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Moterao Chauhan

From Jatland Wiki
(Redirected from Motarao Chauhan)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Moterao Chauhan (1315 AD) was descendant of Gogaji from village Dadrewa in Churu, Rajasthan.

Variants

Jat Gotras

Motsara clan Jats are Descendants of Moterao Chauhan of Dadrewa.

Ancestry of Moterao Chauhan

Moterao Chauhan was descendant of Gogaji, who was born at village Dadrewa in Churu district by the blessing of Guru Gorakhnath. The mother of Gogaji, Bachal worshiped her Guru Gorkhnath for 12 years for a child. The Gogaji's wife was Siriyal. The Ancestry of Gogaji and Motarao is based on Dasharatha Sharma [1] is as under:-

Chahuman → • Muni → • Kalahalanga → • Ghangh (902 AD[2]) {Harsha+Harkaran+Jeen (933 AD)[3]} → • Kanho → • ? → • ? → • ? → • Jivraj/ Jevara (m. Bachal) (Dhandhu to Dadrewa) → • Naniga (childless) → • Gogaji (946-1024 AD) → • Bairasi (Brother of Goga) → • Udayaraja (son of Vairasi) → • Jasaraja → • Kesoraja → • Vijayaraja → • Padmasi → • Prithviraja → • Lalachanda → • Gopala → • Jaitasi (1213 AD) → • Punapala → • Rupa → • Ravana → • Tihunapala → • Moterao (1315 AD) → • Karamachanda (converted to Kayamkhani Muslims by Firuz Shah, 1351-1388 A.D.)

ददरेवा के कायमखानी

Genealogy of Kayamkhanis of Dadrewa
Genealogy of Kayamkhanis of Dadrewa

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.70-87

[पृ.70]: शेखावाटी भूभाग पर शेखावतों के पूर्व कायमखानी वंश का शासन था. उस समय यह भूभाग झुंझुनूवाटी, फतेहपुरवाटी और नरहरवाटी आदि नामों से मशहूर था. यहाँ कायमखानी वंश की उत्पत्ति आदि पर विस्तृत विवेचन करना होगा. कायमखानी वंश का प्रवर्तक कायमखां था जो फिरोज तुगलक (r.1351-1388) के समय में चौहान से मुसलमान बना था. इस सम्बन्ध में उपर्युक्त मत के अलावा समय-समय पर और भी मत प्रतिपादित किए गए हैं. नीचे इन पर कुछ विवेचन किया जा रहा है.

[पृ.71]: माननीय ओझा जी ने अपने बीकानेर के इतिहास में कायमखानियों के उत्पत्ति के संबंध में जो मत व्यक्त किया है उसके अनुसार हिसार के फौजदार सैयद नासिर ने ददरेरे के निवासी चौहानों को परास्त कर वहां से निकाल दिया. इस अवसर पर केवल दो बालक एक चौहान दूसरा जाट वहां रह गए. सैयद ने उन्हें अपने महावत के सुपुर्द कर दिया. बादशाह बहलोल लोदी (r.1451-1489) ने चौहान बालक को मुसलमान बनाकर, सैयद नासिर का मनसब बना दिया और उसका नाम कायमखां रखा. उसने अपने लिए झुंझुनू की भूमि में फतेहपुर बसाया इसी कायमखां के वंशज कायमखानी कहलाते हैं. [4]

राजस्थान के इतिहासकार मुंहता नेणसी ने अपनी ख्यात में लिखा है कि हिसार के फौजदार सैयद नासिर ने ददरेवा को लूटा. वहां से दो बालक एक चौहान दूसरा जाट ले गए. उन्हें हांसी के शेख के पास रख दिया. जब सैयद मर गया तो वे बहलोल लोदी के हुजूर में भेजे गए. चौहान का नाम कायमखां तथा जाट का नाम जैनू रखा. जैनू के वंशज (जैनदोत) झुंझुनु फतेहपुर में हैं. कायमखां हिसार का फौजदार बना. चौधरी जूझे से मिलकर झुंझुनूं क़स्बा बसाया. कायमखां ददरेवा के मोटेराव चौहान का पुत्र था. कायमखां के वंशज कायमखानी कहलाते हैं. [5]

[पृ.75]: ऐतिहासिक तथ्यों से इस बात की पुष्टी होती है. महाकवि जान, रासो के रचयिता, कायमखां के मोटेराव चौहान का पुत्र होना, ददरेवा का निवासी होना आदि तथ्यों का विस्तार से उल्लेख करते हैं. यह विवेचना आवश्यक है कि मोटेराव चौहान का कौनसा समय था तथा कायम खां किस समय मुसलमान बना.

