Harsha Mandir
| Author: Laxman Burdak, IFS (R) |
- For more details see Harsh & Harsha Inscription

Location
Brief Introduction in English
Main article: English translation of Harsha Inscription of 961 AD
In a paper read before the Asiatic Society in 1835 Sergeant E. Dean delivered the inglorious epitaph to an extraordinary tenth-century Indian temple which he,along with Dr. G.E. Rankin had discovered previous year. This site is known as Harshagiri, near the village of Harasnath about 7 miles south of Sikar town. U.P. Shah in his article - "Some medieval Sculpture from Gujarat and Rajasthan" writes of the temple of Harshanatha, which was built in 956 AD and then of Sculpture from Harshagiri datable in c.961-973 AD and finally of the "Purana Mahadeva Temple at Harshagiri (c.961-973 AD). [1] Here is the Sanskrit text of Harsha Inscription of 961 - 973 AD as givan in the table right.
हर्ष मंदिर (Harshanath Temple)
हर्ष मंदिर राजस्थान में कला की दृष्टि से बहुत उन्नत श्रेणी का है. यह मंदिर रावली की पहाड़ियों पर 3000 फीट की ऊंचाई पर गर्वपूरक खड़ा है. मंदिर आज भग्न अवस्था में श्रीहीन हो चुका है पर जो कुछ बचा है वह इसकी महानता और उत्कृष्टता स्थापित करने में समर्थ है. यहाँ वि.सं. 1018 (961 ई.) एवं वि.सं. 1030 (973 ई.) का 48 पंक्ति का चौहानों का शिलालेख मिला था जो चौहान वंशावली, इस देवालय के निर्माण, अलंकरण, साधनों आदि की विस्तृत जानकारी देता है. यह मंदिर भग्नावस्था में है. यह स्थापत्य एवं मूर्ती कला के उत्तरी-भारत में सबल प्रतिनिधि होने के साथ-साथ चौहानों की यशोगाथा को मुखरित करता है. हर्ष मंदिर की मूर्तियाँ विश्व के अनेकों कला संग्रहों में मिलती हैं और सराही जाती हैं. मंदिर कुछ शतियों पूर्व भग्न हो गया था. आज पार्श्व की दीवारें टूटी हुई हैं जिन्हें पत्थरों से फिर जड़ दिया गया है. सभा मंडप एवं गर्भ गृह के कुछ भाग शेष हैं. [2]
कैप्टेन वेब (A.W.T. Webb लिखते हैं कि जब वे हर्ष के ब्राह्मण पुजारियों से मिले तो बताया गया कि यह गाँव विध्वंश कर दिया गया था और इसके निवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया जब औरंगजेब की सेना द्वारा सन् 1679 में मंदिर ध्वस्त किया गया था. जो मौत से बच गए उन्होंने हर्ष पर्वत की तलहटी में हर्ष का वर्तमान गाँव बसाया. इस मंदिर का सर्वनास सन 1679 में तब हुआ जब खानजहां बहादुर ने मुग़ल बादशाह औरंगजेब के आदेशानुसार या किसी तरह उस मूर्ती-भंजक स्वेच्छाचारी शासक को प्रसन्न करने के लिए मंदिर पर हमला कर हर्ष के मंदिरों को जमींदोज कर दिया और प्रत्येक मूर्ती और गढ़ाई के कार्य को विकृत कर दिया. कोई भी बड़ा टुकड़ा अछूता नहीं बचा. [3]
कैप्टेन वेब सीकर के प्रशासक 1934 से 1938 की अवधी में रहे हैं. हाल ही में उनके द्वारा अंग्रेजी में लिखे अभिलेखों का अनुवाद कर भगवान सिंह झाझड़िया ने 'सीकर की कहानी कैप्टेन वेब की ज़ुबानी' नामक पुस्तक 2009 में प्रकाशित किया है. इससे पता लगता है कि कैप्टेन वेब ने इस धरोहर को बचाने और सुरक्षित करने का काफी प्रयास किया. वेब ने भग्नावस्था में बिखरी पडी पुरासंपदा को सीकर में लाकर संग्रहालय में रखवाया.
कैप्टेन वेब हर्ष मंदिर के निरीक्षण के समय ध्वंश को देखकर इतने व्यथित हुए कि वे लिखते हैं कि तब मेरा क्रोध बचकानी ध्वंशात्मक प्रवृति के प्रतीक उनके मुस्लिम नौकर के प्रति जाग्रत हुआ और मैंने उसे, जितना बड़ा टुकड़ा मैं उठा सकता था, उसके हाथों में लाद दिया और उसके पूर्वजों के प्रति अपराध के लिए उसे आदेश दिया क़ि वह इसे पहाड़ी के नीचे ले जाए. बिना हिचक उसने हुक्म का पालन किया, केवल यह कहते हुए कि वह भी मूर्तिपूजा का समर्थन नहीं करता. [4]
कैप्टेन वेब द्वारा हर्ष मंदिर की कुछ सामग्री सन 1935 में सीकर ले जाई गयी थी. यहीं उनके प्रयत्न से एक म्यूजियम बना था जिसके अनेकों कमरे इस कला संसार से भरे हुए थे. हजारों दर्शक विस्मयविमुग्ध होकर इस सामग्री को देखते थे. आज ज्ञात नहीं यह कला संसार कहाँ विलुप्त हो गया. धन लोलुप लोगों ने इसे पश्चिमी देशों में पहुंचा दिया. यह कला का खजाना भारत से नेपाल होता हुआ आगे गया. सीकर के राव राजा का पुत्र हरदयाल नेपाल विवाह गया था. सीकर ठिकाना हर्ष की सामग्री पर अपना एकाधिकार मानता था. [5]
हर्ष का मंदिर पहाड़ पर बना है. हर्ष पहाड़ ऊपर जाकर समतल सा हो गया है. पहाड़ पर काफी समतल भाग छोड़कर पूर्वाभिमुखी मंदिर बनाया गया था. शिलालेख से ज्ञात होता है की चौहान नरेश सिंहराज ने इस पर स्वर्णकलश चढ़ाए थे (श्लोक:१८ - हेममारोपित येन शिवस्य भवनोपरि). देवालय को अनेक गाँव सेवा पूजा के लिए भेंट स्वरुप दिए गए थे (श्लोक: २५ - छत्रधारा वर ग्रामो द्वितीय: शंकराणक:). शिलालेख में इस मंदिर को चंद्रांक शैल पर स्थित, उतुंग श्रृंग एवं पशुपति के सद्विमान बताया गया है. शिला लेख के अंत में हर्षदेव के भवन के चिर स्थायित्व के लिए शुभ कामना प्रकट की है. हर्म्य निर्माण काल 1013 वि.स. (956 ई.) दिया है. [6]
