Shekhawati Ka Navin Itihas/13.Angreji Varchasv Aur Thikane
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Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998
रतन लाल मिश्र - शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन, मंडावा, झुंझुनू, राजस्थान, 1998
लक्ष्मण सिंह (1787-1833 ई.)
[पृ.185]: ईसवी उन्नीसवीं शती के प्रारंभ में देश में चारों ओर अशांति का वातावरण था. केन्द्रीय सत्ता की कमजोरी का लाभ उठाकर अनेक क्षेत्र स्वतंत्र हो गए थे. समाज विरोधी तत्व जगह-जगह लूट खसोट मचा रहे थे.
[पृ.186]: पिंडारियों एवं मराठाओं की लूटमार शेखावाटी की अराजकता पूर्ण स्थिति आदि से घबराकर सन 1818 में जयपुर ने अंग्रेजों से संधि कर ली. सरदारों से भी एक कराननामे पर हस्ताक्षर करा लिए गए थे.
शेखावाटी इस समय जयपुर राज्य में सबसे बड़ा अशांत क्षेत्र बना हुआ था. शासक जातियां आए दिन लूटमार करती और चोर तथा लुटेरों को संरक्षण प्रदान करती थी. जयपुर एजेंट एवं मेजर फॉरेस्टर द्वारा शेखावाटी के अनेकों सरदारों को लिखे गए पत्रों से ज्ञात होता है कि अंग्रेजों ने इस अशांति का मूल कारण शेखावाटी के सरदारों को माना था. [1] एक पत्र में चेतावनी दी गई थी कि अगर उन्होंने अपने
[पृ.187]: अपने क्षेत्र में शांति स्थापित नहीं की तो उनकी भी वही दिशा की जावेगी जो पिंडारियों की की गई थी.[2]
सीकर
पिछले अध्याय में राव देवी सिंह का वृत्त दिया जा चुका है. देवी सिंह की मृत्यु के उपरांत संवत 1852 (1795 ई.) में प्राय 8 वर्ष की अवस्था में लक्ष्मण सिंह राजगद्दी पर बैठा. सीकर के राजाओं में यह सबसे प्रतापशाली हुआ. इसने अपने राज्य की सीमा बढ़ाई, शत्रुओं को दंडित किया और जयपुर दरबार में बड़ा मान सम्मान पाया. कर्नल टॉड ने उसको दत्तक पुत्र लिखने की भूल की है. [3]
अपने पूर्वजों की तरह लक्ष्मण सिंह भी बराबर जयपुर दरबार के प्रति निस्ठावान बना रहा. महाराजा जगत सिंह ने सीकर ठिकाने की स्वामी भक्ति पर प्रसन्न होकर लक्ष्मण सिंह को राव राजा का खिताब दिया. [4] यह खिताब आषाढ़ बदी 12 संवत 1868 को दिया गया था.
लक्ष्मण सिंह की छोटी अवस्था होने के कारण राज कार्य इसकी माताजी देख रही थी. इस अवसर का लाभ उठाकर समर्थ सिंह के वंशज, भोजराज के वंशज तथा खंडेला के ठाकुरों ने महाराजा प्रताप सिंह से सीकर की शिकायत की. इस पर दीवान दौलत राम हल्दिया का भाई नंदराम सीकर पर चढ़ आया और उसने उदयपुर में डेरे किये. [5] भोजराज एवं गिरधर के वंशज भी इसके साथ हो गए क्योंकि यह राव देवी सिंह के समय से ही इनमें बैरभाव हो गया था.
