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Shekhawati Ka Navin Itihas/10.Shekhawat Shasan

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Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998

रतन लाल मिश्र - शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन, मंडावा, झुंझुनू, राजस्थान, 1998

अध्याय 10 - शेखावत शासन

मुगलों का वर्चस्व स्वीकारा

[पृ.145]: राजपूताना में जोधपुर, बीकानेर के राठौर, मेवाड़ के सिसोदिया और आमेर के कछवाहा 15 वीं सदी के अंत तक अपनी पूर्ण अवस्था की तुलना में निर्बल थे. सिर्फ


[पृ.146]: मेवाड़ ने अपनी इस हीन स्थिति में भी मुगलों का सामना किया. शेष राजा मुगलों के सामने नतमस्तक हो गए.

शेखावाटी के कायमखानी मुगलों के सहारे की अपेक्षा रखते थे. उन्होंने मुगल सेवा स्वीकार ली. अनेकों नवाब मनसबदार थे. शेखावत भी मुगलों की सेवा में थे. इस प्रकार शेखावाटी के शासक संपूर्ण रूप से मुगलों का वर्चस्व स्वीकार कर चुके थे.

लड़ाई राजपूत एवं अन्य शासकों का पेशा था. पर पहले वह अपने लिए लड़ते थे अब विदेशी मुगलों के राज्य की जड़ें मजबूत करने के लिए. मेवाड़ पर जब मुगल आक्रमण हुआ तो अनेकों राजपूत राजा महाराणा के विरुद्ध लड़े

शेखावत शासन - खंडेला

शेखावत शासन - खंडेला

[पृ.146]: रायसल की मृत्यु हो जाने के बाद उसका सबसे कनिष्ठ लड़का गिरधर विक्रम 1672 (1615 ई.) में खंडेला की गद्दी पर बैठा. गिरधर पिता की तरह वीर था. वह जिस समय शाहजादा परवेज (1589-1626), मुगल बादशाह जहाँगीर का दूसरा पुत्र और साहिब जमाल का बेटा, के साथ दक्षिण में था उस समय एक सामान्य सी घटना ने उसके


[पृ.147]: प्राण ले लिए. यह झगड़ा सैयदों से हुआ था. यह घटना शेखावाटी प्रकाश के अनुसार विक्रम 1680 में घटी थी.[1]

शाहजादा परवेज के नौकर बारहा के सैयद कबीर के भाई ने एक सिकलीगर से तलवार का काम करवाया था. सिकलीगर के साथ झगड़ा हो गया. कबीर के भाई ने सिकलीगर को पीटा. वहां राजपूत भी उपस्थित थे. उन्होंने कबीर के भाई को पीटा. झगड़ा बढ़ाने पर गिरधर के राजपूतों ने सैयदों को मारा और सैयद आगये और झगड़े ने अब बड़ा रूप ले लिया. यह झगड़े में राजा गिरधर अपने 26 नौकरों सहित मर गया. चार सैयद भी मारे गए. राजपूतों ने बहुत जोर लगाया तब सैयद को दंड दिया गया.

उसका मनसब ओझा जी के अनुसार सं. 1679 में 2000/1500 का था [2] जहांगीरनामा के अनुसार संवत 1672 में पहली बार उसे 800/ 800 का मनसब दिया गया था. इसमें आगे चलकर वृद्धि की गई थी. खंडेला के इतिहास में गिरधर के राज करने का समय संवत 1636 से 1659 दिया है जो सही नहीं है.

गिरधर के तीन रानियों से आठ पुत्र थे: 1. द्वारकादास, 2. हरीसिंह, 3. सलदी सिंह, 4. विजय सिंह, 5. गोकुल, 6. गिरधर और सूर सिंह. रानियाँ थी - रानी किसनावती जी वूड़सू की मेड़ताणी, रानी श्याम कंवर जी बीकानेर की बीकाजी, रानी अग्रादेजी सांडवा की बिदावत.

