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A.W.T. Webb

From Jatland Wiki
(Redirected from Captain Webb)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Captain A.W.T. Webb

A.W.T.Webb (1889-1968), O.B.E., was British Senior Officer Sikar from 24.05.1934 to 1938. His full name was Archibald Wilfred Tisdal. He took number of steps to improve the condition of farmers of Shekhawati particularly in the field of Education and Rural development. The efforts of Captain Webb in preserving the heritage of Harsha Temple, the sculptures and bringing on record of this historical place are appreciable.

Joined as Senior Officer Sikar

He joined his Shekhawati assignment on 24 May 1934 and served up to 2 October 1938. We are concerned here mainly about his role in Shekhawati farmers movement. Apart from this Mr. Webb took number of steps to improve the condition of farmers of Shekhawati particularly in the field of Education and Rural development. We come to know about steps taken by Mr. Webb as Senior Administrator of Sikar from a report obtained from Mr. Jay Narayan Soni of Sikar (Mob: 9352812545), which has recently been translated in to Hindi by Prof. Bhagwan Singh Jhajharia and edited by Archaeologist Mr. Ganesh Berwal and published in the form of a book titled Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009.

Captain Webb on Harsha

Captain Webb during his stay at Sikar as Administrator (1934-38 AD) had visited the place and had mentioned about the temple and other monuments in his report. Captain Webb had arranged to send these sculptures and other records to Sikar museum. Webb has mentioned about sculpture of Nandi made of marble and sculptures of Pandavas and Vakata (वाकाट) at the temple site. There were six huge statues of 7 feet each of pandavas and Kunti , which were sent to Sikar Museum. [1]

Efforts of Captain Webb in preserving sculptures and bringing on record of this historical place are appreciable. He has mentioned about visit Harshanatha in year 1834 by Sergeant E. Dean. Webb mentioned that during his visit in 1834 there were about 20 statues, of size one third larger than normal, at the site in good condition. Webb was shocked to see less than half of the statues after hundred years. Webb has also mentioned about a new Shiva temple near old one built by Rao Raja of Sikar Shri Shiva Singh. This new temple was built from remains of old temple about 200 years back. A path leads from old temple to a nearby small temple of Bhainruji. [2]

The Harshagiri Inscription is about the construction of temple of Shiva in the name Harshadeva. Harsha or Harshadeva is not one of the names of Shiva, it is quite different. This inscription connects the name Harsha with a Puranic story of destruction of Asura Tripura, who had displaced Indra and other gods from svarga. The displaced Gods were rehabilitated here eulogized Shiva here on this occasion and this may perhaps be the origin behind the name Harsha. [3]

Report of A.W.T. Webb on Sikar published in Hindi

A report A.W.T. Webb on Sikar was provided by Mr. Jay Narayan Soni of Sikar (Mob: 9352812545) has been translated in to Hindi by Prof. Bhagwan Singh Jhajharia and edited by Archaeologist Mr. Ganesh Berwal and published in the form of a book titled Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009.

Here are given some images of front page of the book for general information. Some important points in Hindi have been narrated in following paragraphs with page number of the book at the beginning of the para.

पुस्तक 'सीकर की कहानी - कैप्टन वेब की जुबानी'

Cover page of the book "Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani"

सीकर के वकील जयनारायण सोनी ने सीकर के राज परिवार से प्राप्त सीनियर अफसर कैप्टेन ए डब्ल्यू टी वेब के सीकर में प्रशासक की पदस्थापना के दौरान अंग्रेजी में तैयार एक प्रतिवेदन (1938) प्रोफ़ेसर भगवान सिंह झाझड़िया को उपलब्ध करवाया. इसका हिंदी अनुवाद 'सीकर की कहानी - कैप्टन वेब की जुबानी' नाम से प्रोफ़ेसर भगवान सिंह झाझड़िया ने किया तथा सम्पादन पुरातत्वविद गणेश बेरवाल ने किया है ।

पुस्तक - सीकर की कहानी - कैप्टन वेब की जुबानी (कैप्टन वेब द्वारा लिखित दस्तावेज का हिंदी अनुवाद)

अनुवादक - प्रोफ़ेसर भगवान सिंह झाझड़िया

सम्पादन - गणेश बेरवाल

प्रकाशक - 382/27, शांति पब्लिकेशन, सीकर, प्रथम संस्करण - 2009

A.W.T. Webb, "Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani", 1938

पुस्तक समीक्षा: इस पुस्तिका में कैप्टन वेब ने मरुदेश का परिदृश्य बहुत सुन्दर तरीके से प्रस्तुत किया है. पांच वर्ष तक (1934-1938) कैप्टन वेब उनकी पत्नी के साथ सीकर में प्रशासक के रूप में रहे. यहां घर बसाने वाले वह पहले यूरोपियन थे. उन्होंने यहां के लोगों के दृष्टिकोण को समझा, मानसिकता का अध्ययन किया, यहां की आत्मा को ग्रहण किया, परम्पराओं और समस्याओं को समझकर, दिमाग और आंखों से पूर्वाग्रह की धुंध हटाकर सीकरवाटी का स्पष्ट चित्र अंकित करने का प्रयत्न किया है. समाज की जातियों के सम्बन्ध में पूर्वाग्रहरहित अभिमत दिया है. सीकरवाटी में जीवन-स्तर में सुधार के बारे में अनेक नवाचार किये.

सीकर के हर्ष पर्वत की यात्रा की, वहां का अध्यन किया, मूर्ति कला के सुंदर कीमती टुकड़ों, जो इधर-उधर 2 एकड़ के क्षेत्र में इधर-उधर बिखरे पड़े थे, हटाकर सीकर म्यूजियम में रखवाया. हर्ष के पहाड़ के पूर्व के मंदिरों के संरक्षक रहे राणोली गाँव के ब्राह्मणों से मिले. लगभग एक हजार वर्ष पूर्व निर्मित हर्ष मंदिर के निर्माण की कठिनाइयां रेखांकित की. एक अन्य अवसर पर वह हर्ष ग्राम की स्थिति को खोजने के लिए गए.

सीकर के राजाओं के पुत्र पर एक पूरा अध्याय लिखा है. उनकी बातें राजपूत समाज के सुधार के लिए हैं. शेखावाटी के नामकरण पर भी प्रकाश डाला है. यद्यपि उन्होंने अपने लेखों में शेखावाटी की अपेक्षा सीकरवाटी लिखना ज्यादा पसंद किया है. राजपूतों के साथ ही चारण समुदाय का वर्णन किया है.

सीकर के ग्रामीण जीवन का बहुत ही जीवंत वर्णन किया है, यथा गांव का कुआं, पानी खींचने में शिष्टाचार, प्याऊ लगवाना आदि.

चार शहरों की कहानी के अंतर्गत सीकर, फतेहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़ के बसने, विस्तार और लोगों का जीवन तथा इतिहास का वर्णन किया है. वह लक्ष्मणगढ़ की मारवाड़ी चाय का लेख करना नहीं भूले.

रेत के दृश्य, सीकर में दीवाली, राजा के लिए प्रार्थना, राजकुमारी की शादी, मीठा प्रतिशोध, एक प्रतिज्ञा के वास्ते, एक शानदार साहसिक कार्य, अतीत का चिंतन, सीकर ठिकाने के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक मूल्यों व भौगोलिक स्थिति को यथावत प्रस्तुत किया है. पुस्तक में मरुस्थल की जातियों की आतंरिक सोच का जो वर्णन किया है वह तथ्यात्मक है. फतेहपुर पर जार्ज थॉमस (George Thomas) और मराठा नेता वामन राव के 1799 के आक्रमण का विस्तार से उल्लेख किया है. फतेहपुर से हारकर उनकी वापसी का दृश्य एक चलचित्र की अच्छी विषय सामग्री बताया है.

अतीत के दृश्य के अंतर्गत जागीरदार और किसान के मध्य होने वाला स्थाई संघर्ष पर लिखना नहीं भूले. सीकरवाटी से विदा लेते हुए लिखते हैं कि मुझे हिन्दुस्तान के लम्बे गर्मी के दिन याद रहेंगे जब दम घोटने वाली गर्मी दमित होकर पसीने से तर हुए लोग अराजकता समाप्त कर व्यवस्था बनाने को संघर्षरत थे.

पुस्तक के परिशिष्ट-1 में हर्ष शिलालेख की व्याख्या की गयी है और कुछ गाँवों की पहचान की गयी है जो इस शिलालेख में हर्षदेव को धर्मस्थ दिए गए थे. कैप्टन वेब ने हर्ष नगरी और हर्ष पर्वत पर जाकर वहां चारों ओर बिखरी पड़ी मूर्तियों और कलाकृतियों को आगे होने वाली क्षति और उपेक्षा से बचाने के लिए सीकर में म्यूजियम स्थापित करके उनके संरक्षण का कार्य पूरा किया.

[पृ.84]: पुस्तक के परिशिष्ट-2 में कैप्टन वेब द्वारा सीकर मैं विकास का दस्तावेज प्रस्तुत किया है. लिखा है कि जिन लोगों को सीकर ठिकाने में आने का अवसर नहीं मिला है, और जो इस इलाके के बारे में अधिक नहीं जानते हैं उन लोगों की जानकारी के लिए एक संक्षिप्त विवरण दिया गया है... सीकर जयपुर राज्य का एक जागीरदारी ठिकाना है. जयपुर के उत्तरी पश्चिमी भाग में जुड़ा हुआ ठिकाना है जिसका क्षेत्रफल लगभग 1600 वर्ग मील है. आबादी 2,23,000 एवं 10 लख रुपए सालाना राजस्व् है. वर्तमान में इसके शासक राव राजा कल्याण सिंह जी बहादुर हैं, जो कि कच्छावा राजपूतों के शेखावत कुल से संबंधित है. उनके मुखिया जयपुर के महाराजाधिराज हैं. यह वंश आमेर के महाराजा उदयकरण के चौथे पुत्र बालोजी से अवतरित है, जो कि 1367 से 1388 ई. की अवधि में थे.

सीकर के मुख्य उद्योग कृषि, पशुपालन और भेड़ पालन का उल्लेख किया है. साथ ही कुछ कम महत्व के उद्योग भी सूचीबद्ध किए हैं.

[पृ.87]: लिखा है कि कृषि में सुधार के लिए वर्त्तमान में इंदौर कृषि फार्म में बीएससी योग्यता वाला एक जाट हैं जो कि शीघ्र लौटेगा. उसका यह कर्त्तव्य होगा कि किसानों को अपनी जमीन पर अधिकतम लाभ देने वाली फसलों को लगाने को बताये और अपने अधिकतम लाभ के लिए खाद का उपयोग करना भी समझाए.


विभिन्न मुद्दों पर कैप्टन वेब ने जो लिखा उसके कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं-

मरुदेश का परिदृश्य

[पृ.6]: मैं नहीं जानता कि अरावली पर्वतमाला के उत्तर में स्थित राजपूताना के उन भागों को मृतदेश नाम किसने दिया, परंतु यह नाम उपयुक्त है क्योंकि यह पुरातन है और शताब्दियों पूर्व तक खोजा जा सकता है. इसके प्रथम रूप, संस्कृत मरुस्थली का स्थान फारसी भाषा के मरुदेश ने लिया, जिसमें मुस्लिम आक्रमणों का प्रभाव प्रतिबिंबित होता है जो कि 12वीं शताब्दी के बाद वेग पूर्वक भारत में फैला और जिसका प्रभुत्व उसकी पतित वृद्धावस्था में ब्रिटिश लोगों ने 18वीं शताब्दी में ग्रहण किया. पर नाम के भेदों से परिदृश्य में कोई अंतर नहीं आया है. मृतदेश , चाहे इसका नामकरण संस्कृत में फारसी या अंग्रेजी में हो बहुत पहले से वैसा ही है. और रेल, मोटर और अन्य आधुनिक आविष्कारों के आने पर भी यह अपने आदि स्वरूप को परिवर्तित करने में असफल रहा है. खैर कुछ परिवर्तन के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगे हैं. प्रजातंत्र, जोकि ब्रिटिश भारत के पड़ोस के अन्य प्रान्तों में दृढ़ता पूर्वक स्थापित है, सीमा पर इसकी छाया डालता रहा है, और जागीरदार कुलीन तंत्र के अंतिम दुर्गों को प्लावित करने को तत्पर है. इसे रोका भी नहीं जा सकता है क्योंकि प्रजातंत्र मानव इतिहास में पाई जाने वाली सर्वाधिक स्थाई, न रुकने वाले प्रवृत्ति है. वास्तव में पुरातन की भावना और रंग को पकड़ने की भावना ही मुझे कलम हाथ में लेने को प्रेरित करती है जिससे कि मृतदेश जैसा था, वर्तमान में है और आने वाले कल में होगा, दिखाया जा सके.

[पृ.6]:मरुस्थल में वापसी - सर्वप्रथम मैंने इस प्रदेश (मरुस्थल) को बिना समझ वाली आँखों से लगभग अर्ध शताब्दी पूर्व एक शिशु के रूप में गोद में देखा था. मेरे माता-पिता के साथ मैंने रेगिस्तान के ऊँट गाड़ी से बीकानेर तक यात्रा की जहाँ से रेल में बैठकर मेरी मातृभूमि इंग्लैंड गया था. लगभग 46 साल पश्चात् मैं इस प्रदेश के एक कोने में स्थित सीकरवाटी के प्रशासक के रूप में आया.

यह स्थान जहां परंपरा और इतिहास का प्रभाव, जहां मध्ययुगीन जागीरदारी प्रथा किलों और छोटे गढ़ों में जमी हुई थी, जहां


[पृ.7]:की प्राचीरें प्राचीन व्यवस्था का विरोध करने वालों को नफरत की दृष्टि से देखती थी, अब भी उपद्रव ग्रस्त था. तपती हुई पांच गर्मियां और इतनी ही सर्दियां - मैं और मेरी पत्नी ने (जो यहां घर बसाने वाले पहले यूरोपियन थे) इस स्थान की हृदयस्थली में रहे और शायद ही इसकी चारदिवारी को छोड़ा. यहां के दृष्टिकोण को समझना, मानसिकता का अध्ययन, यहां की आत्मा को ग्रहण करना, निर्देश देना, शासन करना, सीखना, कभी-कभी व्यथित होना और अनेक बार उलझन में पड़ना हुआ परंतु इससे सदा आकर्षित हुए. तभी दिमाग और आंखों से पूर्वाग्रह की धुंध हटाकर स्पष्ट चित्र अंकित करने का प्रयत्न किया.

मृतप्रदेश या मरूदेश रेत और छोटी झाड़ियां का वीरान है जो कि हजारों लोगों को पालता है.

जयपुर राज्य के उत्तरी भाग में शेखावाटी या सीकरवाटी बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर को सम्मिलित करता है. आरंभिक अवस्था में इसमें वह बड़ा भूभाग सम्मिलित था जो विशाल भारतीय रेगिस्तान के नाम से जाना जाता था. इसकी संताने पुरातन जातियां हैं जो अत्यधिक सर्दी और गर्मी की अभ्यस्त हैं. केवल वही व्यक्ति जिसने मरुप्रदेश की सर्दी को अनुभव किया है जान सकता है कि सूर्यास्त के पश्चात किस तरह से रेत की गर्मी समाप्त हो जाती है और वह हवा बहुत शीतल हो जाती है. रेत की विशेषता इस बात को स्पष्ट करती है कि गर्मी में भी आमतौर पर रातें सहनीय ठंडी होती हैं.

जलवायु से यहां की जीवन की परिस्थितियों अधिक कठोर हैं. इस प्रदेश के मनुष्यों व जानवरों ने ऐसे आहार पर जीना सीख लिया है जो अन्य लोगों को पाचन की दवा के लिए शीघ्र डॉ. के पास जाने को बाध्य करता है. अधिकांश व्यक्ति मुख्य रूप से बिना खमीर वाले आटे की रोटी आचार युक्त मिर्च के साथ स्वाद लेकर खाते हैं. और पेय पदार्थ के रूप में केवल पानी होता है.


[पृ.8]: परिवर्तन के लिए गायों के भोज्य ग्वार की फली का भारी मिश्रण काम लेते हैं. दूध या मक्खन केवल धनी लोगों के लिए है. मांस एक दुर्लभ वस्तु है और इसके खाने को पाप समझा जाता है. फल और सब्जियां वर्ष में केवल सीमित मौसम में उपलब्ध होते हैं, वह भी गुणवत्ता में हल्के होते हैं. यद्यपि इन्हें मूल्यवान समझकर खुशी से उपयोग किया जाता है. बहुत से किसानों का नाश्ता केवल एक लंबी सफेद मूली होती है जो कच्ची खाई जाती है.

गर्मी का मौसम, कम से कम, गांव में सोने का समय होता है. अधिक सोने वाले को कम भोजन की जरूरत होती है और भोजन इस मौसम में दुर्लभ है. शीत ऋतु कांपने और सिकुड़ कर गोबर से जलने वाली आग के पास बैठने का समय होती है. नीची जाति के लोगों में नगन्य लोग ही गर्म कपड़े रखते हैं और गर्म बिस्तर अपवाद स्वरूप ही होता है, जहां थर्मामीटर का पारा जमाव बिंदु तक जाता है. रहस्य की बात है कि सभी गरीब लोग मर क्यों नहीं जाते हैं. मैंने सर्दी के मौसम में गांव के बालकों को पतले सूती कमीज में खड़े देखा है जबकि मैं ओवरकोट में कांप रहा था.

केवल वर्षा ऋतु के मध्य भाग में जब वर्षा होती है ग्रामीण सक्रिय होते हैं. यह मौसम अल्पावधि का होता है (लगभग 4 माह का) जबकि वर्ष भर के लिए भोजन पैदा किया जाता है. यदि वर्षा नहीं होती तो असंख्य कृषकों के दरवाजे पर भुखमरी दस्तक देती है.


[पृ.9]: पशुओं के चरने के लिए, चारागाह, जैसा हम दूसरे देशों के संदर्भ में समझते हैं, मुश्किल से ही अस्तित्व में है. यह सत्य है कि जमीन के बड़े-बड़े टुकड़े पशुओं के चरने के लिए अलग छोड़े गए हैं परंतु उनमें घास कुछ ही महीनों में दिखाई देती है. बाकी समय में जानवर सूखी पत्तियों को चरते हैं या कांटेदार झाड़ियां को कुतरते हैं. बहुत से जानवर भयंकर व्यवस्था पीड़ित होकर मानव विष्ठा खाने को बाध्य होते हैं. दुधारू गाय और हल में जोते जाने वाले बैलों को ही पूरक खाद्य दिया जाता है, जिसमें कटे हुए ज्वार के डांड, और खेजड़े की सूखी पत्तियां (लूंग) और पाला मिलाया जाता है.