इस सेना के आगमन का समाचार सुनकर कान्हलोत जी जी ने अपने दीवान धाबाई सूरजमल, जालिम सिंह, चंदावत, मेदसिंह परशुरामपुर आदि को नंदराम के पास एवं भैया वृंदावनदास को महाराजा जयपुर के पास भेजा. इधर सीकर में भी 10000 लोग रक्षा के लिए तत्पर हो गए. [6] टॉड के आधार पर नंदराम हल्दिया द्वारा बिना महाराज की स्वीकृति के दंड लेकर घेरा उठाने आदि की बात सीकर के इतिहास में कही गई है. [7] वह निराधार प्रतीत होती है. इसी प्रकार जोर्ज फ्रांसिस द्वारा
[पृ.188]: संवत 1858 में बलारा वालों की सहायता से फतेहपुर पर आक्रमण करने की बात कही गई है. [8] वस्तुत: यह जार्ज थॉमस का आक्रमण था जो सन 1799 के प्रारंभ में हुआ था. [9]
सीकर के चारों ओर स्थिति अशांत बनी हुई थी. लक्ष्मण सिंह ने सर्वप्रथम शाहपुरा के सरदार के विद्रोही होने पर उसे जा घेरा. तब मोहब्बत सिंह मारवाड़ में भाग गया. इसके बाद बठोठ पर हमला किया गया. उसने जालमसिंह मेदसिंह की जगह हुकम सिंह कारंगा और बुध सिंह सिंहासन वाले को राज काज में सहयोग देने हेतु नियत किया. लाड़खानियों को दंडित किया और कइयों को तोप से बांधकर उड़ा दिया गया.[10] इस प्रकार विद्रोहियों को दबाकर उसने सीकर के इलाके में शांति स्थापित की.
इस समय के आसपास सन 1803 में महाराजा प्रताप सिंह का देहांत हो गया था. जगत सिंह उसकी जगह गद्दी पर बैठा. लक्ष्मण सिंह का जगत सिंह से बराबर सद्भाव रहा. उधर जोधपुर में महाराजा मान सिंह गद्दी पर थे पर सरदारों से बराबर विरोध चल रहा था. सरदारों ने भीम सिंह की रानी को सगर्भा बताया और आगे चलकर उसके लड़के धोंकल सिंह को जोधपुर का वास्तविक हकदार घोषित कर दिया. इस प्रकार इस क्षेत्र में विद्रोह की आग भड़क उठी. सीकर के राव राजा की सहानुभूति धोकल सिंह के साथ थी. उसकी एक लड़ाई शाहपुर को लेकर मानसिंह से हो चुकी थी.
माधोवंश प्रकाश के लेखक का कथन है कि संवत 1863 में पोकरण का ठाकुर सवाई सिंह धोंकल सिंह को लेकर सीकर आया. उसने कहा कि झाड़ोद पट्टी के 57 गांव जो कायमखानी नवाबों के समय से ही जोधपुर के पास है आपको दे दिए जाएंगे अगर आप मदद करें. साथ ही दौलतपुर का परगना भी दिया जाएगा. धोंकल सिंह को आगे चलकर खेतड़ी पहुंचा दिया गया. उस समय खेतड़ी में अभय सिंह था. उसने धोंकल सिंह को सुदृढ़ गढ़ भोपालगढ़ में आश्रय दिया. [11]
उधर कृष्णाकुमारी के विवाह के प्रश्न को लेकर जयपुर और जोधपुर का आपस में वैमनस्य हो चुका था. इसी प्रश्न पर गिंगोली में एक लड़ाई हुई जिसमें प्राय 10000 शेखावतों ने भी भाग लिया. सीकर की फौज भी इसमें शामिल थी. धोंकल सिंह के भाग्य में जोधपुर नहीं लिखा था अतः सवाई सिंह आदि सरदारों की हत्या तथा अमीरखां के विश्वासघात के कारण सब कुछ मटियामेट हो गया.
लक्ष्मणगढ़ नगर बसाया
[पृ.188]: लक्ष्मण सिंह ने संवत 1862 (1805 ई.) में बेड़गांव की पहाड़ी पर गढ़ बनवाया और दो वर्ष बाद लक्ष्मणगढ़ नगर बसाया.
- मनसुख रणवां [12] ने अनुसंधान कर लेख किया है कि बेड़गांव पूर्व में मील जाटों की राजधानी रही है.
- मनसुख रणवां [13] ने आगे अनुसंधान कर लेख किया है ...[पृ.25]: राव राजा लक्ष्मण सिंह का विवाह है बीकानेर के पाटवी कंवर जय सिंह की पुत्री से हुआ. जय सिंह की पुत्री राठौर जी के नाम से विख्यात हुई. राठौड़ रानी से कुंवर प्रताप सिंह का जन्म हुआ. राव राजा की दूसरी रानी वीरा थी. राव राजा ने खेत में वीरा को काम करते देखा तो मोहित हो गया एवं उसे उठा लाया. वीरा की कोख से मुकुंदा, चिमन और हुकमा एवं पुत्री उदय पैदा हुए. कहते हैं कि रामबाक्स पालित पुत्र ईश्वर प्रदत्त था तथा भैरों सिंह राजपूत रानी से पैदा हुआ. वीरा रानी ने पैदा हुए पुत्रों ने आगे चलकर अंग्रेजों व राजपूत राजाओं की नींद हराम करदी.