जिनमें से गिरधर की मृत्यु पर द्वारकादास खंडेला की गद्दी पर बैठा. यह भी बराबर बादशाह की सेवा में रहा. इसका मनसब 1500 जात और 1000 सवार का था. बादशाह ने इसे मेवों का विद्रोह दबाने को भेजा. उसने सख्ती से मेवों का दमन किया और शांति स्थापित की. [3]

इस समय दक्षिण में खानजहां लोदी ने विद्रोह किया. इकबालनामा जहांगीर के अनुसार खानजहान लोदी ने पैसे के लोभ से बालाघाट तथा अहमदनगर के किले निजामुमुल्क को सौंप दिए थे. यह घटना हिजरी 1034 = ई. 1625 = विक्रम 1682 की है जो जहांगीर के राज्य के 21 वें वर्ष में घटित हुई थी.[4] आगे चलकर इसी खानजहाना लोदी से हुई लड़ाई में द्वारकादास मारा गया. शेखावाटी प्रकाश के अनुसार यह घटना संवत 1688 की है. [5] इसकी मृत्यु का समय विक्रम 1687 भी माना गया है. [6] द्वारकादास द्वारा अपने सिद्धि के बल पर मुक्त सिंह को वश में करने की बात भी कही गई है.[7]


[पृ.148]: द्वारकादास की मृत्यु पर उसका बड़ा पुत्र वरसिंह देव खंडेला की गद्दी पर संवत 1688 में बैठा. कुछ लोग संवत 1680 में मानते हैं. द्वारकाधीश की मृत्यु के 12 मास पीछे संवत 1690 के आसपास बादशाह का खिल्लत आया जिसमें हाथी, घोड़े, सरपेच आदि थे. बादशाह ने इसकी नियुक्ति दक्षिण में की थी.

वरसिंह देव की पुत्री लाड़कंवर का विवाह मार्ग शुक्ला दो, 1695 को बीकानेर के अनूपसिंह के साथ हुआ था. यह बात बीकानेर के रानीसर के कुएं की सती की छतरी के स्तंभ पर खुदे लेख से ज्ञात होती है. इस लेख के अनुसार शेखावत रानी ने आषाढ़ सुदी 10 शनिवार संवत 1757 में छतरी की प्रतिष्ठा करवाई थी. [8]

ज्येष्ठ सुदि 8 संवत 1720 को इसकी मृत्यु पर बहादुर सिंह सिंहासन पर बैठा. इसने भी अपने पूर्वजों की तरह शाही सेवा स्वीकार कर ली थी. इसकी नियुक्ति भी दक्षिण में हुई थी. पर वहां सूबेदार से अनबन होने के कारण वह सरकारी सेवा छोड़ अपने मुल्क में आ रहा. [9] वहां आकर आसपास के क्षेत्र में लूटमार करने पर एक शाही सेना इस पर भेजी गयी. इसमें दराब खां और बहराम खां सरदार प्रमुख थे. सेना हिंदू मंदिरों को विनाश करती खंडेला की ओर बढ़ने लगी.[10] यह फौजी चैत शुक्ला 6 संवत 1735 तथा अनुसार 6 मार्च 1679 को खंडेला पहुंची थी. [11]

इस सेवा का सामना करना संभव न जानकर बहादुर सिंह पहाड़ों की ओट में छिप गया. [12] इस प्रकार इस भूभाग को शाही सेना से बचाने वाला कोई नहीं रहा. इस कठिन समय में छापोली का सुजान सिंह, जो रायमल के चौथे पुत्र भोजराज का वंशज था, अपने थोड़े से सहयोगियों के साथ आगे आया और विशाल शाही फौज के आगे अड़ गया. कहते हैं कि वह उसी समय मांवडा से विवाह कर लौट रहा था.