मंदिर के स्तंभों का मध्य भाग बेलबूंटों से अलंकृत था. स्तम्भ के उपरी भाग में छत के आसन गन्धर्व, यक्ष और अप्सराओं की मूर्तियों से मंडित थे. मुख्य शिखर निश्चय ही भूमि से 100 फीट के ऊपर रहा होगा इस तरह का अनुमान असंगत नहीं है. इसके तोरण द्वार के पास सुघटित नंदी था. मंदिर के बाहर आज भी नन्दीश्वर की मूर्ती विराजमान है. गर्भ गृह का कुछ भाग बचा है जिसमें छत के भीतरी भाग में लगी दीर्घाकार सुन्दर कलात्मक सुर सुंदरियों की प्रतिमाओं में से कुछ शेष हैं. इसके उन्नत और चारू तोरण द्वार पर सर्व देवों की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित की गयी थीं यह बात हर्ष सिला लेख से ज्ञात होती है. इस मंदिर का सूत्रधार वीरभद्र का पुत्र चंडशिव था. (वीरभद्र सुत: ख्यात: सूत्रधारो प्रचण्डशिव: विश्वकर्मेव सर्वज्ञो वास्तु विद्या विशारद:।। - हर्ष शिलालेख) [7]
हर्ष मंदिर की अनेकों मूर्तियाँ राजपूताना संग्रहालय नई दिल्ली में हैं. संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के क्लीव लैंड म्यूजियम आफ आर्ट में हर्ष मंदिर की मूर्तियाँ हैं. अमेरिका के नेल्सन एटकिन्स गैलरी, फिलाडेल्फिया म्यूजियम आफ आर्ट में भी कई मूर्तियाँ विद्यमान हैं. पेरिस के रोवर्ट रूसों के निजी संग्रह में भी हर्ष की मूर्तियाँ हैं. अजमेर म्यूजियम में अनेक फलक हैं. [8]
हर्ष की मूर्तियों को देखने से ज्ञात होता है की इनमे लौकिक और धार्मिक दोनों विषयों से सम्बंधित मूर्तियाँ परिलक्षित होती हैं. लोकिक विषयों में नर्तक-नाटकी, गायक-गायोकाएं, योद्धा, हाथी, सामान्य सैनिक, अप्सराएँ, शाल-भंजिकाएं, दासियाँ आदि की कला पूर्ण मूस्तियाँ हैं. दैविक विषयों में अनेक रूपों में विष्णु, इन्द्र, शिव, शक्ति, गणेश, कुबेर आदि मनोरम प्रतिमान हैं. मूर्तियों की संख्याधिख्य को देखकर विस्मय होता है. [9]
अजमेर म्यूजियम में अनेक फलक हैं. अमेरिका के नेल्सन एटकिन्स गैलरी में एक विशाल प्रतिमा फलक है जिसके मध्य में विशाल नन्दीश्वर पर उमा-महादेव प्रतिष्ठित हैं. शिव के हाथों में त्रिशूल व शर्प, नीचे दाहिने हाथ में कमल, तथा बांया हाथ गौरी के वक्ष पर है. जटा-जूट युक्त शिव के मस्तक पर खुला त्रिनेत्र और वक्षस्थल पर श्रीवत्स लांछन है. शिव की गोदी में बैठी पार्वती का दाहिना हाथ शिव के गले में है. सुसज्जित केश-पाश है. बाँई और एक स्त्री पुष्पमाल लिए हुए तथा उसके पार्श्व में नृत्यरत एक पुरुषाकृति है. शिव के दाहिने और एक शैव साधू यज्ञोपवित एवं कोपीनयुक्त दर्शाया गया है. इसके हाथ में जलपात्र है. यह नृत्य की मुद्रा में है. पार्श्व में नृत्यरत दूसरी आकृतियाँ हैं. [10]
उपर्युक्त वर्णित स्थानों के अलावा हर्ष मंदिर की मूर्तियाँ स्थानीय देवालयों में बिखरी पड़ी हैं. इनमें से कुछ हर्ष पर्वत के नीचे भैंरूजी के मंदिर में, कुछ देवनारायण मंदिर में, शिवालय में तथा कुछ देवजी के मंदिर में हैं. भैंरूजी के मंदिर में एक लाल शिला फलक है जिसकी चौड़ाई 34" तथा ऊंचाई 49" है. यह पद्मासनस्थ बडूक भैरव हैं. पार्श्व भागों में उपासिकाएं हैं. हर एक के ऊपर तीन लघु प्रतिमाएं हैं. ऊपर के कोनों पर चामरयुक्त गज प्रदर्शित हैं. वर्त्तमान भग्न देवालय में भी कुछ सुन्दर प्रतिमाएं हैं जिनमें अधिकांस निज मंदिर की भीतरी छत पर वर्गाकार रूप में संलग्न हैं. भग्न देवालय के आसपास कुछ वर्षों पूर्व तक मूर्तियाँ बिखरी पड़ी थी. [11]
हर्ष महादेव के भग्न मंदिर की कुछ मूर्तियों के विवरण भी अपेक्षित हैं. श्वेत प्रस्तर से निर्मित नन्दीश्वर आज भी अपने स्थान पर है. गले में छोटी-छोटी घंटियों की माला है. मूर्ती के कुछ अंग भग्न हैं. इसकी लम्बाई 62 " चौडाई 29 " एवं ऊँचाई 40 " है. सामने एक नांद जैसी वस्तु है. अपनी विशालता और अंग सौष्ठव के करण यह मूर्ती प्रभावित करती है. विभिन्न आभूषणों से आभूषित एक नारी मूर्ती है जिसकी ऊँचाई 68 " एवं चौडाई 19 " है. अनेक अंगों पर आभूषण हैं तथा नयनाभिराम केश-पास है. झूलता हुआ दुकूल अंग यष्टि पर दिखाया गया है. [12] मिथुन चित्र: 10-11 वीं शती ई. में बने अनेक प्रसिद्द मंदिरों की तरह नग्न नारी मूर्तियाँ एवं मिथुन चित्र भी हर्ष मंदिर में थे. आज भी कुछ नग्न मानव प्रतिमाएं शेष हैं जो इस धारणा की पुष्टि करते हैं. मैथुन चित्र उस समय के देवालयों के एक अंग रहे हैं. विद्वानों ने देवालयों में नग्न चित्रों के होने के सम्बन्ध में अनेक मत व्यक्त किये हैं. एक जन प्रचलित विश्वास यह है की मिथुन चित्रों के करण मंदिर की बज्रपात जैसी प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा होती है. दूसरे मत के अनुसार ऐसे दृश्य पुरुष और प्रकृति के रहस्य मिलन के प्रतिसक्षी हैं. ये तांत्रिक विचारधारा के विकास के अभिन्न अंग बन गए थे. एक संभावना यह भी व्यक्त की गयी है क़ि उस समय तांत्रिक सिद्धांत बड़े प्रबल थे. कौल और कापालिक और सोम सिद्धान्तिनों का प्राबल्य था. अत: मिथुन चित्र आवश्यक हो गए थे. कुछ मिथुन चित्र कामयोगिक पद्धतियों के निर्दर्शन के रूप में हैं. [13]
हर्षनाथ के मंदिर की प्रशस्ति 973 ई.