- लक्ष्मणगढ़ कस्बा बसने के पीछे पासवानी रानी का हाथ रहा. रावराजा लक्ष्मण सिंह ने प्रेम-पास में फांसकर पासवानी लड़की से शादी कर ली. पाटवी रानी को यह शादी मंजूर नहीं थी. पाटवी रानी वह वीरा रानी के मध्य अनबन शुरू हो गई. राव राजा को रानियों के आपसी द्वेष की खबर लग गई.
- [पृ.26]: रानियों की खटपट मिटाने के लिए सीकर से 9 कोस उत्तर दिशा में बीहड़ रेगिस्तान में बेड़गांव की पहाड़ी पर सन 1805 में दुर्ग बनवाया व पूर्व में सुंदर नगर आबाद किया. इस किले पर लाखों रुपए खर्च किए. वीरा रानी इसी गढ़ में रहने लगी. राव राजा लक्ष्मण सिंह को भी गढ़ से बड़ा भारी लगाव था. पौष शुक्ल 14 संवत 1890 अर्थात् सन् 1833 को वीर, कुशल प्रशासक लक्ष्मण सिंह का स्वर्गवास हो गया. लक्ष्मण सिंह की अर्थी के साथ ही पासवानी रानी सती हो गई.
रतन लाल मिश्र ने लिखा है कि ...[पृ.188 ]: बीदावतों ने लूटमार मचा रखी थी रावराजा लक्ष्मण सिंह ने उन्हें दंडित किया गया. सलहदी के वंशज सीकर की भूमि में चोरी धाड़ा करते थे अतः लक्ष्मण सिंह ने
[पृ. 189]: उनके गांव खिरोड़, मूनवाड़ी, जाखल पर चढ़ाई की तथा संवत 1869 (1812 ई.) में खिरोड़ के गढ़ को क्रुद्ध होकर तुड़वा डाला.
[पृ.190]: कर्नल टॉड ने लक्ष्मण सिंह के वंश के वर्णन में कई भूलें की हैं जैसे राव तिरमल के पुत्र का नाम हरिसिंह लिखा है. चांदसिंह को सीकर का बसाने वाला बताया है. सीकर के गजेटियर में भी इन भूलों को दोहराया गया है.[14] राव राजा लक्ष्मणसिंह ने संवत 1884 (1827 ई.) में झुंझनूंवाटी पर हमला किया क्योंकि भोजराजजी से उसका वैरभाव चलता था. उस समय भोजराजके उदयपुर में एकत्रित हो रहे थे. माधोवंश प्रकाश में लिखा है कि इस पर भोजराज के वंशज भाग कर भोजगढ़ के गहरे नालों में छुप गए. मीरखां ने सवारों से नालों के मार्ग रुकवा दिए और छर्रों से भरी तोपें लगवा दी आगे चलकर उनसे फौज खर्च लेकर सेना लौट गई. [15]
संवत 1882 (1825 ई.) में जयपुर की सेना ने सीकर के कस्बे लक्ष्मणगढ़ को घेर लिया. इस सेना में खेतड़ी का कंवर बख्तावर सिंह भी अपनी जमीयत के साथ आया था. घेरा दिनानुदिन आगे बढ़ रहा था फिर फिर जयपुर के आदेश पर सेना हट गई. खेतड़ी वालों को पीछे हटते हुए सीकर के सरदारों ने खूब लूटा. उधर जयपुर की राजमाता के कहलाने पर लक्ष्मण सिंह ने खंडेला छोड़ दिया.
लक्ष्मण सिंह ने डूंडलोड को लूट लिया था, खिरोड़ को भ्रष्ट कर डाला था. आगे चलकर खेतड़ी वालों से उसका मेल मिलाप हुआ. संवत 1885 में जयपुर के बक्शी मन्नालाल के साथ राव राजा ने मंडावा घेर लिया था. यहीं पुत्र जन्म की खबर उसे मिली. इस पर आयोजित समारोह में संधि हो गई.[16]
संवत 1890 (1833 ई.) पोष सुदि 14 को 46 वर्ष की अवस्था में लक्ष्मणसिंह का देहांत हो गया. उसकी जगह उसका पुत्र राम प्रताप गद्दी पर बैठा. लक्ष्मण सिंह के समय में सीकर का क्षेत्र बढ़ाकर 500 गांवों से अधिक का हो गया था और इसका राजस्व 8,00,000 से प्रति वर्ष अधिक था.
