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Harsha Deva

From Jatland Wiki
(Redirected from हर्ष देव)
Author: Laxman Burdak, IFS (R)

Harsha Deva (हर्षदेव) (933 AD) was a strong follower of Shiva who gave names to Harsha Parvata, Harshanagari and Harsha Mandir near Sikar in Rajasthan. He along with his sister Jeenmata practiced extreme asceticism at Harshagiri and became a deity. He was Kuladeva of Chauhans as mentioned in Harsha Inscription (961-973 AD) of Chauhan dynasty. Dated information about Harsha Deva in 933 AD is available from Bards of Burdak clan history.

Variants

Various names of Harshadeva are mentioned in Harsha Inscription (961-973 AD) of Chauhan dynasty. Here are reproduced various names of Harshadeva for ready reference with Line No. and Verse No. of Harsha Inscription indicated in the bracketa.

History

Clear History of Harsha Deva is not available. But we find mention of Harsha Deva and his sister Jeen in year 933 AD in the 'Burdak clan History'. The 'History of Burdak clan' is recorded and maintained by Bard (traditional record keeper) Rao Bhawani Singh (Mob:09785459386) of village Maheshwas, tahsil Phulera, district Jaipur, Rajasthan. As per his records Burdak clan is integral part of Chauhan Confederacy.

Raja Ratansen begot son Biramrao. Biramrao came from Ajmer to Dadrewa and founded a fort here in samvat 1078 (1021 AD). He had 384 villages in his kingdom. Biramrao got married to Jasmadevi daughter of Virabhana Garhwal. Biramrao begot three sons namely,

  • 3. Achal Singh

Mythology

Statues in Shiva temple Harsh

There is a popular belief which has come down to people through the centuries that in a village Ghanghu of Churu, King Ghangh loved and married an Apsara (nymph) on the condition that he would not visit her palace without prior information. King Ghangh got a son called Harsh and a daughter Jeen. Afterwards she again conceived but as chance would have it king Ghangh went to her palace without prior intimation and thus violated solemn vow he had made to the Apsara. Instantly she left the king and fled away with her son Harsha and daughter Jeen whom she abandoned at the place where presently the temple stands. The two children here practiced extreme asceticism. Later a Chauhan ruler built the temple at that place.[1]

बुरड़क वंशावली में हर्ष

चौहान वंश में बुरड़क वंशावली का विवरण बडवा की बही से मिलता है. बडवा की बही के अनुसार 933 ई. में हर्ष की उपस्थिति का ज्ञान होता है. बड़वा (भाट) श्री भवानीसिंह राव, गाँव- महेशवास, पोस्ट- बिचून, तहसील- फूलेरा, जिला- जयपुर (फोन-09785459386) की बही में बुरडक इतिहास के सम्बन्ध में निम्न विवरण उपलब्ध है:

राजा रतनसेण के बिरमराव पुत्र हुए. बिरमराव ने अजमेर से ददरेवा आकर राज किया. संवत 1078 (1021 AD) में किला बनाया. इनके अधीन 384 गाँव थे. बिरमराव की शादी वीरभाण की बेटी जसमादेवी गढ़वाल के साथ हुई. इनसे तीन पुत्र उत्पन्न हुए:

  • 1. सांवत सिंह - सांवत सिंह के पुत्र मालसिंह, उनके पुत्र राजा घंघ, उनके पुत्र इंदरचंद तथा उनके पुत्र हरकरण हुए. इनके पुत्र हर्ष तथा पुत्री जीण उत्पन्न हुयी. जीणमाता कुल देवी संवत 990 (933 AD) में प्रकट हुयी.
  • 2. सबल सिंह - सबलसिंह के बेटे आलणसिंह और बालणसिंह हुए. सबलसिंह ने जैतारण का किला संवत 938 (881 AD) में आसोज बदी 10 को फ़तेह किया. इनके अधीन 240 गाँव थे.
  • 3. अचल सिंह -

जीणमाता का पूरा नाम जयन्तिमाता है. जीणमाता का मंदिर सीकर से १५ किमी दक्षिण में खोस नामक गाँव के पास तीन छोटी पहाड़ियों के मध्य स्थित है. इसमें लगे शिलालेखों में विक्रम संवत १०२९ का शिलालेख सबसे पुराना है. यह चौहानों की कुल देवी है. इस मंदिर में जीणमाता की अष्टभुजी प्रतिमा है. कहा जाता है कि जीण तथा हर्ष दोनों भाई-बहिन थे और दोनों में बड़ा प्रेम था. जीण और हर्ष राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गाँव के अधिपति घंघ की संतान थे.