डॉ गोपीनाथ शर्मा [14] लिखते हैं कि यह प्रशस्ति शेखावाटी के प्रसिद्द हर्षनाथ के मंदिर की वि.सं. 1030 आषाढ़ सुदी 15 की है. उक्त मंदिर का निर्माण अल्लट द्वारा किया गया था. यह प्रशस्ति साम्भर के चौहान राजा विग्रहराज के समय की है. इससे चौहानों के वंशक्रम तथा उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश पड़ता है. इस वंश के शासकों के नाम इस प्रकार हैं -
- गुवक प्रथम (हर्ष शिलालेख: L-12,V-13)
- चन्द्रराज द्वितीय (हर्ष शिलालेख: L-13,V-14)
- गुवक द्वितीय (हर्ष शिलालेख: L-13,V-14)
- चन्दनराज (हर्ष शिलालेख: L-13,V-14)
- वाक्पतिराज प्रथम (हर्ष शिलालेख: L-14,V-15)
- सिंहराज (हर्ष शिलालेख: L-16,V-17)
- विग्रहराज द्वितीय (हर्ष शिलालेख: L-18,V-20)
- दुर्लभराज द्वितीय (हर्ष शिलालेख: L-21,V-26)
इसमें बागड़ के लिए बार्गट शब्द का प्रयोग किया गया है. इसमें विग्रहराज के पिता सिंहराज के सम्बन्ध में लिखा है कि उसने सेनापति की हैसियत से उद्धत तोमर नायक सलवन को मारा या परास्त किया. युद्ध में उसने अनेक राजाओं को कैद किया और उन्हें तब तक नहीं छोड़ा जब तक पृथ्वी के चक्रवर्ती रघुवंशी राजा स्वयं वहां न आये. सिंहराज की सेनापति की स्थिति तथा रघुवंशी राजा के आने तक शत्रुओं को नहीं छोड़ना उसका किसी का सामंत होना व्यक्त करता है. उस समय रघुवंशी शक्तिशाली शासक कन्नोज का राजा प्रतिहार देवपाल था. सिंहराज इसी देवपाल का सामंत हो सकता है.
हर्ष शिलालेख वर्ष 973 में वर्णित गाँवों की सूची
हर्ष शिलालेख वर्ष 973 की लाइन 34 -39 में उन गाँवों के नाम आये हैं जिन्हें विभिन्न शासकों या उनके सरदारों ने अपने नियंत्रित क्षेत्र से हर्षदेव को चढ़ाये. ये क्षेत्र हर्षदेव के आस-पास ही स्थित हैं. इन गाँवों की पहचान की गयी हैं. विस्तृत सूची यहाँ देखें - हर्ष शिलालेख
हर्ष मंदिर - समकालीन इतिहास
रतन लाल मिश्र[15] ने लिखा है...[p.28]: सं 885 में प्रतिहार राजा भोज की मृत्यु के पश्चात प्रतिहारों का विशाल साम्राज्य कमजोर शासकों के करण छिन्न-भिन्न हो गया. अनेक प्रांतीय शासक सर उठाने लगे. गजनवी के आक्रमण के समय कन्नौज में प्रतिहारों का राज था. चौहान प्रतिहारों के सामंत थे. वे अनंत नाम से विख्यात शेखावाटी एवं उसके भूभागों पर शासन करते थे. हर्ष के शिलालेख वि. 1030 (973 ई.) से ज्ञात होता है कि इस भूभाग पर चौहानों का अधिकार था. संभवत: १० वीं शती के अंत में प्रतिहारों के निर्बल पड़ने पर वे स्वतंत्र हो गए थे और इस भूभाग पर प्रभुता संपन्न शक्ति के रूप में शासन करते थे. शाकम्भरी उनकी राजधानी थी.
चौहान गूवक प्रथम नागभट्ट द्वीतीय का सरदार था. [16] वह बड़ा प्रतापी राजा था. इसने अरबों के आक्रमण को विफल कर उन्हें वापस खदेड़ दिया था. इस कुल में आगे चलकर चन्द्रराज द्वीतीय, गूवक द्वीतीय और चन्दन हुए जिसने तोमरराज रुद्रेन को मारा. वाक्पतिराज (925 ई.) ने तंत्रपाल को अनंत गोचर जाते हुए तंग किया. यह उसके प्रतिहारों से स्वतंत्र होने का द्योतक था. [17] इस कुल में सिंहराज, विग्रहराज, लक्षमण हुए. लक्ष्मण ने नाडोल शाखा का श्रीगणेश किया. सिंहराज ने गद्दी पर बैठने के बाद तोमर सलवन को हराया. उसने महाराजाधिराज की पदवी धारण की. उसके पूर्व सभी राजा केवल महाराज उपाधि रखते थे. उसके समय में हर्ष का मंदिर ई.956 में बना.
[p.29]: विग्रहराज द्वीतीय (973 ई.) भी बड़ा प्रबल शासक था. इसने गुजरात पर हमला किया और नर्मदा तक बढा. इसके बाद दुर्लभराज ने शासन संभाला (999 ई.) इसके राज्य में पर्वतसर जोधपुर के क्षेत्र सम्मिलित थे. उसने सीकर तक के प्रदेश पर अधिकार कर लिया. [18] उसके राज्य की सीमा उत्तर में सीकर, पूर्व में जयपुर, दक्षिण में पुष्कर, और पश्चिम में पर्वतसर तक थी.[19] चौहान नरेश पृथ्वीराज तृतीय के सन 1192 में मुहम्मदगोरी से हार जाने के करण चौहान शक्ति को बड़ा धक्का लगा. शेखावाटी प्रदेश में फिर भी इस वंश का शासन अधिकाँश भूभाग पर प्राय: 15वीं शती तक चलता रहा. [20] शेखावाटी के कुछ भाग पर 15वीं शती के अंत में शेखावत वंश का अधिकार हुआ था. 16वीं शती में पठानों, कायम ख्यानियों और शेखावतों का विभिन्न समय पर सामना करना पडा. बिना किसी केन्द्रीय शक्ति के सहारे के करण चौहान वंश के शासकों के ये लघु राज्य कालांतर में नाम-शेष हो गए. [21]
चौहानों कीतरह तंवर भी प्रतिहारों के सामंत थे और शाकम्भरी के चौहानों के पडौसी थे. उस समय हर वंश के पास औसत रूप से 84 गाँव होते थे जो उसे सामंत होने के करण मुख्यशक्ति से प्राप्त होते थे. तोमरों का राज्य भी विस्तृत था. यह वर्तमान हरियाणा क्षेत्र में फैला हुआ था. कभी ढिल्लीका इसी वंश की राजधानी थी. परंपरा के अनुसार इन्होने 736 ई. में दिल्ली की स्थापना की थी. प्रतिहार भोज के समय में तोमर बज्रट (850 ई.) बड़ा शक्तिशाली सरदार था. गोग्गा भूनाथ महेन्द्रपाल प्रथम का समकालीन था. प्रतिहारों की शक्ति कमजोर पड़ने से उसके सामंत आपस में झगड़ने लगे. चौहान चन्दन द्वारा तोमर रुद्रेन मारा गया था तथा सिंहराज ने सलवन को हराया था. तोमर फिर भी 1150 ई. तक वर्तमान हरयाणा और उसके आगे के काल में बराबर तोरावाटी में शासन करते रहे. इन्हें आगे चलकर शेखावतों के हमलों का सामना करना पड़ा. विग्रहराज तृतीय ने हरियाणा में तंवारों के राज्य पर आक्रमण कर उन्हें छिन्न-भिन्न कर दिया. चौहान-तोमर संघर्ष का मुख्य स्थल शेखावाटी का भूभाग रहा. ऐसा प्रतीत होता है कि चौहानों ने तंवारों को शेखावाटी के भूभाग से दक्षिण-पूर्व में हटने को बाध्य कर दिया. शेखावाटी के नरहड़ कसबे के एक शिलालेख द्वारा चौहान विग्रहराज के अधिकार की बात ज्ञात होती है. इस शिलालेख में विग्रह राज को महा-भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर विग्रह राजदेव कहा गया है. इस प्रकार अपने प्रतिद्वंदी तंवारों को शेखावाटी से खदेड़ कर चौहान वर्तमान शेखावाटी के सारे भूभाग पर छा गए थे.
