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Shekhawati Ka Navin Itihas/11.Shekhawat Shasan

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Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998

रतन लाल मिश्र - शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन, मंडावा, झुंझुनू, राजस्थान, 1998

कायमखानी शासन अध्याय-11

दौलतखां (द्वितीय) (1626-1653)

[पृ.155]: अल्फखां की मृत्यु के बाद उसका पुत्र दौलतखां (द्वितीय) (1626-1653) नवाब हुआ. बादशाह जहांगीर ने इसे मनसब देकर कांगड़ा में नियुक्त किया. यहां दीवान ने पहाड़ियों को मार भगाया और अपने थाने अविचल रूप से स्थिर रहा. उधर जहांगीर की मृत्यु के बाद शाहजहां दिल्ली गद्दी पर बैठा.

दौलतखां (द्वितीय) (1626-1653) 14 वर्षों तक कांगड़ा में रहा और फिर उसकी नियुक्ति काबुल और पेशावर में की गई. [1] दौलत खान का पुत्र ताहिरखां भी बादशाह का मनसबदार बन गया था. दौलतखां ने फतेहपुर के किले का जीर्णोद्धार करवाया था. इस समय किले के चारों ओर एक गहरी खाई भी बनवाई गई जिसे जल से पूर्ण किया गया. इसने अपनी देखरेख में अपने पिता के राज्य काल में एक सुंदर और विशाल बावड़ी फतेहपुर में बनवाई थी. इसे नागौर के शेख महमूद ने 1024 हिजरी में बनाई थी. यह बात बावड़ी पर लगे शिलालेख से ज्ञात होती है.

फूल महल से मगरिब की तरफ जनाना महलात का सदर दरवाजा है. उस पर अंदरूनी हिस्से में पूर्वी कोने में एक कुत्बा कुंदा है जिसे पता चलता है कि 1014 हिजरी में इस महल को दौलतखां द्वारा बनाया गया था. फूल महल भी दौलतखां द्वारा बनाया गया था. इस पर एक लेख भी खुदा हुआ था.

शाहजहां के यहां जोधपुर का अमरसिंह राठौड़ मनसबदार था. बादशाह के मीर मुंशी सलावतखान से झगड़ा होने पर भरे दरबार में उसने सलावत खान को मार डाला. गौड़ विट्ठल दास के लड़के अर्जुन ने धोखे से वार कर उसे गिराया तथा

[पृ.156]: गुर्जबदारों ने आकर उसका काम तमाम किया. यह घटना संवत 1701 (1644 ई.) श्रावण शुक्ल द्वितीया की है. [2]

अमरसिंह राठौड़ नागौर का अधिपति था. बादशाह ने नागौर खालसा करने के लिए ताहरखां को भेजा. वह सेना सजा कर गया. उधर बादशाह ने फरमान लिखकर दौलत खान को बुला भेजा. वह उस समय काबूल मुहीम पर था. ताहिरखां ने नागौर पहुंचकर वहां से राठौर को निकाल दिया और जयगढ़ में अपने डेरे कर लिए. ताहिरखां ने सं. 1703 (1646 ई.) में नागौर पर कब्जा किया था. [3] इसी समय दौलतखां भी आकर ताहिरखां के सम्मिलित हो गया.

इसके बाद दौलतखां को शहजादा मुराद के साथ बलखबुखारा की लड़ाई में भेजा गया. अपने आप अर्ज कर ताहिरखां भी पिता के साथ हो गया. यह लड़ाई सं. 1710 (1653 ई.) में हुई थी.[4] वहां से दौलतखां कंधार चला गया और ताहिर खां शाहजादे के पास रहा. यहां बीमारी से ताहिरखां का प्राणांत हो गया. इस दुख को सहने में असमर्थ होकर दौलतखां भी सं. 1710 (1653 ई.) में लड़ाई में अपने को बलिदान कर दिया. दौलतखां ने अपने नाम पर दौलतपुरा नामक गांव बसाया था.

