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Sakrai

From Jatland Wiki
(Redirected from Shakambari)
Author: Laxman Burdak, IFS (R)

Location of Sakrai in Sikar district
Khandela - Sakrai - Karoi - Saledipura in Sikar district

Sakrai (सकराय) or Sakray (सकराय) or Sakambari (साकम्बरी) is an ancient religious place in tahsil Neem Ka Thana of district Sikar in Rajasthan. Its ancient name was Shankaranaka (शंकराणक).

Variants

Location

Nearby village in north is Saidala Bhagwanpura. Sakambri is 16 km. from Udaipurwati & 56 km. from Sikar.

Population

As per Census-2011 statistics, Sakray village has the total population of 1970 (of which 1002 are males while 968 are females).[4]

Sakrai Mata temple

Shakambarimata at Sakrai

The place is famous for its sacred temple of Sakrai Mata built by Chauhan Raja Durlabhraja in 692 AD (?)[5]. It is located on mount malay at a place surrounded with the hills in three sides, the location is an ideal tourist spot.[6] Its population is 888. A statue of Mahishasura Mardini is installed in the temple.

The Sakrai inscription opens with three successive verses invoking the blessings of Ganapati, Chandika and Dhanada.

In Harsha Inscription

Source - Journal of the Asiatic Society of Bengal, Volume 4 By Asiatic Society of Bengal, No. 43, July 1835, pp.367-385

In a paper read before the Asiatic Society on August 5, 1835, Sergeant E. Dean delivered the inglorious epitaph to an extraordinary tenth-century Indian temple - Harsha Mandir which he, along with Dr. G.E. Rankin had discovered previous year. This site of Harsha Inscription is known as Harshagiri, near the village of Harasnath about 7 miles south of Sikar in Rajasthan. This Inscription is very important for Chauhan history as it gives the genealogy of Chauhan rulers. In verse 48 it mentions names of villages donated by various Chauhan rulers for the temple of Harshanatha.

Chhatradhara (छत्रधारा) is mentioned in Harsha Inscription (L.21,V.25) - Donated to Harshadeva by Sinharaja. The old or present Harsh village where two rivers meet. Located in tahsil Sikar district Sikar, Rajasthan.

Verse-25.—By him (Sinharaja), through his exemplary devotion, two villages were presented with suitable deeds of gift to the deity called Harshanatha (हर्षनाथ), the best of these called Chhatradhārā (छत्रधारा), the second Sankarānaka (शंकराणक).

Harsha Inscription 961-973 AD mentions Sakambhari (शाकंभरी) (L.38,V.48):

L-38: Likewise, the young prince, the blessed Jayashriraja (जयश्रीराज), religiously bestowed on Harsha-deva, the village of Kolikupaka (कोलिकूपक) (Kolida), whose revenues were received by himself.
Likewise, the whole of [the villages called] Sakambhari (शाकंभरी) (Sakrai), Lavanakutaka (लवणकूटक) (Kochhor), Prativinsha (प्रतिविंशा) (Parasrampura), and Apaharshaka (अपहर्षक) (Palasara), were bestowed in the same manner.[7]

सकरायमाता मंदिर के शिलालेख

नोट - यह विवरण मुख्यत: रतन लाल मिश्र की पुस्तक शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, १९९८, पृ.३११ से ३१९ से अध्ययन हेतु लिया गया है.

अरावली की एक उपत्यका के रम्य प्राकृतिक परिवेश में स्थित शाकम्भरी (सकरायमाता) के मंदिर में तीन प्राचीन शिलालेख उपलब्ध हैं.