लक्ष्मण सिंह के सात ठुकरानियां एवं आठ पासवान थी. दासियों से मुकुंद, हुकमा और चिमना नामक पुत्र और एक पुत्री थी. एक पोषित पुत्र राम बाक्स था. गद्दी पर बैठने के समय उसका पुत्र राम प्रताप सिर्फ 5 वर्ष का था. उधर जयपुर में राम सिंह भी अभी बाल्यावस्था में था.
[पृ.191]: राव राजा लक्ष्मण सिंह अपने जीवन काल में अपने तीन दासी पुत्रों को प्रतिवर्ष 60,000 की जागीर प्रदान कर दी थी जबकि प्रचलित प्रथा के अनुसार 5,000 से अधिक की जागीर उन्हें नहीं दी जा सकती थी. [17] राम प्रताप ने ब्रिटिश सरकार को शिकायत भेजी एवं काउंसिल ऑफ रीजेंसी से प्रार्थना की कि वह भूमि उसे वापस दिलवाई जाए. निदान जयपुर की सेना सीकर आई. इस सेना का मुकुंदजी और उनके भाइयों ने सामना किया. डूंगर सिंह ने, जो आगे चलकर कुख्यात धाड़ी हुआ, इस सेना का विरोध किया. अंत में दासी पुत्र भाग गए और चोरी धाड़ा करने लगे. [18]
डूंगर सिंह को आगरा की जेल में रखा गया और जोधपुर के एक व्यापारियों के काफिले को लूटने के कारण आजीवन कारावास का दंड मिला. [19] यह लूट अक्टूबर 1845 में हुई थी. 17 दिसंबर 1846 की रात को 11:00 बजे सीकर के कुछ क्रांतिकारियों (लोठू निठारवाल, करना मीणा) ने एवं राव राजा के दासी पुत्रों ने आगरा जेल पर आक्रमण किया और डूंगर सिंह को छुड़ाकर ले आए. उसका भाई बख्तावर सिंह भागते समय मर गया. [20]
- मनसुख रणवां ने 'अमर शहीद लोटू जाट' (2001) नामक पुस्तक में उस समय की राजनीतिक स्थिति, डूंगर सिंह के साथ लोठू जाट की दोस्ती, अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह, डूंगर सिंह को आगरा जेल से छूड़ाने के बारे में बड़ा रुचिकर और खोजपूर्ण विवरण दिया है. विस्तृत विवरण के लिए पढ़ें - लोठू निठारवाल
[पृ.191]: सब मिलकर पूरे जोर-शोर से लूटमार मचाने लगे. उन्होंने जोधपुर और बीकानेर के कई व्यापारियों को लूट लिया.
इन्होंने आगे चलकर नसीराबाद के ब्रिटिश खजाने पर धावा मारा और वहां से 25875 रुपए 11 आने लूटकर भाग गए. सीकर के इतिहास में यह राशि 52,000 बताई गई है. [21] ब्रिटिश सत्ता को यह एक ललकार थी. राव राजा सीकर को सदरलैंड ने लिखा कि जवाहरसिंह, डूंगरसिंह और मुकुंदसिंह के गांवों पर हमला करें. राव राजा को लूटी हुई राशि जमा कराने और लुटेरों की संपत्ति कुर्क करके इस राशि को वसूल करने के भी आदेश दिए गए.
प्रताप सिंह, भैरूसिंह, माधव सिंह
[पृ.191]: रामप्रताप की बाल्यावस्था में राजकाज उसकी माता चलाती थी. लुटेरे डूंगजी, जवाहर जी रामगढ़ के पोद्दारों से लूटकर ₹20000/- ले गए थे. शेखावाटी में इस निरंतर होने वाले उपद्रव, लूट-खसोट की जांच के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल लॉकेट को भेजा गया. [22] उसने शेखावाटी का दौरा कर सन 1821-32 में एक विस्तृत रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को दी थी. इसके परिणाम स्वरुप एक सेना नसीराबाद से आई. इसने सरदारों के गढ़ तोड़े, चोरों को गिरफ्तार किया और शेखावटी ब्रिगेड के नाम से प्रसिद्ध हुई. मेजर फॉरेस्टर इसका सेनापति था.