हां, मरुदेश के निवासी बहुत मेहनती हैं. इस इनको ऐसा होना पड़ता है अन्यथा वे अस्तित्व में नहीं रह सकते. व्यावहारिक तौर पर रेत में जो कुछ भी उत्पन्न होता है उसे किसी न किसी रूप में काम में लाया जाता है. खेतों की खरपतवार भी सुखे घास के रूप में इकट्ठी की जाती है. कुछ जगहों को छोड़कर, जहां कुवों से खेती की जाती है, कहीं भी साफ खेत नहीं दिखाई देता. झाड़ियों के पत्ते चारे के लिए अलग करके बचा हुआ भाग बाड़ का काम देता है. लंबे सरकंडे (पानी) के चमकदार पौधे छपर का काम देते हैं. यह पौधे, शिवाय जब बहुत छोटे हों उन्हें छोड़कर जानवरों के खाने योग्य नहीं होते हैं. यह रेगिस्तान में बहुतायत से होते हैं. इस घास के लहराते हुए पंख, जब फूल आते हैं, भू धरातल पर अविस्मरणीय मनोहरता प्रस्तुत करते हैं. फोग के पौधे के लाल फल दवा बनाने में प्रयुक्त होते हैं. यह पौधा सर्वाधिक सूने भाग में उगता है. जंगली बेर के फल (बेर) एक विलासिता की वस्तु मानी जाती है. खेजड़ों की पतली टहनियां सावधानी से ईंधन के लिए एकत्रित की जाती हैं. बावजूद उन कठिनाइयों के जो मरुदेशी लोगों को पालने से लेकर कब्र तक घेरे रहती हैं, दुखी नहीं हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने एक ऐसी मानसिक अवस्था विकसित कर ली है जो उनको कुछ भी मिलता है उसी में संतुष्ट रखती है और कम मात्रा को ही आनंद से भोगते हैं और अनावश्यक रूप से उसके पीछे नहीं दौड़ते.


[पृ.10]: ... कुछ लोग दुनिया में कमाने के लिए बाहर जाते हैं. ऐसे बहुत संख्या में हैं घर के कबूतरों की तरह वापस लौटते हैं जब उनकी महत्वाकांक्षा पूर्ण हो जाती है. ढलती उम्र में महलों को त्याग कर अपने पुराने घरों में सीकरवाटी लौटते हैं. राजपूत जो कि फौज में ऊंचे पदों पर पहुंचते हैं और पर्याप्त पेंशन पाते हैं जिसके आधार पर वे अच्छी जगहों पर रह सकते हैं, उसी गांव में आकर रहना पसंद करते हैं, जहां उनका जन्म हुआ था.

जाटों के बारे में

[पृ.10]:कितना ही अत्याचार हो, कड़ा लगान लिया जाए, एक जाट अपने पुरखों की जमीन को छोड़ना पसंद नहीं करता. मरुप्रदेश की पुकार उसकी संतानों के लिए अप्रतिहत है और मैं भी यह जानता हूं क्योंकि मेरा समय भी इसे विदा कहने का है, मैं भी इस पुकार के प्रति बहरा नहीं हूं. एक मरुप्रदेशी के लिए उसकी भूमि का आकर्षण है. उसे यदि यह पूछा जाए कि आकर्षण क्यों है तो वह उलझन में पड़ जाता है और कुछ सोचकर कहता है कि सीकरवाटी स्वस्थ है और यह सत्य है पर क्यों? यह मैं नहीं जानता.

यहां पर हंसी और आमोद प्रमोद बहुत कम है. मरुदेशी गंभीर प्रकृति के और शांत रंग-ढंग के लोग हैं. कठोरता के बाद उनके स्पष्ट गुण भाग्यवादिता और क्षुद्रता हैं.... सच्चाई एक महान गुण है जिसको वे जबान से ही कह देते हैं.


[पृ.11]: मैंने 4 साल उस मरुदेश के पुनरुत्थान के लिए जो ईश्वर ने देखरेख के लिए मुझे सुपुर्द किया था योजना बनाने में लगाए. समस्या बहुत भारी है. कई कठिनाइयाँ हैं....

[पृ.13]:एक कठिनाई जो महसूस की गई वह यह है कि जाट जो कि कृषि करने वाले समुदाय का 70% हिस्सा है अब तक मुर्गी-पालन व सब्जियां उगाने को पूरी तरह ना करते हैं. सब्जियों और मुर्गियों और अंडों का स्थानीय बाजार में स्पष्ट अभाव परिलक्षित है और यह तथ्य उन कृषकों के लिए लाभ का अवसर प्रदान कर सकता है जिनके गांव से शहर को बस की दैनिक सेवा उपलब्ध है. परंतु नहीं- जाटों ने कभी भी मुर्गी पालन या सब्जी पैदा करने का कार्य न तो किया है न अब करने का इरादा रखते हैं. क्यों? ओह-मुर्गियां हमारे घरों में शोर करती हैं और सब्जियां उगाना बागवान का काम है किसान (जाट) का नहीं.

सीकरवाटी में जीवन-स्तर में सुधार के बारे में-

[पृ.14]:मुझे विश्वास है कि सीकरवाटी में पर्याप्त मात्र में जीवन-स्तर में सुधार लाया जा सकता है. पहले ही प्रारंभिक शिक्षा और चिकित्सा सहायता आबादी के बड़े हिस्से को उपलब्ध करवा दी गई है. और ऐसी योजनाएं बनाई गई हैं कि यह सुविधा सभी को उपलब्ध हो जाएगी. पशु-सुधार और कृषि सुधार के कार्य लक्षित हो रहे हैं. नए उद्योग आरंभ हो रहे हैं. न्याय और उचित लेनदेन स्थापित हुए हैं परंतु यह बात कि क्या देश की स्वाभाविक गरीबी वास्तव में संतोष जनक जीवन स्तर को बनाए रख सकेगी, एक ऐसा प्रश्न है जिसे मैं निश्चिंत जवाब नहीं दे सकता हूं.

मरुस्थल गुलाब की तरह फल-फूल रहे हैं परंतु यह विशाल पैमाने पर सिंचाई से ही संभव है. मरुदेश में भूतल में पानी उपलब्ध है परन्तु सिंचाई के लिए ऊर्जा की आवश्यकता है, विशाल पैमाने पर बिजली उपलब्ध कराना समस्या का हल हो सकता है, यदि उसके लिए धनराशि उपलब्ध हो. इस तरह की व्यवस्था


[पृ.15]:मरुदेश के वर्तमान निवासियों के आर्थिक संसाधनों की क्षमता में संभव नहीं है क्योंकि देश अनेक स्वतंत्र राज्यों और जागीरों में विभक्त है जो कि खर्चीले शाही घरों की व्यवस्था करते हैं. यदि कभी ऐसी सुविधाएं प्राप्त होती हैं तो वे पड़ौस के स्वशासित प्रान्तों के सम्मलेन से ही प्राप्त की जा सकेंगी. तब राजकुमार और प्रमुख उस बहुत कुछ को खो देंगे जो बहुत सुन्दर हैं और शानो-शौकत व दिखावा अदृश्य हो जायेगा.

हर्ष पर्वत के बारे में

[पृ.15]:सीकर वाटी के दक्षिण पश्चिम भाग में राजधानी सीकर से लगभग 6 मील दूर एक पहाड़ स्थित है जो युगों से इसके पवित्रता के लिए प्रसिद्ध है. क्योंकि क्या यही वह ढालू शीश नहीं है जहां भगवान शिव को देवताओं को पुनर्जित करने के लिए आना पड़ा जबकि वे राक्षस त्रिपुर के द्वारा नष्ट कर दिए गए थे और जिसने इंद्र और दूसरे देवों को स्वर्ग से निष्कासित कर दिया था?....

यह निश्चित है कि यह पहाड़ इंग्लैंड पर नॉरमन विजय (1066 ई.) से एक शताब्दी पूर्व एक तीर्थ स्थल था क्योंकि मैंने मंदिर के खंडहरों में से एक समर्पण पट्टिका प्राप्त की जिस पर इन मंदिरों की नींव रखने का वर्ष 961 ई. अंकित है. क्या यह इससे पूर्व भी श्रद्धालुओं के लिए स्थल था, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है- इसका नाम व परंपरा इंगित करते हैं कि मंदिर पूर्व के मंदिरों के खंडहरों और स्थल पर बनाए गए थे....

हर्ष का पहाड़ यद्यपि एक पर्वत श्रेणी के बहुत निकट है परंतु यह अलग स्थित है और पृथक हैं मानो प्रकृति ने इसकी विशिष्ट


[पृ.16]: पवित्रता को जोर देकर दर्शाना चाहा है. यह एक ऐसा चिन्ह है जो 40 मील या इससे भी अधिक दूरी तक देखा जा सकता है. इसकी चढ़ाई एक रास्ते के या ऊंची सड़क के द्वारा है जो पत्थर के टुकड़ों से तैयार किया गया है. इस रास्ते की दूरी नीचे से चोटी तक डेढ मील से कम नहीं है, जिसका औसत ढलान दस में दो है.

हर्षपर्वत की यात्रा: सर्दी के साफ़ दिन में जबकि सूर्य नील हरित आकाश में चमक रहा था, हम हमारी प्रथम तीर्थ यात्रा पर हर्षनाथ के लिए रवाना हुए. रास्ता इतना ढालू है और पत्थर असंख्य यात्रियों के पद प्रहार से इतने चिकने हो गए हैं कि हमें बार-बार सांस लेने और हमारे अंगों को आराम देने के लिए रुकना पड़ता था. घुमावदार रास्ते के प्रत्येक घुमाव के साथ उत्तेजना बढ़ती जाती थी. चोटी के ठीक नीचे एक मंदिर है जो कि नंगी चट्टान से बने एक प्राकृतिक चबूतरे पर स्थित है. अंदर सामने की दीवार पर गढे हुए उभरे पत्थरों पर चलती हुई नीलगाय चित्रित है.


[पृ.17]: पहाड़ की छोटी सपाट है, लगभग एक मील लंबी और औसत रूप से चौड़ाई लगभग 100 गज है. यह छोटी झाड़ियां और नागफनी के गुच्छों से ढका हुआ है. यदि दक्षिणी भाग ढालू है तो उत्तरी भाग एकदम नीचे की तरफ मैदानों में गिरते प्रतीत होते हैं. छोटे वायुयान से आप लगभग एक मील दूर खंडेला की पहाड़ियों को देखते हैं जो कि सीकर राज्य की सीमा बनाते हैं. कुछ दूर बाएं तरफ एक अन्य पहाड़ी है जिस पर एक गढ़ी (देवगढ़) सुरक्षा हेतु स्थित है. वहां से सुदूर में जयपुर के पहाड़ एक लंबी श्रृंखला बनाते दिखते हैं. उत्तर की तरफ जहां सीकर के पुराने महल सर ऊंचा किये खड़े हैं और इससे भी आगे धुंधले क्षितिज पर लक्ष्मणगढ़ का किला एक पहाड़ी पर स्थित है और कस्बे के केंद्र से स्पष्ट ऊंचा उठा हुआ एडिनबर्ग किले के संक्षिप्त रूप में परिलक्षित होता है.

मंदिर में पहुंचने के लिए कुछ सीढ़ियां हैं जो एक स्थान पर पहुंचती हैं जो कभी अहाता रहा होगा. जहां सीढ़ियां समाप्त होती हैं खम्भों एक युग्म है जो निश्चित रूप से आरंभ में एक प्रवेश द्वार की मेहराब को सहारा देता होगा जैसा कि शिलालेख पत्थर पर वर्णित है. कुछ कदम आगे एक ऊंचे चबूतरे पर जीवित आकार से बड़ा अंगच्छेदित नंदी स्थित है जो कि पवित्र बैल और शिव के सेवक के रूप में माना जाता है. यह एक ठोस संगमरमर के शिलाखंड से गढ़ा गया है. यह आश्चर्य जनक है कि इतने वजन के भारी शिलाखंड को पहाड़ पर कैसे ले जाया गया होगा. संदेह नहीं कि कभी इसे एक मंडप ढक कर रखता होगा परंतु अब तो केवल इसका आधार बचा है.


[पृ.18]: हर्ष मंदिर की दीवारों के चारों तरफ विष्णु और उनकी सखियों की आकृतियां लगी हुई हैं जो अच्छी सुरक्षित अवस्था में हैं. सहायक मंदिरों के चिन्ह सब तरफ विद्यमान हैं. परंपरा के अनुसार कुल 84 से कम मंदिर विद्यमान नहीं हैं. यहाँ पर्याप्त संख्या में सहायक मंदिर थे, हर्ष शिलालेख से जानकारी मिलती है. इनमें यह भी अंकित है कि यहां पांडवों की मूर्तियां भी थी. इस संबंध में सार्जेंट डीन, जिसने 1834 में हर्षनाथ की यात्रा की, लिखा कि उसने खड़ी चट्टान के किनारे पर 15 से 20 ऐसी मूर्तियां (लगभग सामान्य आकार से एक तिहाई बड़ी)


[पृ.19]:देखी जो की मौसम से अरक्षित होते हुए भी बहुत अच्छी हालत में थी. दुख है कि केवल 100 वर्ष बाद मुझे इस संख्या से आधी से भी कम संख्या मिली और मैंने उन्हें और 150 अन्य मूर्ति कला के सुंदर कीमती टुकड़ों, जो इधर-उधर 2 एकड़ के क्षेत्र में इधर-उधर बिखरे पड़े थे, हटाकर सीकर म्यूजियम में रखवाया.

शिव का एक नया मंदिर दृष्टतापूर्वक पुराने के निकट ही स्थित है. इसका जीवन महज 220 वर्ष होगा जिसे वर्तमान सीकर राज्य के संस्थापक राव शिवसिंह जी ने बनवाया था. इस पर चूने का प्लास्टर किया गया है पर जहां प्लास्टर उतरा है, सत्य को उजागर कर देता है. यह मंदिर भी अधिकांशत: पुराने मंदिर के मलबे से ही बना है और शायद इसी कारण पैतृक कुल में उत्पन्न होने का हक जता सकता है और इसकी दिखावटी भव्यता क्षमता की जा सकती है.

पुराने मंदिर से एक छोटा रास्ता एक और मंदिर, जो भेरुजी को समर्पित है, को जाता है. यहां पर भी पुराने भवनों के समान से पुनर्निर्माण स्पष्ट दिखता है, परंतु भीतरी पूजा-स्थल अपने मूल स्वरूप में स्थित रहा प्रतीत होता है. ज्यों ही हम सीढियों वाले धुंधले रास्ते से जो कि पवित्रम स्थल को जाता है, नीचे उतरते हैं जले घी की कस्तूरी जैसी गंध से आक्रांत होते हैं. खंबे और दीवारें चिकनी और धुआन्सी हैं क्योंकि पुजारी शताब्दियों से नैवेद्य जलाते रहे हैं. इसके बाहर भूतल में दो कोठरियां हैं जो खाली और छत रहित है परंतु कभी यह उन मनुष्यों के निवास रहे होंगे जिन्होंने संसार को त्याग कर अपने आप को कष्टपूर्ण तपस्या में लगाया.

मैंने समर्पण पट्टिका के अनुवाद को बाहर निकाला और एक नई समझ के साथ पढ़ने लगा. जहाँ पहले इसका संदेश अवैयक्तिक लगा था और दूर का लगा था, अब यह एक सन्निकटता और गहरे अर्थ से भरा हुआ लगा. मैंने प्रण लिया कि मैं उस शान को, जो मेरे चारों ओर बिखरी पड़ी थी, आगे होने वाली क्षति और उपेक्षा से बचाऊंगा.


[पृ.20]: इस प्रतिज्ञा को मैंने सीकर में म्यूजियम स्थापित करके पूरा किया.

राणोली गांव : सर्वप्रथम पहाड़ी के नीचे हर्षनाथ के निकट स्थित राणापालिका गांव का रहने वाला ब्राह्मण सुवास्तु ध्यान में आता है. मैं वहां जा चुका हूं और नकशे में अब गांव राणावाला के नाम से जाना जाता है. ग्राम के निवासियों ने बातचीत में इसे राणापादिका संदर्भित किया. सुवास्तु पुरोहितों के एक प्राचीन वंश से संबंधित था. शायद वे लोग हर्ष के पहाड़ के पूर्व के मंदिरों के संरक्षक रहे होंगे. मैं यह सोचना पसंद करता हूं कि वे संरक्षक थे और यह विचार कल्पना को अधिक थकाता नहीं है. परंतु वह वंश पतन की ओर अग्रसर हुआ जब तक कि सुवास्तु जो कि नंदी का स्वयम् अवतार था उसको सुधारा और एक दैवीय आदेश पहाड़ पर शिव का मंदिर बनाने हेतु ग्रहण किया.

अब अपने मंच पर सिंहराज कदम रखते हैं. वह अजमेर का चौहान राजा था जिसके राज्य में मरूदेश के कई भाग सम्मिलित थे. उसको सुवास्तु ने यह दैवीय निर्देश दिखलाया और वही वह था जो निर्देश की प्रतिपालना करने वाला संरक्षक बना. पहला पत्थर सन् 961 ई. में रखा गया.

हर्ष मंदिर के निर्माण की कठिनाइयां: कुछ समय के लिए उन कठिनाइयों पर मनन करें जो उन दोनों के सामने थी. यद्यपि हम नहीं जानते कि पत्थर कहां से काटा गया, यह निश्चित है कि इन मंदिरों में प्रयोग लाये जाने वाले पत्थर की किस्म उपलब्ध करवाने वाली खानें यहां से कम से कम 200 मील दूर हैं. सड़कें उन दिनों में सिर्फ रास्ता होती थी और नदियां बिना पुल होती थी. यातायात उन दिनों लकड़ी के पहियों वाली गाड़ियों,


[पृ.21]: हाथियों या ऊंट से होता था. और यदि इन कठिनाइयों पर भी जब विजय पाली जाती थी, जो कि स्पष्ट रूप से थी, तब भी पत्थर के बड़े खण्डों को पहाड़ पर ले जाना कैसे होता होगा. मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूं कि आधुनिक यातायात के साधनों और उठाने वाले उपकरणों से भी हमें टूटी हुई गढ़ी हुई मूर्तियां और खम्भों को पहाड़ से नीचे लाने में भी बहुत कठिनाई हुई थी. परंतु उन बहादुर लोगों ने उन शिला खण्डों को ऊपर पहुंचाने के तरीके ढूंढे और यह भी पत्थरों के काटे जाने से पूर्व जबकि वह अधिक भारी थे. उनका कार्य विलक्षण था.

परंतु उन दोनों भी जब मनुष्यों ने हर्ष मंदिर, और उसके आसपास जो कुछ है, मिलकर एक उत्तम वस्तु बनाई. पुन: अवतरित प्राणी अमर नहीं थे और न मानव प्रकृति ही सदा महान थी. सुवास्तु बावजूद अवतारीकरण के अपना कार्य पूरा करने से पूर्व ही मर गया और सिंहराज कला का संरक्षक और महान राजा विग्रहराज II नाम के दूसरे राजा द्वारा पदच्तयु कर दिया गया, मार डाला गया और उसकी रानी को अपने बाहुपास में ले लिया और उनके राजपुत्रों को अनुचर बना लिया.