प्रथम शिलालेख मंदिर के एक द्वार पर लगा है जो सबसे प्राचीन है. यह एपिग्राफिया इंडिका (Epigraphia Indica) के वोल्यूम सताईस पृष्ठ २७-३३ पर प्रकाशित हुआ है. इसका समय विक्रम संवत ६९९ माना गया है. इस पर ऐसियाटिक सोसाइटी वेस्टर्न सर्किल की १९३४ की रिपोर्ट में भी विचार हो चुका है. डॉ. भंडारकर इसकी तिथि ८७९ वि. तथा श्री ओझा ७४९ वि. मानते हैं. रतन लाल मिश्र लिखते हैं कि खंडेला में जो शाकम्भरी से पास ही है वोद्द के पुत्र आदित्य नाग ने अर्द्धनारीश्वर का मंदिर बनाया था. इसकी तिथि डॉ. डी.सी. सरकार ने ८६४ वि. मानी थी. आदित्य नाग ने खंडेला में अपना मंदिर बनाया था और सकराय में शाकम्भरी मंदिर के मंडप निर्माण के लिए अन्य दस गोष्ठियों के साथ सम्मिलित हुआ. यह मान्यता साधार लगती है. इस आधार पर डॉ. डी.सी. सरकार द्वारा सुझाई गयी तिथि वि. ८७९ स्वीकार करने योग्य है. [8] शाकम्भरी देवी के स्थान पर लगे संवत ८७९ के शिलालेख से ज्ञात होता है की ११ वणिकों ने एक संघ बनाकर एक अतीव सुन्दर मंडप शंकरादेवी के मंदिर के आगे बनाया. इन लोगों के नाम मदन (धूसर वंश) गर्ग, गनादित्य (धर्कट वंश) देवल, शंकर, आदित्यनाग आदि. [9]

सकराय दूसरा शिलालेख का

Sakrai Inscription2

दूसरा शिलालेख मंदिर के पार्श्व भाग पर लगा है. श्री ओझा इसे १०५६ वि.स. का मानते हैं.

मूल पाठ

१. (१०५) ६ श्रावण वदि। श्री शंकरादेव्याया मह (:)
२. राज श्री दुल्लह राजन्य राज्ये दुसाध्य
३. (शिव) हरिसुत तस्यैव भातृव्यज श्री
४. (सिद्धरा)ज ताभ्यां मंडपं कारापितं। कर्म्मका
५. (र आ) हिल सिंहटसुत: देव्यापादंक् नित्य प्र
६. (णमति) (बहु) रूपसुत: देवरूपेन

भावार्थ संवत १०५६ श्रावण बदी १ को शंकरादेवी का मंडप महाराज श्री दुल्लहराज के राज्य में दुसाध्य शिवहारी के पुत्र एवं उसके भतीजे सिद्धराज ने बनाया. कर्मकार का नाम आहिल था. जो सिंहट का पुत्र था. जो देवी के चरणों में नित्य प्रणाम करता है. प्रशस्ति खोदी बहुरूप के पुत्र देवरूप ने.