इसी समय समर्थ सिंह के वंशजों को दावा करने पर 11 गांव मिले. उन्होंने श्मायगढ़ को मुख्य स्थान बनाया. भैरुसिंह को 5000 वार्षिक की आमदनी के गांव दिए गए.
[पृ.192]: अंग्रेज शासकों से राव राजा का सद्भाव था एवं जयपुर नरेश से उसका प्रेमभाव बना हुआ था. संवत 1907 भाद्रपद शुक्ल 10-11 को इसका देहांत हुआ. इस समय के कुछ पूर्व में जयपुर तथा ब्रिटिश सत्ता के पारस्परिक संबंध कटु होते जा रहे थे. ब्रिटिश एजेंट शेखावाटी में हस्तक्षेप करने के लिए समुचित अवसर खोज रहे थे. सन 1829 में जी आर क्लार्क ने उन गढ़ों को तोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया जो शेखावाटी की प्रत्येक पहाड़ी पर अवस्थित थे.
[पृ.193]:रावराजा प्रताप सिंह के कोई पुत्र नहीं था. अतः उसके मरने पर उसकी माता ने अपने पुत्र वधू के सगर्भा होने की झूठी बात फैला दी. बाद में गवर्नर जनरल के एजेंट की सम्मति से भैरू सिंह सीकर की गद्दी पर बैठा. यह घटना भादवा संवत 1908 की है. इसने जोरावर सिंह लाड़खानी को मुख्य दीवान बनाया था. राव राजा की स्वयं की असावधानी से सर्वत्र अव्यवस्था फैल गई. जगह-जगह चोरी धाड़ों का जोर बढ़ने लगा.
भैरूसिंह (d.1865 ई):
जब अशांति चरम सीमा पर जा पहुंची तो हाई काउंसिल को शेखावाटी का मुन्तजिम मुकर्रर कर भेजा गया. उसने व्यवस्था की. मुकुंद जी खवासवाल को दीवान नियत किया गया. महाराज राम सिंह ने भैरूसिंह की मातमी का दस्तूर सांगानेर में किया था.
जब सन 1857 में देश में राजनीतिक क्रांति हुई तो भैरों सिंह ने ब्रिटिश सरकार की भरपूर मदद की. जिसके लिए इसे गवर्नर जनरल की ओर से खरीता और खिल्लत दी गई. सं. 1920 में जब जयपुर नरेश राम सिंह विवाहने को जोधपुर गया
[पृ.194]: मेडता के मुकाम पर भैरूसिंह भी बारात में सम्मिलित हो गया. इसने स्वयं कई शादियां बड़े घरानों में की थी. आगे चलकर भैरूसिंह असाध्याय रोग से ग्रसित हुआ तो इसने शिव सिंह के तीसरे पुत्र मेद सिंह की संतान में से ठाकुर बिडद सिंह सरवड़ी वाले के छोटे पुत्र माधव सिंह को अंकस्थ कर लिया. भैरू सिंह की मृत्यु चैत बदी 10 संवत 1922 (1865 ई.) में हुई.
माधव सिंह (r.1865- ई.)
भैरू सिंह की मृत्यु के बाद माधव सिंह सीकर की गद्दी पर बैठा. उसका राज्याभिषेक चैत्र शुक्ला 7 संवत 1923 (1865 ई.) को हुआ था. इसके छोटी अवस्था में होने के कारण राजकाज मुकुंद जी चलाता था. उन दिनों जयपुर, जोधपुर और बीकानेर की सीमा पर रहने वाले उपद्रवियों ने सिर उठाया और लूटमार करने लगे. इस पर सहायक एजेंट ने सुजानगढ़ में मुकाम किया.
रावराजा कल्याण सिंह का निर्वासन
[पृ.194]: माधव सिंह के कोई पुत्र नहीं था. अतः इसने अपने बड़े भाई विलायत सिंह के पुत्र कल्याण सिंह को गोद लिया. इसके समय में राज्य शासन में शिथिलता का आरोप
[पृ.195]: लगाकर जयपुर ने हस्तक्षेप किया. यह घटना सन 1938 की है. जयपुर की ओर से कैप्टन ए डब्ल्यू टी वेब सीकर का सीनियर अफसर होकर आया. जिसने किसानों पर अनेकों अत्याचार किया.