एक छोटी सी लड़ाई हुई जिसमें वीरवर सुजान सिंह अपने साथियों सहित मारा गया. पर उसने अपने जीते जी यवनों को देव मंदिर विनष्ट नहीं करने दिया. सुरजन सिंह के इस वीरतापूर्ण कार्य के गीत इस क्षेत्र में आज भी गए जाते हैं. कवियों ने उसकी बड़ी सराहना की है. [13] बहादुर सिंह की मृत्यु फाल्गुन शुक्ला अष्टमी संवत 1740 में हुई.


[पृ.149]: बहादुर सिंह के तीन पुत्र थे सबसे बड़ा केसरी सिंह था. दो पुत्र फतेह सिंह और उदय सिंह थे. उसकी मृत्यु पर केसरी सिंह संवत 1740 (1683 ई.) में गद्दी पर बैठा. उसने सारी स्थिति को समझ कर पुन: शाही सेवा स्वीकार कर ली और अनेकों को मुहिमों पर जाकर अपने वीरत्व का प्रदर्शन किया.

केसरी सिंह स्थूल देह वाला बलशाली पुरुष था. इसने दक्षिण में कई लड़ाईयां जीती जिससे इसकी नामवरी फैल गई. राजाराम जाट पर केसरी सिंह ने चढ़ाई की थी और उसके विद्रोह को दबाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. [14]

केसरी सिंह ने राज्य लोभ से अपने छोटे भाई फतेह सिंह को संवत 1747 में खाटू श्याम जी में मार डाला था. [15] उसकी दो पत्नियां उसके साथ सती हो गई पर तीसरी चौहान जो गर्भवती थी जो अपने पीहर चली गई. उसके धीरज सिंह पैदा हुआ. खंडेला में उदय सिंह और धीरज सिंह से आगे चलकर दो पाने चले.

केसरी सिंह भी अधिक दिनों तक शाही सेवाओं में नहीं निभ पाया एवं उसे छोड़ खंडेला आ रहा. आसपास के क्षेत्र में लूट मार करने और मामला नहीं देने के कारण शाही फौजें सैय्यद अब्दुल्ला खां के नेतृत्व में चढ़ आई. केसरी सिंह ने अपने जाति भाइयों को एकत्रित कर शाही सेना का मुकाबला हरिपुरा के मैदान में किया. इस लड़ाई में केसरी सिंह ने वीरगति पाई. यह लड़ाई संवत 1754 के आश्विन माह में हुई थी. केसरी सिंह ने मृत्यु के पूर्व अपने छोटे भाई उदय सिंह को खंडेला भेज दिया था.

लड़ाई के बाद आगे बढ़कर मुस्लिम सेना ने खंडेला पर अधिकार कर लिया. यह अधिकार कुछ समय तक चलता रहा पर सारे क्षेत्र में अशांति फैली रही. राजपूतों ने शाही सेना को चैन से नहीं बैठने दिया. उदय सिंह अपने ससुराल बडू चला गया जहां उसकी मृत्यु हुई. उस पर एक चबूतरा बड़ू में बना हुआ है.

शेखावत शासन - सीकर

शेखावत शासन - सीकर

Genealogical Tree of Sikar family, Source: Wills Report, 1933, Appendix-A, p.1
Sikar Rulers Genealogy

[पृ.149]: तिरमल रायसल का चतुर्थ पुत्र था जिससे सीकर ठिकाने की शाखा प्रारंभ हुई. यह भी अपने पिता के साथ बादशाही सेवा में रहता था. इसने अहमदाबाद की लड़ाई में अच्छी वीरता का प्रदर्शन किया था. जिस पर प्रसन्न होकर बादशाह ने इसे कासली और नागौर के परगने इनायत किए थे. यह लड़ाई अकबर के राज्यकाल के 18 वें वर्ष में हुई थी. इसका समय 1573 ई. बताया गया है. [16] तिरमल को बादशाह ने राव की उपाधि से भी विभूषित किया था.