सकराय तीसरा शिलालेख का वि.स.1055

Sakrai Inscription-3a
Sakrai Inscription-3b

तीसरा शिलालेख वि.स.1055 का है. इसका उल्लेख रायल ऐसियाटिक सोसाइटी की रिपोर्ट के साथ ही एपिग्राफिया इंडिका (Epigraphia Indica) वो. 38, भाग 7, पृ. 323,242 में भी इसका संपादन हुआ है. इस शिलालेख में प्राचीन प्रथा के अनुसार प्रथम दो अंक छोड़ दिए हैं और केवल 55 का अंकन है. संपादक ने प्रथम दो अंकों को 10 मानकर शिलालेख की तिथि 1055 बताई है. इस सम्बन्ध में डॉ. दशरथ शर्मा मानते हैं कि विग्रहराज का उत्तराधिकारी दुर्लाभराज द्वितीय सं. 1053 में राज्य कर रहा था इसलिए सकराय शिलालेख में उल्लिखित विग्रहराज की पहचान विग्रहराज तृतीय से करनी चाहिए ओर विलुप्त अंकों को 10 की अपेक्षा 11 माना जाना चाहिए. इस के अतिरिक्त एक और तथ्य भी प्रासांगिक प्रतीत होता है जो शिलालेख के काल निर्धारण में सहायक होगा. विग्रहराज की मृत्यु का ठीक समय हमें ज्ञात नहीं है. विग्रहराज द्वितीय के समय का हर्ष-शिलालेख 1030 वि. का ज्ञात है. दुर्लाभराज 1055 में गद्दी पर बैठ गया था. उस समय तक विग्रहराज की मृत्यु हो चुकी थी. नर्मदा विग्रहराज की पुत्री थी जिसका विवाह वत्सराज के साथ हुआ था. उसके गोविन्दराज नामक पुत्र हुआ था. उसकी पत्नी देयिका थी. गोविन्दराज-देयिका की पुत्री देयिनी थी जिसने शाकम्भरी के मंदिर का जीर्णोद्धार या पुनर्निर्माण करवाया था. इस प्रकार विग्रहराज, गोविन्दराज और देयिनी ये तीन पीढियां व्यतीत हो चुकी थीं. देयिनी ने संभवत: अपनी वृद्धावस्था में माता-पिता तथा स्वयं की पुन्यवृद्धि के लिए पितृग्रह में रहते हुए यह मंदिर बनवाया था (पितृमातृभ्याम आत्मन: पुण्य वृद्धये). इस प्रकार विग्रहराज से लेकर देयिनी द्वारा मंदिर निर्माण के काल तक प्राय: 100 वर्ष का समय व्यतीत हो चुका होगा. इस आधार पर शिलालेख की तिथि वि . १०५५ नहीं होकर वि. ११५५ मानना संगत प्रतीत होती है. [10] शाकंभरी देवी के 1055 वि. (1155 वि.) के शिला लेख से ज्ञात होता है कि देवी का मंदिर जो ईंटों का बना था कालांतर में टूट फूट गया था. देयिनी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया और द्रोणक नामक गाँव अर्पित किया. (शाकंभरी शिलालेख श्लोक-16)