जयपुर से एक सेना सीकर में अप्रैल 1937 में आई. उधर एक विशाल जन समूह प्रतिरोध स्वरुप सीकर में एकत्रित हो गया. इस पर जयपुर नरेश ने कल्याण सिंह को शासन के अयोग्य घोषित कर दिया तथा सीकर को कोर्ट-आफ-वार्ड्स के नीचे ले लिया. [23] रावराजा कल्याण सिंह को निर्वासित कर आबू भेज दिया. इस मौके पर अंग्रेज रेजिडेंट लोथियन ने जयपुर का पक्ष लिया.
वायसराय को लिखने पर 1942 ई. की 15 अगस्त को कल्याण सिंह को वापस सीकर जाने की अनुमति मिली. कल्याण सिंह के पुत्र हरदयाल सिंह का विवाह नेपाल के राजा त्रिभुवन नरेश की पुत्री त्रैलोक्य राज्य लक्ष्मी के साथ हुआ था. हरदयाल सिंह की मृत्यु 1958 ई. (विक्रम 2015) में हो गई. युवरानी ने 1959 में सातड़ी के विक्रम सिंह को गोद लिया.
कल्याण सिंह के समय में शेखावाटी में खासकर सीकर में कृषक आंदोलन उग्र रूप से शुरू हुआ था. इसके समय में जयपुर महाराजा हरदयाल सिंह की विदेश यात्रा के प्रसंग में बड़ा विवाद हुआ था. कल्याण सिंह की मृत्यु 65 वर्ष की अवस्था में संवत 2024 (1967 ई.) में हुई. कल्याण सिंह धार्मिक वृत्ति का सरल हृदय व्यक्ति था. इसने सीकर में अनेकों सामाजिक संस्थाओं को सहयोग दिया. इसमें अपने पुत्र की विदेश यात्रा पर आपत्ति उठाने पर जयपुर राज्य की ओर से दिए गए अनेकों कष्टों को धैर्यपूर्वक सहन किया था.
रावराजा कल्याणसिंह के निर्वासन से वापसी और जाट बोर्डिंग सीकर
स्रोत: राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), प्रकाशक: कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर, संस्करण: 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, पृ.193-195
सीकर के रावराजा के निर्वासन के पश्चात् वहां शांति व्याप्त थी. इस दौरान एक दिलचस्प घटना घटी. झुंझुनू में छात्रावास की भूमि बिसाऊ ठाकुर ने दी थी. किन्तु सीकर में प्रयास करने के उपरांत भी जमीन नहीं मिल रही थी. गोठड़ा किसान समेलन में भी यह प्रकरण उठा था. लेकिन रावराजा के निर्वासन के बाद भूमि कौन दे यह समस्या हो गयी. रावराजा के बाहर रहने से रानी चिंतित थी. किसी ने उन्हें बताया कि यदि किसान पंचायत जयपुर दरबार को कह दे तो रावराजा की वापसी हो सकती है. रानी ने किसान पंचायत के नेताओं को बुलाया. उनके सामने इच्छा प्रकट की कि राजा को वापस बुलाया जाये. हरीसिंह बुरड़क पलथाना और ईश्वर सिंह भामू ने मांग रखी कि यदि सीकर दरबार छात्रावास के लिए भूखंड उपलब्ध करवादे तो पंचायत के नेता रावराजा को वापस लाने का प्रयास करेंगे. उन्होंने रेलवे स्टेशन के निकट भूमि चिन्हित कर रखी थी. सीकर रानी ने वादा किया कि रावराजा के आते ही छात्रावास के लिए जमीन देदी जाएगी. पंचायत के मुखियाओं ने जयपुर महाराजा को लिखकर दिया कि यदि यदि रावराजा को सीकर लाया जाता है तो उनको कोई ऐतराज नहीं है. सितम्बर 1942 में कल्याण सिंह फिर से रावराजा बनकर आ गए. (राजेन्द्र कसवा: पृ.193)