आगे चलकर नागौर इससे वापस लेकर जगतसिंह कच्छवाहा को दे दी गई थी जिस पर तिरमल जागीर छोड़कर कासली लौट आया और अपने भूभाग का विस्तार करने लगा. इस समय संवत 1662 में जहांगीर गद्दी पर बैठा तब उसने तिरमल को


[पृ.150]: बुलाया पर वह नहीं गया. संवत 1674 (1617 ई.) के आसपास तिरमल की मृत्यु हो गई जिस पर बादशाह ने कासली उसके खवासवाल पुत्र पूर्णमल के नाम कर दी. राव तिरमल की मृत्यु शार्दुल वंश प्रकाश एवं सीकर के इतिहास में संवत 1662 में बताई गई है जो ठीक नहीं है क्योंकि उसका एक पट्टा विक्रम 1674 का प्राप्त हो गया है जिसमें उसके द्वारा 400 बीघा भूमि दान में देने का उल्लेख है. यह पट्टा राव राजा सीकर के संग्रह में है. इसका एक पट्टा संवत 1672 का भी मिल चुका है.

तिरमल की दो रानियां से पांच पुत्र पैदा हुए थे - 1. गंगाराम, 2. बनीछोड़ 3. उदयकरण 4. जसकरण 5. आसकरण. पिछले तीन निस्संतान रहे. एक खवासिन पातर से पूर्णमल नामक पुत्र हुआ था. यह खवासिन दिल्ली की खत्राणी थी. जिनमें गंगाराम बड़ा था.


कासली हाथ से चली जाने पर तिरमल का पुत्र गंगाराम अपनी जागीर के गांव रैनवाल में जा रहा. उसका पुत्र श्यामसिंह भी अपने दिन वही बीताता रहा. गंगाराम का एक पट्टा संवत 1710 का मिला है जिसके आधार पर उसकी उपस्थिति इस समय तक ज्ञात होती है. गंगाराम के दो रानियों से पांच पुत्र थे: 1. श्याम राम, 2.रत्नराम (टाडास) 3. तुलसीराम (जुलियासर), 4. दलपतराम (रेवासा), 5. कल्याण राम (पालवास)

श्याम सिंह धार्मिक वृत्ति का व्यक्ति था. इसलिए अपने जीवन काल में ही राजकाज अपने बड़े लड़के जसवंत सिंह को सौंप दिया था. श्याम सिंह का एक पट्टा संवत 1726 का मिलता है. इससे ज्ञात होता है कि इस समय तक गंगाराम की मृत्यु हो चुकी थी. इसके तीन स्त्रियों से 9 पुत्र पैदा हुए थे.[17]

जसवंत सिंह वीर प्रकृति का पुरुष यह. इसने खंडेला के क्षेत्र पर अपना अधिकार करना प्रारंभ किया और दूजोद पर कब्जा कर लिया जो आधी खंडेला की थी. इस पर खंडेला के तत्कालीन राजा बहादुरसिंह से इसका बैर भाव हो गया. उधर मंडोली गांव जलाने के कारण लाड़खानी भी इसके शत्रु हो गए. उधर कासली के गांवों में लूटमार करने के कारण पूर्णमल भी इसे शत्रुता रखने लगा. आगे चलकर खंडेला के शिवगढ़ में राजा बहादुर सिंह ने इसे धोखे से मार डाला. [18] इसके दो स्त्रियों से तीन पुत्र थे - 1. दौलत सिंह, 2. फ़तेह सिंह, 3. रूप सिंह. फ़तेह सिंह के वंशज दूजोद, जसुपुरा, परड़ोली और कुमास में हैं. रूप सिंह निस्संतान रहा.