सिद्धसेनसूरी की वि. सं. 1123 (1066 ई.) में रचित सर्वतीर्थमाला में अपभ्रंश कथाग्रन्थ 'विलासवर्दूकहां' में झुंझुनू के साथ-साथ खण्डिल्ल, नराणा, हरसऊद (Harsh) और खट्टउसूस (खाटू) के नाम आये हैं। इससे इसकी उपस्थिति विक्रम की 12 वीं शती में भी ज्ञात होती है।[22]
हर्ष मंदिर - स्थापत्य कला
रतन लाल मिश्र[23] ने लिखा है...[पृ. 273]: शेखावाटी के क्षेत्र में वास्तु कलाकार क्रमिक विकास हुआ. 20वीं सदी ईस्वी से लेकर आगे के काल तक इस कला की विभिन्न प्रतिनिधि भवनों, मंदिरों, स्मारकों का निर्माण हुआ है. शेखावाटी का ही नहीं अपितु राजस्थान का कला की दृष्टि से बहुत उन्नत हर्ष का प्रसिद्द शिव मंदिर है जो प्रायः 3000 फीट ऊंची अरावली की पंक्तियों पर गर्वपूर्वक खड़ा है. मंदिर आज भगन अवस्था में श्रीहीन हो चुका है. पर जो कुछ बचा है वह इसकी महानता और कलात्मक उत्कृष्टता स्थापित करने में समर्थ
[पृ.274]: यहां पर चौहानों के शासनकाल में एक विशाल देवालय बनाया गया था. यहां विक्रम संवत 1030 (973 ई.) का 48 पंक्तियों का एक शिलालेख है. इस शिलालेख से इस देवालय के निर्माण, अलंकरण, साधनों आदि की विस्तृत जानकारी मिलती है. यह मंदिर भग्नावस्था में है. यह स्थापत्य एवं मूर्ति कला के उत्तरी भारत में सफल प्रतिनिधि होने के साथ-साथ चौहानों की यशोगाथा को मुखरित करता है. हर्ष मंदिर की मूर्तियां विश्व के अनेकों कला संग्रहों में मिलती हैं और सरारी जाती हैं.
मंदिर कुछ सदियों पूर्व भग्न हो गया था. यह देवी प्रकोप के कारण हुआ या विधर्मी शासकों की मूर्ति भंजकता का परिणाम था कुछ भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है. आज पार्श्व की दीवारें टूटी हुई हैं जिन्हें पत्थरों से फिर से जड़ दिया गया है. सभा मंडप एवं गर्भ गृह के कुछ भाग शेष बचे हैं.
मंदिर की कुछ सामग्री सन 1935 में कैप्टन वेब द्वारा सीकर ले जायी गयी थी. यही उनके प्रयत्न से एक म्यूजियम बना था जिसके अनेकों कमरे इस कला संसार से भरे हुए थे. हजारों दर्शक विस्मयविमुग्ध होकर इस सामग्री को देखते थे. आज ज्ञात नहीं यह कला संसार कहां विलुप्त हो गया. धन लोलुप व्यक्तियों ने इसे पश्चिमी देशों में पहुंचा दिया. यह कला का खजाना भारत से नेपाल होता हुआ आगे गया. सीकर के राव राजा का पुत्र हरदयाल नेपाल विवाहा गया था. सीकर ठिकाना हर्ष की सामग्री पर अपना एकाधिकार मानता था.
जैसा कि ऊपर कहा गया है हर्ष देव का यह मंदिर हर्ष पहाड़ पर बना है जो सीकर से प्राय: 6 मील दक्षिण में है. पहाड़ का शीर्ष भाग ऊपर जाकर समतल सा हो गया है. पहाड़ का काफी समतल भाग छोड़कर पूर्वाभिमुखी मंदिर बनाया गया था. शिलालेख से ज्ञात होता है कि चौहान नरेश सिंहराज ने इस पर स्वर्ण कलश चढ़ाये थे. [24] (हेममारोपितंयेन शिवस्यभवनोपरि) देवालय को अनेकों गांव सेवा पूजा के लिए भेंट स्वरूप दिए गए थे.[25] (छात्रधारा वरग्रामो द्वितीय: शंकराणक:) शिलालेख में इस मंदिर को चंद्रांक शैल पर स्थित, उतुंग श्रुंग एवं पशुपति के सद्विमान के समान बताया गया है. शिलालेख के अंत में हर्ष देव के भवन के स्थायित्व के लिए शुभकामनाएं प्रकट की गई है. हर्म्य निर्माण काल 1013 विक्रम (956 ई.) दिया है.
शिलालेख के इस वर्णन से मंदिर की महिमा की जानकारी होती है पर इसके वास्तविक स्वरूप की जानकारी नहीं होती. यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि क्या यह पंचायतन अथवा सप्तरथ पद्धति पर बना हुआ था. इसकी ऊंचाई सप्तांग पद्धति की थी या किसी दूसरी पद्धति की थी. गर्भगृह अंतराल, मंडप और अर्ध मंडपों की पूर्व स्थिति किस प्रकार की थी. क्या यह सांधार या निरंधार (प्रदक्षिणापथ सहित या रहित)
[पृ.275]: था. शिखरों अथवा अंग शिखरों के निर्माण की कौन सी पद्धति काम में ली गई थी. आमलक और कलशों के निर्माण पद्धति क्या थी.
भग्न मंदिर के पुनर्रुपायन के प्रयत्न वस्तुतः दयनीय हैं. बिखरी शिलाएं पार्श्व भाग में एक दूसरे के ऊपर रखकर पार्श्व भागों को पूरा कर दिया गया है. आगे वाले भाग में भी प्राचीन स्तंभों को खड़ा करके उन पर शिलाएं रख दी गई है. इनमें कहीं भी चुने आदि का प्रयोग नहीं किया गया. कलापूर्ण कुछ प्रतिमाएं दीवार के सहारे से खड़ी कर दी गई है.
यह अतीव विस्मयकारी बात है कि विक्रम की 18वीं सदी के अर्धांश के बाद सीकर के राव शिव सिंह ने नया मंदिर बनाया पर हर्ष पर्वत पर बिखरे इस कला संसार की पुनर्प्रतिष्ठा की ओर उसका ध्यान नहीं गया. यह मानने के कारण विद्यमान हैं कि मंदिर उस समय तक भग्न हो गया था.