मूल पाठ

जयतिमुनि मनुजगीत: स(रभस) म् निरद्दारितारि राया (यौ) या: (य:) (१)
कृन् (न) द्... रु...नूपुर-मुखर: स (लसतम्म) लम् छन्न: प...
२. ...क्षमैरिव स्फ़ुरद विकटपन्नगा मलयपाद्श्रीरिव। सुरत्नकटको ज्व(ज्ज्व)
लो सुरगिरेश तति सन्निभा प्र...मृदाश्र (य) (२)
३. ...हितानीक: शक्तिर्मान विवुधारित हृत श्रीमद् विग्रहराजो भूच्चाहमानो गुहोपम:(३)
४. ....सद्धतवन्शे प्रभव: सद्वागुरा तस्यु नर्म्मदा (४) श्री बच्छराज
नृपते: प्रहतारितस्य सामन्त चक्राकरराजहंसी. साजीजनद् विजित शत्रु जनोर्जितम् श्री गोविन्दराज (राज)...
५.राजालोकम (कम्)। (५) हेलादलद विकट कुंभ कवाट मुक्त:
मुक्ताफलोच्चालितविस्फ़ुरितअंतरिक्षम्। येन क्वनन् मुदुजाल प्रचलालि मालामालोडितम् श (स)
६. लीलान (लान्)।। (६) देवं कर्मरतानित्यम् विनतानाम वरप्रदा: राजनीश्रीदेयिका,
कान्ता तस्याभूद् देवतोपमा।। (७) को दानेनपूरित: प्रतिदिशम् कस्याश्रयोनोवत: को ।
७. निवृतिम कस्याच्छ्रय नोद्धता। इत्येवं त्रिदेशेश्वरस्य भवने जेगीयते यश्शिचरम्
चित्रम् चा(रण) चक्रकै: विरचितम् चन्द्रावदातंयश: ।। (८) अस्ति उन्नते: सुरगृहै:(ना)
८. ना विधैद्विज वनिगवर वेश्मजालै:। सत श्रेष्ठि संसत महाजन सन्निवेशम श्री
पूर्णतल्लकपुरम् प्रथितम पृथ्वीव्याम (व्याम्)। (९) श्रेष्ठि जाज्जक जयमात्रयो: (र) र्पितम्
९. इदम् देवद्रोन्या-रम्य प्रदीप पंर्यतं लता व्यालोल पल्लवम्। कोकिला कुल
संघुष्ठं, मल्ली माला निषेविताम्।। (१०) पवनापात संभ्रान्त किन्नरा:
१०. तम् (तम) शिखालि (न्दी) केका कुलितम् हरि हारीत नादितम (तम्)। (११)
वृहदाद्रोण्याश्रितम् श्रीमत् सिद्धगधर्व संस्तुतम्। शोधम् श्री शंकरादेव्या: पुरा केनापि
कारितम (तम्)। (१२) विदीर्ण कूटशिखर (रम्)
११. तितेष्ठकम् . देव्यास्तद् मन्दिरं जातं कालयोगाच्चला चलम् (लम्) तयोंन्नियोगे
देयिन्या: स्थाने (घोसायी) तदायतनम् भूय: कारितम् रुचिमत्तरम (रम्) ।। (१४) जीवितम का...
१२. संपदातितरलास्तरंगवत् यौवनानिसुचिरंनदेहिनाम् । इति एत्य जागतोहि अनित्याम् ।। (१५)
१३. यस्याश्च पितृ मातृभ्याम् आत्मन: पुण्यवृद्धये....
ग्रामो द्रोनक संज्ञकश्च न्ययात्रेदापित:।। (१६) यावत् क्षितीह क्षितिधर: क्षणदाकरश्च
यावत् क्षिनोति तिमिरम् रवि अंशुजालै:-वृंदेनृतमतामगनमुखर नृपुर राव रम्यम्।। (१७)
१४. ....द् मकरन्दविसर्पि विन्दुमत् भ्रमद्भ्रमर संज्ञ विवृद्धराव काले
विलोलपा... रूम.... देवालयम्.... हितरुचिमद् विचित्रम्।। (१८)
१५. शकरसुनुना पूर्वा विरचिता हीऐषा। वराहेनाल्प मेधसा उत्कीर्णा सूत्रधार
सिलागनेन वोद्दक पुत्रेन संसंवत्सर ५५ माघ सुदि.

बाघेश्वर जीण और शाकंभरी

रतन लाल मिश्र[11] ने लिखा है... [पृ. 276]: जसरापुर (खेतड़ी) से प्राय: 6 मील की दूरी पर बाघेश्वर का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. यहां प्राचीन काल के तीन मंदिर हैं. यहां प्राचीन सामग्री बिखरी पड़ी है. कई प्राचीन मूर्तियां भी पाई जाती है. तूंदा गांव के पास प्राचीन प्रतिमाएं मिली है जिन्हें खेतड़ी नगर के पन्नालाल के तालाब की दीवारों में लगा दिया है. तूंदा गांव के पास प्राचीन पट्टण का टीला है. यह नगर पूर्ण रूप से विध्वंसित हो गया है.

जीण शेखावाटी का प्राचीन मंदिर है. इसके जीर्णोद्धार संबंधी अनेकों शिलालेख मंदिरों के स्तंभों पर लगे हैं पर निर्माण कल का द्योतक कोई शिलालेख नहीं मिला है. अर्णोराज के समय का एक शिलालेख (विक्रम 1196) है जिसमें मंदिर के आल्हण द्वारा जीर्णोद्धार कराये जाने का उल्लेख है.

जीण का मंदिर आज भी खड़ा है पर विभिन्न समय पर मंदिर के प्रांगण में निर्माण कार्य होते रहने के कारण पूर्व स्वरूप लुप्त हो गया है. केवल मंडप एवं गर्भ मात्र शेष है. स्तंभों पर अलंकरण की व्यवस्था निश्चय ही चौहान काल की है. अत्यधिक अलंकरण की और रुझान है. मंडप उन्नत आधार पर बना है. इस मंदिर में इतने जीर्णोद्धार हुए कि पूर्व स्वरूप का कुछ ही शेष रहा है.