ददरेवा के चौहान साम्भर के चौहानों की एक शाखा थे. लम्बी अवधी से इनका ददरेवा पर अधिकार था और इनकी उपाधी राणा थी. चौहानों में राणा की उपाधी दो शाखाएं प्रयुक्त करती थी. पहली मोहिल और दूसरी चाहिल. ददरेवा के चौहान संभवत: चाहिल शाखा के थे. गोगाजी जो करमचंद के पूर्वज थे, के मंदिर के पुजारी आज भी चाहिल हैं. मोटे राव चौहान गोगाजी का वंशज था.

दशरथ शर्मा गोगाजी का समय 11वीं शदी मानते हैं. उनके अनुसार वे महमूद गजनवी से युद्ध करते हुए सन 1024 में बलिदान हुए.[6]

[पृ.76]: रणकपुर शिलालेख में भी गोगाजी को एक लोकप्रिय वीर माना है. यह शिलालेख वि. 1496 (1439 ई.) का है.[7]

[पृ.77]: यह प्रसिद्ध है कि गोगाजी से 16 पीढ़ी बाद कर्मचंद हुआ. इसी प्रकार जैतसिंह से उसे सातवीं पीढ़ी में होना माना जाता है. बांकीदास ने गोगाजी को जेवर का पुत्र होना लिखा है.[8] गोगाजी के बाद बैरसी , उदयराज , जसकरण , केसोराई, विजयराज, मदनसी, पृथ्वीराज, लालचंद, अजयचंद, गोपाल, जैतसी, ददरेवा की गद्दी पर बैठे.[9] जैतसी का शिलालेख प्राप्त हुआ है जो वि.स. 1270 (1213 ई.) का है. इसे वस्तुत: 1273 वि.स. का होना बताया है. जैतसी के बाद पुनपाल, रूप, रावन, तिहुंपाल, मोटेराव, यह वंशक्रम रासोकार ने माना है. [10]

जैतसी के शिलालेख से एक निश्चित तिथि ज्ञात होती है. जैतसी गोपाल का पुत्र था जिसने ददरेवा में एक कुआ बनाया. गोगाजी महमूद गजनवी से 1024 ई. में लड़ते हुए मारे गए थे. गोगाजी से जैतसी तक का समय 9 राणाओं का प्राय: 192 वर्ष आता है जो औसत 20 वर्ष से कुछ अधिक है. जैतसी के आगे के राणाओं का इसी औसत से मोटेराव चौहान का समय प्राय: 1315 ई. होता है जो फिरोज तुग़लक के काल के नजदीक है. इससे स्पस्ट होता है कि कायम खां फीरोज तुग़लक (1309-1388) के समय में मुसलमान बना.

[पृ.79]: तारीखी फीरोजशाही से ज्ञात होता है कि बंगाल से लौटने के बाद बंगाल की लड़ाई के दूसरे साल हिसार फीरोजा की स्थापना की.[11] यह 1354 ई. में माना जा सकता है. हिसार में सुल्तान ने एक दुर्ग बनाया और अपने नाम पर इस नगर का आम हिसार फीरोजा रखा. इसके पूर्व हिसार के आसपास का क्षेत्र हांसी के शिंक (डिविजन ) में था. इस शिंक का नाम हिसार फीरोजा कर दिया और हांसी,

[पृ.80]: अग्रोहा, फतेहाबाद, सरसुती, सालारुह, और खिज्राबाद के जिले इसमें सामिल कर लिये. इसके पास ही दक्षिण पश्चिम में शेखावाटी का भूभाग था.

कायमखां यद्यपि धर्म परिवर्तन कर मुसलमान हो गया था पर उसके हिन्दू संस्कार प्रबल थे. उसका संपर्क भी अपने जन्म-स्थान के आस-पास की शासक जातियों से बना रहा था. कायमखां के सात रानियाँ थी जो सब की सब हिन्दू थी. इन स्त्रियों के पिता एवं स्थानादि के नाम से उसके संपर्क एवं सम्बन्ध की बात ज्ञात होती है. उसकी किसी मुस्लिम बेगम का नाम ज्ञात नहीं है.

कायमखां की सात रानियों के नाम थे[12] -

[पृ.84]: कायमखां अपने जीवन के अंतिम दिनों में हिसार फीरोजा का हाकिम रहा था. यह क्षेत्र दूर-दूर तक फैला था तथा अपना जन्म स्थान ददरेवा भी निकट था जहाँ अब भी चौहान राज कर रहे थे. कायमखां का शेखावाटी से निकट संपर्क था यह बात खंडेले के शासकों के वर्ग में उसकी शादी से जाना जा सकता है. इसी संपर्क के करण बाद में उसके पुत्र हिसार से विस्थापित होकर इधर चले आये.

