the Jats/ChapterVIII,p. 138
- ↑ Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.220-221
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