ताहिरखां ने अपने नागौर शासन के काल में एक मस्जिद बनवाई थी जो किले के पास ही उत्तर में स्थित है. इस मस्जिद पर लगे एक अभिलेख के अनुसार इसका निर्माण हिजरी 1056 सन 1646 (1703 विक्रम) में किया गया था. [5] ताहिरखां ने अपने नाम से ताहिरपुरा गांव बसाया था. [6]

दौलतखां वीर, साहसी, कला प्रेमी, लेखक और कई था. उसने एक हिंदी वैद्यक ग्रंथ 'दउलती विनोदसार' बनाया था जो वैद्यक का विशाल ग्रंथ है.[7] ताहिरखां भी काव्य प्रेमी और कवियों का आश्रयदाता था. [8]

दौलतखां (द्वितीय) (1626-1653) के राज्य काल के समय का एक शिलालेख सुंदरदास जी के स्थान पर लगा हुआ है. यह संवत 1688 कार्तिक कृष्ण अष्टमी का है. इस दिन प्रयाग दास का निधन हुआ था. इस लेख में दिल्ली में शाहजहां के तथा फतेहपुर में दौलतखां और उसके पुत्र ताहिरखां के शासन का उल्लेख है.[9] दौलतखां ने अपने पिता के राज्य काल में फतेहपुर में बावड़ी का भी निर्माण करवाया था.

सरदारखां (1653-1680)

[पृ.156]: दौलतखां (द्वितीय) (1626-1653) के तीन लड़के थे, ताहिरखां, मीरखां, और आसिफखां. [10] ताहिरखां के दो पुत्र सरदारखां और दीनदारखां थे. जब ताहिरखां युवावस्था में मर गया तो बादशाह ने सं. 1710 (1653 ई.) में [11] सरदारखां को नवाब बनाया. इसने अपने नाम से सरदारपुरा गांव बसाया था. इसके युवक पुत्र फदनखां की मृत्यु होने पर दुखी होकर इसने 27 वें वर्ष में राज छोड़ दिया. इसका राज छोटे भाई दीनदारखां को सं. 1737 (1680 ई.) में प्राप्त हुआ.

दीनदारखां (1680-1703)

[पृ.157]: दीनदारखां (1680-1703) भी अपने पूर्वजों की तरह शाही सेवा में बराबर बना रहा. इसने दीनदारपुरा नाम गांव अपने नाम पर बसाया. इसे फतेहपुर परिचय में शक्तिहीन और मूर्ख बताया है. ये सब बातें निराधार हैं. [12] इसके संबंध में अनेकों वृत्त मिलते हैं जिससे ज्ञात होता है कि यह एक प्रभावशाली सरदार था.

दीनदारखां का शाही सेवा में अनेकों बड़ी मुहिम पर जाता था. इसे बादशाह ने इसकी वीरता पर प्रसन्न होकर डीडवाना की फौजदारी प्रदान की थी. राठौर सोनग राठौरों की फौज के साथ अगस्त 1661 (विक्रम 1738) में डीडवाना की और बढा पर नागौर के इंद्रसिंह की सेना से मुठभेड़ होने पर पीछे हट गया. कुछ महीनों बाद अजबसिंह चंपावत के नेतृत्व में फिर डीडवाना पर आक्रमण किया गया. यहां का फौजदार दीनदार कायमखानी लड़ाई में हार गया. उससे राठौड़ों ने पेशकश वसूली की थी. [13]

इसकी पुष्टि में एक दूसरा उल्लेख भी प्राप्त हुआ है. डीडवाना में दीन दरवाजे के उल्लेख से भी दीनदारखां की वहां उपस्थित का पता चलता है. बादशाह आलमगीर के समय में दीनदारखां की देखरेख में दरवाजे का निर्माण होने का उल्लेख है. इसी कारण इसका नाम दीन दरवाजा रखा गया था. [14] यह घटना जुमाद प्रथम हिजरी 1093 अप्रैल 1621 (1738 विक्रम) की है. [15]