घांघू का इतिहास

संदर्भ - ददरेवा के इतिहास का यह भाग सार्वजनिक पुस्तकालय तारनगर की स्मारिका 'अर्चना' में प्रकाशित मातुसिंह राठोड़ के लेख 'चमत्कारिक पर्यटन स्थल ददरेवा' (पृ. 21-25) से लिया गया है।

10 वीं शताब्दी के लगभग अंत में मरुप्रदेश के चौहानों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने प्रारम्भ कर दिये थे। इसी स्थापनाकाल मे घंघरान चौहान ने वर्तमान चुरू शहर से 10 किमी पूर्व मे घांघू गाँव बसा कर अपनी राजधानी स्थापित की। [2] ('अर्चना',पृ.21)

राणा घंघ की पहली रानी से दो पुत्र हर्षहरकरण तथा एक पुत्री जीण का जन्म हुआ। हर्ष व जीण लोक देवता के रूप में सुविख्यात हैं। ('अर्चना',पृ.21) ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते हालांकि हर्ष ही राज्य का उत्तराधिकारी था लेकिन नई रानी के रूप में आसक्त राजा ने उससे उत्पन्न पुत्र कन्हराज को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। संभवत: इन्हीं उपेक्षाओं ने हर्ष और जीण के मन में वैराग्य को जन्म दिया। दोनों ने घर से निकलकर सीकर के निकट तपस्या की और आज दोनों लोकदेव रूप में जन-जन में पूज्य हैं।

राणा घंघरान की दूसरी रानी से कन्हराज, चंदराजइंदराज हुये। कन्हराज के चार पुत्र अमराज, अजराज, सिधराज व बछराज हुये। कन्हराज का पुत्र अमराज (अमरा) उसका उत्तराधिकारी बना। अमराजका पुत्र जेवर (झेवर) उसका उत्तराधिकारी बाना। लेकिन महत्वाकांक्षी जेवर ने दादरेवा को अपनी राजधानी बनाई और घांघू अपने भाइयों के लिए छोड़ दिया। जेवर ने उत्तरी क्षेत्र मे अपने राज्य का विस्तार अधिक किया। असामयिक मृत्यु के कारण यह विजय अभियान रुक गया। जेवर के पश्चात उनका पुत्र गोगा (गोगदेव) चौहान युवावस्था से पूर्व ही माँ बाछलदे के संरक्षण में ददरेवा का राणा बना। [3]('अर्चना',पृ.21)

वर्तमान जोगी-आसन के स्थान पर नाथ संप्रदाय के एक सिद्ध संत तपस्वी योगी ने गोरखनाथ के आशीर्वाद से बाछल को यशस्वी पुत्र पैदा होने की भविष्यवाणी की थी। कहते हैं कि बाछलदे की बड़ी बहन आछलदे को पहले इन्हीं संत के अशिर्वाद से अर्जन-सर्जन नामक दो वीर पैदा हुये थे। ('अर्चना',पृ.22)

हर्ष और जीण की कहानी

लोक काव्यों व गीतों व कथाओं में जीण का परिचय मिलता है जो इस प्रकार है. राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में एक चौहान वंश के राजा घंघ के घर जीण का जन्म हुआ. उसके एक बड़े भाई का नाम हर्ष था. दोनों के बीच बहुत अधिक स्नेह था. एक दिन जीण और उसकी भाभी सरोवर पर पानी लेने गई जहाँ दोनों के मध्य किसी बात को लेकर तकरार हो गई. उनके साथ गांव की अन्य सखी सहेलियां भी थी. अन्ततः दोनों के मध्य यह शर्त रही कि दोनों पानी के मटके घर ले चलते है जिसका मटका हर्ष पहले उतारेगा उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह समझा जायेगा. हर्ष इस विवाद से अनभिज्ञ था. पानी लेकर जब घर आई तो हर्ष ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतार दिया. इससे जीण को आत्मग्लानि व हार्दिक ठेस लगी. भाई के प्रेम में अभाव जान कर जीण के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह घर से निकल पड़ी. जब भाई हर्ष को कर्तव्य बोध हुआ तो वो जीण को मनाकर वापस लाने उसके पीछे निकल पड़ा. जीण ने घर से निकलने के बाद पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अरावली पर्वतमाला के इस पहाड़ के एक शिखर जिसे "काजल शिखर" के नाम से जाना जाता है पहुँच गई. हर्ष भी जीण के पास पहुँच अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा चाही और वापस साथ चलने का आग्रह किया जिसे जीण ने स्वीकार नहीं किया. जीण के दृढ निश्चय से प्रेरित हो हर्ष भी घर नहीं लौटा और दूसरे पहाड़ की चोटी पर भैरव की साधना में तल्लीन हो गया. पहाड़ की यह चोटी बाद में हर्षनाथ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हुई. वहीँ जीण ने नव-दुर्गाओं की कठोर तपस्या करके सिद्धि के बल पर दुर्गा बन गई. हर्ष भी भैरव की साधना कर हर्षनाथ भैरव बन गया. इस प्रकार जीण और हर्ष अपनी कठोर साधना व तप के बल पर देवत्व प्राप्त कर लोगों की आस्था का केंद्र बन पूजनीय बन गए. इनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई और आज लाखों श्रद्धालु इनकी पूजा अर्चना करने देश के कोने कोने से पहुँचते हैं.

External links

See also

References

  1. http://www.rajasthaninfoline.com/rinfo/jeenmata.htm
  2. गोविंद अग्रवाल: चूरू मण्डल का शोधपूर्ण इतिहास, पृ. 51
  3. गोरी शंकर हीराचंद ओझा: बीकानेर राज्य का इरिहास भाग प्रथम, पृ. 64