उत्सुकता परंतु प्रसन्नता का विषय है कि विग्रहराज II ने अपने विजित पूर्व राजा से प्रतिस्पर्धा ही नहीं कि उसे मंदिर निर्माण के कार्यों में रुचि लेने में पीछे भी छोड़ दिया. उसके संरक्षण में निर्माण कार्य सन् 973 ई. में शुरुआत के ठीक 12 वर्ष बाद पूरा हुआ और इसका संस्कार संदीप्त, सुवास्तु के शिष्य के द्वारा किया गया. मंदिर का वास्तुकार वाररुद्र का प्रसिद्ध पुत्र था. आश्चर्य की बात है कि उसने अपने आपको पिता के नाम की शरण में क्यों रखा जबकि वह स्वयं बहुत प्रसिद्ध था. क्या यह विनम्रता थी या किसी की ईर्ष्या?

समर्पण पत्रिका में सारांश रूप में गांव की एक सूची है जो मंदिर को धर्मस्थ दिए गए थे. दाता के नाम भी दिये गये हैं. इन नामों में सिंहराज, उसके भाइयों और उसके दो पुत्रों, विग्रहराज II और उसकी दो पत्नियों साका-बड़ी और ताविका के नाम हैं.


[पृ.22]: सर्वनाश सन् 1679 के मई मास में घटित हुआ जब खान जहां बहादुर ने मुगल बादशाह औरंगजेब के आदेश अनुसार- या किसी तरह उस मूर्ति-भंजक स्वेच्छाचारी शासन को प्रसन्न करने के लिए- मंदिर को ध्वस्त करने के लिए हमला किया जो कि पूरे जयपुर और जोधपुर राज्यों पर था. उसने हर्ष के पहाड़ के मंदिरों को ध्वस्त किया और उन्हें जमींदोज कर दिया और प्रत्येक मूर्ति और गढ़ाई के कार्य को विकृत कर दिया. कोई भी बड़ा टुकड़ा अछूता नहीं बचा.


[पृ.23]: ....तब मेरा क्रोध बचकानी ध्वंसात्मक प्रवृत्ति के प्रतीक मुस्लिम नौकर के प्रति जागृत हुआ और मैंने उसे जितना बड़ा टुकड़ा मैं उठा सकता था उसके हाथों में लाद दिया और उसके पूर्वजों के अपराध के लिए उसे आदेश दिया कि वह इसे पहाड़ी के नीचे लेकर जाए. बिना हिचक उसने हुकुम का पालन किया केवल यह कहते हुए कि वह अब भी मूर्ति पूजा का समर्थन नहीं करता.

स्थान छोड़ने से पहले मैंने सावधानी से बचे हुए सर्वोत्तम टुकड़ों को म्यूजियम में स्थानांतरित करने के लिए चिन्हित और संख्यिकृत किया.


[पृ.24]: हर्ष ग्राम की स्थिति: एक अन्य अवसर पर हम हर्ष ग्राम की स्थिति को खोजने के लिए गए. यह घोसले की तरह छोटी वृक्षाच्छादित घाटी में पहाड़ की तलहटी में बसा है, जिसे इसलिए नाम पाया है. आज तेंदुए, लकड़बग्घे और कभी-कभी बाघ भी इसके कुछ निवासी हैं. एक बार यह शब्द लिखे गए उसे कुछ ही पहले वहां से एक मनुष्य का आधा खाया हुआ शरीर लाया गया था.

कथाएं और अनुमान इस गांव की पूर्व की महानता और इसकी लूट के संबंध में गढ़ ली गई हैं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह उसी समय नष्ट कर दिया गया था जब ऊपर के मंदिरों को ध्वस्त किया गया था और उन्हें अपावन हाथों से इसके निवासियों को निर्दयता से कत्ल कर दिया गया था. कुछ बचे हुए लोग जो कत्लेआम से बच गए, ने उसी नाम से एक अन्य गांव बसा लिया, जो लगभग एक मील से कम दूरी पर है. यह गांव अब भी है, यह अतिशय गंदा है. पुरोहितों में से स्पष्टत: किसी को भी बक्शा नहीं गया था. हर्षनाथ के वर्तमान पुजारी पुष्कर से ले गए थे. जबकि राव शिव सिंह जी ने एक नया मंदिर सन 1718 में बनवाया था. वे पुजारी अब भी 'पकारिया' नाम से जाने जाते हैं. पुराने गांव में से केवल हाथियों के अस्तबल बचे हुए दिखते हैं. एक सुंदर मंदिर के खंडहर भी हैं जो ऊपर वाले मंदिरों की तरह का रहा होगा. अनेक खंडहर और साधारण निवासों की नींवे खोदने पर निकलते हैं. वह पुरानी दीवार जो कि गांव के चारों तरफ थी, अब भी कुछ हिस्सों में तलाशी जा सकती है. यह बिना तरासे पत्थरों से बिना चूने के बनी हुई है. कुछ समय बाद हमें एक बावड़ी दिखी जिसे खोदा गया और मरमत की गई. इसके अलावा 6 या 7 कुएं भी पाए गए जो अब मिट्टी से भरे हुए हैं. परंतु यह फिर से ठीक किए जाने योग्य हैं. यदि हम स्थानीय कथाओं को मानें तो हर्ष एक गांव नहीं था


[पृ.25]: बल्कि एक शानदार शहर था. एक हिंदी का पुराना दोहा है:

जगमालपुरा हर्ष नगरी
बोम तालाब छतरी
एक बाजार मंडी गुदड़ी

जो इस बात को बताता है:- हर्ष के बड़े पोखर और जगमालपुरा के मकबरे के मध्य बाजार व हजार दुकानें थी और 900 कुवों को ढकती थी. ऐसा कहा जाता है कि पुराना शहर में चार गांव थे जो अब भी अस्तित्व में हैं. कटराथल जो कि कटला बाजार था, कासली जो कि कसाईबाड़ा और कसाइयों का बाजार था, जगमालपुरा जो कि साप्ताहिक बाजार या गुदड़ी था. छत्रधार नाम की नदी शहर के मध्य बहती थी, और इसके पानी को रेवासा झील में खाली करती थी. नदी का तल अब भी पाया जा सकता है जो कि मिट्टी में गहराई पर है और कहावत के अनुसार हड्डी की तरह सूखा है.

पवित्र हर्ष पहाड़ पर उड़ान: मैं यह बताना चाहूंगा कि हमने किस प्रकार एक बार इस पवित्र हर्ष पहाड़ पर उड़ान भरी. मैंने पायलट को जितना नीचा उड़ाना संभव हो सके उड़ाने के लिए कहा था क्योंकि मैं दूसरे खंडहरों की रूपरेखा को ऊपर से देखना चाहता था, जो कि धरातल से दिखाई नहीं देते. हम तीन लोग सिकुड़ कर सामने की केबिन में एक 'मोती' वायुयान में घुटे हुए कष्टपूर्ण स्थिति में बैठ गए. अचानक जब पर्वतमाला के केंद्र


[पृ.26]: पर नीचे उड़ रहे थे हम एक हवा के लघु क्षेत्र में टकराए और लगा कि हम जमीन से टकरा जाएंगे. उस क्षण के तनाव को बढ़ाने के लिए हमारा भारतीय सहयात्री चिल्लाया, "हे भगवान ! लोग हमेशा यह कहते हैं कि यह पहाड़ एक चुंबक है जो कि हर एक वस्तु को आकाश से खींच लेता है." परंतु हम उस हवा के क्षेत्र से सुरक्षित बाहर आ गए. यद्यपि मैं उन खंडहरों को देखना भूल गया. पहाड़ के चुंबकीय गुण की फिर परीक्षा नहीं करना चाहता. कौन जाने यह सत्य प्रमाणित हो जाए.

राजपूतों के बारे में

[पृ.27]: कैप्टन वेब राजपूतों के बारे में लिखते हैं कि यह आश्चर्यजनक नहीं है कि राजपूत जाति भारत में भी सबसे अधिक नफ़रत का पात्र थी. उनसे पीड़ित लोग कहते हैं कि ईश्वर ने छ: बार इस डाकू जाति को दमित किया और सातवां अवसर भी शीघ्र ही आने वाला है. वे आगे कहते हैं कि राजपूतों को याद रखना चाहिये कि चूहों और विजेताओं के लिए दुर्भाग्य से क्षमादान नहीं होता. राजपूत अपने आप को विशिष्ट वर्ग मानते हैं


[पृ.28]: और दूसरी जातियों में जन्म लेने को एक त्रासदी मानते हैं. ....अपने आप तक सीमित होने पर राजपूतों का प्रशासन का तरीका रुखा और सहज है. ब्रिटिश लोगों के आगमन से पूर्व कोई भी राजपूत अपनी जनता की भलाई के बारे में नहीं सोचता था. उसका ध्यान फ़ौज और किसानों से वसूल किये जाने वाले हर एक रुपये पर केन्द्रित रहता था. इस तरह के विचार मामूली परिवर्तनों के साथ अब तक भी प्रचलित हैं. इसमें कुछ अपवाद भी हैं परंतु जो लोग राजपूत को अच्छी तरह से समझते हैं, जानते हैं कि यह परिवर्तन केवल बाहरी हैं आंतरिक नहीं और 1938 का औसत राजपूत वैसा ही है जैसा शताब्दी पूर्व था.

[पृ.29]:यह संदेह की ही बात है यदि मैं कहूं कि कहीं एक भी राजपूत है जो इस बात से सहमत न हो कि शासन बजाय लोगों की सहमती के तलवार के बल पर ही होता है.

वे अब भी अपने हृदयों में इस विश्वास को गले लगाते हैं कि राजनीति और शासन की कला में विश्वासघात अपरिहार्य तत्व है.

साधारणतया यह माना जाता है कि वर्तमान समय का राजपूत अपने पूर्वजों की तुलना में पतनोन्मुख है. इसमें काफी सच्चाई है यह स्वीकार्य है और इस पतन के लिए जो शांति ब्रिटेन ने भारत को दी वह काफी हद तक जिम्मेदार है.

[पृ.30]:जो लोग शताब्दियों से तलवार के डर से उनकी प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ती करते रहे अब उनके विरोध में उठ रहे हैं. अब वे दिन लद रहे हैं जब जागीरदार किसानों को जानबूझकर अज्ञान में रखते थे ताकि वे और कठोर परिश्रम करें. राजपूत अब अधिक समय तक सम्पन्नता में नहीं रह सकेंगे.

उन्हें अपने आपको और परिवारों के पालन-पोषण के लिए मेहनत करनी होगी, अन्यथा नष्ट हो जायेंगे.

[पृ.30]: मेरे जैसे लोग जो राजपूत का हित चाहते हैं उन्हें सिर्फ समय न खोने की राय दे सकते हैं कि जीवित वस्तुओं को समय के साथ बदलना चाहिए या वे फिर न उठने के लिए गिर जायेंगे. ...परन्तु जिस व्यवस्था से वे चिपके हैं जिसको उन्होंने अब तक अनिवार्य माना है उसके अलावा जीने के और भी तरीके हैं.

शेखावाटी के नामकरण पर -

[पृ.31]: शेखावाटी के नामकरण पर कैप्टन वेब लिखते हैं कि शेखावाटी के सभी सरदारों की उत्पति बालोजी से मानते हैं । बलोजी आमेर के शासक उदयकरण (1363 -1388 ) के तीसरे पुत्र थे । बलोजी को अमृतसर (अमरसर) जिला प्राप्त हुआ । उनका पुत्र शेखाजी था जिसने अपने नाम पर शेखावाटी नाम दिया । एक राजपूत ने कैसे मुस्लिम नाम पाया यह रुचिकर है । यह नाम एक मुस्लिम संत के सम्मान स्वरुप दिया गया था जिनकी दुआओं से निसंतान मोकल बालोजी ने पुत्र पाया ।

संत का नाम शेख बुरहान था । और उनका परिवार स्थान अब भी अचरोल (जयपुर राज्य) के पास मौजूद है । एक दिन वह अमृतसर के पास एक खेत से गुजर रहे थे. जिसमें मौकल जी खड़े थे. उनके पास पहुंचकर उन्होंने परंपरागत अभिवादन किया, "क्या मेरे लिए आपके पास कुछ है?" "श्रीमान जी आप जो को चाहते हैं". परंतु बरहन केवल दूध का एक गिलास चाहते थे. तब एक पास खड़ी हुई सुखी गाय के पास जाने पर खाली ऑडी से प्रचुर मात्रा में दूध का नि:सरण होने लगा.

मोकल जी को संतुष्ट करने के लिए यह पर्याप्त था कि शेख चमत्कारी संत है- और प्रार्थना की कि उनके आशीर्वाद से वह


[पृ.32]: नि:संतान न रहे. शेख इससे सहमत हो गए और कुछ समय पश्चात मोकल जी के पुत्र का जन्म हुआ और बुरहान के निर्देशानुसार उसका नाम शेख की जाति के अनुसार शेखा रखा गया. बदले में शेख ने यह भी चाहा कि राजपूत बालकों को मुस्लिम बालकों की तरह बद्दी पहनना चाहिए. इसके अतिरिक्त उसे नीला कुर्ता और टोपी भी पहननी चाहिए. उसे सूअर के मांस से परहेज करना चाहिए और ऐसा मांस नहीं खाना चाहिए जिसमें खून शेष हो. उसमें यह भी निर्देश दिया कि शेखाजी के प्रत्येक पुरुष संतान के जन्म के समय एक बकरे की बलि दी जानी चाहिए, कलमा पढ़ा जाना चाहिए और मुस्लिम परिवारों की तरह बालक पर खून छिड़का जाना चाहिए.

शेखाजी के जन्म के बाद पांच शताब्दियों के बीत जाने के बाद भी इन मान्यताओं को अब तक निभाया जाता है. अधिक अजीब बात यह है कि शेख बुरहान का स्थान एक धाम के रूप में है और 100 के करीब वंशजों के मुफ्त जमीन पर अधिकार हैं.

कुछ भी इसे अधिक उस कलुषता को, जो अभी शेखावाटी के राजपूतों को ढके हुए हैं, स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर सकता जो कि एक तथ्य को स्वीकारना है कि अब भी उनके यहां जन्म लेने वाली 80% लड़कियां जन्म से ही मार दी जाती है. सर्वमान्य तरीका यह है की बच्ची के मुंह में अफीम का एक टुकड़ा रखा जाता है और उसको तुरंत मिट्टी के घड़े में रखकर गाड़ दिया जाता है. यह रिवाज इतने विशाल पैमाने पर मान्य है कि इसको समाप्त करना अत्यधिक कठिन है और इस अपराध की गवाही प्राप्त करना असंभव है. यह रिवाज बिना किसी शंका के आर्थिक विचार से उत्पन्न हुआ. अधिकांश राजपूत तुलनात्मक रूप से गरीब हैं और एक राजपूत लड़की के पति के लिए जो कीमत देनी पड़ती है वह ऊंची है.


अफीम का सेवन - [पृ.33]: सीकर के राव राजा के अधीन तेरह से कम किले नहीं हैं जो कि उसके राज्य में सामरिक महत्व के स्थानों पर बने हुए हैं. प्रत्येक में सेना है और पर्याप्त मात्रा में बारूद और अफीम की पूर्ति है. अफीम राजपूतों की नजर में दूसरी उतनी ही अपरिहार्य वस्तु है जितने हथियार व गोला बारूद. कोई राजपूत अफीम की घूंट या


[पृ.34]: गोली के बिना लड़ता नहीं है. जब किसी किले का समर्पण करना अनिवार्य हो जाता है, समय की मानी हुई परंपरा है कि औरतों को चिता में जला देना और तब केसरिया बाना पहनकर और अपने आप को अफीम से भरकर आगे बढ़ना और मरते दम तक लड़ते जाना.

जुझार स्मारक: उन राजपूतों के बारे में विलक्षण कहानियां कही जाती हैं जो सर कट जाने के बाद भी लड़ते रहते हैं. शेखावाटी में मैंने अनेक स्मारक उन सर कटे हुए बहादुरों के देखे हैं. उन्हें जुझार कहा जाता है.

मोरडूंगा जुझार स्मारक: एक स्मारक मोरडूंगा गांव में स्थित है. इससे जुड़ी हुई कहानी इस प्रकार है:- 17वीं में शताब्दी के आखिरी भाग में रतनसिंह बालापोता अपना विवाह उत्सव मनाने बाहर गया हुआ था. जब विवाह समारोह चल रहा था उसे समाचार मिला कि डाकू के एक गिरोह ने उसके गांव में जाकर उसके पशुओं को हांक लिया था. उसने तुरंत वहां से चलकर डाकुओं को मोरडूंगा में पीछा करके पकड़ा. बिना झिझक भयंकर क्रोध से उसने उन पर हमला किया. यद्यपि परिस्थितियों उसके बिल्कुल विपरीत थी और लड़ाई में एक डाकू की तलवार से उसका सिर धड़ अलग कर दिया गया. उसकी ताकत और साहस इतना अधिक था कि बेसिर होते हुए भी उसका दाहिना हाथ तलवार चलाता रहा और स्वयमं के मरने से पहले उसने कई दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया स्मारक जो इंट से बना चबूतरा है उस स्थान पर जहां उसकी संतप्त पत्नी सती हुई और अपने पति के सर को गोद में लिए हुए जीवित जला दी गई थी.

पालास जुझार स्मारक: ऐसा ही एक अन्य स्मारक गांव पालास में किसी मोतीसिंह की याद में बना है. युवा जोड़े के लिए विवाह पश्चात रिवाज स्वरूप वहां पर तीर्थ यात्रा के लिए इस कामना से जाते हैं कि जब उनके कोई लड़का पैदा हो तो वह मोती सिंह जुझार जैसे अदम्य साहस वाला बने.


चारण समुदाय : [पृ.35]: राजपूतों के सहचर परंतु उनसे संबंधित नहीं, वे चारण हैं. वह समुदाय राजपूतों की वंशावली रखता है. यह उनके कवि हैं जो उनके बहादुरी के कारनामों का गुणगान करते हैं, जो उनके संरक्षक हैं और जिनसे वे अपनी सेवाओं के लिए बड़ी मात्रा में जमीन पाते हैं. सीकरवाटी में 40 से कम गांव नहीं है जो चारणों को दिए गए हैं. उनके द्वारा जो विशेष सुविधाएं प्राप्त हैं उनमें बिना दखल के युद्ध के समय एक जिले से दूसरे जिले में जाने की अनुमति और जहां भी वह जाएं वहां पर सहायता व खर्चा देना. इस मदद का उन्होंने उथल-पुथल के दिनों में व्यापारियों के यातायात दलाल बनकर बहुत फायदा उठाया. यही सुविधा इंग्लैंड के प्रकृति पूजक पुरोहितों द्वारा प्राप्त की गई थी और मुझे इस बात का सदा खेद रहा है कि अब तक मैं इस रुचिकर और सांकेतिक समानता का अनुकरण करके इसकी खोज करने के लिए समय नहीं निकाल सका.

ग्रामीण जीवन

[पृ.37]: बड़े गाँवों में पक्के मकान बनियों के हैं. ये बनिए भारतीय जीवन के वैसे ही आवश्यक अंग हैं जैसे सड़क साफ़ करने वाले अछूत.