औरंगजेब के पुत्र अकबर के विद्रोह के समय दीनदारखां ने राठौरों और बड़े शाही सेनापति तहब्बुरखां में मेल मिलाप कराने में अपने प्रभाव का उपयोग किया था. राजपूतों ने अकबर को अजमेर पहुंचकर औरंगजेब पर आक्रमण के लिए तैयार कर लिया था. वाकया 541, 544, 556 में लिखा है कि राठौर दुर्गादास तथा राठौर सेना ने दीनदार कायमखानी तथा हाजी फतेहअली के माध्यम से तहब्बुरखां से बातचीत प्रारंभ की. राजपूतों का दूत रतन भाटी 18 जुलाई 1680 ई. (1737 विक्रम) से तहब्बुरखां के पास आने जाने लगा. इससे खान और राजपूतों में घनिष्ठ बढी. [16]

उपर्युक्त वृत्त अब तक प्राप्त जानकारी के आधार पर था. पर हाल ही में एक शिलालेख की बात ज्ञात हुई है. यह शिलालेख फतेहपुर में जादू के कुएं पर लगा हुआ है. इसके अनुसार संवत 1717 में ताहिरखां का पुत्र अलफखां शासन करता था एवं दिल्ली पर औरंगजेब का शासन था. [17] इसमें सानी शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है जो द्वितीय अलफ़खान की सूचना देता है.

क्यामखां रासा में दिए गए वंश वृक्ष के अनुसार दौलतखां (1683-1710 विक्रम) का पुत्र ताहरखां था जो युवावस्था में मर गया. दौलतखां के बाद ताहरखां के पुत्र सरदारखां को राज मिला. सं. (1710-1737) उसने रासो के अनुसार 1737 विक्रम में अपने भाई दीनदारखां को राज्य सौंप दिया. इस उल्लेख में अलफखां का कोई उल्लेख नहीं है. वस्तुतः सरदारखां की उपाधि अलफखां सानी थी.


[पृ.158]: उपर्युक्त शिलालेख अकाट्य प्रमाण है पर इसकी पुष्टि एक फरमान से भी होती है. एक फरमान बादशाह औरंगजेब ने 11 जनवरी 1667 ई. (1724 विक्रम) को बीकानेर के कँवर अनूपसिंह को भेजा था. इसमें लिखा था कि परगना फतेहपुर और झुंझुनू के जागीरदार अलफखां, अजमेर के फौजदार जमानतखां और चकला हिसार के मुत्सदी को आदेश दिया गया है कि वह पूरी तरह तैयार रहे और युद्ध की स्थिति में हर संभव सहायता पहुंचाएं. [18] इस फरमान से अलफ खां का बादशाह का मनसबदार होना और सं. 1724 में वर्तमान होना सिद्ध होता है.

एक तीसरे तथ्य से भी इसकी पुष्टि होती है. औरंगजेब कालीन मुगल अमीर वर्ग नामक पुस्तक में जिन अमीरों की सूची है उसमें संख्या 307 पर सरदार अलफखां कियामखां का नाम है. उसे 1500/700 का मनसबदार बताया गया है. [19] एक अन्य उल्लेख के अनुसार अल्फखां गुलबर्गा का फौजदार भी रहा था. यह घटना सन 1657 (विक्रम 1714) के आसपास की है. [20]

फतेहपुर के कायमखानी नवाबों का वंशक्रम

[पृ.158]:उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर फतेहपुर के पिछले कायमखानी नवाबों का वंश क्रम निम्न प्रकार से सिद्ध होता है. [21]

दौलत खां (द्वितीय) ...सं. 1683-1710 (रासो के अनुसार) (1626-1653 ई.)

सरदार खां (प्रथम) ...सं. 1710-1737 (रासो की भूमिका के अनुसार) (1653-1680 ई.)

उर्फ

अलफ खां (द्वितीय) ...सं. 1717-1737 (1660-1680 ई.)

दीनदार खां ...सं. 1737-1760 (1680-1703 ई.)