शाकंभरी का मंदिर शेखावाटी का प्राचीन मंदिर है. यहाँ तीन शिलालेख है. सबसे प्राचीन शिलालेख इंडियन एपीग्राफिस्ट छाबड़ा द्वारा 699 संवत का माना गया है. भंडारकर इसे 879 विक्रम का और ओझा विक्रम 749 का बताते हैं. इसमें 11 महाजनों द्वारा गोष्ठिक बनाकर शंकरा देवी के मंदिर का मंडप जो खंडेला से 14 मील उत्तर पूर्व में है बनाने का उल्लेख है. इससे ज्ञात होता है कि इसके पूर्व काल में देवी का मंदिर बन चुका था. मंदिर का मंडप या तो भग्न हो गया होगा या मंदिर मंडप विहीन स्वरूप वाला होगा. इस मंडप उत्तम के स्वरूप के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिलती है.

इसी प्रकार खंडेला के हर्ष संवत 201 के शिलालेख में बोद्दा के पुत्र आदित्यनाग द्वारा मंदिर बनाए जाने का उल्लेख है. यह शिव पार्वती का मंदिर वर्तमान में स्थित नहीं है अतः इसके संबंध में कुछ कहना कठिन है. शाकंभरी में ही संवत 1155 का शिलालेख है जिसमें उल्लेख है कि ईंटों से विनिर्मित घोसायिका के इस मंदिर के शिखर टूट गए थे और मंदिर भग्न अवस्था को प्राप्त हो गया था तब देयिनी ने इसका जीर्णोद्धार करवाया. संवत 1056 के अन्य शिलालेख में मंडप बनाए जाने का उल्लेख है.

[पृ.277]: मंदिर आज पूर्ण रूप से नया स्वरूप लिए खड़ा है. शिखरबंद मंदिर का यह निर्माण ईंटों और चूने का है शिला पट्टिकाओं का नहीं. मंडप भी है पर सब कुछ नया है. निज मंदिर पूर्वाभिमुख है जिसमें देवी की दो मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारंभ में देवी के दोनों और गणेश और कुबेर की मूर्तियां थी. इस तथ्य की पुष्टि शिलालेख से होती है जिसमें देवी के साथ गणेश और कुबेर की भी स्तुति है. आगे चलकर ब्रह्माणी नाम से एक मूर्ति देवी के पास स्थापित कर कुबेर और गणेश को हटाकर मंडप में निज मंदिर के बाहर स्थापित कर दिया गया जहां वे आज भी प्रतिष्ठित है.

शाकंभरी के मंदिर के अतिरिक्त अनेकों शिखर बंद प्राचीन मंदिर इस स्थान के आसपास उपस्थित हैं. स्वयं शाकंभरी के मंदिर के बाहर एवं खोह कुंड में दो प्राचीन मंदिर हैं. लोहार्गल में अनेकों शिखर बंद मंदिर है. रघुनाथगढ़ से लेकर शाकंभरी तक जाने वाले मार्ग में अनेकों मंदिर मिल जाते हैं. वस्तुतः यह भूभाग अतीव प्राचीन है. किरोड़ी जी का मंदिर एवं कुंड भी प्राचीन है. अब इस स्थान पर एक नया मंदिर खड़ा हुआ है.

12वीं सदी के वास्तु कला के प्रतिमान प्राप्त नहीं है. यही बात आगे की दो शतियों के लिए लागू होती है. निर्वाण के समय की प्राचीन बावड़ी (खंडेला के पास) की बात एक तत्कालीन शिलालेख से ज्ञात होती है.