दौलत सिंह (r.1687-1721)

सीकर नगर की नींव: जसवंत सिंह की मृत्यु पर उसका पुत्र दौलत सिंह उसकी जगह राज काज चलाने लगा. खंडेला के बहादुर सिंह ने वीरभान का बास नामक एक छोटा सा गांव इसको बैर भाव की शांति के लिए दिया. यहां पर राव दौलत सिंह ने वर्तमान सीकर नगर की नींव विक्रम संवत 1744 (1687 ई.) में रखी. यहीं उसने एक मोहन जी का मंदिर बनवाया.

उधर कासली में पूर्णमल के मरने पर उसका पुत्र बलराम दास उसकी जगह आया. इससे जगत सिंह ने कासली छीन ली. जगत सिंह के बाद उसका पुत्र दीप सिंह कासली की गद्दी पर बैठा. शाहपुरा पर इसका भाई जैत सिंह काबिज रहा.

दौलत सिंह एक वीर पुरुष था. वह सवाई जय सिंह का कृपा पात्र था. आमेर को खालसा करने के लिए बहादुर शाह ने जो फौज भेजी थी उसका मुकाबला कूकस


[पृ.151]: के तट पर राजपूतों ने किया. इस लड़ाई में दौलत सिंह घायल हो गया था. विल्स रिपोर्ट के अनुसार सवाई जयसिंह ने उसे निवाई एवं आमेर में जागीर दी थी. उसे एक पत्र में 'जमींदार मौज सीकर मीन-अमल परगना खंडेला' कहा गया है. मृत्यु के समय उसके पास 25000 की आय की जागीर थी.

दौलत सिंह का प्रथम पट्टा विक्रम 1745 का मिलता है जिसमें उसके द्वारा 101 बीघा जमीन गरीब पंडा को मोहन जी के मंदिर में सेवा पूजा करने पर दिए जाने का उल्लेख है. इसका अंतिम पट्टा विक्रम 1773 का मिला है जिसमें उसके द्वारा सीकर मौजे की 51 बीघा भूमि मिश्र रूपा को देने का उल्लेख आता है. इसके साथ पट्टे 1745 विक्रम से 1763 तक के मिले हैं.

दौलत सिंह का देहांत संवत 1778 (1721 ई.) में हुआ. इसके शिवसिंह, स्वरूपसिंह और विष्णु सिंह नामक पुत्र थे. इसकी मृत्यु पर शिवसिंह गद्दी पर बैठा. स्वरूपसिंह के वंशज सीवोठ, गाड़ोदा, बागड़ोदा, शेखसर में; विष्णु सिंह की संतान सीवोठ , मोल्यासी, पैवा और रोरु में हैं.

उदयपुर का भोजराज (1567)

भोजराज (1567)

[पृ.151]: उधर शेखावाटी के उत्तरी एवं मध्य भाग पर रायसल की मृत्यु के बाद उसके तीसरे पुत्र भोजराज का अधिकार रहा. इसका जन्म एक जन्म पत्रिका के अनुसार भा. सुदी 11 संवत 1624 (1567 ई. ) को हुआ था. [19] अपने पिता के जीवन काल में ही इसने अनेकों लड़ाईयों में भाग लिया था तथा राजकाज का भी अनुभव प्राप्त किया था. पाटन के तंवारों पर इसके हमले की बात का पिछले पृष्ठों में उल्लेख किया गया है.

बादशाह ने इसको कुसुंबी गांव का पट्टा दिया जो आगे चलकर उदयपुर कहलाया. इसने इस स्थान पर एक किला भी बनवाया था. इसका मनसब 800 जात और 400 सवार का था. [20] मोहन जी शाह इसका दीवान था. इसकी मृत्यु विक्रम 1597 (1540 ई.) के आसपास हुई थी. खंडेला में इसकी छतरी बनी हुई है. इसके सात रानियों से तीन पुत्र हुए - 1. टोडरमल, 2. केसरी सिंह, 3. रघुनाथ सिंह. केसरी सिंह के वंशज चंवरा, जोधपुर, सुनारी, भादुवड़ी आदि में बसते हैं.