सरदार खां (दूसरा) ...सं. 1760-1788 (1703-1731 ई.)

कामयाब खां ...सं. 1788-1793 (1731-1736 ई.)

सरदारखां II (1703-1731)

[पृ.158]: इस प्रकार नवाब दीनादारखां ने विक्रम 1760 तक अच्छी प्रकार शासन किया. इसका पुत्र रसीदखां था. उसके दो लड़के थे सरदारखां और मीरखां. इसके बाद यही सरदारखां नवाब बना था.

वंशावलियों से नाम हटाना

[पृ.158]:अलफखां सानी का नाम कायमखानियों की वंशावली में नहीं मिलता है. इसके कई कारण हो सकते हैं. कई बार संबंधित व्यक्ति के उसके वंशजों के द्वारा

[पृ.159]: मुख्य शाखा के विरुद्ध कार्य करने से नाम वंशावलियों से हटा दिया जाता है. कई बार कुत्सित एवं अशोभनीय कार्य करने पर अयोग्य मानकर उसके नाम का उल्लेख जानबूझकर छोड़ दिया जाता है. इस संबंध में इतिहास में कुछ उदाहरण अपेक्षित हैं.

गुप्त अभिलेखों में उल्लिखित वंश तालिका में समुद्रगुप्त के बाद चंद्रगुप्त द्वितीय का नाम आता है. विद्वानों का उस समय यही मत था. नवीन साहित्यिक एवं पुरातत्वीय प्रमाणों के फल स्वरुप इन दोनों नरेशों के बीच रामगुप्त की बात ज्ञात हुई. विद्वानों ने इस भूल का कारण राम गुप्त द्वारा देवी ध्रुवस्वामिनी को शाकाधिपति को सपना बताया है.

दत्वा रूद्धगति: खसाधिपतये देवी ध्रुवस्वामिनीम्।
यस्मात् खंडितसाहसो निववृते श्री शर्मगुप्तो नृप:।
तस्मिन्नेव हिमालये गिरि गुह्या कोणक्वणित किन्नरे।
गीयन्ते तब कार्तिकेय! नगरस्त्रीणां गणै: कीर्तय:।
...(काव्यमीमांसा)

यहाँ डॉक्टर मिराशी प्रतिहार नरेश महिपाल को कार्तिकेय बताते हैं.

दूसरा उदाहरण यह दिया जा सकता है. चंदेल नरेश यशोवर्मन ने चेदि नरेश बालहर्ष को हराया था. इस लज्जाजनक हार के कारण उसका नाम वंशावलियों से हटा दिया गया था. चंदेल नरेश मदन वर्मा और परमार्दिदेव के बीच यशोवर्मन के राजा होने की बात बटेश्वर शिलालेख से ज्ञात होती है. पर इस वंश की वंशालियों में उसका नाम नहीं मिलता है. कुछ पारिवारिक कल की बात को डॉक्टर राय ने इस नाम विस्मृति का कारण माना है. दूसरा कारण यह भी है कि उसने अपने लघु राज्य काल में परमार वंश के भूप के रूप में कोई उल्लेखनीय उपलब्धि प्राप्त नहीं की थी.

नागौर के शासको में वाजिउल मुल्क, शम्सखां, फिरोज हुए पर मुस्तफासागर के शिलालेख में जो हिजरी 840 (ई. 1437) का है उसमें शम्स खां के बाद मुजाहिद खां का नाम है. नरेना की जामा मस्जिद के लेख में भी फिरोज का नाम नहीं है. यह संभवत: नरेना के शासक मुजाहिदखां और फिरोज के पारस्परिक कटु संबंधों का द्योतक है. अलफ खां वस्तुतः सरदारखां की उपाधि मात्रा थी कोई स्वतंत्र व्यक्ति नहीं.