गांव का कुआं: गांव के मध्य में एक कुआं होता है जिसका चबूतरा ऊंचा है और इसके लगभग 20 फीट ऊंचे चार खंबे हैं. ये ऊँचे खम्भे मरूप्रदेश में एक निशान का काम भी करते हैं जो प्यासे से यात्री को प्यास बुझाने के लिए दूर से ही बुलाते हैं. मरूप्रदेश में उन कुवों की सामान्य विशेषता है जो दानदाता उदार लोगों द्वारा बनाए गए हैं.

गांव ये कुंए ग्रामीण गपशप के केंद्र होते हैं. यहां पर औरतें रोजाना दिन में दो बार अपने घरों के लिए पानी खींचने और समाचार विनिमय के लिए मिलती हैं. सांवली ग्रहणियां और लड़कियां एक-एक दो-दो करके आती हैं. यह भड़कीले रंग के घाघरे और चुनरियां ओढ़े होते हैं और बड़े-बड़े घड़ों को अपने सिर पर शानदार ढंग से संतुलित किये होती हैं. ये कुंए सांसारिक कष्टों से दूर होने के स्थान भी हैं. औसत रूप से सीकर में सप्ताह में एक बार आत्महत्या


[पृ.38]: या दुर्घटना के रूप में किसी अभागे के स्वयं गिरने या वैसे गिरने की सूचना मिलती है. इन कुवों की गहराई में पर्याप्त भिन्नता होती है. अधिक शुष्क भागों में 300 या 400 फीट गहरे कुंए होना असामान्य नहीं है.

क्योंकि चबूतरों और मकानों में ईटों का काम जिन स्थितियों का सामना वे करते हैं उसका मूक गवाह है. प्लास्टर उतर जाता है और इन इंटों में गड्ढे हो जाते हैं और जहां भी खुली होती हैं चमकती हैं.

पानी खींचने में शिष्टाचार: गाँव के कुवों में पानी खींचने में सख्त शिष्टाचार का पालन किया जाता है. ऊंची जाति के लोग चबूतरे के उच्चतम स्थान से पानी खींचते हैं. अछूत लोग नीचे स्थल से पानी खींचते हैं जो कि उनसे उत्कृष्ट लोगों के सामने की तरफ होता है.

प्याऊ लगवाना: कुवों की दानशीलता से निकट से जुड़ी वस्तु प्याऊ लगवाना है. यह कुछ अंतराल पर सड़क के पास या कसबों में होती हैं और प्यासे राहगीरों को ठंडा पानी उपलब्ध कराती हैं. धनी व्यापारी या अन्य लोग किसी दिवंगत संबंधी की स्मृति में उनकी व्यवस्था करवाते हैं. यहाँ रोजाना धूल से सने यात्रियों को आते देखा जा सकता है. एक मिट्टी के घड़े से ब्राह्मण सहायक द्वारा पीतल के लोटे में पानी डाला जाता है. सर्वप्रथम वह पीने वाले के हाथों पर थोड़ा पानी उन्हें धोने के लिए डालता है. तब हाथों को कप की तरह (ओक) बनाकर बैठकर यात्री ब्राह्मण के द्वारा उसके हाथों में डाले जाने वाले पानी को गटागट पी जाता है. सर का हल्का सा इशारा पानी की पर्याप्तता का प्रतीक होता है और यात्री उठता है. अंतिम कुल्ले को एक लम्बी धार के रूप में बाहर निकलता है. चेहरे को हाथों से पौंछता है और इस दान की स्थापना करने वाले को आशीर्वाद देता हुआ रवाना होता है.

हर साल मेई-जून के महीने में मरूप्रदेश में लू प्रचंड होती हैं और येतीखी आवाज करती हैं. यह मानसून की पूर्व सूचक होती हैं. जब यह गति से आगे बढ़ती हैं तो धूल एक चक्रवात के रूप में ऊपर उठती हैं. सूर्य को ढक लेती है मरूप्रदेश के प्रत्येक कोने में प्रवेश हो जाती हैं और पीले लबादे के रूप में उसे ढक लेती हैं. हवा में धूल की पागल बना देने वाले गंध भर जाती है और परिणाम स्वरुप मिजाज गरम हो जाता है. दिनों और सप्ताहों तक तीखा और तेज गति से चलने वाला धूल का आक्रमण चिनाई को


[पृ. 39]: भयंकर क्षति पहुंचाता है जो कि इसके रास्ते में आती हैं. सन 1938 का वर्ष सबसे खराब था जो हमने महसूस किया. कई दिनों तक उड़ी हुई मिट्टी से आंखों में दर्द होता था और लगातार गले और नाक को नजला पीड़ित करता था. भोजन और पेय पदार्थ दांतों में किरकिरी लाते थे. रेलवे भी लगभग बंद हो जाता था जब मिट्टी के टीले तूफान से चालित पटरी को गुंबद बनकर ढक लेते थे. हम जीवित रहे और हिंदी के इस पुराने दोहे की पुष्टि की-

वाह री तेरी शेखावाटी
आधो चून आधी माटी

मरुदेश के चार शहरों की कहानी

[पृ.42]: मरुदेश के सुदूर कोने में फैले हुए चार बड़े शहरों का होना किसी की भी संभावना की भावना को विचलित करने वाला तथ्य है कि इनकी आबादी 13000 से 26000 के बीच है. ऐसा लगता है कि मुगल और मराठा आधिपत्य के दौरान धनी व्यापारी अपने लिए व धन के लिए सुरक्षा की तलाश में किसी बिना पहुंच वाले व अनाकर्षक स्थान को देखते थे जहां वे बिना भय और दखल के हटकर रह सकते. उनका चयन मरुदेश


[पृ.43] पर होता था. वहां पर वे शानदार घर बनाते थे और अच्छे से बैठकर अच्छे समय का इंतजार करते थे क्योंकि ब्रिटिश राज में शांति सुरक्षा बहाल होने के कारण वे भारत के बड़े नगरों में व्यापार फिर से आरंभ कर सके. केवल जन्मदिन या शादियों के लिए अपने घरों को आते थे. कोलकाता में सीकर के निवासी हैं और उनके संयुक्त संपत्तियां लाखों रूपयों की है. आकार के क्रम में यह चार कस्बे, सीकर, फतेहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़ हैं. इसकी उम्र को देखते हुए स्वायत शासन में प्रथमता की वरिष्ठता फतेहपुर को दी जानी चाहिए.

फतेहपुर शहर:

फतेहपुर नवाब फतेहसिंह के द्वारा 1522 ई. में बसाया गया था. सन 1731 में राव शिवसिंह द्वारा अधिकृत किया जाकर यह फतेहपुर के नवाब के अधीन 800 वर्ग मील प्रदेश सहित सीकर में शामिल कर लिया गया.

फतेहपुर का नवाब: फतेहपुर का नवाब (Sardar Khan II) (1703-1729 AD) उक्त समय बड़ा विलासी था. उसने एंटोनी की तरह अपने राज्य को प्यार के लिए खो दिया. उसकी क्लियोपैट्रा - तेली की औरत थी जिसको उसने अपहरण करके अपनी पत्नी बना लिया. एक समकालीन कविता में वर्णित है कि किस प्रकार उसने तेलिन के लिए एक महल बनवाया और रात दिन वहां उसके साथ रहा, एक घड़ी के लिए भी उसके बिना नहीं रह सका. अपनी असली पत्नी बीवी खानजादी के साथ वह दुर्व्यवहार करता था. उस कविता के शब्दों में "उसे एक कुली का जीवन बितवाता था और एक पलंग से उसके पैर बांध देता था". वास्तव में एक ईर्ष्यालु पत्नी के लिए व्यवहार यह बहुत कठोर ही था.

समय पाकर तेलिन ने अपने शाही प्रेमी से एक पुत्र को जन्म दिया. एक ओछी जात रखैल की मेल से उत्पन्न संतान को नवाब ने अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा. अपने वैध वारिस अपने भतीजे को दूर रखना चाहा. परंतु उसके मुख्य प्रजाजन कायमखानी ऐसे प्रस्ताव से दुखी थे. जाति को अपना इरादा चाहिए था. उपस्थित लोगों के दिलों में आग लग गई. क्योंकि सब ने सोचा कि एक शर्मनाक बात बोली गई थी. उन्होंने असली वारिस के पक्ष में तर्क दिए पर नवाब द्वारा उनको गालियां देखकर बेइज्जती से भगा दिया गया. वे अपने कैम्प में लौट आये परंतु घोड़े की जीनें नहीं


[पृ.44]: उतारी. उन्होंने जयपुर जाने का निश्चय किया और नवाब तेलिन को बर्खास्त करवाने के लिए सहायता चाही. सीकर में होकर जाते समय वे राव शिवसिंह से मिले. राव ने कहा, "क्या कायमखानी जाती कलंकित हो गई है? और फतेहपुर को उखाड़ फेंकने के लिए जयपुर की सहायता की क्या जरूरत है? मैं तैयार हूं." कायमखानियों ने विश्वास के साथ जवाब दिया, "ओ दौलतसिंह के बेटे सेवारथ में बैठो और तेलिन व नवाब को हमारे हवाले करो."

कुछ सप्ताह पश्चात सीकर के राव शिवसिंह ने 30000 की सेना का नेतृत्व किया. उनमें 10000 ही फतेहपुर के पास मैदान में लड़े. नवाब घबरा गया. प्रदेश छोड़कर भाग गया. शिव सिंह ने किले और कस्बे को अधिकार में ले लिया और तब कस्बे और प्रदेश को अपने राज्य में मिला लिया. कायमखानी प्रदेश को शिवसिंह द्वारा अपने राज्य में मिलाने से हताश हो गए. कायमखानियों के इस अविश्वास की स्मृति अब तक भी खटकती है. जब 1938 में सीकर विद्रोह हुआ और राव राजा और उनके राजपूत जयपुर सेना द्वारा घेर लिए गए तब कुछ कायमखानी मेरे पास में इस आशय को लेकर पहुंचे कि ईश्वर प्रदत्त अवसर का उपयोग करके वे अपने खोए हुए अधिकार फतेहपुर की नवाबी को फिर से प्राप्त कर लें. बहुत मुश्किल से उनको इस योजना की क्रियान्वति के प्रयत्न न करने के लिए समझाया गया.

सांवले वर्ण की क्लियोपैट्रा के लिए बनवाया गया महल अभी है परंतु इसकी दीवारें उम्र के साथ कलुषित हो गई हैं. यह अब भी तेलिन के टावर का नाम से पुकारा जाता है. ऊपर के मंजिल के एक कमरे में लाल वार्निश किया हुआ पायों वाला पलंग हटाया जिसकी यह विशेषता थी कि वह तेलिन द्वारा काम लिया गया था. काश! यदि पलंग भी कानाफूसी कर सकते!

भयानक हत्याकांड: किले के दूसरे भाग से एक संकरी सीढ़ी है जो नवाबों के मूल महल के जनानखाने की तरफ जाती है. यहां पर 200 वर्ष पूर्व भयानक हत्याकांड हुआ- जयपुर की सेवा में सेवा करते हुए राव शिवसिंह बाहर थे और उन्होंने अपने बड़े पुत्र सम्राट सिंह को अपने राज्य की देखभाल में छोड़ा. उसका अपने छोटे भाइयों मेघसिंह


[पृ.45] और केरतसिंह से झगड़ा हो गया. एक दिन जब वह दोनों युवक बाहर गए हुए थे उसने अपने आप को सीढिओं के एक मोड़ में छुपा लिया और उनके आने का इंतजार किया. उनकी वापसी में, जब वे सीढिओं में अपनी पत्नियों के कक्षों की ओर बढ़ रहे थे, उसने दोनों को तलवार से हत्या कर दी. इस अपराध के लिए राजपूत बिरादरी के लोग उससे नफरत करने लगे. वह अपने पिता का उत्तराधिकारी बना परंतु कुछ वर्षों पश्चात वह मर गया. उसके पुत्र को थोड़े समय बाद बाहर निकाल दिया गया. सम्राट सिंह का वंश अब भी अस्तित्व में है और सीकर के मुखिया होने का दावेदार है परंतु स्थानीय भावनाएं इस तरह की पुनर्स्थापना को कभी स्वीकार नहीं करेंगी. भाइयों की हत्या की स्मृति किस प्रकार लंबे समय तक रहती थी उसका उदाहरण है कि सीकर के राव राजा फतेहपुर किले में प्रवेश नहीं करते हैं.

किले की मूल दीवारों में से अब कुछ विशेष नहीं है. राव शिवसिंह ने गड़े खजाने की असफल खोज में किले पर अधिकार करने के पश्चात शीघ्र ही उसकी नीवों को खुदवा डाला. उसने दीवारों को फिर बनवाया और नवाब के महलों में एक नया भाग जुड़वाया. पुराना भवन प्रतीकात्मक मुगल शैली का है, वर्गाकार और भव्य है. शताब्दियों के समय ने इसकी सफेदी को कलुषित कर दिया है और आंधियों ने नीली फारसी सजावटों को विकृत कर दिया है जो कि कभी बाहरी दीवारों को प्रचुरता से सजाता था. इन सजावटों में से केवल कुछ चिन्ह शेष हैं जिनसे हम इस विगत राजवंश की उन पुरातन सुंदरताओं का चित्र पुनर्निमित कर सकते हैं. जब मैंने सर्वप्रथम इसे देखा- यह हर एक पतन और उपेक्षा से हारती हुई लड़ाई लड़ रहा था. मेहराबें टूटी हुई थी और सुंदर छोटे झरोखे जिन में पत्थर में खुदाई की जालियां थी या तो जहां गिरे वही दंडवत थे या कांपते हुए शीघ्रपतन के खतरे में लटके थे. मैं इस नाश का पुनरुद्धार करने के लिए बहुत कुछ कर सका. कायमखानियों की सहायता से अलफखान, जो कि महानतम नवाबों में से एक था, के मकबरे की मरम्मत करवा सका.

फतेहपुर दूसरी बार 1799 ईस्वी में लूटा गया. (विस्तृत विवरण देखो पृ.62)


फतेहपुर के सेठ: [पृ.46] फतेहपुर स्वयं एक महलों का शहर है जो सेठों ने बनवाए हैं. इनमें से कुछ भवन एकड़ों भूमि को घेरे हुए हैं और कुछ अपवादों को छोड़कर एक ही नमूने का अनुकरण करते हैं. साधारणतया सड़क पर खुलता हुआ एक भव्य प्रवेश द्वार, दरवाजे लकड़ी की खुदाई करके पीतल से जड़े हुए हैं, भवन वर्गाकार या आयताकार हैं, अधिकांश ये रंगीन भारतीय दृश्यों से सजाए जाते हैं, जिन में हाथी, ऊंट, घोड़े और योद्धा मुख्यरूप से विभिन्न अवस्था में होते हैं या हिंदू देवी-देवता विभिन्न अवस्थाओं में होते हैं.

पूर्वजों की छतरियां: बहुधा पास के भूभाग में पूर्वजों की छतरियां देखी जा सकती हैं. इनमें एक कस्बे के बाहरी हिस्से में स्थित है. यह संगमरमर में एक कविता है और किसी भी राजा की जो छतरियां मैंने मरुदेश में देखीं हैं उनसे अत्यधिक सुंदर हैं. इस स्मारक की देखभाल करने वाले ब्राह्मणों को प्रचुरता से सदा-सदा के लिए धर्मस्थल दिया गया है. परंतु सेठ जिसकी यादगार इस स्मारक में संचित है के वर्तमान वंशज जूए और असफल सट्टेबाजी के कारण आर्थिक कमजोरी से भीख मांगने के कगार पर पहुंच गए हैं.

मारवाड़ी बिरादरी: ये व्यापारी राजा मारवाड़ी बिरादरी से संबंधित हैं. इनमें से बहुत से खाली हाथ एक बिस्तर और थोड़े से रुपए लेकर रवाना हुए थे. कपास और जूट का सट्टा करके कोलकातामुंबई के बाजारों में बहुत से मामलों में विशाल धन एकत्रित किया. एक बार धनी बनकर भी मारवाड़ी अपने पुरानी कंजूसी के ढर्रे पर चलता है. वह केवल भवन निर्माण या शादी पर खर्च करके ही आनंदित होता है. एक वर्ग के रूप में वे चालाक हैं. वस्त्र या व्यक्ति में मैल और व्यापारिक लेनदेन में अविश्वसनीय हैं. रुपया उनका भगवान है और कोई भी मारवाड़ी कोई भी काम व्यर्थ में नहीं करता. वे संस्थानों, जैसे अस्पताल, पाठशालाओं या अनाथालय आदि को प्रचुरता से दान देते हैं परंतु उनके पीछे उनका अंतरनिहित उद्देश्य अपने नाम को चलाये रखना होता है. अनाम-दान को एक बड़ा अपराध मानते हैं. इसे पैसे को फेंकना समझते हैं. इससे भी आगे यदि हरएक मामले में नहीं तो अधिकांशत: वे जो धन खर्च करते हैं वह "श्रीजी की लाग" से आता है जो वह अपने ग्राहकों पर प्रत्येक व्यापारिक लेनदेन पर वसूल करते हैं. फिर भी धन उनकी स्मृति को संजोए रखने के लिए दिया जाता है.

सीकर शहर:

सीकर शहर राव दौलतसिंह द्वारा 1687 ई. में बसाया गया था. यह 26000 से अधिक आबादी का सुंदर शहर है. भारतीय मापदंडों से यह विलक्षण रूप से साफ और अच्छा नियोजित है. यह विद्युतीकृत है और यहां रेलवे भी है. यह सीकर राज्य की राजधानी है.

सीकर नामकरण: सीकर के नाम के उद्गम के बारे में मतैक्य नहीं है परंतु संभवतया जिस जमीन पर यह बसा है उसे जमीन के पूर्व मालिक एक जाट से लिया गया है. प्रारंभिक दिनों में समस्त निवासी सुरक्षा के लिए इसकी भारी दीवारों के भीतर रहते थे. यह दीवारें अभी पूर्णतया सुरक्षित स्थिति में हैं. बाद में आबादी बढ़ने पर निवास की जगह सीमित हो गई और कस्बा पत्थर की रूकावटों को पार करके आगे बढ़ने लगा. परिणाम स्वरुप अब लगभग दो तिहाई घर परकोटे से बाहर रहने लगे हैं.

राजा का गढ़ या महल: परकोटे के केंद्र में राजा का गढ़ या महल स्थित है. यह एक भारी ढांचा है जो अपना मस्तक अन्य सब कुछ से ऊपर उठाए खड़ा है. इसमें बहुत से सुंदर कमरे और हाल हैं. परंतु यह मुख्य रूप से आधुनिक युग के आराम के विचारों से अनभिज्ञ है. कस्बे की तरह ही गढ़ अढाई शताब्दियों की अवधि में बढा है. इसमें विभिन्न खजाने, जवारात के कक्ष व हथियार हैं. इसके दो हाल जिसे मैं कभी थक न सका मकराना महल और चीनी महल हैं.