यह शिलालेख फाल्गुन शुक्ल तेरस 1575 का है. इसमें पृथ्वीराज के पुत्र राम और वालहा द्वारा बावड़ी बनाने का उल्लेख है. यह बावड़ी 1592 विक्रम में पूर्ण हुई थी. खंडेला से पलसाना रेलवे स्टेशन जाने वाले मार्ग पर खंडेला से डेढ मील दूर पर यह काली वाय आज छिन्न-भिन्न अवस्था में है. यह निर्वाण शासक नाथूदेव के राज्य काल में बनी थी.

16 वीं शती विक्रम के पश्चात अनेक वास्तु कला के प्रतिमान मिलते हैं. चंदेल काल के दो लघु मंदिर रेवासा और रघुनाथगढ़ में है. ये कला विहीन सीधे साधे हैं. रेवासा के इस मंदिर के कई जीर्णोद्धार हो चुके हैं. एक जीर्णोद्धार संवत 1535 में होने की बात शिलालेख से ज्ञात होती है. इस क्षेत्र में पहाड़ों के अंतराल में अवस्थित मनसा देवी का प्राचीन मंदिर है. जीण, शाकंभरी और मनसा शेखावाटी के शक्तिपीठ है.

प्राचीन मंदिरों के स्थापत्य की इस बात को यहीं छोड़कर जब आगे बढ़ते हैं तो मंदिर वास्तु की परिवर्तित शैली का स्वरूप सामने आता है. इस शैली में बने मंदिरों का प्रारंभ विक्रम की 16वीं सदी से होता है जो 20वीं शती के प्रारंभ तक चलता रहता है. संवत 1578 में फतेहपुर में बना लघु मंदिर इस प्राचीन प्रणाली का प्रतिनिधि है. संवत 1508 में तुहिनमल द्वारा बनाया गया लघु जैन मंदिर का भी अब स्वरूप बदल गया है.

[पृ.278]: लक्ष्मीनाथ जी का फतेहपुर का मंदिर सं. 1621 में बना था. उस समय इसका आकार बहुत छोटा था.

शेखावाटी की पहाड़ी श्रेणियां

रतन लाल मिश्र[12] ने लिखा है: [पृ.2]:शेखावाटी गौरी बालुका राशि के उन्नति टीलों से भरा-पूरा भूभाग है जहां केवल दक्षिणी भाग सघन वनावली से छाई गिरिपंक्तियों से आवृत्त है. यह पंक्ति


[पृ.3]: सिंघाना से सांभर तक फैली हुई है तथा इसे राज्य के और भागों से अलग कर देती. [13] कुछ दूर उत्तर की तरफ लोहार्गल के पहाड़ हैं जिनके सबसे ऊंचे शिखर को मालकेतु कहते हैं.[14] यह पहाड़ी श्रृंखला सिंघाना से खंडेला, उदयपुर, शाकंभरी, लोहार्गल, रघुनाथगढ़, सांगरवा, रेवासा, हर्ष आदि स्थानों से निकलती हुई सांभर झील तक चली जाती है. इस पहाड़ी श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी रघुनाथगढ़ की चोटी है जो 3450 फीट ऊंची है. हर्ष पर्वत शिखर 2998 फीट तथा लोहार्गल की बरखंडी की चोटी लगभग 3000 फीट ऊंची है. [15]

ये पहाड़ी पंक्तियां उदयपुरवाटी में बहुत घनी हो जाती हैं. लोहार्गल के चारों ओर विकट गिरिश्रृंखलाएं हैं जो शाकंभरी देवी मंदिर के आगे तक अपनी अनवरत ऊंचाई लिए चली जाती हैं. यहां पहाड़ों की कई श्रृंखलाएं हैं जिन पर सघन वृक्षावली छाई हुई है. वर्षा ऋतु में जब नीले बादलों से सारा आकाश ढक जाता है तो इन पहाड़ों पर छाई हरीतिमा पूर्ण वृक्षावली एक मनोहारी दृश्य उपस्थित कर देती है. इन पहाड़ी श्रृंखलाओं में अनेकों देव मंदिर हैं अतः धार्मिक मान्यता के कारण लोग वृक्षों को काटते सकुचाते हैं.