समसखां-सुल्तानखां-वाहिदखां-सादतखां (झुंझुनू)

[पृ.159]: इधर झुंझुनू में समसखां सानी के बाद सुल्तानखां नवाब बना. इसके बारे में विशेष वृत्त ज्ञात नहीं है. इसके बाद क्रमशः वाहिदखां और सादतखां का झुंझुनू की गद्दी पर बैठे. इसका एक पट्टा विक्रम 1729 को प्राप्त हुआ है. [22] दूसरा पट्टा 1758 विक्रम का है. झुंझुनू के रामदास के कुए की छतरी के शिलालेखों में भी इसका उल्लेख है. एक लेख विक्रम 1739 का है. इसमें दीवान सादतखां कयामखानी नाम आया है.

[पृ.160]: वाकयात कौम कायमखानी के अनुसार सादातखां ने अपने भाई हांसी के शेख मुजफ्फर के पुत्र यूसुफ को नवाब बनाना चाहा. इस पर बादलगढ के पूर्वी द्वार के पास नूंवा के कायमखानियों ने 1694 विक्रम में यूसुफ को मार डाला. [23] इनमें मारने वाले विद्रोहियों में सरमस्तखां एवं दाराबखां कायमखानी मुख्य थे. दाराबखां घोड़ीवारा का था जहां उसका मजार है.

मुहम्मद सादतखां की मृत्यु के बाद फाजिलखां नवाब बना.

उधर फतेहपुर में सरदारखां उर्फ सवाई क्यामखां बड़ा प्रबल हो रहा था. उसने सैयद बंधुओं के प्रभाव का उपयोग करके झुंझुनू अपनी जागीर में करा लिया. आगे चलकर सैयद बंधुओं के पतन पर बादशाह मोहम्मदशाह ने पुन: फाजिलखां को एक अर्जी पेश करने पर झुंझुनू दिया था. [24] यह घटना ई. 1721 (विक्रम 1778) की है.

रोहिल्लाखां (1730) (झुंझुनू)

[पृ.160]: फाजिलखां की मृत्यु पंडित झाबरमल शर्मा के अनुसार 1728 ई. (विक्रम 1785) में हुई. [25] पर यह समुचित नहीं जान पड़ता क्योंकि रोहिल्लाखां का एक पट्टा विक्रम 1778 (1721 ई.) का प्राप्त हुआ है. रोहिल्लाखां आगे चलकर सवाई जय सिंह की ओर से फतेहपुर नवाब सरदारखां (1703-1729) के विरुद्ध लड़ा था. इसकी मृत्यु तिथि निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है. 'शिखर-वन्शोत्पत्ति' काव्य में इखलासखां का नाम उसके उत्तराधिकारी के रूप में आया है जिससे कायमखानी उसके जीतेजी गद्दी पर बैठाना चाहते थे. इखलास खां को कुछ सूत्र नूवां का तथा कुछ उसे रोहिल्लाखां का भाई बताते हैं. [26]

पठान शासन

[पृ.160]: नरहड में नवाब बावनखां के फौत होने पर उसका फर्जंद कुतुबखां पसमद नसीन हुआ. इसको बादशाह की ओर से दीवान का खिताब प्राप्त था. इसने अनेकों लड़ाईयों में भाग लिया था और अपनी वीरता की धाक जमाई थी. यह हिसार का हकीम भी रहा था.

जब बीकानेर का राजा अनूपसिंह दक्षिण में सरकारी मुहिम पर था तो जैसलमेर के भाटियों ने बीकानेर के कुछ भूभाग पर कब्जा कर लिया था. इसकी सूचना मिलने पर अनूप सिंह ने अपने सरदारों के नाम हुकुम भेजा कि आक्रमणकारियों को निकाल दें. उसने बादशाह से अर्ज कर एक फरमान हिसार के हकीम कुतुबखां को भी भिजवाया कि वह बीकानेर की सेना की मदद करें. [27]

फरमान मिलने पर कुतुबखां ने बीकानेर फौज की मदद से भाटी अमरसिंह को पराजित कर दिया. [28] इस लड़ाई का उल्लेख ओझा जी ने बीकानेर के इतिहास में किया है. गहलोत ने इस लड़ाई में हिसार के पठान सरदार का उल्लेख करते हुए राठौरों की हार बताई है.