हर्ष मंदिर का जो कुछ भाग बचा है उसे देखकर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. प्राचीन शिखर बंद मंदिरों की शैली पर बनने वाला यह देवालय उन्नत अधिष्ठान पर निर्मित हुआ था. इसमें अर्द्ध मंडप और मुख्य मंडपों की व्यवस्था थी [26] जिनके अंतर भाग विशेष कर पार्श्व भाग के ताकों में सुंदर मूर्तियां प्रस्थापित थी. मंडपों के अपने शिखर और आमलक थे जिनकी ऊंचाई क्रमशः अधिक होती चली गई थी. इससे निर्माण का सौष्ठव प्रकट होता था. मंडपों के पार्श्व भाग पर बहिर्निसृत कोणकों वाले शब्दों की व्यवस्था थी. जिनके नीचे के स्तंभों पर सुंदर अलंकरण किया गया था.
मंदिर के स्तंभों का मध्य भाग बेल बूटों से अलंकृत था. स्तंभ के ऊपरी भाग में छत के आसन गंधर्व, यक्ष और अप्सराओं की मूर्तियों से मंडित थे. स्तंभों में अत्यधिक अलंकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है. मंदिर के शिखर की ऊंचाई का अनुमान लगाया जा सकता है. मंदिर के अवशिष्ट भागों से इस अनुमान में सहायता मिलती है. मुख्य शिखर निश्चय ही भूमि से 100 फीट के ऊपर होगा इस तरह का अनुमान असंगत नहीं है.
इसके तोरण द्वार के पास सुगठित नंदी था. मंदिर के बाहर आज भी नंदीश्वर की भव्य मूर्ति विराजमान है [27] जो कुमार संभव में महाकवि द्वारा वर्णित नंदी के स्वरूप का स्मरण कराती है. गर्भ गृह का कुछ भाग बचा है जिसमें छत के भीतरी भाग में लगी दीर्घाकार सुंदर कलात्मक सुर सुंदरियों की प्रतिमाओं में से कुछ शेष हैं.
इसके उन्नत और चारू तोरण द्वार पर सर्वदेवों की मूर्तियां प्रतिष्ठित की गई थी. यह बात भी हर्ष शिलालेख से ज्ञात होती है. [28] इस मंदिर का सूत्रधार वीरभद्र का पुत्र चंडशिव था. मूर्तिकार का नाम यद्यपि नहीं है पर सूत्रधार में मूर्तिकार भी समाहित है.
[पृ. 276]: स्थापत्य की दृष्टि से हर्षनाथ का यह विवरण मूलतः प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित है.
हर्ष मंदिर - मूर्ति कला
रतन लाल मिश्र[29] ने लिखा है...[पृ.282]: मूर्ति कला के इस क्रमिक विकास के संक्षिप्त सर्वेक्षण के पश्चात शेखावाटी की मूर्ति कला के उल्लेख अपेक्षित हैं. मूर्ति कला के अजस्र कोष के रूप में पुन: हर्ष मंदिर की ओर दृष्टिपात करना पड़ता है. जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है यह मंदिर आज भाग्नावस्था में है तथा इसका अधिकांश कला संभार विश्व के अनेक निजी कला संग्रहों में किसी न किसी प्रकार पहुंच गया है. कैप्टन वेब के समय सीकर स्थित महामंदिर में एक सुंदर बाग में मध्य भाग में एक विस्तृत भवन के अनेकों कक्ष इस कला कोष से भरे हुए थे पर अब सब कुछ खो गया है.
हर्ष शिलालेख से मंदिर के स्थापत्य और मूर्तियों के संबंध में उल्लेखनीय जानकारी मिलती है. इस मंदिर के तोरण द्वारों में सर्व देवों की मूर्तियां प्रतिष्ठित थी और इसके पास ही सुगठित वृषभ था जो आज भी भगन समृद्धि का मुख्य साक्षी बना विद्यमान है.
हर्ष मंदिर की अनेक मूर्तियां राजपूताना संग्रहालय नई दिल्ली में है. संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के क्लीव लैंड म्यूजियम आफ आर्ट्स में हर्ष मंदिर की मूर्तियां हैं. अमेरिका के नेल्सन एटकिंस गैलरी फिलाडेल्फिया म्यूजियम आफ आर्ट में कई मूर्तियां विद्यमान हैं. पेरिस के रॉबर्ट रूसो के निजी संग्रह में भी हर्ष की मूर्तियां हैं.
हर्ष की मूर्तियों को देखने से ज्ञात होता है कि इनमें लौकिक और धार्मिक दोनों विषयों से संबंधित मूर्तियां परिलक्षित होती हैं. लौकिक विषयों में नर्तक-नर्तकी , गायक-गायिकाएं, योद्धा, हाथी, सामान्य सैनिक अप्सरायें, सालभंजिकाएं, दासियां आदि की कलापूर्ण मूर्तियां हैं. दैविक विषयों में अनेक रूपों में विष्णु, इंद्र, शिव, शक्ति, गणेश, कुबेर आदि के मनोरम प्रतिमान हैं. मूर्तियों की संख्याधिक्य को देखकर विस्मय होता है.
अजमेर म्यूजियम में अनेक फलक हैं. एक फलक में नर्तक, गायक, हाथी और योद्धाओं का चित्रण है. एक फलक में मत्तगजों की दो पंक्तियां हैं. यह फलक निश्चय ही मंदिर के बहिपार्श्व के अलंकरण में उपयुक्त हुआ होगा.[30] इसी स्थान पर विष्णु की रम्य मूर्ति है जिसमें विष्णु नर्तकों एवं गायकों से परिवृत दर्शाए गए हैं. शेषशायी के रूप में, हरि के रूप में तथा अष्टभुजी रूप में विष्णु की अनेक मूर्तियां हैं. एक मूर्ति में विष्णु को वराह एवं सिंह के अतिरिक्त मुख्य हैं. एक फलक में विष्णु चक्र संरक्षकों द्वारा परिरक्षित दिखाया गया है. [31]
इन मूर्तियों के अतिरिक्त पांडवनृत्यरत भगवान शिव को अन्य नर्तकों के साथ दिखाया गया है. आलिंगन की मुद्रा में नंदीश्वर पर शिव पार्वती तथा हाथ में वज्र लिए हुए इंद्र एक अन्य फलक पर चित्रित हैं.[32] अनेक देवों के वामकंध पर धनुष
[पृ.283]: और हाथ में बाण दिखाएं गए हैं. एक फलक में सूर्य, ब्रह्मा, विष्णु और शिव एक साथ दिखाए गए हैं. समुत्थित लिंग वाले लकुलीश, हरिहर, नवगृह, सूर्य, अश्वरूढ रेवंत की मूर्तियां हैं. एक फलक में ब्रह्मा और प्रस्तर स्वरूपी शिवलिंग को नापने का प्रयास करते दिखाए गए हैं. एक फलक में सूर्य की तेजस्वी मूर्ति है जो कला पारखियों द्वारा कला की श्रेष्ठ धरोहर मानी जाती है. [33]
ऊपर के वृत्त में उन मूर्तियों में से कुछ का संक्षिप्त उल्लेख है जो अजमेर या दिल्ली म्यूजियम में हैं. जैसा कि कहा गया है कि विदेशों में भी हर्ष मंदिर की अनेकों मूर्तियां हैं. इनमें से कुछ का वर्णन अभीष्ट है. अमेरिका के नेल्सन एटकिंस गैलरी में एक विशाल प्रतिमा फलक है जिसके मध्य में विशाल नन्दीश्वर पर उमा महादेव प्रतिष्ठित हैंव्. शिव के हाथों में त्रिशूल व सर्प, नीचे दाएं हाथ में कमल तथा बायां हाथ गोरी के वक्ष पर है. जटाजूट युक्त शिव के मस्तक पर खुला त्रिनेत्र और वक्ष स्थल पर श्रीवत्स लांछन है. शिव की गोदी में बैठी पार्वती का दाहिना हाथ शिव के गले में है. सुसज्जित केशपाश हैं. बैई ओर एक स्त्री पुष्प माल लिए हुए तथा उसके पार्श्व में नृत्यरत पुरुष आकृति है. शिव के दाहिनी और एक शैव यज्ञोपवित एवं कोपीन युक्त दर्शाया गया है. इसके हाथ में जल पात्र है. यह नृत्य की मुद्रा में है. पार्श्व में नृत्यरत दूसरी आकृतियां हैं.