पहला पूरा क्रीम रंग के संगमरमर से बना है. इसके खुदाई से सजे हुए खंबे और उभरी हुई दीवारें जिसमें असली सोने का काम किया हुआ है और गहरी लाल रंग वह नीले रंग में चित्रित है. दूसरे में राजपूत योद्धाओं, युद्धों, जुलूसों का भी चित्रण बहुत चतुराई से किया गया है.

माधव निवास कोठी: पुराने भवन से कुछ दूरी पर बनी माधव निवास कोठी जिसका मुख्य आकर्षण सुनहरे सिंहासन और सोने का मुलम्मा की हुई कुर्सियों की कतारे हैं. यहां वर्ष में दो बार राज्य के कुलीन और अधिकारी राजा को सम्मान देने और उसके जन्मदिन और दशहरे के त्योहार पर नजराने देने के लिए इकट्ठे होते थे. दरबार में रंगीली दृश्य होते हैं जिनमें समस्त प्राचीन राजचिन्ह, फूलों की कढ़ाई के किमखाब, गहरे लाल रंग के परिधान राजशाही की सनातनता को प्रदर्शित करते हैं.

रामगढ़ शहर :

रामगढ़ सीकर जागीर के उत्तर में बीकानेर राज्य की सीमा से कुछ मील दूर भूभाग में स्थित है. यहां पर बदलते हुए मिट्टी के टीलों में होकर पहुंचा जाता है जो दृश्य को धुंधला कर देते हैं और यात्री को एकाकीपन और उदासी से प्रभावित करते हैं.

रामगढ़ किस तरह से बना इस सम्बन्ध मुझे निम्नलिखित कहानी इस शहर को बसाने वाले सेठ चतुर्भुज के एक वंशज द्वारा कही गई थी. सीकर के राव देवीसिंह की रानी एक बार बीकानेर राज्य के चूरू में यात्रा पर गई. उसकी ननद वहां पर रहती थी. उसने ताना दिया कि सीकर, जहां मैं रहती थी, इतना सुंदर शहर नहीं था जितना चूरू था.


[पृ.50]: घर आकर रानी ने अपने पति को सूचित किया कि वह तब तक खाना नहीं खायेगी जब तक वह एक ऐसा सुंदर शहर न बसवा देगा जैसा चूरू है. राव ने रानी को इंगित किया कि शहर एक दिन में नहीं बसाया जा सकता. परंतु वह जितना संभव होगा ऐसा करेगा और अपनी पत्नी की इच्छा पूरी करेगा, यदि वह भोजन कर ले.

थोड़े समय बाद राव ने एक टीम चुरू भेजी. उन्होंने सेठ चतुर्भुज के समस्त बही खातों को जप्त कर लिया और सीकर वापस ले आए. सेठ बहुत क्रोधित हुआ और तुरंत शिकायत लेकर राव के पास सीकर पहुंचा. उसने बताया कि बहियाँ राजा के लिए किसी काम की नहीं थी जबकि सेठ के लिए अधिकतम कीमत की थी. राव उन्हें वापस लौटाने को सहमत हो गया यदि वह सीकरवाटी में बस जाए और चूरू से सुंदर शहर बसाए. अंत में सेठ सहमत हो गया और नासा नाम के गांव का चयन किया जहां अब रामगढ़ स्थित है. यह 1790 ईस्वी में बसाया गया.

दूसरी विलक्षण और रुचिकर बात उसी व्यक्ति द्वारा कही गई, जो उन परिस्थितियों को वर्णित करती है जिनमें पोद्दार परिवार धनी और महत्वपूर्ण बना. अपनी युवावस्था में सेठ चतुर्भुज चूरू के एक वृद्ध जति को संरक्षण दिया करता था. जति ने सेठ के लिए एक शुभ दिन तय किया जिस दिन वह सुदूर प्रदेशों के लिए रवाना हो, तो उसके पर्याप्त धन कमाने की पक्की संभावना होगी.

तय किए हुए दिन चतुर्भुज रवाना हुआ परन्तु शीघ्र ही उसने सड़क पर एक फन उठाये हुए काले नाग को देखा. इसको अपशकून समझकर और मृत्यु का चिन्ह मानकर वह गांव वापस गया और जति को सारा वृत्तांत सुनाया. जति ने उसे बताया कि यह अच्छा शकुन था और नाग का फन एक सुनहरे छाते का प्रतीक था. उसने चतुर्भुज को धनी बनने और राजाओं से दोस्ती होने के आश्वासन के साथ फिर यात्रा करने को कहा.

चतुर्भुज पहले बठिंडा गया जहां अनाज का व्यापार किया. एक रात्रि को जब दुकान में बैठा था कुछ लोग भोजन खरीदने के लिए आए. पैसा न होने के कारण उन्होंने उसे कुछ तस्तरियां दी


[पृ.51]: जो पीतल की बनी दिखाई दी. अगले दिन वह गांव से बाहर गया, एक ऐसे कैंप के पास पहुंचा जो अभी-अभी जलाया गया था. एक डाका पड़ा था और डाकू घबराकर कैंप को आग लगाकर भाग गए थे. उसने पाया कि वह व्यक्ति जिसने उसकी पिछली रात तस्तरियां दी थी उसी डाकू गिरोह का सदस्य था. दुकान पर लौटकर वह एक अधिकारी के पास गया और अग्निकांड के मलबे और राख को हटाने का ठेका ले लिया. खुदाई में उसने जावाहरात से भरा एक थैला पाया, कीमती पाषाण भी. इस अतिरिक्त पूंजी से उसने व्यापार विकसित किया और एक बहुत धनी व्यक्ति बनकर चुरू लौटा.

1835 ई. के रामगढ़ की एक झलक लेफ्टिनेंट बॉइलू की डायरी से मिल सकती है जिसने मरुदेश की उस वर्ष यात्रा की. वह रामगढ़ में दो या तीन वर्ष तक रहा. उसने रामगढ़ को एक समृद्ध सीमा स्थित कस्बे के रूप में जो स्वच्छता के साथ घेरे के अंदर स्थित और साहूकारों से भरा बताया जिनकी कमाई पर अब तक किसी को न बख्शने वाली कैंची नहीं पड़ी है. सीकर के अधिकारियों ने पाया कि रामगढ़ के व्यापारियों पर जुर्माना लगाने से वह उस स्थान को खाली कर जाएंगे और इस तरह से वह अपने प्रदेश में सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को मारने का कृत्य करेंगे. इन व्यापारियों को पोद्दार की पदवी मिली हुई है. इससे प्रतीत होता है की जति की दूसरी भविष्यवाणी कि उसे राजाओं की दोस्ती हासिल होगी, भी सत्य प्रमाणित हो गई. स्थानीय रूप से रामगढ़ अब भी रामगढ़ सेठों का कहलाता है जिसका अर्थ "व्यापारी राजाओं से संबंधित हैं".

इसके निवासियों में अत्यंत पतित और अवांछनीय ब्राह्मण जाति के लोग भी हैं जिनसे मिलने का दुर्भाग्य मुझे प्राप्त हुआ. ब्राह्मण लोग पुजारी वर्ग से हैं, मैंने लगभग लिखा यह भारत की पाश्विक जाति है.

लक्ष्मणगढ़ शहर:

[पृ.51]: लक्ष्मणगढ़ प्राचीनता पर हक नहीं जाता सकता. यह सन् 1906 में बसा था. यह एक भव्य किले की छाया में स्थित है. यहाँ चट्टानों की एक बड़ी मौजूदगी है जबकि साधारणतया यह प्रदेश मैदानी भाग है. कस्बा अच्छे ढंग से बसा हुआ है और सेठों के कई सुंदर भवन यहां पर हैं. गढ़ पर चढ़ने पर यात्री को खाली स्थल


[पृ. 52]: देखकर हताशा होती है. नजार विलक्षण है चाहे वह इसके स्वयं के घेरे में ही हो.

मैं एक दिन इस किले में संभाव्य सीकर म्यूजियम हेतु कुछ खजाने की तलाश में था. अफीम के नशे में एक किलेदार मुझे संदेह के साथ इधर-उधर अनुकरण करता रहा. अंत में स्पष्ट रूप से जिद को समर्पित करते हुए उसने अपने भद्दे कुर्ते को ऊपर उठाया और धोती के मोड़ों से चाबी निकालकर एक लकड़ी के नीचे दरवाजे को खोला.

अंदर अंधियारा था, अतः एक जवान पुलिस अफसर, जो मेरे साथ था, ने माचिस जलाई. किलेदार द्वारा एक गर्जना हुई, जिसमें माचिस बुझाने का स्पष्ट निर्देश था. तब हमें जानकारी मिली कि कमरे में टनों बारूद था. उस माचिस की एक चिंगारी हमें ही नहीं पूरे कस्बे को उड़ा सकती थी. परंतु कमरे में कुछ विशेष तरह के जंजीर वाले कवच और एक जोड़ा चमकीले इस्पात के दस्ताने कीमती पाषणों से जुड़े हुए थे. इनको अब सीकर म्यूजियम में सुरक्षित और अच्छा स्थान मिल गया है.

मारवाड़ी चाय: शहर की एक गली में जहां अस्वच्छ मारवाड़ी चाय, गरम मसालों, दूध, बादाम चीनी आदि का आश्चर्यजनक मात्रा में मिश्रण है और मैं मान लेता हूं की पत्तियां भी खमीर उठाई हुई है. यह इतनी गाढी होती है कि यदि चम्मच छोड़ा जाए तो सीधा खड़ा रह सकता है. मैं इसे घृणा की दृष्टि से देखता हूं परंतु शिष्टाचार के नाते मैंने गैलनों ऐसी चाय पीली होगी. मेरे मेजबान को खुश करने के लिए दूसरा कप स्वीकार करने के अवसर पर मैंने बर्तनों को लिए दूसरा पेय बनाने के लिए आए हुए बावर्ची को देख लिया. मेरा मिजाज जो पहले से ही खराब था और बिगड़कर खतरे के निशान पर पहुंच गया. वह गंदा था, चिकनाई से सना था और वर्णनातीत कलुषित था. उसकी केतली और पात्र और भी अधिक गंदे थे और आप ध्यान दें यह एक वास्तविकता में धनी परिवार में था. दुख की बात है कि मरुदेश में समृद्धि और स्वच्छता हाथ से हाथ मिलाकर नहीं चलते.

कैंपों की स्मृति: मैं लक्ष्मणगढ़ के पास लगाए जाने वाले कैंपों की स्मृति


[पृ.53]: धारण किए हूँ. साधारणतया हम कस्बे से आधी मील दूर कैंप लगाते थे. यह एक भव्य तालाब के पास होता था. मुकदमों की दिनभर सुनवाई करने के बाद प्रार्थनाओं पर निर्णय करके और असंख्य साक्षात्कारों के पश्चात गोधूली से लेकर शाम को भोजन लेने तक आराम का समय होता था. बहुत बार मैंने वहां बैठे हुए ग्रामीण गाथाओं को या ऐसी कहानियों को सुना है जो कि पूर्वी कहानी कहने वाले लोग ही बुन सकते हैं. परंतु सबसे अच्छी वे रातें होती थी जब एक बिस्तर पर तारा जडित मखमल की छतरी के नीचे दूर की आवाजों की लोरी से प्रेरित होकर नींद चुपके से आ जाती थी. मरुप्रदेश की रातें दूसरे प्रदेशों से अलग तरह की होती हैं. मेरे रेगिस्तान में रेत में टिकने वाले पैर की तरह नरम होती हैं, वे रहस्यमय ढंग से से अनजाने प्रकंपन से धड़कती हैं और वे शीघ्र ही दूसरे उषाकाल के दैनिक चमत्कार में विलीन हो जाती हैं.

एक शानदार साहसिक कार्य : फतेहपुर का युद्ध 1799

फतेहपुर का युद्ध सन् 1799:

सन् 1799 शेखावाटी के परेशानी का समय था क्योंकि इस भूभाग पर जार्ज थॉमस (George Thomas) और मराठाओं ने आक्रमण किए थे. वह यूरोप के सैनिक योद्धाओं के छोटे समुदायों में था जिनके


[पृ.63]: पास जो व्यक्तिगत रूप से बहुत ही प्रशिक्षित सेना जो कि किसी भी भारतीय राजा को, जो कीमत चुकाने को तैयार हो, भाड़े के सैनिकों के रूप में सेवा देने को तैयार रहते थे और बीच-बीच में स्वयं लूटपाट कर लेते थे. जॉर्ज थॉमस को मराठा नेता वामन राव ने उसके साथ जयपुर के राजा से विलंबित कर वसूल करने के लिए अपने साथ लेने को सहमत कर लिया था. जॉर्ज थॉमस के पास अपनी छोटी बहुत ही कुशल तीन बटालियन थी. कुल मिलाकर लगभग 2000 लोग थे. वामन राव के सैनिक भी लगभग इतने ही थे. इसलिए दोनों की कुल ताकत 4000 से अधिक नहीं थी.

जयपुर प्रदेश में प्रवेश करने पर राजा के 400 सैनिकों ने जो कर वसूल करने के लिए सीमा पर तैनात थे पीछे हट गए और आक्रमणकारियों को 10000 पोंड नजराने के रूप में दे देने की पेशकश की. यह पेशकार स्वीकार कर ली गई और कूच जारी रहा तथा कई अन्य मुखिया भी समर्पण हेतु बाध्य किये. एक माह तक आक्रमणकारी अपना आगे का अभियान बिना प्रतिरोध के जारी रख सके.

इस दौरान जयपुर का राजा हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठा था. उसने अपनी सेना एकत्रित की. वह अपने उत्तरी जिलों की सहायताके लिए आगे बढ़ा जहां वामन राव और जॉर्ज थॉमस अपना खेल खेल रहे थे. जयपुर की सेना में 40000 लड़ाकू थे जिनके लिए बहादुरी परंपरागत थी. अब जॉर्ज थॉमस ने महसूस किया कि उसकी स्थिति कितनी जोखिम भरी थी. बिना प्रतिरोध की प्रवृत्ति की झूठी सुरक्षा की भावना से आनंदित, उसने अचानक अपने आप को एक बिना रसद और बिना ऐसे आधार के जहां कठिनाइयों में शरण ले सके दुश्मन के प्रदेश में कटा हुआ पाया. वामन राव तुरंत वापस मुड़ने के पक्ष


[पृ.64] में था. उसने कहा यह मेरे और मेरे पुरखाओं के लिए अपमान की बात होगी जिन्होंने दुश्मन को कभी पीठ नहीं दिखाई. अंत में फतेहपुर पर आक्रमण करने का तय किया गया जहां पर सैनिकों के लिए पर्याप्त मात्रा में अनाज और सुरक्षात्मक स्थिति बनने की संभावना थी.

फतेहपुर के लोगों के पास शीघ्र होने वाले आक्रमण की अग्रिम सूचना पहुंच गई थी जिसे वे प्रतिरोध की तैयारी कर सकें. एक प्राथमिक उपाय के रूप में जिधर से आक्रमणकारी आ रहे थे उस रास्ते के समस्त कुवों को भरने का निश्चय किया गया. बिना इस बात के आभास के थॉमस आगे बढ़ा. उसे तब पता लगा जब उसकी योजना में परिवर्तन के लिए बहुत विलंब हो चुका था. उसके सैनिक खतरे से अरक्षित थे. अंतिम दिन उसने बलात 25 मील का कूच गहरी धूल में किया, जिसमें लंबे गर्म बाद दोपहर का समय- उसके थके हुए सैनिक मुश्किल से ही आगे बढ़ सकते थे. अंत में जब फतेहपुर के कुवों पर उनकी दृष्टि पड़ी कस्बा उनका प्रतिरोध करने को पूरी तरह तैयार था. कस्बे का बाहर का अंतिम हुआ ठीक उसी समय भरा जा रहा था.

बिना झिझक के थॉमस ने घुड़सरोवरों के द्वारा कुएं की रक्षा करने वालों पर आक्रमण किया. कुछ समय तक हठी प्रतिरोध था परंतु हताश की हिम्मत ने लड़ाई जीती. यदि यह कुआं अधिकार में नहीं ले लिया जाता तो थॉमस की सेना एक बिना बराबरी की लड़ाई में पूरी तरह नष्ट हो जाती या एक असंभव वापसी करनी पड़ती. जिसमें उसके सैनिक भूख मव् प्यास से मर जाते.

अब कैंप लगाया गया. सैनिकों को विश्राम और वांछित जलपान मिला. दो दिन पश्चात कस्बे के लोगों, जो जयपुर की सेना के शीघ्रार आने की संभावना से उत्साहित थे, ने समर्पण करने की शर्तों के कारण मन कर


[पृ.65]: दिया परंतु थॉमस ने अपनी सेना को व्यवस्थित किया, हमला किया और उस स्थान को अधिकार में ले लिया.

इसके बाद शीघ्र ही जयपुर की सेना के आने की सूचना मिली. थॉमस ने अपने कैंप की किलेबंदी करने का निश्चय किया. उसने जंगली कांटेदार पेड़ों की टहनियों की बाड बनाकर ऐसा किया. उसने अनाज और रसद की पर्याप्त मात्रा में आपूर्ति कर ली. जयपुर के राजा ने 6 मील की दूरी पर कैंप लगाया और तब एक ताकतवर घुड़सवार और पैदल सेना टुकड़ी कुवों को साफ करने के लिए आगे बढ़ाई. उसे 2 दिन तक यह कार्य करने का अवसर दिया गया जबकि थॉमस ने अपनी स्थिति और सुदृढ़ बना ली.

दूसरी रात्रि को थॉमस दुश्मन के तोपखाने के मुख्य भाग पर आक्रमण करने को आगे बढ़ा. उसकी सेना में पैदल सेना की दो बटालियन थी. कुल मिलाकर 800 मनुष्य, 800 तोपें और 90 घुड़सवार. उसने अपनी योजनाओं के बारे में वामन राव को कुछ भी नहीं बताया, उसने मराठा सैनिकों को साथ लिया. अनुभव ने उसे सिखाया था कि मराठा सिवाय असुरक्षित गांव को लूटने के किसी अन्य काम के नहीं थे और उनके कैंप की गपशप दुश्मन के कैंप तक हमेशा पहुंच जाती थी.

रात के इस अभियान में अनावश्यक रूप से विलंब घटित हुए और सूर्योदय के साथ, अपनी परितुष्टि के लिए दुश्मन हथियारों से लैस होकर उसे सामना करने को तैयार थे. इसलिए उसने अपने हमले को कुवों को साफ करने वाले दल की ओर मोड़ा. उनकी संख्या लगभग 7000 थी. कड़ी लड़ाई और काफी संख्या में सैनिकों के हताहत होने के बाद, दुश्मन अपने स्थान की तरफ धकेल दिए गए और कुवों को पुनः भर दिया गया. थॉमस अपने कैंप को वापस चला गया.