[पृ.161]: कहते हैं कि नवाब कुतुबखां अपने पड़ोसी शेखावत जुझार सिंह पर भी विक्रम 1732 (1675 ई.) के लगभग हमला किया था. कुतुबखां की वीरता के अनेक पद्य प्रचलित हैं. [29]

कुतुबखां की मृत्यु पर उसका बड़ा लड़का अब्दुल करीमखां गद्दी नशीन हुआ. यह नरहड़ का अंतिम दबाव था. [30] कुतुबखां की मृत्यु संभवत: संवत 1752 (1695 ई.) के पूर्व ही हो चुकी थी. यासीनखां लिखित नागड़ पठानों के इतिहास के अनुसार बिना एक कतरा खून का बहाए शार्दुल सिंह के पुत्र ने झूठे वादे के जाल में फंसा कर नरहड़ पर कब्जा कर लिया था.

वस्तुत: नरहड के नवाब कुतुबखां के समय से ही नारनौल के शाही हाकिम अलीकुली खां से पठानों का मनमुटाव चला आ रहा था. एक उल्लेख के अनुसार शार्दुल सिंह के पुत्र जोरावर सिंह ने विक्रम 1794 (1737 ई.) में नरहड का पट्टा शार्दुल सिंह के नाम पर करवा लिया था. वस्तुत: यह अधिकार ई. 1732 (विक्रम 1789) में ही हो चुका था. संभवत: इस समय से पूर्व में ही नरहड़ पर शेखावतों का इजारेदार के रूप में अधिकार हो गया था. बगड़ के प्रसिद्द संत रूपादास को शार्दूल सिंह ने कार्तिक सुदि 15 वि. 1791 को बगड़ की 300 बीघा जमीन का पट्टा दिया था. मेजर यासीनखां की भी यही मान्यता है कि ई. 1732 (वि. 1789) के आस-पास नरहड़ शेखावतों को मिल गया था.

इस प्रकार विक्रम संवत 1521 से 1789 (1464-1732 ई.) विक्रम तक प्राय: 268 वर्ष तक चलकर पठान शासन शेखावाटी से मिट गया. पठान स्रोतों के अनुसार बिना लड़ाई के नरहड़ पर शेखावतों का अधिकार हुआ था जबकि अन्य स्रोत पठानों से एक लड़ाई होने और उसमें शार्दुल सिंह के पुत्र बहादुर सिंह के मारे जाने की बात कहते हैं. सर यदुनाथ सरकार के जयपुर के इतिहास में लिखा है कि बगड़ के अफगान और कायमखानी अभिमानी थे. वह बादशाह की बात नहीं मानते थे. इस पर मोहम्मदशाह ने सवाई जय सिंह को उनका मनसब और उनकी भूमि छीनने के लिए लिखा. जय सिंह ने शार्दुल सिंह को लिखा कि इस आज्ञा को पूरी करें.

जब तक दिल्ली पर बलवान शासन रहा तब तक प्रांतीय शासक काबू में रहे और उ सत्ता के निर्बल होते ही आसपास का राज्य हड़प जाने की एक होड़ सी लग गयी. केंद्रीय शक्ति का सहारा न रहने के कारण पठान शासन अधिक नहीं टिक सका और भूमिसात हो गया.