उपयुक्त वर्णित स्थान के अलावा हर्ष मंदिर की कुछ प्रतिमाएं स्थानीय देवालयों में बिखर गई हैं. इनमें से कुछ हर्ष पर्वत के नीचे के भैरुजी के मंदिर में, कुछ देवनारायण के मंदिर में, शिवालय में तथा कुछ देव जी के मंदिर में हैं.
भैरुजी के मंदिर में एक लाल शीला फलक है जिसकी चौड़ाई 34 इंच तथा ऊंचाई 49 इंच है. यहाँ पद्मासन मुद्रा में बटुक भैरव हैं. पार्श्व भागों उपासिकायें हैं. हर एक के ऊपर तीन लघु प्रतिमाएं और हैं. ऊपर के कोनों पर चामर युक्त गज प्रदर्शित हैं.
इनके अतिरिक्त वर्तमान भग्न देवालय में भी कुछ सुंदर प्रतिमायें विद्यमान हैं. जिन में अधिकांश निज मंदिर की भीतरी छत पर वर्गाकार रूप में संलग्न हैं. भग्न देवालय के आसपास कुछ वर्षों पूर्व तक मूर्तियां बिखरी पड़ी हुई थी. कुछ वर्षों पूर्व धारा संपात से भूमितल से एक अत्यंत सुंदर चतुर्भुज विष्णु की मूर्ति प्राप्त हुई है जो अब भी हर्ष मंदिर के पास एक कक्ष में अवस्थित है. यह मूर्ति काले स्निग्ध पत्थर की है. मूर्ति के शिरोभाग के चारों ओर तेज चक्र है. दोनों और के पार्श्वों में अनेकों लघु मूर्तियां पूरी ऊंचाई तक निर्मित हैं. विष्णु के वाम हस्त में एक चक्र है. मूर्ति की भावभंगिमाँ अतीव उत्कृष्ट है. इसे उत्तरी भारत की विष्णु मूर्ति में बड़ा उच्च स्थान प्राप्त है.
[पृ.284]: कुछ वर्षों पूर्व एक विशाल यज्ञ उपकरण भी भारी वर्षा के कारण मंदिर के पास की भूमि से निकाला था जिसे तत्कालीन जिलाधी सीकर ले आए थे. हर्ष का कला संसार इस प्रकार विभिन्न रूप से नष्ट होता रहा पर उसके परिरक्षण के सामूहिक प्रयत्न नहीं हुए. अगर आज हर्ष मंदिर की यह सुंदर कलाकृतियां शेखावाटी के किसी एक म्यूजियम में एक साथ संग्रहित की जाकर प्रदर्शित होती तो इस क्षेत्र की कला प्रेम की बात उभर कर विश्व के सामने रहती.
हर्ष महादेव के इस भग्न मंदिर की कुछ मूर्तियों के विवरण भी अपेक्षित हैं. श्वेत प्रस्तर से वह निर्मित नंदीश्वर आज भी अपने स्थान पर है. गले में छोटी-छोटी घंटियों की माला है. मूर्ति के कुछ अंग भग्न हैं. इसकी लंबाई 62” इंच चौड़ाई 29 इंच एवं ऊंचाई 40 इंच है. सामने एक नांद जैसी वस्तु है. अपनी विशालता और अंग सौष्ठव के कारण यह मूर्ति प्रभावित करती है.
विभिन्न आभूषणों से आभूषित एक नारी मूर्ति है जिसकी ऊंचाई 68 इंच है एवं चौड़ाई 19 इंच है. अनेक अंगों पर आभूषण है तथा नयनाभिराम केश पाश है. झूलता हुआ दुकूल अंक यष्टि पर दिखाया गया है. [34]
इस समय (10वीं 11वीं शती ई.) बने अनेक प्रसिद्ध मंदिरों की तरह नग्न नारी मूर्तियां एवं मिथुन चित्र भी हर्ष मंदिर में थे. आज भी कुछ नग्न मानव प्रतिमाएं शेष हैं जो इस धारणा की पुष्टि करते हैं. मिथुन चित्र उस समय के देवालयों के एक अंग रहे हैं. सामान्य रूप से देखने से देव धाम में इन मूर्तियों की उपस्थिति एक अद्भुत विरोधाभास नजर आता है.
विद्वानों ने इस विषय पर विभिन्न मत व्यक्त किए हैं. एक जन प्रचलित विश्वास यह है कि मिथुन चित्रों के कारण मंदिर की वज्र पास शैली प्राकृतिक विपदाओं से रक्षा होती है.[35] दूसरे मत के अनुसार ऐसे दृश्य पुरुष और प्रकृति के रहस्य में मिलन के प्रतिसाक्षी हैं जो तांत्रिक विचारधारा के विकास के अभिन्न अंग बन गए थे. [36] एक संभावना यह भी व्यक्त की गई है कि उस समय तांत्रिक सिद्धांत बड़े प्रबल थे. कौल और कापालिक और सोमसिद्धांतिनों का प्रबाल्य था. अतः मिथुन चित्र आवश्यक हो गए. [37] कुछ मिथुन चित्र काम योगिक पद्धतियों के निर्देशन के रूप में हैं.[38] प्रोफेसर ओ सी गांगुली ने शिल्प शास्त्रों के उन निर्देशों की और विद्वानों का ध्यान केंद्रित किया है जो मंदिर के पार्श्व भाग पर ऐसी मूर्तियां आवश्यक मानते हैं. [39]
हर्ष की मूर्तियों में संबंध गायकों एवं नर्तकों का चित्रण भी सघन रूप से हुआ है. साथ ही शिकार, पशु युद्ध, राज्य उत्सव है, सेना प्रयाण और गृहस्त जीवन के भी कुछ दृश्य हैं. एक चामरधारिणी नारी की लघु प्रतिमा है जो अपने वैभवपूर्ण अंग सौष्टव से ध्यान आकर्षित करती है. मूर्तियों के संबंध में एक उल्लेख कर इस प्रश्न को
[पृ.285]: समाप्त किया जाता है. शैव होते हुए चौहान नरेशों ने अन्य संप्रदायों के देवों को अपने कुलदेव के समान स्थान प्रदान कर अपने उदारता का प्रशंसनीय उदाहरण उपस्थित किया था.