दूसरे दिन थॉमस ने पूर्ण मुठभेड़ का निश्चय किया. परंतु उसने पाया कि दुश्मन ने उसके इरादे को भांप बाप लियाथा. इसलिए वह पहले से ही उसके द्वारा चुने हुए स्थान की और आगे बढ़ा जो बाल उसने छोड़ दिया वह 800 घुड़सवार मराठा सैनिक थे. दूसरे दुश्मन की बहुत बड़ी सेना को देखकर भाग खड़े हुए और अकेले


[पृ.66]: थॉमस को युद्ध लड़ने के लिए छोड़ दिया.

तब यह युद्ध हुआ जो फौज के इतिहास में सर्वाधिक विस्मयकारी था. थॉमस युद्ध की दृष्टि से सुविधापूर्ण स्थलों का चुनाव और सेना का वर्गीकरण करने में कुशल था और उसके मनुष्यों की शानदार दृढ़ता ने उनको पूर्ण सर्वनाश से बचाया.

बार-बार सब तरफ से हमला किए जाने के बावजूद वे हठपूर्वक अपने स्थान पर बने रहे. एक समय जयपुर की घुड़सवार सेना ने थॉमस के छोटे जत्थे को देखकर उस समूह पर अचानक भयंकर हमला कर दिया. इन बहादुर सैनिकों ने गोलियों की एक बौछार करने के पश्चात बड़ी घुड़सवार सेना पर बेल्टों से हमला कर दिया. परिणाम स्वरुप पैदल सेना द्वारा घुड़सवार सेना को हराने का असाधारण दृश्य उपस्थित कर दिया.

शाम तक थॉमस हराया नहीं जा सका था और जयपुर का राजा उनके हठीले प्रतिरोध के सामने असहाय होकर पीछे हटने को बाध्य हुआ. इसलिए राजा वहां से हटा और थॉमस अपने शेष सैनिकों सहित घेरा बंद कैंप में गया. थॉमस के लगभग 300 सैनिक मरे, दुश्मन के 2000. इस तरह फतेहपुर का युद्ध समाप्त हुआ जिसमें थॉमस ने 2000 से कम सैनिकों के साथ सफलतापूर्वक एक बड़े कसबे और बड़े किले बंद को रक्षित किया और खुले मैदान में तोपखाने की प्रचुर सहायता वाले 4000 सैनिकों की सेना को परास्त किया. अगले कुछ दिनों में जयपुर सेना के लिए और बल पहुंचने आरंभ हुए और थॉमस को लगने लगा कि पीछे मुड़ना ही उनके पूर्ण सर्वनाश से बचने का एकमात्र उपाय था.

इसी विचार से कैंप हटा लिया गया और सूर्योदय से पहले ही पंक्ति बंद होने लगे. अब मैं इस वापसी का कॉम्पटन द्वारा दिए गए पूर्ण मूल-पाठ प्रस्तुत करता हूं. यह एक सुंदर विवरण है जिसे संक्षिप्त करना या रूपांतरण करना समीचीन नहीं होगा.

"सैनिक दलों ने मुश्किल से रवानगी आरंभ की थी कि दुश्मन ने बड़ी संख्या में आक्रमण कर दिया. जब तक यह जारी रहा, सब जगह बुरी तरह घबराहट प्राप्त हो गई और कोई भी दुश्मन और दोस्त में पहचान भी नहीं कर सकता था. परंतु सूर्य की रोशनी


[पृ.67]: के प्रकट होने पर थॉमस ने अपने लोगों को एकत्रित किया, युद्ध के लिए व्यवस्थित किया और दुश्मन को दूर हटाया. आगे बढ़ाना फिर चालू हुआ परंतु राजपूत उसके पीछे से दबाव बनाए रहे और उन्हें तोपों की आग और अत्यधिक रॉकेट के गोलों से परेशान करते रहे.

वह तेज गति से आगे बढ़ता रहा और उनकी तोपों शीघ्र पीछे छोड़ दिया. अब केवल रॉकेट और पुरानी बंदूकों वाले ही उनका पीछा कर रहे थे.

दिन बहुत अधिक गर्म था और उसके हताश सैनिक पानी की कमी से परेशान थे. रेगिस्तान की तपती हवा मिट्टी-रेत भट्टी की तरह गर्म श्वास ले रही थी, जबकि क्षितिज पर एक मृग मरीचिका चमकती और चकाचौंध करने वाली थी. यह पानी की झील में तैरते हुए आकर्षित करने वाले हरे टापूओं के दृश्य उपस्थित करती थी. यह दृश्य जब निकट होते तो धुंधले होते हैं या अदृश्य हो जाते थे. घसीटते हुए पैरों से अबोधगमय धूल के बदले ऊपर उठने जो प्यास को अत्यधिक बढ़ाते थे और परेशानी के कारण सैनिकों का मुख्य भाग क्षतिग्रस्त होता था. भाग्य से यह अग्निपरीक्षा पीछा किए जाने व पीछा करने वाले दोनों के लिए थी. 15 घंटे तक थॉमस की सेना एक हताशा भरी लड़ाई लड़ती रही जबकि उनके पीछे निश्चित मृत्यु खड़ी थी और यह सब सहायता मिलने की भयंकर अनिश्चितता के सामने था. "सेना" थॉमस ने अपने दोस्त को संक्षिप्त, सिपाही के लायक भाषा में बताया "बुरी तरह से थकी हुई थी. अंत में एक लंबी थका देने वाली कूच के पश्चात हम एक गांव में पहुंचे जहां पर्याप्त मीठे पानी के दो कुंए थे."

लोग इनकी तरफ इतनी तेजी से झपटे कि दो आदमी नीचे गिर गए. एक डूब गया और दूसरा बहुत मुश्किल से बचा लिया गया. इसके बाद कुवों की पहुंच के पास हथियार बन्द बल लगा दिया गया जब तक कि सबको थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी मिल गया. अव्यवस्था समाप्त हुई और व्यवस्था बहाल हुई.

इस दौरान दुश्मन मने तीन मिल पीछे की तरफ कैंप लगाया और थॉमस ने अगले दिन उन पर हमला करने का निश्चय किया. परंतु जब सुबह हुई तो उसने महसूस किया कि उसके लोगों का


[पृ.68]: आदतन व्यवहार साथ छोड़ चुका था और वे इतने हताश थे कि लड़ने को तैयार नहीं लगते थे. वह केवल पीछे हटना जारी रख सकता था. शीघ्र बहुत से लोग थकावट के शिकार बनने लगे.

क्योंकि आगे बढ़ाने में पूर्व दिन की तरह कठिन विपरीत परिस्थितियां थी. दुश्मन उनकी परेशानी से उत्साहित है और हमला करने के इच्छुक थे.

थॉमस की ओर से तोपखाने से आग बरसाना आवश्यक था. उसके आदमी इतने हताश थे कि उनको उत्साहित करने के लिए वह घोड़े से उतरा और पूरे दिन पैदल उनके साथ चलता रहा.

यह एक विशिष्ट गुण है और उसके व्यक्तिगत गुणों को उत्कृष्ट रूप से दिखलाता है जिसके कारण थॉमस अपने लोगों में, जो उसकी हर हाल में अनुकरण करते थे, अत्यधिक प्रिय था.

यह आइरिस योद्धा थॉमस देशी सेनापतियों की तरह नहीं था. यदि कोई देशी सेनापति होता तो वह पीछे हटने के समय तेज घोड़े पर ऐड लगाकर दौड़ जाता या सबसे तेज हाथी पर ले जाया जाता था. वह सिवाय अपनी सुविधा के अन्य बैटन के प्रति बेखबर होता था. आयरिस योद्धा थॉमस इस तरह का नहीं था जो अपने जीवन धर्म में किसी दोस्त के साथ झूठा साबित हुआ हो या किसी आश्रित जन को परेशानी और खतरे के वक्त अकेला छोड़ा. उसने अपनी सिपाहियों के खतरों और अभाव में हिस्सा बटाया जैसे कि उनकी विजयों में और उन्हें कभी भी ऐसा कार्य करने को नहीं कहा जिसमें वह भाग न ले या जोखिम लेने को तैयार न हो.

फतेहपुर से इस वापसी का दृश्य एक चलचित्र की अच्छी विषय सामग्री है. अपनी हताश सेना के आगे सिर ऊंचा करके थॉमस आगे बढ़ता है. उसके पीछे सिपाहियों का लंबा संघवरित दल चलता है. यह लोग पहले आंख उठाकर असीमित रेत के प्रदेश को देखते हैं और तब अपने विश्वसने नेता को देखते हैं जो अपने दृढ़ पथ पर बढ़ता है और जिसमें उनकी आशाएं केंद्रित हैं. थके हुए जानवर गहरी रेत में तोपों को घसीटते हैं. शीघ्र ठहराने के लिए निर्देश दिया जाता है. एक तोप झुकाई जाती है और दुश्मन पर निडरता पूर्वक चलाई जाती है. छोटी बंदूक की तरह हर एक गोला छूटने के बाद आवाज समाप्त हो जाती है और शांत हवा में धूंआ


[पृ.69]: उदासी से छाया रहता है. फिर तोपों को भी नीचा करने का आदेश दिया जाता है और एक बार फिर सेवा के मुख्य भाग के आगे खड़ा होकर लंबा, डरावना, आइरिस सेनापति विस्तृत सूने रेगिस्तान में आगे बढ़ता है.

सूर्योदय होते होते एक बड़े कस्बे में पहुंच जाता है जहां पर पीड़ित सैनिक पांच कुवों को देखकर प्रफुल्लित होते हैं और अपनी प्यास बुझाने में सफल होते हैं जबकि दुश्मन जो कि अब तक उनके उत्साह को पीछे छोड़ रहा था पीछा करने को छोड़कर फतेहपुर वापस लौट जाते हैं.

अतीत के दृश्य

[पृ.69]: विदाई हुई. गाड़ी एक कुचलने वाले कंपन के साथ रवाना होती है. हम घर की तरफ प्रस्थान करने को तैयार हैं. इसलिए विचार आसानी से हमारी ग्रहण की जाने वाली भूमि की ओर मुड़ते हैं. कुछ समय पूर्व से हम उसकी पुकार सुनते रहे हैं. यह प्रस्तुत पंक्तियों में पवित्रता के साथ संचित है:-

दक्षिण मुद्र की गहराई से
अपने आकाश के नीलवर्ण से
विशाल पर्वत श्रेणियां से होकर
उठती जिनकी चट्टानों से प्रतिध्वनियां
बैलगाड़ियों की चरमर के साथ, दूर
असीमित घास के मैदान के पार
आती है पुकार हमारे प्रिय देश की
हमारे देश अफ्रीका की"

हम इसकी अनुक्रिया करते हैं परंतु गाड़ी की खिड़कियों से हम छोटे स्वच्छ बंगलो की पंक्ति को देखते हैं. जहां के बंगले, फलों वाले बगीचों और किशोर वृक्षों वाले हैं और पुलिस तथा सेना के मुख्यालयों की लाल रंग की छतें, सफेदी की हुई बैरकों, परेड के मैदान, अस्तबलों के स्वच्छ शिलाखंड सभी हमारे समय की संतान और हमारी बनाई हुई दिखाई देती है. इनका दृश्य घर की तरफ के विचारों पर आता है जो दिल की राज्जूओं को कुछ कठोर बना देता है.


[पृ.70]: कुछ मील और हर्ष का पहाड़ कोहरे की लहराती कलंगी से विदाई में अभिवादन करता है. वहां की आत्माएं हमें भूलेंगे नहीं इसका मुझे विश्वास है. देवी किला भी जो कि रावनागियों का कठोर संरक्षक रहा है, क्षण भर के लिए कम कठोर लगता है शायद मुझे यह याद दिलाएगा कि मैं इसकी कहानी कभी नहीं लिखी. इसलिए मैं धीरे विनम्रतापूर्वक बड़बड़ाता हूं. "विदा पुत्तन लड़का ! और मैं किसी दिन तुम्हारी कहानी अवश्य लिखूंगा." कुछ समय पश्चात् हम सीमा को पार करते हैं. दुख से मुक्ति की धारणा मन में धारित करते हम 24 घंटे की यात्रा के लिए मानस बनाते हैं....

भावनाओं को दमित करते हुए हताशा भरे प्रयत्न के रूप में मैं खिड़की से दुनिया को गुजरते हुए देखता हूँ....

[पृ.71]: मैं याद करता हूँ किस तरह से पांच छोटे-बड़े पांच साल पूर्व मैनें मरुदेश के एक कोने का प्रशासन हाथों में लिया था?


जागीरदार और किसान के मध्य होने वाला स्थाई संघर्ष पर:

[पृ.71]: यह अक्षमता और भाई-भतीजावाद से जकड़ित परम्पराओं और रुढियों से बंधा हुआ, प्रदेश स्पष्टतया आशारहित था. आवारा लोग, व्यस्त न होकर दखल डालने वाले प्रत्येक महकमें में भिनभिनाते थे और जागीरदार और किसान के मध्य होने वाला स्थाई संघर्ष एक चरम की और पहुँच रहा था. मुझे उस समय की कटु यादें आती हैं जब किसान की पीड़ा उन्हें उकसाने का करण बनी और राजनैतिक दृष्टता करने वालों के समूहों के लिए दरवाजे खुल गए. हमने उस तूफ़ान का मुकाबला किया परन्तु इस दौरान हिंसक मृत्यु और निर्दयता से घायल होने पर भारी क्षति सहन करनी पड़ गयी थी. ईश्वर को अवसर प्रदान करने पर धन्यवाद है कि जिनकी कठिनाईयों को दूर करने का प्रयत्न कर मैंने उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रमाणित की और मैं वहां के सीधे-सादे लोगों द्वारा बाद में परेशानी के समय में दी गयी सहायता के प्रति कृतज्ञ रहूँगा और उसकी स्मृति सदा दिल में संजोये रखूँगा. मुझे हिन्दुस्तान के लम्बे गर्मी के दिन याद रहेंगे जब दम घोटने वाली गर्मी दमित होकर पसीने से तर हुए लोग अराजकता समाप्त कर व्यवस्था बनाने को संघर्षरत थे.

अलविदा ! शेखावाटी और
भगवान तुम्हारा भला करे.

जयपुर, 2 अक्टूबर 1938

हर्ष शिलालेख की व्याख्या

हर्ष शिलालेख की व्याख्या

[पृ.78]: हर्ष शिलालेख और मंदिर को सुपुर्द की गई संपत्ति की पहचान जिस काले रंग के पत्थर पर शिलालेख अंकित है वह माप में अनुमानत: तीन x तीन वर्ग फुट है.

शिलालेख में वर्णित चौहान राजाओं की वंशावली निम्न अनुसार है, परंतु परंपरा अनुसार दो नाम और जुड़ते हैं जो यहां सम्मिलित हैं:

गुवक I

चंद्रराज II (पारंपरिक)

पुनर्वगुवक (पारंपरिक)

चंदन

वाक्पति I

सिंहराज - वत्सराज

चंद्रराज - गोविंदराज

सिंहराज के उत्तराधिकारी के रूप में विग्रहराज II आया जो कि निश्चय पूर्वक सिंहराज का पुत्र नहीं था क्योंकि यह वर्णित किया गया है कि उसके एक भाई दुर्लभ था. सिंहराज के दो पुत्रों को विग्रहराज II ने किस तरह दूर हटाया इसकी जानकारी नहीं है परंतु 21 वें छंद में अंकित है कि सिंहराज की विधवा द्वारा एक प्रश्न रखा गया कि, "अब मेरा स्वामी कौन होगा?" उसके दो पुत्रों का क्या हुआ, नहीं जाना बताया गया है परंतु अन्य स्रोतों से तार्किक रूप से विश्वास किया जा सकता है कि वे और उनका


[पृ.79]: चाचा वत्सराज विग्रहराज II के सिकमी आसामी बन गए थे.

हर्ष शिलालेख के अनुसार सुवास्तु नाम का एक ब्राह्मण था जिसने विग्रहराज को एक मंदिर बनाने हेतु प्रेरित किया. कहा जाता है कि वह हर्ष के निकट के गांव राणा-पालिका जो कि खंडेला के अधीन रानोली (राणावली) के रूप में पहचानी जा सकती है. अब इस गांव को कभी-कभी राणा पादिका के रूप में संदर्भित करते हैं.

सुवास्तु के पुत्र संदीप्त ने इसे संस्कारित किया. कहा जाता है कि उसने मंदिर का विस्तार किया और इसके चारों तरफ रास्तों को बनवाया.

मंदिर का वास्तुकार सुप्रसिद्ध वररुद्र का पुत्र जो कि उन गांवों या ढाणियों में से कोई भी होगा जो कि शिलालेख में मंदिर के रखरखाव के लिए समर्पित हैं. इनमें से कुछ स्पष्टतया दूसरे जिलों में है, जैसे वर्तमान अजमेर. इनमें से निम्नलिखित वर्तमान सीकर राज्य या पड़ोस के ठिकानों में से हैं:

इस बिंदु पर यह कहना रुचिप्रद होगा कि पुराने हर्ष गांव की स्थिति हर्ष पहाड़ की तलहटी में है.

हाल ही में लेखक ने अन्य मंदिर के अवशेष और नींव को पाया जो कि बिल्कुल पहाड़ी पर स्थित मंदिर की तरह है.

पुराने गांव की दीवारों को खोजना संभव हुआ और विभिन्न भवनों की स्थिति का पता लगा सका. कुछ चूड़ियां, सान लगाने के पत्थर और पाइप आदि मिले जो कि अब म्यूजियम के केस नंबर सी.के. में हैं. कई कुएं व बावड़ियां भी मिली हैं जैसा कि दिए हुए नकशे में हैं.


[पृ.80]: हर्ष के ब्राह्मण पुजारी बताते हैं कि यह गांव विध्वंस कर दिया गया था और इसके निवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया था जब मुसलमानों द्वारा सन 1679 में मंदिर ध्वस्त किया गया था. जो मौत से बच गए उन्होंने हर्ष का वर्तमान गांव बसाया. परंपरा अनुसार पहले हर्ष एक बड़ा शहर था. एक पुराना दोहा इस प्रकार है:

"जगमालपुरा हर्षनगरी, बोम तालाब बड़ी छतरी हाट बाजार, मंडी गुदड़ी."

अनुवाद करने पर इसका अर्थ है: हर्ष के बड़े तालाब और जगमालपुरा की बड़ी छतरी के मध्य 1000 दुकानें व बाजार था.

स्थानीय लोगों द्वारा कहा जाता है कि पुराना कस्बा 38 मील घेरे में था और उसमें 900 कुंए थे. इसमें निम्नलिखित आधुनिक गांव सम्मिलित थे.

यदि यह कहानी सत्य है (और वह बहुत अधिक असंभव नहीं है) तो स्पष्टतया देश पिछली इन शताब्दियों में दुर्भाग्यपूर्ण रहा है.

हर्ष के वर्तमान मंदिर के पूर्वाधिकार राव शिवसिंह द्वारा पुष्कर से ले गए थे और इन्हें पोकारी नाम से जाना जाता है.