सन्दर्भ

  1. कायम खां रासो भूमिका भाग पृ.30 फखरू तवारीख फारूखी पृ. 14
  2. कायमखां रासो टिपण्णी पृ.127 फखरू तवारीख फारूखी पृ. 14
  3. फतेहपुर परिचय पृ. 46 फुटनोट - सुन्दर ग्रंथावली पृ. 36
  4. वाही पृ. 47
  5. डॉ चागताई द्वारा सम्पादित ए. ई. मु. 1949-50 पृ.49
  6. कायम खां रासो भूमिका
  7. इस ग्रन्थ की पुष्पिका में इति श्री दउलति विनोदसार, संग्रहे श्री दउलति खान नृपति बर विनिर्मित वैद्य गुणाधिकार: उल्लेख है. इस में 45 अधिकार हैं. इसकी अपूर्ण प्रति प्राप्त है.
  8. दौलत खां और उसके पुत्र ताहर खां के लिए सैम सामयिक कवी भीखजन ने उद्गार प्रकट किये हैं....
  9. सोलह सो सत्तासिय कातिक मास विचार। असित षष्टमी तिथि हुति वार-कहत बुधवार॥ ढीली पति जहांगीर सुत राजति साहि जहान। दोलतिषां नृप फतेहपुर, तानंद ताहरखान॥
  10. फतेहपुर परिचय में इनके नाम ताहिरखां, अहमद खां और असद खां बताये गए हैं. पृ. 45
  11. सनसहस पचास पुनि तेरह लहु प्रमानजी, संवत सत्रहसु जो दस गवन कियो दीवान जी॥ दौलत खां की मृत्यु का संवत रासो पृ. 91
  12. फतेहपुर परिचय पृ. 49 फखरू तवारीख फारूखी पृ. 16
  13. अजितोदय सर्ग 11 श्लोक 32-33; मूंदियाड की ख्यात पृ. 186-187 ; बाँकीदास 37, अजित विलास 216 कविराज मुरारीदान की ख्यात 521; जूनी बही 72
  14. राजस्थान के अभिलेख व्यास पृ. 177
  15. वही पृ 177 डॉ चागताई द्वारा सम्पादित ए-ई मुस्लिम 49-50 पृ. 28 इसे मीर मुहम्मद ने लिखा था.
  16. महाराजा अजीत सिंह और उनका युग - मीरा मित्र पृ.80
  17. शिलालेख का मूल पाठ निम्न प्रकार से है - संवत 1717 वर्षे शालिवाहणशाके 1582 माहवदि 5 गुरुदिने दिल्ली-पतिपातिसाही अवरंग साहराज्ये फतेहपुर मध्ये क्यामखां वंशे श्री ताहर खां तत्पुत्र दीवान श्री अलफ खां सानी राज्ये महेसरीजाती वीहाणों साह प्रियागदास तत्पुत्र साहजादूदास श्री कृ प्रीत्यर्थ कूप करवायो श्री शुभंभवतु सं.1717 ।श्री ॥ उस्ता छाजु बुदाई
  18. डेस्क्रिप्टिव लिस्ट ऑफ़ फरामानस मंसूरस, एंड निशान्स पृ. 90-91 यह फरमान रबीउल अव्वाल का है. इसमें अलफखां को फतेहपुर और झुंझुनूं का जागीरदार बताया है. इससे ज्ञात होता है कि झुंझुनूं भी उस समय फतेहपुर के नवाबों के कब्जे में था.
  19. औरंगजेब कालीन मुग़ल अमीर वर्ग-अतहअली पृ.277
  20. दी मुग़ल नोबिलिटी उंडर औरंगजेब पृ.87
  21. विशेष जानकारी के लिए देखिये लेखक का लेख वैचारिक भाग 4 अंक 1 सितम्बर 1976
  22. फखरू तवारीख
  23. वाकयात कौम कायमखानी पृ.80
  24. लाकेट रिपोर्ट जयपुर अलवर का इतिहास गहलोत पृ.182
  25. मरू भारती वर्ष 1 अंक 3 पृ.10 वि. 2010
  26. सांरांकी जुबानी इकलास ने बैठाणा। गादी झुंझुनूं की से रूहिल्ला को हटाणा... शिखर वन्शोत्पति पद्य 602
  27. टॉड राजस्थान उर्दू तर्जुमा-सफा 1505
  28. बीकानेर का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ. 260-62
  29. रोल पडयो रण वास में तोड़ रह्या गढ़ कोट। राणी बोली राव नै, गहो क़ुतुब की ओट॥
  30. शेखावाटी प्रकाश अध्याय 5 पृ. 9-10