इन्हीं गिरि पंक्तियों का एक सिलसिला सीकर से दक्षिण की और कुछ दूरी से प्रारंभ होता है. इस सिलसिले में हर्ष की उन्नत पहाड़ी श्रृंखला है जिस पर कलानिधि हर्ष का प्रसिद्ध मंदिर अवस्थित है. बाजोर से कुछ ऊपर उठकर यह श्रृंखला निरंतर आगे बढ़ती जीण के मंदिर से आगे तक निकल जाती है. यहां स्थान-स्थान पर गौर बालू के टीले इन पहाड़ों से अड़े हुए हैं. कहीं-कहीं तो यह स्पर्धा संघर्ष आतीव दर्शनीय हो गया है. रेवासा का नगर एवं दुर्ग इसी श्रेणी पर है.

शेखावाटी के जल भंडार

रतन लाल मिश्र[16] ने लिखा है: शेखावाटी के क्षेत्र को शुष्क प्रदेश माना जाने पर भी यहां जल के अगाध भंडार हैं. शाकंभरी एवं लोहार्गल का 12 महीना बहने वाला सतत जल प्रवाह, किरोड़ी एवं गणेश्वर के गर्म एवं ठंडे जल प्रवाह, बाघेश्वर का सतत प्रवहमान जल स्रोत यहां की भूमि को आर्द्र रखते हैं तथा वृक्षावलियों को संचित करते हैं. खेतड़ी के पास अजीत समंद झील सन 1891 में राजा अजीत सिंह द्वारा बनवाई गई थी. इसका क्षेत्रफल 8-71 वर्ग मील का है. बंध रैवा, बंध बैरी छोटे बड़े जल स्रोत हैं. [17]

शेखावाटी के क्षेत्र में कुछ जगह भूमि क्षारयुक्त समतल एवं नीची हैं. इसमें वर्षा कालीन जल भर जाता है जिससे सर, झील या खारडा कहते हैं. इनमें अनेकों छोटे नदी नाले आकर गिरते हैं. जीण माता का सर प्रसिद्ध है तथा बड़ा विस्तृत है. इनके

[पृ.5]: अलावा पीथमपुरी (नीम का थाना तहसील) और रैवासा की झीलें हैं. रैवासा की झील में नमक पैदा होता है. इसका ठेका ब्रिटिश सरकार ने 1878 में लिया था. [18]

English translation of Sakrai Mata temple Inscription

Not available.

See also

External Links

References

  1. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, p.267
  2. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998,p.311
  3. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, p.312
  4. http://www.census2011.co.in/data/village/82283-sakray-rajasthan.html
  5. Encyclopaedia of tourism resources in India, Volume 1 By Manohar Sajnani, p.299
  6. http://sikar.nic.in/other_tourist.htm
  7. L-38:[*तथा युवरा]ज: श्रीजयश्रीराज
    स्वभुज्यमानकोलिकूपग्रामं
    भक्तया हर्षदेवाय शासनेन दत्तवान् ।
    तथा समस्तं श्रीहर्म्महतेश्या शाकंभर्या लवणकूटक प्रतिविंशा अपहर्षकं दत्तं ।
  8. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, १९९८, पृ.३११-३१२
  9. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, १९९८, पृ.२६५
  10. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, १९९८, पृ.३१३-३१४
  11. Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, pp.276
  12. Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar, p.2-3
  13. जयपुर राज्य का भूगोल - अनंत लाल मुखर्जी पृ.45
  14. वही पृ.47; शास्त्री पृ.5
  15. शेखावाटी का भूगोल-नारायण सिंह, पृ.9
  16. Shekhawati Ka Navin Itihas/1.Prakritik Parivesh Evam Sima Vistar, p.4-5
  17. खेतड़ी का इतिहास, झाबरमल शर्मा
  18. शेखावाटी का भूगोल - नारायणसिंह पृ.13

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