इसकी मृत्यु के बाद इसका बड़ा पुत्र टोडरमल इसके स्थान पर आया. उसको उदयपुर मिला और अन्य भाइयों को पांच-पांच गांव जागीर में मिले थे. टोडरमल मिर्जा राजा जयसिंह के साथ रहता था. उसने अनेकों लड़ाईयों में वीरता दिखाई. खुर्रम (शाहजहां) और शाही सेना का मुकाबला हाजीपुर में हुआ उसमें टोडरमल ने अपने शौर्य का परिचय दिया. इसकी एक लड़ाई कायमखानी नवाब सरदार खान से भी हुई थी. रासो के अनुसार इस लड़ाई में उसे हार कर भागना पड़ा.

इसके संबंध में कहा जाता है कि टोडरमल बड़ा दानी और शूरवीर था इसकी मृत्यु संभवत: 1715 विक्रम (1658 ई.) में हुई. [21] इसके 6 रानियों से 6 पुत्र थे- 1. पुरुषोत्तम, 2. भीम सिंह (मंडावरा), 3. श्यामसिंह (छापोली), 4. हिम्मत सिंह (कारी), 5. हरनाथ सिंह (रसूलपुरा) और 6. जुझार सिंह.

अधीनस्थ भूभाग को सभी पुत्रों ने बराबर बांटने की प्रथा शेखावाटी में टोडरमल से ही प्रारंभ हुई थी. सारा भूभाग इसके 6 पुत्रों में बराबर बांट दिया गया था. उदयपुर की गद्दी पर इसकी मृत्यु के बाद जुझार सिंह बैठा.


[पृ.152]: समान बंटवारे का सिद्धांत केंद्रीय शक्ति के लिए बड़ा घातक सिद्ध हुआ. इसके कारण सारा भूभाग छोटे-छोटे भोमियों में बट गया और कोई केंद्रीय शासन नहीं रहा. उधर सीकर ठिकाना बराबर बलवान होता गया. जहां यह प्रथा नहीं थी. टोडरमल के पुत्र जुझार सिंह ने गुढा के क्षेत्र में जीत कर अपने गुरु के नाम पर इसका गुढा नाम रखा. यह घटना विक्रम संवत 1709 की है. [22]

शेखावाटी प्रकाश के कथन को अपनी मान्यता का आधार बनाते हुए शार्दुलसिंह शेखावत के लेखक ने टोडरमल का मृत्यु शैय्या पर पड़े हुए केड़ जलाने की इच्छा प्रकट करना एवं उसके पुत्र जुझार सिंह द्वारा केड को कायमखानियों से जीतना लिखा है. [23] जो बिल्कुल निराधार बात है. नागड़ पठान नामक पुस्तक के लेखक श्री यासीनखां ने एक शिलालेख खोज निकाला था जिसका पाठ उन्होंने अपनी पुस्तक में दिया है. उसके अनुसार केड़ पर उस समय तक कायमखानियों का शासन था. यह स्थान वस्तुतः पठान नवाबों के अधिकार क्षेत्र में था. [24] यह लेख संवत 1752 मिति कार्तिक बदी 11 का है.

उदयपुर का जुझार सिंह

[पृ.152]: जुझारसिंह की नरहड के समसामयिक नवाब कुतुबखां से भी लड़ाई हुई थी. इसके आधार के रूप में एक पद्य प्रचलित है. [25] इसने कांगड़ा और खुरासन की लड़ाईयों में भी भाग लिया था. इसके 18 पुत्र पांच रानियों से हुए थे- मोहसिंह, मुकनसिंह, रूपसिंह, दीप्तसिंह, भगूतसिंह, जगरामसिंह, किशोरसिंह, सरदारसिंह, सूरतसिंह, अभयसिंह, साहिबसिंह, सुलतानसिंह, मानसिंह, प्रेमसिंह, गुमानसिंह, जयसिंह, शक्तिसिंह, सांवतसिंह. दस पुत्रों को राज्याधिकार से वंचित कर दिया गया था.