हर्ष मंदिर संरक्षण के संबंध में टीका से उद्धरित : द्वारा श्री डी.आर. भंडारकर एम.ए., अधीक्षक पुरातात्विक सर्वे पश्चिमी वृत, दिनांक फरवरी 1913

वास्तव में कुछ भी हो, यहां पर हमारा संबंध पुराना महादेव मंदिर से है. ड्योढ़ी में काले पत्थर का टुकड़ा है जिस पर शिलालेख खुदा है. इससे हमें पता लगता है देव महादेव जिसको यह समर्पित है हर्ष के नाम से जाना जाता था. जिसके अनुसार पहाड़ को भी हर्ष गिरी नाम से पुकारा जाता है. यह मंदिर विक्रम 1013 (ई सन 956) में भुविरक्त बनाम अल्लट नामक व्यक्ति द्वारा बनाया गया था. वह लकुलीश पाशुपत वंश से संबंधित था. यह लेख विक्रम 1036 में अंकित किया गया जब अल्लट का शिष्य भावद्योत जीवित था और चौहान राजा विग्रह्राज II शासन करता था.

शिलालेख का 12वां छंद आरंभ में मंदिर कैसा था, इसका


[पृ.81]: वर्णन करता है. यह कहता है:- अलौकिक हर्ष देव का मंदिर शानदार है जो कि इसके विशाल हाल, मंडप इस शानदार सुनहरे काम सहित, बनावट के हिसाब से बहुत ही आकर्षक है. ऊंचाई में मेरु पर्वत सदृश, अपने मेहराबदार द्वारा के कारण बहुत ही आनंददायक है. समुचित ढंग से ढका हुआ नंदी है और बहुत सी आनंददायक वस्तुओं से भरा हुआ है. जैसे ही हम मंदिर में पहुंचते हैं और सीढिओं की एक लंबी कतार अहाते की तरफ ले जाती है. सकरी सीढ़ियों और खम्भों के एक जोड़ के मध्य भाग के पास (लगता है कि पूर्व में इन खम्भों पर एक तोरण द्वार स्थित रहा होगा) और जिससे मेहराबदार द्वारा बना होगा जैसा कि छंद में लिखा पाया है. कुछ आगे उठे हुए चबूतरे पर संगमरमर की बनी पुरानी नंदी की प्रतिमा है. यह निश्चित रूप से पूर्व में एक मंडप में रखी गई होगी जिसका अब केवल बैठकी की ही शेष रही है. निश्चित रूप से शिलालेख में संदर्भित नंदी (बैल) यही है. इसमें यह भी कहा गया है कि मंदिर के पास में सहायक ढांचे और थे उनमें पांडवों और वाकाट की मूर्तियां थी और वहां के खंडहरों से भी प्रमाणित होता है कि अन्य ढांचे थे. उत्तर,दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में ऐसे सहायक ढांचे रहे होंगे. खंडहरों में पांडवों की मूर्तियां भी पहचानी जा सकती हैं (जो उत्तर पश्चिम में है). यहां पर 6 विशालकाय (तब से सीकर म्यूजियम में पहुंचा दी गई) सात फुट तक लंबी मूर्तियां हैं जिन्हें पांडव राजकुमारों और उनकी माता कुंती की मूर्तियां बताया जाता है.

ऐसा लगता है कि मंदिर में पूजागृह, हाल और ड्योडी थी. पूजागृह के भीतरी भाग में जो कि कुछ नीचे तल पर स्थित है हाल से सीढिओं द्वारा पहुंचा जा सकता है. इसमें चार चेहरों वाला लिंग स्थित है. हाल और ड्योडी की छत चार लंबे खंबो पर अवस्थित है. पहले वाला अब की तरह एक कोने में एक मंच पर अवस्थित है. बाद वाला पत्थर के बने पटियों पर जो कि हाल व ड्योढ़ी के साथ हैं, स्थित है. दीवारों की पुष्ति बंधी थी जो एक तरह की झुकी मुंडेर जैसी थी और बाहर की तरफ खंबों के साथ निकली हुई थी. इसमें से अब बहुत कम शेष हैं.

वास्तव में एक समय में मंदिर पूर्ण विध्वंस की अवस्था में था और यह स्पष्टतया पुराने सामान से पुनर्निमित किया गया था. पूरी की पूरी पुरानी छत समाप्त हो चुकी है और एक नई छत से इसका स्थान लिया है. इसका बाहरी भाग चूने से पोता गया है जिसे वर्षा का पानी रिस कर न आ सके. चूने का प्रयोग इस बात को दर्शाता है कि मंदिर मुस्लिम काल में पुनर्निमित किया गया था. दो-तीन को छोड़कर सभी छोटे स्तंभ नए


[पृ.82]: हैं. लगता है कि यह मूल रूप में यहां पर नहीं थे. सभी लंबे खंभे नए हैं जिनका केवल आधार ही पुराना है. नए खंबो में भी पुराने खंबों के टुकड़े लगे हैं, जो एक दूसरे पर रखे गए हैं. यह बिना चूने या इसी तरह के अन्य पदार्थ के बिना ही अवस्थित हैं. इस तरह के अस्थिर आधारों पर ऊपरी भारी भाग स्थित है जिनका भार बहन करना भी कठिन है. छत के नीचे का हिस्सा सूखा, अव्यवस्थित दीवारें जो कि पुराने स्थापत्य के टुकड़ों, जो कि बाहर घड़े गए हैं, से बनी हैं. यह पुरानी ऊपर की दीवार को छूती है (सिवाय प्रवेश द्वार के). इस दीवार में ब्रैकेट में से एक जडा है जो बड़ी आकृति का है. ऊपर का हिस्सा और पुनर्निमित आधार जिस पर लंबा पतला जोड़ है, जिसका दूसरा हिस्सा गहराई तक दीवार में जाता है. इस अद्भुत तरीके से नए बहुत भारी कोष्टक सहारा पाए स्थित हैं. नहीं, इसमें कोई आशंका नहीं है कि यह सूखी दीवार डरावनी लगती है और यह मूल निर्माण कार्य का भाग नहीं था. पर यदि इस दीवार को तोड़ा जाए तो छोटे खम्भों के ऊपर का विशाल भाग, उनके साथ अधिकांश भाग व छत स्थित नहीं रह सकेगी. इसके अतिरिक्त यदि हम मूल भवन के मौलिक भाग को ही बचा कर रखने पर जोर देंगे तो हाल व ड्योढ़ी में से कुछ भी शेष न रहेगा. (सिवाय कतिपय पत्थर निर्मित पाटियों के), या दो-तीन सफेद छोटे खंबे और शेष का केवल आधार रहेगा. अन्य सभी खंबे छोटे या बड़े हैं. क्योंकि छत नयी है इनको पुनरस्थापित करना संभव नहीं है क्योंकि पुराने हिस्सों को तलाश करना और उनकी पहचान असंभव है. इन परिस्थितियों में यही वांछनीय लगता है कि पूरा पुन: बना हुआ मंदिर और उसकी शुष्क दीवार ऐसी ही रहे जैसी अब हैं. आवश्यकता केवल इसी बात की है कि मंदिर को इस पुनर्निमित अवस्था में संरक्षित रखना चाहिए.

छत को पानी अवरोधी बनाया जाए, जहां पर पत्थर के टुकड़े नहीं हैं वहां पर नए लगाए जाएं और शीश पर चूने की सतह का नवीनीकरण किया जाए. बाद में रंग को थोड़ा हल्का किया जाए. दक्षिण पश्चिम के हिस्से में जहां कुछ भाग गिर चुका है नए रूप में पुनर्निमित किया जाए.

कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) की नियुक्ति

ठिकाना सीकर जितना ही बर्बरता पर उतरा, उतना ही जाटों का पक्ष सबल बना । देश का लोकमत उनके अनुकूल बना । आखिर सर जॉन बीचम को समझ में आ गया कि किसानों की समस्याओं को टाला नहीं जा सकता । ऐसी स्थिति में जयपुर सरकार ने यह निश्चय किया कि किसी योग्य व अनुभवी अंग्रेज अफसर को पूरे अधिकारों के साथ सीनियर अफसर के पद पर सीकर भेजा जाय । तब जयपुर सरकार ने सीकर-प्रशासन के लिए कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) को नियुक्त किया जिसने 22 मई 1934 को चार्ज संभाला । 29 मई 1934 को सीकर वाटी किसान पंचायत के मंत्री देवा सिंह बोचल्या के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल मि. वेब से मिला । वेब ने सुझाव दिया कि एक कमिटी बनाई जाये जिसमें किसान प्रतिनिधि भी सम्मिलित हों । यह सुझाव किसान नेताओं को जमा नहीं, क्योंकि चार किसान प्रतिनिधियों में से दो किसानों को प्रशासन की और से मनोनीत करना था । 24 जून 1934 ई. को कूदन में सीकरवाटी के प्रमुख जाटों की एक बैठक कमीशन के लिए मेंबर चुनने के लिए हुई जिसमें भरतपुर के ठाकुर देशराज और कुंवर रतनसिंह शामिल हुए । 25 जून 1934 को किसानों की एक आवश्यक बैठक पृथ्वी सिंह के प्रयासों से गोठड़ा गाँव में बुलाई गयी । काफी संख्या में एकत्रित किसानों ने अपनी ओर से सर छोटूराम, कुंवर रतनसिंह, पृथ्वीसिंह गोठडा एवं ईश्वरसिंह भैरूपुरा को प्रतिनिधि मंडल के रूप में चुन लिया । इन्हें वेब की कमेटी में काम करना था । किन्तु वेब ने 15 जुलाई 1934 को एक पक्षीय घोषणा कर दी । (डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.101) इस घोषणा में नाम मात्र की सहूलियतें थी । किसान पंचायत संतुष्ट नहीं हुई । पंचायत के मंत्री देवा सिंह बोचल्या ने एक विज्ञप्ति जारी कर वेब के ऐलान को मानाने से इनकार कर दिया । इस पर देवा सिंह बोचल्या को गिरफ्तार कर लिया । [4]

कैप्टन वेब की नियुक्ति की परिस्थितियाँ

ठाकुर देशराज[5] ने लिखा है .... तारीख 14 मई 1934 को जाट किसान जत्था अलीगढ़ से वापस होकर दिल्ली पहुंचा। स्टेशन पर कुछ स्थानीय जाट सरदारों ने जत्थे का स्वागत किया। दिल्ली के प्रसिद्ध पत्रकारों तथा नेताओं में पंडित इंद्र जी व्यवस्थापक अर्जुन ने जत्थे की कष्ट कहानी सुनने व आवभगत करने में पूरी दिलचस्पी ली। श्रीयुत देवीदास गांधी ने भी कष्ट कहानी सुनने के लिए उत्सुकता के साथ जत्थे के प्रतिनिधि से मिलते ही स्वीकृति दी। यदि उन्हें उस दिन अचानक एक दूसरा आवश्यक कार्य न आ अटकता और जत्था दूसरे दिन के लिए ठहर जाता तो श्री देवदास जी तथा हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक महोदय इस किसान जाते की की कहानी बड़े प्रेम के साथ सुनते। लाला देशबंधु दास प्रोपराइटर तेज ने भी अपना रिपोर्टर जाट किसान जत्थे के ठहरने के स्थान पर भेज कर अपनी उदारता प्रकट की। नवयुग के सरकारी संपादक जी भी जाट जत्थे के प्रतिनिधियों से बड़े प्रेम के साथ मिले और विश्वास दिलाया कि उनकी सच्ची शिकायतों को जनता के सामने रखने के लिए नवयुग कभी पीछे नहीं रहेगा। जाट जत्थे की इच्छा थी कि आर्य सार्वदेशिक सभा के प्रधानमंत्री उनसे मिलकर जनेऊ संबंधी वास्तविक घटनाओं की बाबत पूछताछ करके वास्तविक घटनाओं को जान लें। किंतु मंत्री और प्रधान के कार्यालय ममें न होने से भेंट न कर सके।

चौधरी हरचंद सिंह जी (अर्जुन), महाशय धनीराम जी प्रोपराइटर जमींदार ब्रोस, चौधरी लाजपत राय जी करोल बाग में जाट जत्थे को जलपान तथा अन्य सुविधाएं प्राप्त कराने में


[पृ.250]: काफी दिलचस्पी ली। इस समय जत्था रेवाड़ी के आसपास है। ..... लोकमान्य 23 मई 1934

जब बाहर इस प्रकार का आंदोलन जाटों के पक्ष में हो रहा था तब सीकर ठिकाने नहीं एक चाल सोची। और वह यह कि साम, दाम, भाय और भेद से कुछ जाटों से इस आशय के दस्तकत कराने लगे कि हमें कोई शिकायत ठिकाने से नहीं है। किंतु जिन 15 चौधरियों ने ऐसे दस्तखत किए उन्हें भी आंदोलन में शामिल होना पड़ा।

सीहोट के जुल्मों के विरोध में कटराथल में जो जोरदार स्त्री कॉन्फ्रेंस हुई थी उससे ठिकानेदारों के कान तो जरूर खड़े हुए किंतु राव राजा सीकर व जयपुर राज्य किसी की ओर से सीहोर के ठाकुर के विरुद्ध कोई सख्त कार्रवाई ना होने के कारण छुट भैए जागीरदारों के और सरकारी कर्मचारियों के जुल्मों में कोई अंतर नहीं आ रहा था।

सीकर के सीनियर अफसर मिस्टर डिसूजा एक धार्मिक ईसाई अवश्य थे किंतु राव राजा पर उनका कोई प्रभाव नहीं था। वे दोनों तरफ से असफल रहे। न तो राव राजा और उनके साथियों को ही वह संतुष्ट कर सके और न किसानों को चलती चक्की से बचा सके। इसलिए जयपुर दरबार की आज्ञा से एडबल्यूटी वेब नाम के अंग्रेज को जो कि एक पॉलिटिकल रिटायर्ड अफसर था, राव राजा ने सीकर का सीनियर ऑफिसर बनाना स्वीकार कर लिया। (एसोसिएटेड प्रेस 15 मई 1934)

22 मई 1934 को मि. वेब ने सीकर आकर सीनियर ऑफिसर का चार्ज ले लिया। इससे एक दिन पहले अर्थात 21 मई को जाट लोग


[पृ.251]: अपनी मांगों का मेमोरियल फिर एक बार जयपुर दरबार की सेवा में प्रेषित कर चुके थे। इस मेमोरियल में अपनी उनकी मांगों को दुहराया था जो पहले पेश की जा चुकी थी।

सीकर के जाटों की सफलता: ठिकाने ने जांच कमीशन नियुक्त कर दिया, जयपुर 29 मई 1934 : जाट पंचायत सीकर वाटी के महामंत्री देवा सिंह बोचल्या की प्रमुखता में लगभग 200 जाटों का एक डेपुटेशन सीकर के नए सीनियर अफसर एडबल्यू वेब से मिला और अपनी शिकायतें सुनाई। मिस्टर वेब ने उनकी बातों को सहानुभूति पूर्वक सुनकर बतलाया कि राव राजा सीकर ने आप लोगों की शिकायतों की जांच करने के लिए 8 व्यक्तियों का एक मिशन नियत करने की इजाजत दे दी है। उसका प्रधान मैं स्वयं और मेंबर मेजर मलिक मुहम्मद सेन खां पुलिस तथा


[पृ.254]: जेलों के अफसर-इंचार्ज कैप्टन लाल सिंह, मिलिट्री मेंबर ठाकुर शिवबक्स सिंह, होम मेंबर और चार जाट प्रतिनिधि होंगे। चार जाटों में से दो नामजद किए जाएंगे और दो चुने जाएंगे।

आप ने यह भी कहा कि मुझे जाटों की शिकायतें कुछ अत्युक्तिपूर्ण मालूम पड़ती हैं तथापि यदि जांच के समय आंदोलन बंद रहा और शांति रही तो मैं जांच जल्दी समाप्त कर दूंगा और जाटों को कोई शिकायत नहीं रहेगी।

जाट जांच कमीशन की रचना से संतुष्ट नहीं हैं। न वे चारों जाट मेंबरों को चुनना ही चाहते हैं। वे झुंझुनू में एक सभा बुलाने वाले हैं। बोसना में भी एक पंचायत होगी इन दोनों सभाओं में मिस्टर वेब के ऐलान पर विचार होगा। (यूनाइटेड प्रेस)

इसके बाद राव राजा साहब और सीनियर साहब दोनों ही क्रमश: 2 जून और 6 जून सन 1934 को आबू चले गए।

आबू जाने से 1 दिन पहले सीनियर ऑफिसर साहब मिस्टर वेब ने सीकर वाटी जाट पंचायत को एक पत्र दिया जो पुलिस की मारफ़त उसे मिला। उसमें लिखा था, “हम चाहते हैं कि कार्यवाही कमीशन मुतल्लिका तहकीकात जाटान सीकर फौरन शुरू कर दी जावे। हम 15 जून को आबू से वापस आएंगे और नुमायदगान से जरूर सोमवार 18 जून सन 1934 को मिलेंगे। लिहाजा मुक्तिला हो कि जाट लीडरान जगह मुकर्रर पर हमसे जरूर मिलें।

सीनियर ऑफिसर के आबू जाने के बाद सीकर के जाट हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे। बराबर गांवों में मीटिंगें करते रहे। उन्होंने इन मीटिंगों में इस बात के प्रस्ताव पास किया, “जयपुर दरबार के सामने पेश की हुई हमारी मांगे


[पृ.255]: सर्वसम्मत हैं और हमारे ऐसी कोई भी पार्टी नहीं जो इन मांगों के विरुद्ध हो, सीकर के कर्मचारियों ने मिस्टर वेब को यह समझाया कि यहां के जाटों में दो पार्टियां हैं कतई झूट है” (नवयुग 12 जून 1934)

मि. वेब आबू से एक दो दिन की देर से वापस हुए। इसके बाद में शायद किसी जरूरी काम से जयपुर गए। इसलिए जाट पंचायत के प्रतिनिधियों से बजाय 18 जून 1934 के 22 जून 1934 को मुलाकात हुई। उन्होने पहली जुलाई तक कमीशन के लिए जाटों के नाम की लिस्ट देने को जाट पंचान से कहा और यह भी बताया कि राव राजा साहब ने ठिकाने में से सभी बेगार को उठा दिया है।

29 जून 1934 को राव राजा साहब भी आबू से वापस आ गए। कुछ किसानों ने रींगस स्टेशन पर उनसे मुलाकात करनी चाहिए किंतु नौकरों ने उन्हें धक्के देकर हटा दिया।

इससे पहले ही तारीख 24 जून 1934 को कूदन में सीकर वाटी के प्रमुख जाटों की एक मीटिंग कमीशन के लिए मेंबर सुनने के लिए हो चुकी थी। भरतपुर से ठाकुर देशराज और कुंवर रतन सिंह जी भी इस मीटिंग में शामिल हुए थे। तारीख 25 जून 1934 को एक खुली मीटिंग गोठड़ा में हुई जिसमें रायबहादुर चौधरी छोटूराम और कुंवर रतन सिंह बाहर से तथा कुंवर पृथ्वी सिंह और चौधरी ईश्वर सिंह सीकर से जांच कमीशन के लिए चुने गए।