यह अश्चर्यजनक लगता है कि रावराजा के विरुद्ध संघर्ष करने वाले और उत्पीड़न सहने वाले ही उन्हें वापस ले आये. पंचायत के जाट नेताओं ने सोच समझ कर ही यह निर्णय किया था. असल में कल्याण सिंह अनपढ़ जरूर थे किन्तु वे साफ़ दिल व्यक्ति थे. छोटे ठिकानेदार ही उसे निर्दयी बनाए थे. राष्ट्रीय स्तर पर यह लगने लगा था कि देर-सबेर जागीरदारों को जाना ही होगा. अंग्रेज अधिकारियों और जयपुर रियासत ने बंदोबस्त करके कुछ हद तक सीकरवाटी के किसानों को संतुष्ट भी कर दिया था. (राजेन्द्र कसवा: पृ.194)
रावराजा के पुनः आने से सकारात्मक प्रभाव पड़ा. छात्रावास के लिए किसान पंचायत को भूमि आवंटित करने में विलम्ब नहीं हुआ. बसंत पंचमी , फ़रवरी 1943 में, सीकर बोर्डिंग हाऊस का शिलान्यास स्वयं रावराजा ने किया. उस अवसर पर हरीसिंह बुरड़क पलथाना, ईश्वर सिंह भामू भैरूपुरा, कालूराम सुंडा कूदन, कानाराम भूकर, डूंगाराम भामू, हरी राम भूकर गोठड़ा आदि किसान नेता उपस्थित थे. कल्याण सिंह ने 12 बीघा भूमि प्रदान की. यही नहीं रावराजा ने अपने पुत्र हरदयाल सिंह के नाम से एक कमरे की राशि भी दी. (राजेन्द्र कसवा: पृ.195)
सन्दर्भ
- ↑ मेजर फोरेस्टर एवं पोलिटिकल एजेंटों ने अनेक पत्र विभिन्न ठिकानों के सरदारों को लिखे थे जिनमें चोर धाड़ियों को पकड़ने , उन पर नियंत्रण करने आदि का आग्रह किया गया था. ऐसे पत्रों में मंडावा के माधो सिंह को लिखे पत्र बड़े महत्वपूर्ण हैं. ये मंडावा ठिकाने में प्राप्त हैं.
- ↑ मेजर थर्सबी का पत्र माधो सिंह मंडावा के नाम मंडावा ठिकाना का रिकार्ड
- ↑ James Todd Annals,p.632
- ↑ Chiefs of Leading Families in Rajputana, GOI Publication,p.64
- ↑ माधो प्रकाश पृ.120; सीकर का इतिहास - झाबरमल शर्मा, पृ.104
- ↑ माधो प्रकाश-जून्थारम,पृ.120
- ↑ सीकर का इतिहास - झाबरमल शर्मा, पृ.104-105
- ↑ सीकर का इतिहास - झाबरमल शर्मा, पृ.104-105
- ↑ The Military Memoirs of George Thomas- William Francklin European Free Booters- Lester Hutchinson, p.93-94
- ↑ मधोवंश प्रकाश,पृ.121; सीकर का इतिहास, पृ. 107
- ↑ सीकर का इतिहास पृ.109-कोलब्रुक पत्र ए. स्टर्लिंग मई-23, 1828
- ↑ मनसुख रणवां:अमर शहीद लोटू जाट, 2000, p. 12
- ↑ मनसुख रणवां:अमर शहीद लोटू जाट, 2001, p. 25-26
- ↑ देखें - सीकर गजेटियर इतिहास - भाग - राजस्थान सरकार प्रकाशन गजेटियर विभाग. इस गजेटियर में सीकर के इतिहास के सम्बन्ध में अनेकों भूलें हैं. गजेटियर जैसे प्रामाणिक माने जाने वाले प्रकाशन में इस प्रकार की भूलें वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण हैं.
- ↑ माधोप्रकाश -बक्षी जून्थाराम, पृ.133 - 34; सीकर का इतिहास - झाबरमल शर्मा,पृ.117
- ↑ माधोप्रकाश - बक्षी जून्थाराम, पृ.136
- ↑ कर्नल सदरलैंड का पत्र मेजर लुडलो, 5 अक्टूबर 1846
- ↑ कर्नल सदरलैंड का पत्र एफ क्यूरी, 17 अक्टूबर 1846
- ↑ कर्नल सदरलैंड का पत्र डब्ल्यू एडवार्ड, 1 जनवरी 1847
- ↑ सी सी जेक्शन मजिस्ट्रेट का पत्र लुडलो - 29 दिसंबर 1846
- ↑ Selection from the record of G.O.I. Foreign Department, No. L.T. Calcutta, 1868 p.47
- ↑ कर्नल सदरलैंड "राव राजा सीकर" 8 फ़रवरी 1848
- ↑ जयपुर राज्य का इतिहास - गहलोत पृ.189