कायमखां के पुत्र

शेखावाटी प्रकाश के अनुसार कायमखां के पुत्र 5 थे - महमदखां, ताजखां, क़ुतुबखां, अबूखां, और इख्तियारखां[13]. 'कायमखां रासो' के अनुसार कायम खां के पुत्रों की संख्या 5 थी. उनके नाम थे - ताजखां, महमदखां, क़ुतुबखां, इख्तियार खां और मौनखां. [14]

'फतेहपुर परिचय' में उसके 6 लड़के होने की बात कही है. ताजखां, मुहम्मदखां, इख्तियारखां (अक्खनखां), अहमदखां, क़ुतुबखां (कट्टनखां) और मोहनखां इनके नाम थे. माधव वंश प्रकाश में 6 लडके होना लिखा है. इस पुस्तक के अनुसार मुहम्मदखां की संतान ने झुंझुनू की नवाबी की, ताजखां की संतान ने फतेहपुर में राज्य किया. [15]

[पृ.85]: रासो के अनुसार कायम खां के पुत्र ताजखां, मुहम्मदखां कुछ समय हिसार में रहे. तीसरा पुत्र इख्तारखां (अखन) ढोसी पर राज करता रहा. वह बहुत प्रबल नवाब था. अखन ने ढ़ोसी की पहाड़ी पर एक दुर्ग का निर्माण किया और आस-पास के स्थानों पर अधिकार कर लिया. रासो के अनुसार अखन को आमेर वाले 12 लाख और अमरसर वाले 8 लाख कर स्वरुप देते थे.

चौथा पुत्र क़ुतुबखां बारुवे में जाकर बस गया और आस-पास के स्थानों पर उसने अधिकार कर लिया. बारुआ झुंझुनूं जिले का स्थान है जो नवलगढ़ से 11 किमी दूर दक्षिण में है. मौनखां बगड़ में था. इस प्रकार झुंझुनू के पूर्व-दक्षिण का सारा भू-भाग कायमखानी नवाबों के अधीन हो गया था.

[पृ.86]: मोकल राणा के समधीश्वर मंदिर चित्तोड़ के शिलालेख 1428 ई. में लिखा है कि महाराणा ने उत्तर के मुसलमान नरपति फीरोज पर चढ़ाई की और लीला मात्र में युद्ध में उसके सारे सैन्य को नष्ट कर दिया. [16] इस शिलालेख के अलावा श्रृंगी ऋषि शिलालेख वि.सं. 1485 (1428 ई.) में इसका उल्लेख है. कुम्भलगढ़ के लेख वि.सं. 1517 (1460 ई.) में कहा गया है कि महाराणा ने पीरोजा (फीरोज) को अहमद के साथ हराया.[17]

[पृ.87]: ताजखां बड़ा बलवान शासक हुआ. इसने खेतड़ी, खरकड़ा, बुहाना पर अधिकार किया और पाटन, रेवासा और आमेर को अपने वश में कर लिया. कछवाहे, निर्वाण, तंवर और पंवारों से उसने पेशकस ली. ताजखां की हिसार में मृत्यु संवत 1503 (1446 ई.) हुई. इसका भाई महमद खां हांसी में मरा.

References

  1. DasharathaSharma: Early Chauhan Dynastied (800-1316 AD), pp.365-366
  2. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, १९९८, पृ.41
  3. Burdak Gotra Ka Itihas
  4. बीकानेर का इतिहास: गौरीशंकर हीराचंद ओझा, पृ.113 पाद टिपण्णी
  5. नैणसी की ख्यात:मुंहनोत नैणसी पृ. 196
  6. वरदा वर्ष 3 अंक 4 शोध पत्रिका वर्ष 20 अंक 2; अरली चौहान डायनास्टी p.327-328; गोगाजी चौहान की राज.गाथा श्री चारण पृ.18
  7. रणकपुर शिलालेख विक्रम संवत 1496 (1439 ई.) पंक्ति 13
  8. चौहान गोगाजी की माँ बाछल दे पिता जीवराज - बाँकीदास ख्यात पृ. 142
  9. कयाम खां रासा p.16 ; मरुभारती वर्ष 16 अंक 4
  10. क्यामखां रासो, पृ.10-11 ; डॉ दशरथ शर्मा, वाही,पृ.327
  11. तारीखी फीरोजशाही, p.33
  12. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.100
  13. शेखावाटी प्रकाश - शास्त्री p.11
  14. कायमखां रासो, पृ. 18 भूमिका भाग दशरथ शर्मा पद्य 309 पृ. 26
  15. माधव वंश- जूंथा राम पृ.75
  16. चित्तोड़ का शिलालेख ब्लोक 51 , E.I.II.पृ.41
  17. "आलोडयासु सपादलक्षमखिलं जालान्धरान् कम्पयन् । ढिल्ली शंकितनायकां व्यरचयन्नादाय शाकम्भरी । पीरोजं स महामदं शरशतैरापात्य य: प्रोल्लसत् । कुंतव्रात निपात दीर्ण ह्रदयां तस्यवधीद् दंतिन:। Epigraphia Indiaca, Vol.21,p278; Kumbhalgarh Inscription 1460 AD

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