जुझार सिंह मृत्यु के बाद जगरामसिंह पहले गुढा में स्थापित हुआ. आगे चलकर इसे उदयपुर का भी आधा भाग मिला. यह भी शाही सेवा में था. इसने हरिपुरा की लड़ाई से पलायन किया था. इसकी दो स्त्रियों से पांच पुत्र पैदा हुए: 1.कुशलसिंह, 2.सुखसिंह, 3.गोपासिंहल, 4.शार्दूलसिंह, 5.सलहदीसिंह


सन्दर्भ

  1. शेखावाटी प्रकाश पंडित शास्त्री पृ.9 फुटनोट 2 ; केसरी सिंह समर पृ. 36 फुटनोट
  2. तुजुके जहाँगीरी पृ. 252- ओझा निबंधमाला भाग 3 पृ.61
  3. केसरी सिंह समर - हरनाम उपाध्याय, पृ.38
  4. इकबालनामा ई जहाँगीरी मुहम्मद हादी - पृ.435 इलियट डाउसन
  5. शेखावाटी प्रकाश, अध्याय 6, पृ.10
  6. जयपुर का इतिहास - गहलोत पृ. 193
  7. शेखावाटी प्रकाश, अध्याय 6, पृ.10
  8. स्वस्ती श्री गणेश कुलदेव्य प्रसादात - संवत 1757 वर्षे शाके श्री शालिवाहन राज्य 1622 महाराज श्री अनूप सिंह जी तस्य पतनी राणी सेषावत राजा वरसिंह देवजी की बेटी छतड़ी की प्रतिष्ठा करावतम् शुभम् भवतु
  9. शेखावाटी प्रकाश, पृ.11
  10. केसरी सिंह समर पृ. 58 पथ 259
  11. औरंगजेब नामा मुंशी देवी प्रसाद भाग-2 पृ. 81
  12. औरंगजेब नामा मुंशी देवी प्रसाद भाग-2 पृ. 74
  13. झिरमिर झिरमिर मेहा बरसे, मोरा छतरी छाईजी । कल में होय तो आव सुजाणा, फ़ौज देहरे आईजी ॥
  14. केसरी सिंह समर पृ.3 भूमिका भाग I
  15. केसरी सिंह समर पृ.3 भूमिका भाग I
  16. तबकाते अकबरी इलियट - डाउसन, पृ.362
  17. शार्दूलसिंह शेखावत पृ. 77
  18. माधो प्रकाश, पृ.62-63
  19. Literary Heritage of Rulers of Jaipur, G N Bohra,p.36
  20. पादशाही नामा - भाग 2, पृ. 69
  21. शार्दूल सिंह शेखावत के लेखक के अनुसार संवत 1707 में हुई थी पृ. 571. यह उचित नहीं लगता क्योंकि सरदार खां कायमखानी नवाब संवत 1710 में गद्दी पर बैठा था. उसकी लड़ाई टोडरमल से होने की बात रासो कहता है. पद्य 1040
  22. शेखावाटी प्रकाश पृ.6 अध्याय-1
  23. शार्दुलसिंह शेखावत पृ.77
  24. इस लेख का प्रारूप इस प्रकार है- संवत 1752 मिति कार्तिक बदी 11 जागीरदार नागड़ बगड़ का अब्दुल्लाखां शेरखां। केड स्थान के जवानी जमादार सलावतखां , मुनीरखां, अजबखां , दारावखां । चौधरी राजमल जी छतरी कराई बेटने
  25. एक दिन मालरा जूझे से भिडभडइतरा भाग्या। कारतलव क़ुतुब कायमखां नागड़। कम धज भीमकिशोर, धणी जंगल धर बागड़।