आरंभ में मि. वेब ने तत्परता और बुद्धिमानी से काम लिया। उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के रुख में परिवर्तन करने के लिए 30 जून को एक मीटिंग की और उसमें तमाम कर्मचारियों से कहा कि हम सब “प्रजा के नौकर हैं”, उन्होंने खर्चे में भी घटोतरी की। पहले तमाम कर्मचारी सरकारी सवारी बरतते


[पृ.256]: थे, उन्होंने इस प्रथा को मिटा दिया। बेगार के खिलाफ भी कदम उठाया। मालिक मोहम्मद जैसे षड्यंत्र लोगों के जाल में वे भी फंस गए। जाट लोग मलिक मोहम्मद को कभी पसंद नहीं करते थे क्योंकि जाटों पर दमन करने में वह अगवा था।

तारीख 23 जुलाई 1934 से कमीशन कार्य शुरु कर देगा। ऐसा निश्चय सुनकर जाट प्रतिनिधि वेब से बहुत खुश हुए और उन्होंने उस दिन 10 जुलाई की मुलाकात में उनसे उन्हें बधाई देते हुए यह भी कह डाला कि अब हमारे आधे दुख दूर हो गए हैं। इस दिन मिस्टर वेब ने खुले दिल से 2 घंटे तक जाट प्रतिनिधियों से बातें की थी और सारी तकलीफें अपने समय में दूर कर देने का विश्वास दिलाया।

तारीख 23 जुलाई 1934 की प्रतीक्षा जाट किसान बड़ी उत्सुकता से कर रहे थे कि उस दिन उनके कष्ट की जांच का कार्य आरंभ हो जाएगा किंतु ‘साईं के मन कछु और है मेरे मन कछु और’ वाली कहावत के अनुसार मिस्टर वेब की ओर से मिलने वाली विज्ञप्ति तारीख 15 जुलाई 1934 को ही मिल गई।

वेब का ऐलान 15 जुलाई 1934 अधूरा और निराशा पूर्ण

ठाकुर देशराज[6] ने लिखा है .... इस एलान से सीकर के किसानों के दुख दूर नहीं हो सकते। 15 जुलाई 1934 को मिस्टर ए.डबल्यू.टी. वेब साहब सीनियर ऑफिसर सीकर ने राव राजा साहब सीकर की मंजूरी से ऐलान अपने इजलास से निकाला है, वह निराशाजनक है। ऐसा निर्णय सीकरवाटी जाट पंचायत अपने विशेष मीटिंग द्वारा 16000 की उपस्थिति में 29 जुलाई 1934 को कर चुकी है। सीकर के समस्त किसान जिन कारणों और कमियों से एलान को अपूर्ण और निराशाजनक समझते हैं, वह इस एलान में जोकि पंचायत द्वारा प्रकाशित कराया जाता है..... इसलिए वह तब तक स्वीकार होना कठिन है जब तक सीकर वाटी जाट पंचायत द्वारा विस्तार से दी गई लिखित बातों का उसमें समावेश और संशोधन न हो जाए। ....देवासिंह बोचल्या, मंत्री सीकर वाटी जाट क्षत्रिय पंचायत

जयपुर के ठिकानों में प्रजा पीड़न

ठाकुर देशराज[7] ने लिखा है .... ‘राजपूताना मेल’ के संपादक का आंखों देखा वर्णन -

‘राजपूताना मेल’ अखबार के संपादक श्री दिनकर राव ने फॉरवर्ड में एक पत्र प्रकाशित करवाया है जो इस प्रकार है-

समाचार पत्रों में सीकर के जाट किसान आंदोलन के संबंध में बहुत से समाचार प्रकाशित हुए हैं। उन्हीं की सत्यता की जांच करने के लिए मैंने सीकर के सीनियर अफसर कैप्टेन एडबल्यूटी वेब से तार द्वारा आज्ञा प्राप्त कर सीकर गया था। मैं वहाँ 2 दिन रहा और कई आदमियों से मिला। जो कुछ मैंने वहां देखा बड़ा ही हृदय विदारक था। बेचारे जाट लोगों को भोमिया लोग एक न एक अपराध लगाकर खुल्लम-खुल्ला सताते हैं। मैं कैप्टन एडबल्यूटी वेब से मिला था और उनसे बातचीत की थी। बातचीत करने पर वह मुझे सच्चे और स्पष्ट वक्ता मालूम हुये। जाट आंदोलन से वह बहुत ही विचलित दिखाई देते थे। परंतु खुड़ी दुर्घटना के संबंध में उनका विचार है कि जाट भी अस्त्र शस्त्र से सुसज्जित थे। उन्होंने तलवार लाठियां तथा अन्य हथियार दिखाए जो उनके कथन अनुसार जाटों के पास से खुड़ी ग्राम में बरामद हुए थे। यह हो सकता है परंतु इसमें कोई बुरी बात नहीं है। हर किसान लाठी रखता है और राजस्थान के गांव में तो कोई भी किसान ऐसा नहीं मिलेगा जिसके पास लाठी ना हो। रही कुछ तलवारों और दो-तीन स्वदेशी बंदूकों की बात जो भागे हुये जाटों के पास से बरामद हुई थी सो वे भी साधारण हैं।


[पृ.291]: भीषण दमन तथा लाठीचार्ज को सहकर जाट अपने अहिंसात्मक आंदोलन पर दृढ़ रहे यह अत्यंत सराहनीय बात है। भोमियों के प्रति जो यह कहा जाता है कि वे अहिंसा पर दृढ़ रहे इसमें तो कोई खास बात नहीं है। परंतु जाट जैसी लड़ाकू कौम उत्तेजना दिलाने जाने पर भी चुप रही, वह बड़े आदर्श की बात थी। इस स्थिति से मैं निराश नहीं हुआ हूं। यदि जिम्मेदार नेता हस्तक्षेप करें तो मुझे विश्वास है कि शांतिपूर्ण समझौता हो जाएगा। (लोकमान्य 5 अप्रैल 1935)

राजेन्द्र कसवा द्वारा वेब का मूल्यांकन

कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) के बारे में राजेन्द्र कसवा[8] लिखते हैं कि कैप्टन वेब एक क्रूर, अभिमानी किन्तु अनुशासित अफसर माना गया है । इसके पीछे उसके फौजी संस्कार भी जान पड़ते हैं । ऐसा प्रतीत होता है की वह मात्र हुक्म चलाने का आदि था । आन्दोलनकारियों से वह बिलकुल खुश नहीं था और उन पर गोली चलाना उसके बांयें हाथ का खेल था । (राजेन्द्र कसवा: P. 160)

कैप्टन वेब सीकर में सीनियर अधिकारी के तौर पर 1934 से 1938 तक पांच साल तक रहे । उसका दुर्भाग्य था कि ये पांच वर्ष सीकरवाटी में भारी उथल-पुथल के रहे । जन आन्दोलन से चिढ़ने की उसकी अंग्रेज मानसिकता थी, किन्तु वह एक विचारशील व्यक्ति था ।

मि. वेब सबसे पहले तत्कालीन व्यवस्था का एक हिस्सा था । यह तो वह मानता है कि किसान अत्यंत पीड़ित था किन्तु जन आन्दोलन को वह नहीं पचा पाया । ठिकानेदारों-जागीरदारों की अकर्मण्यता, निर्दयता और ऐयाशी के कारण वह उनसे घृणा करता था तो किसान आन्दोलन से भी खुश नहीं था । उसका स्वभाव कुछ ऐसा जान पड़ता है कि यदि वह शांति काल में सीकरवाटी में रहता तो निश्चय ही जनहित के कार्य करता । वह किसानों और ग्रामीण जनता के शोषण से दुखी रहता था । अशिक्षा, धार्मिक पाखंडों, रूढियों, छुआछूत और अंधविश्वासों से निजात दिलाने का कार्य करता, किन्तु आम जन उसके कार्यकाल में अपने अधिकारों के लिए और स्वतंत्रता के लिए उठ खड़ा हुआ था । घमंडी सामंतों और निरीह किसानों, दोनों के लिए वेब समान रूप से अप्रिय साबित हुआ, यही उसके व्यक्तित्व की विशेषता थी । (राजेन्द्र कसवा: P. 163)

अक्टूबर 1938 में सीकर दरबार का सीनियर अफसर कैप्टन वेब का कार्यकाल पूरा हो गया । कैप्टन वेब का कार्यकाल विवादस्पद से अधिक कठोर किन्तु संवेदनशील अफसर का समझा गया है । बेशक आरंभिक वर्षों में किसान आन्दोलन को कुचलने में उसका हाथ था, लेकिन यह सब तत्कालीन परिस्थितियों के कारण हुआ । अनपढ़ और क्रूर जागीरदारों के बीच कैप्टन वेब हमेशा सही रस्ते की तलाश में लगे रहे । यही कारण था कि किसान उस पर विश्वास करने लगे थे । (राजेन्द्र कसवा: P. 169)

शेखावाटी जाटों के वेब के प्रति विचार

24 जून 1938 को सीकरवाटी जाट किसान पंचायत की सीकर में एक बैठक हुई जिसमें सीकर के रावराजा के जयपुर दरबार से विद्रोह प्रकरण में जाटों द्वारा हिस्सा न लेने के निम्न कारण बताये गए-

  • 1. खूड़ी और कूदन में जाटों के साथ किया गया बुरा व्यवहार ।
  • 2. राजपूत जागीरदारों द्वारा जाटों पर की गयी ज्यादतियां ।
  • 3. रावराजा सीकर का कुप्रंध और जाट जाति के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार ।
  • 4. जाट किसान आन्दोलन के दौरान राव रानी द्वारा कोई सहानुभूति नहीं दर्शाना ।
  • 5. कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) के अच्छे प्रशासन से जाट जाति को अनेक फायदे विशेषकर कृषि सम्बन्धी सुधार, शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधाए तथा ग्रामीण उत्थान[9]

जयपुर सीकर प्रकरण में शेखावाटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर का साथ दिया था । विजयोत्सव के रूप में शेखावाटी जाट किसान पंचायत का वार्षिक जलसा गोठडा गाँव में 11 व 12 सितम्बर 1938 को शिवदानसिंह अलीगढ की अध्यक्षता में हुआ जिसमें 10-11 हजार किसान, जिनमें 500 स्त्रियाँ थी, शामिल हुए ।

इस पंचायत में अन्य प्रस्तावों के साथ निम्न प्रस्ताव भी पारित किया गया -

सीकर के वर्तमान प्रशासन में किसी प्रकार का परिवर्तन न किया जाय क्योंकि कैप्टन वेब (A.W.T.Webb) के प्रशासन के दौरान किसानों को पर्याप्त राहत मिली है । अतः वेब को तब तक रखा जाय जब तक की सीकर में भूमि बंदोबस्त पूरा न हो जाय ।[10]

शेखावाटी जाट किसान पंचायत के इन संकल्पों से यह स्पष्ट होता है कि जाट कैप्टन वेब से काफी खुश थे । वे कैप्टन वेब को शेखावाटी के प्रशासक रूप में रोकना चाहते थे । जाटों के इस अहसान को 'सीकर की कहानी- कैप्टन वेब की जुबानी' पुस्तक में कैप्टन वेब ने इस अहसान को निम्न शब्दों में व्यक्त किया-

जागीरदार और किसान के मध्य होने वाला स्थाई संघर्ष एक चरम की और पहुँच रहा था । मुझे उस समय की कटु यादें आती हैं जब किसान की पीड़ा उन्हें उकसाने का कारण बनी और राजनैतिक दृष्टता करने वालों के समूहों के लिए दरवाजे खुल गए । हमने उस तूफ़ान का मुकाबला किया परन्तु इस दौरान हिंसक मृत्यु और निर्दयता से घायल होने पर भारी क्षति सहन करनी पड़ गयी थी । ईश्वर को अवसर प्रदान करने पर धन्यवाद् है कि जिनकी कठिनाईयों को दूर करने का प्रयत्न कर मैंने उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रमाणित की और मैं वहां के सीधे-सादे लोगों द्वारा बाद में परेशानी के समय में दी गयी सहायता के प्रति कृतज्ञ रहूँगा और उसकी स्मृति सदा दिल में संजोये रखूँगा ।" (भगवान सिंह झाझड़िया, p.71)

कैप्टन वेब के हर्ष की धरोहर को बचाने के प्रयास

कैप्टेन वेब (A.W.T. Webb) लिखते हैं कि जब वे हर्ष के ब्राह्मण पुजारियों से मिले तो बताया गया कि यह गाँव विध्वंश कर दिया गया था और इसके निवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया, जब मुसलमानों द्वारा सन 1679 में मंदिर ध्वस्त किया गया था । जो मौत से बच गए उन्होंने हर्ष का वर्तमान गाँव बसाया । इस मंदिर का सर्वनाश सन 1679 में तब हुआ जब खानजहां बहादुर ने मुग़ल बादशाह औरंगजेब के आदेशानुसार या किसी तरह उस मूर्ती-भंजक स्वेच्छाचारी शासक को प्रसन्न करने के लिए मंदिर पर हमला कर हर्ष के मंदिरों को जमींदोज कर दिया और प्रत्येक मूर्ती और गढ़ाई के कार्य को विकृत कर दिया । कोई भी बड़ा टुकड़ा अछूता नहीं बचा । [11]

कैप्टेन वेब सीकर के प्रशासक 1934 से 1938 की अवधी में रहे हैं । हाल ही में उनके द्वारा अंग्रेजी में लिखे अभिलेखों का अनुवाद कर भगवान सिंह झाझड़िया ने 'सीकर की कहानी कैप्टेन वेब की ज़ुबानी' नामक पुस्तक 2009 में प्रकाशित किया है । इससे पता लगता है कि कैप्टेन वेब ने इस धरोहर को बचाने और सुरक्षित करने का काफी प्रयास किया । वेब ने भग्नावस्था में बिखरी पडी पुरासंपदा को सीकर में लाकर संग्रहालय में रखवाया ।

कैप्टेन वेब हर्ष मंदिर के निरीक्षण के समय ध्वंश को देखकर इतने व्यथित हुए कि वे लिखते हैं कि तब मेरा क्रोध बचकानी ध्वंशात्मक प्रवृति के प्रतीक उनके मुस्लिम नौकर के प्रति जाग्रत हुआ और मैंने उसे जितना बड़ा टुकड़ा मैं उठा सकता था उसके हाथों में लाद दिया और उसके पूर्वजों के प्रति अपराध के लिए उसे आदेश दिया क़ि वह इसे पहाड़ी के नीचे ले जाए. बिना हिचक उसने हुक्म का पालन किया, केवल यह कहते हुए कि वह भी मूर्तिपूजा का समर्थन नहीं करता । [12]

कैप्टेन वेब द्वारा हर्ष मंदिर की कुछ सामग्री सन 1935 में सीकर ले जाई गयी थी । यहीं उनके प्रयत्न से एक म्यूजियम बना था जिसके अनेकों कमरे इस कला संसार से भरे हुए थे । हजारों दर्शक विस्मयविमुग्ध होकर इस सामग्री को देखते थे । आज ज्ञात नहीं यह कला संसार कहाँ विलुप्त हो गया । धन लोलुप लोगों ने इसे पश्चिमी देशों में पहुंचा दिया । यह कला का खजाना भारत से नेपाल होता हुआ आगे गया । सीकर के राव राजा का पुत्र हरदयाल नेपाल विवाह गया था । सीकर ठिकाना हर्ष की सामग्री पर अपना एकाधिकार मानता था । [13]

शिम्भूराम भूकर शहीद हो गए

रणमल सिंह[14] लिखते हैं कि सन् 1934 के प्रजापत महायज्ञ के एक वर्ष पश्चात सन् 1935 (संवत 1991) में खुड़ी छोटी में फगेडिया परिवार की सात वर्ष की मुन्नी देवी का विवाह ग्राम जसरासर के ढाका परिवार के 8 वर्षीय जीवनराम के साथ धुलण्डी संवत 1991 का तय हुआ, ढाका परिवार घोड़े पर तोरण मारना चाहता था, परंतु राजपूतों ने मना कर दिया। इस पर जाट-राजपूत आपस में तन गए। दोनों जातियों के लोग एकत्र होने लगे। विवाह आगे सरक गया। कैप्टन वेब जो सीकर ठिकाने के सीनियर अफसर थे , ने कटराथल गाँव के चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल जो उस समय जाट पंचायत के मंत्री थे, को बुलाकर कहा कि जाटों को समझा दो कि वे जिद न करें। चौधरी गोरूसिंह की बात जाटों ने नहीं मानी, पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। इस संघर्ष में दो जने शहीद हो गए – चौधरी रत्नाराम बाजिया ग्राम फकीरपुरा एवं चौधरी शिम्भूराम भूकर ग्राम गोठड़ा भूकरान । हमारे गाँव के चौधरी मूनाराम का एक हाथ टूट गया और हमारे परिवार के मेरे ताऊजी चौधरी किसनारम डोरवाल के पीठ व पैरों पर बत्तीस लाठियों की चोट के निशान थे। चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल के भी पैरों में खूब चोटें आई, पर वे बच गए।

चैत्र सुदी प्रथमा को संवत बदल गया और विक्रम संवत 1992 प्रारम्भ हो गया। सीकर ठिकाने के जाटों ने लगान बंदी की घोषणा करदी, जबरदस्ती लगान वसूली शुरू की। पहले भैरुपुरा गए। मर्द गाँव खाली कर गए और चौधरी ईश्वरसिंह भामू की धर्मपत्नी जो चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथना की बहिन थी, ने ग्राम की महिलाओं को इकट्ठा करके सामना किया तो कैप्टेन वेब ने लगान वसूली रोकदी। चौधरी बक्साराम महरिया ने ठिकाने को समाचार भिजवा दिया कि हम कूदन में लगान वसूली करवा लेंगे।

Books authored by Webb

  • Webb, A. W.. (1961): Agricultural census of the Seychelles Colony: Report & tables for 1960
  • Webb, A. W.. (1960): Population census of the Seychelles Colony: Report and tables for 1960
  • A.W.T.Webb(1964): The Story of Seychelles, .Victoria: Government Printing Office.1966.
  • Webb, A. W. T. (Archibald Wilfred Tisdal): List of Islands which constitute the Colony of Seychelles
  • A. W. T. Webb (1944): Padmini - a historical romance. Published by Thacker & Co. in Bombay. Written in English.
  • Webb, A. W. T. (Archibald Wilfred Tisdal)., 1899-1968: List of Islands which constitute the Colony of Seychelles / A.W.T. Webb

References

  1. Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009, p. 81
  2. Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009, pp. 18-19
  3. Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009, p. 76
  4. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 125-126
  5. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.249-256
  6. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.262-267
  7. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.290-291
  8. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 160
  9. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.159
  10. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.162
  11. सीकर की कहानी (कैप्टेन वेब की जुबानी), सीकर, 2009, पृ. 22,80
  12. सीकर की कहानी (कैप्टेन वेब की जुबानी), सीकर, 2009, पृ.23
  13. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.274
  14. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0 पृष्ठ 113