हर्ष मंदिर के स्तंभों पर बेल-बूंटों की भरमार है. कला विशारदों की दृष्टि में वे पारंपरिक हैं. उनका मुख्य उद्देश्य अलंकरण है पर अत्यधिक संख्या में मानव प्रतिमाओं के कारण में प्राय: दृष्टि पथ से ओझल ही बने रहते हैं. ज्यामितीय प्रतिमानों (Geometrical Patterns) की ओर चौहान काल के कलाकारों कि सविशेष प्रवृति है. इस क्षेत्र में उनकी कला ने नए आयाम उपस्थित किये. जिनका अनुसरण आसपास के प्रदेशों में किया जाता रहा.
हर्ष की मूर्तियों का उत्तरी भारत की उत्कृष्ट मूर्तियों में स्थान है. यहाँ मानवाकार प्रतिमाओं के मुख मंडल पर निखरने वाले भावों की छवि इतनी चित्ताकर्षक एवं मनमोहक है कि इस भग्न एवं विश्रृखलित संपदा को निखारने हजारों लोग अब भी आते हैं. मानव की अंग भंगिमाओं से उनके मनोगत भाव का सुंदर प्रदर्शन किया गया है. रूप और आकर को यहां भावाभिव्यक्ति का सबल माध्यम बनाया गया है. ऐसे मंदिर इन्डो-आर्यन कला की चरम परिणीति के पारिक हैं. [40]
खेतड़ी के पास बाघेश्वर का प्राचीन स्थान है. प्राचीन काल के कुछ अवशेष यहां हैं. इनमें तीन लघु मंदिर हैं. यहाँ प्राचीन सामग्री बिखरी पड़ी है. कई प्राचीन मूर्तियां दीवार के सहारे से खड़ी की गई हैं. इनमें विष्णु, शिव, नृत्यरत गणपति आदि की मूर्तियां हैं.
प्राचीन तूंदा गांव के टीले से प्राप्त अनेकों लाल पत्थर की लघु प्रतिमाएं खेतड़ी के पन्नालाल के तालाब में यत्रतत्र प्रस्थापित हैं. ये मूर्तियां लघु आकार में है. इनकी संख्या भी कम नहीं है. तालाब में एक विष्णु और लक्ष्मी की युगल प्रतिमा है जिसकी लंबाई 36 इंच एवं चौड़ाई 33 इंच है. अंग प्रत्यंग में आभूषण पहने विष्णु है जिनके सिर पर किरीट है. हाथों में गदा, चक्र और शंख हैं. एक हाथ लक्ष्मी के कंधे पर है. पुरुष और स्त्री क्रमश: विष्णु एवं लक्ष्मी के पास निर्मित हैं. चित्र का समग्र प्रभाव मनमोहक है.ये मूर्तियां कुछ आगे के समय की ज्ञात होती हैं. हर्ष जैसा निखार इन मूर्तियों में परिलक्षित नहीं होता है.
शेखावाटी में अन्यत्र भी प्राचीन मंदिरों में देव मूर्तियां हैं पर उनके बारे में अभी समुचित अध्ययन नहीं हो पाया है. आगे चलकर विक्रम 19वीं सदी में मूर्तियों का स्थान भित्ति चित्रों ने ले लिया था. अतः मूर्ति निर्माण की परंपरा में सातत्य बना नहीं रह सका.
बुरड़क वंशावली में हर्षदेव
चौहान वंश में बुरड़क वंशावली का विवरण बडवा की बही से मिलता है. बडवा की बही के अनुसार 933 ई. में हर्षदेव की उपस्थिति का ज्ञान होता है. बड़वा (भाट) श्री भवानीसिंह राव, गाँव- महेशवास, पोस्ट- बिचून, तहसील- फूलेरा, जिला- जयपुर (फोन-09785459386) की बही में बुरडक इतिहास के सम्बन्ध में निम्न विवरण उपलब्ध है:
राजा रतनसेण के बिरमराव पुत्र हुए. बिरमराव ने अजमेर से ददरेवा आकर राज किया. संवत 1078 (1021 AD) में किला बनाया. इनके अधीन 384 गाँव थे. बिरमराव की शादी वीरभाण की बेटी जसमादेवी गढ़वाल के साथ हुई. इनसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए:
- 1. सांवत सिंह - सांवत सिंह के पुत्र मालसिंह, उनके पुत्र राजा घंघ, उनके पुत्र इंदरचंद तथा उनके पुत्र हरकरण हुए. इनके पुत्र हर्ष तथा पुत्री जीण उत्पन्न हुयी. जीणमाता कुल देवी संवत 990 (933 AD) में प्रकट हुयी.
- 2. सबल सिंह - सबलसिंह के बेटे आलणसिंह और बालणसिंह हुए. सबलसिंह ने जैतारण का किला संवत 938 (881 AD) में आसोज बदी 10 को फ़तेह किया. इनके अधीन 240 गाँव थे.
- 3. अचल सिंह -
जीणमाता का पूरा नाम जयन्तिमाता है. जीणमाता का मंदिर सीकर से १५ किमी दक्षिण में खोस नामक गाँव के पास तीन छोटी पहाड़ियों के मध्य स्थित है. इसमें लगे शिलालेखों में विक्रम संवत १०२९ का शिलालेख सबसे पुराना है. यह चौहानों की कुल देवी है. इस मंदिर में जीणमाता की अष्टभुजी प्रतिमा है. कहा जाता है कि जीण तथा हर्ष दोनों भाई-बहिन थे और दोनों में बड़ा प्रेम था. जीण और हर्ष राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गाँव के अधिपति घंघ की संतान थे.
हर्ष और जीण की कहानी
लोक काव्यों व गीतों व कथाओं में जीण का परिचय मिलता है जो इस प्रकार है. राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में एक चौहान वंश के राजा घंघ के घर जीण का जन्म हुआ. उसके एक बड़े भाई का नाम हर्ष था. दोनों के बीच बहुत अधिक स्नेह था. एक दिन जीण और उसकी भाभी सरोवर पर पानी लेने गई जहाँ दोनों के मध्य किसी बात को लेकर तकरार हो गई. उनके साथ गांव की अन्य सखी सहेलियां भी थी. अन्ततः दोनों के मध्य यह शर्त रही कि दोनों पानी के मटके घर ले चलते है जिसका मटका हर्ष पहले उतारेगा उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह समझा जायेगा. हर्ष इस विवाद से अनभिज्ञ था. पानी लेकर जब घर आई तो हर्ष ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतार दिया. इससे जीण को आत्मग्लानि व हार्दिक ठेस लगी. भाई के प्रेम में अभाव जान कर जीण के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह घर से निकल पड़ी. जब भाई हर्ष को कर्तव्य बोध हुआ तो वो जीण को मनाकर वापस लाने उसके पीछे निकल पड़ा. जीण ने घर से निकलने के बाद पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अरावली पर्वतमाला के इस पहाड़ के एक शिखर जिसे "काजल शिखर" के नाम से जाना जाता है पहुँच गई. हर्ष भी जीण के पास पहुँच अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा चाही और वापस साथ चलने का आग्रह किया जिसे जीण ने स्वीकार नहीं किया. जीण के दृढ निश्चय से प्रेरित हो हर्ष भी घर नहीं लौटा और दूसरे पहाड़ की चोटी पर भैरव की साधना में तल्लीन हो गया. पहाड़ की यह चोटी बाद में हर्ष नाथ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हुई. वहीँ जीण ने नव-दुर्गाओं की कठोर तपस्या करके सिद्धि के बल पर दुर्गा बन गई. हर्ष भी भैरव की साधना कर हर्षनाथ भैरव बन गया. इस प्रकार जीण और हर्ष अपनी कठोर साधना व तप के बल पर देवत्व प्राप्त कर लोगों की आस्था का केंद्र बन पूजनीय बन गए. इनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई और आज लाखों श्रद्धालु इनकी पूजा अर्चना करने देश के कोने कोने से पहुँचते हैं.
औरंगजेब द्वारा मंदिरों का तोड़ना
शेखावाटी के मंदिरों को खंडित करने के लिए मुग़ल सेनाएं कई बार आई जिसने खाटू श्याम , हर्षनाथ, जीणमाता, खंडेला के मंदिर आदि खंडित किए. एक कवि ने इस पर यह दोहा रचा -
- देवी सजगी डूंगरा , भैरव भाखर माय ।
- खाटू हालो श्यामजी , पड्यो दडा-दड खाय ।।
एक जनश्रुति के अनुसार देवी जीणमाता ने सबसे बड़ा चमत्कार मुग़ल बादशाह औरंगजेब को दिखाया था. बुरडक गोत्र के बडवा श्री भवानीसिंह राव के अभिलेखों में जीण माता के सम्बन्ध में यह विवरण उपलब्ध है कि औरंगजेब ने शेखावाटी के मंदिरों को तोड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी थी. यह सेना हर्ष पर्वत पर शिव व हर्षनाथ भैरव का मंदिर खंडित कर जीण मंदिर को खंडित करने आगे बढ़ी. उस समय हर्ष के मंदिर की पूजा गूजर लोग तथा जीनमाता के मंदिर की पूजा तिगाला जाट करते थे. कहते हैं कि हमले के तुरन्त बाद जीणमाता की मक्खियों (भंवरों) ने बादशाह की सेना पर हमला बोल दिया. मक्खियों ने बादशाह की सेना का पीछा दिल्ली तक किया और सेना को बहुत नुकसान पहुंचाया. बदशाह ने जब हर्ष और जीनमाता का स्मरण किया और माफ़ी मांगी तभी पीछा छोड़ा. इसके उपलक्ष में बादशाह द्वारा हर्ष मंदिर के लिये सवामण तेल और सवामण बाकला हर साल भेजने का वादा किया. जीनमाता के भाट हरफ़ूल तिगाला जाट को गाँव गोठडा तागालान की 18000 बीघा जमीन की जागीर बक्शी. इसलिए इस गाँव का नाम गोठडा तागालान कहलाता है. यह जागीर उनके पास 105 साल रही तत्पश्चात संवत 1837 में यह कासली के नवाब के साथ फतेहपुर के अधीन हुआ. बादमें यह जागीर शेखावतों के पास आई. यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बुरडक गोत्र के आदि पुरुष नानकजी ने संवत १३५१ (1294 AD) में बैसाख सुदी आखा तीज रविवार के दिन गोठडा गाँव बसाया था.
Gallery
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Statues in Shiva temple Harsh
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Statues in Shiva temple Harsh
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Statues in Shiva temple Harsh
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Statues at Harshanath of 10th century
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Nandi at Harsh
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Sura Sundari 10 c. Sculptures Sikar Museum
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Standing Ganesha Sculptures Sikar Museum
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Sculptures Sikar Museum
See also
Notes
- ↑ Some Unpublished Sculpture from Harshagiri
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.273-74
- ↑ सीकर की कहानी (कैप्टेन वेब की जुबानी), सीकर, 2009, पृ. 22,80
- ↑ सीकर की कहानी (कैप्टेन वेब की जुबानी), सीकर, 2009, पृ.23
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.274
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.274
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.275
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.282
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.282
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.283
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.284
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.283
- ↑ रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.284
- ↑ डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ. 66
- ↑ Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, pp.28-30
- ↑ हर्ष शिलालेख: ई.आई.,II , पृ. 119
- ↑ दी इम्पीरियल कन्नौज, पृ. 167
- ↑ दी इम्पीरियल कन्नौज, पृ. 107
- ↑ दी इम्पीरियल कन्नौज, पृ. 167
- ↑ मरुभारती रासो-दशरथ शर्मा,पृ. 279-32, शेखावाटी के नवाबी राज्य और उनका अवसान, पं. झाबर मल्ल शर्मा - मरुभारती 9 /3 पृ. 6
- ↑ अन्युवल रिपोर्ट, राजपुताना म्यूजियम 1932-33 सं. 3 पृ.2
- ↑ Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 219
- ↑ Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, pp.273-276
- ↑ हेममारोपितं येन शिवस्य भवनोपरि. हर्ष शिलालेख - इंडियन एंटीक्वेरी, XLII p.57
- ↑ वही पृ.57
- ↑ येन निर्म्मितमिदं मनोहरं शंकरस्य भवनं समंडपम् - हर्ष शिलालेख L-30
- ↑ सुघटित वृषस - वही
- ↑ सर्वदेवमयचारू तोरणं - वही
- ↑ Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998, pp.282-285
- ↑ वीरभद्र सूत: ख्यात: सूत्रधारो प्रचण्डशिव:। विश्वकर्मेव सर्वज्ञो वास्तु विद्या विशारद ॥
- ↑ हिन्दू टेम्पल वो. 11 प्लेट LXIX-स्टेला क्रेमरिश दी आर्ट of इंडिया - चित्र-717-118 क्रेमरिश
- ↑ वही पृ.403 वो. LXVIII
- ↑ Development of Hindu Iconography- T G Rao The Ancient Bulletin of ISE Vo.6 p.36
- ↑ हर्ष गिरि की अप्रकाशित प्रस्तर प्रतुमायें - डॉ मनोहर शर्मा
- ↑ खजुराहो बी एल धम्मा व एस सी चन्दा पृ.11
- ↑ The Art of Chandelas p.29 O.C. Ganguli
- ↑ मार्ग वो.x सं.0 पृ.59-62
- ↑ वही
- ↑ रूपं सं.22 , 25, 1935
- ↑ Art and Archtecture of India, p.173; Benjamin Roland Hindu Temple II p.367 Kramrish