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Rao Shekha

From Jatland Wiki
(Redirected from राव शेखा)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Genealogical Tree of Sikar family, Source: Wills Report, 1933, Appendix-A, p.1
Genealogy of Sikar Thikanedars

Rao Shekha (1433–1488) was the ancestor of Shekhawat Rajputs in present-day Rajasthan, India. He was a member of the Kachhwaha dynasty of Amber, who asserted his independence and established a principality centered at Amarsar around the mid-15th century.[1] His descendants came to be known as the Shekhawats.[2]

Variants

Birth

Rao Bala, third son of Udaikaran of Amber, was given estate of Nayan and Barwara after death of his father. Descendants of Rao Bala are collectively called as "Balapota".

After death of Rao Bala, Mokal succeeded him as Ruler of estate. He had 4 wives, but no heir. One day in his estate, he met a mysterious man, who was sufi saint named Sheikh Burhan Chisti, he gave boon to him that his son will remain undefeated, but he have to name him similar to sufi saint, and wear tunic. On day of Vijayadashmi, in Tyondagarh fort, in Khetri, Rao Shekha was born from womb of Maharani Nirwan, daughter of Rao Lunkaran Nirwan.

Shekhaji succeeded as the head of the Nayan and Barwada estate, along with 24 more villages, at the age of 12, as a result of the untimely death of his father Mokal in 1445.[4]

Shekhaji left a well-established position to his youngest son Raimal.[5] [6]. After Rao Raimal, Rao Lunkaran (1548-1584) was made the Head of Amarsar .

After is Death, the Ancestral seat of Amarsar was succeeded by his Son Rao Manohar. Later Shahpura, became the capital of Old Amarsar - Manoharpur line of Shekhawats.[7]

Death

Shekhaji died in 1488 fighting the Gaur Rajputs in the war of Ghatwa, reason being a newly lady of Kachwaha clan was ill treated and her husband was killed by Gaur ruler. Shekhaji took his last breath at Ralawta. A cenotaph (Chhatri) was built where he died. A statue of Shekhaji was also inaugurated in the same place by the President of India Smt. Pratibha Patil.[8]

राव शेखा से शेखावत वंश का प्रारंभ

राव शेखा (1433–1488 ई.) - शेखावत वंश का प्रारंभ

स्रोत: रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.130-134

[पृ.130]: उदयकरण (1367-1389 ई.) का तृतीय पुत्र बाला था जिसके पोते से शेखावत वंश का प्रारंभ हुआ. बाला को चतुर्थ पुत्र भी कहा गया है. [9]

उदयकरण का समय विक्रम संवत 1423 से 1445 माना गया है. यही स्थिति सीकर के इतिहास की है. माधोवंश प्रकाश में उदयकरण के गद्दी पर बैठने का समय माह बदी 3 संवत 1423 दिया गया है और मृत्यु संवत फागण बदी 3, 1445 है. इस प्रकार इस ग्रंथ के अनुसार इसने 22 वर्ष एक माह राज्य किया. एक आधुनिक पुस्तक में भी यही समय स्वीकार किया गया है [10]


[पृ.131]: उदयकरण का उपयुक्त समय ठीक नहीं प्रतीत होता है. उदयकरण का ठीक समय वस्तुतः (1367-1389) ई अथवा विक्रम 1424 - 1446 है जिसका उल्लेख अनेक आधुनिक ग्रंथों में किया गया है. [11]

उदयकरण ने बाला को जीवन निर्वाह हेतु बरवाड़ा 12 गांवों सहित दिया. शेखावाटी प्रकाश के रचयिता ने 25 गांवों सहित बरवाड़ा स्थानाधिकार माना है. अन्यत्र उन्होंने 12 गांवों सहित बरवाड़ा मिलने की बात कही है. कुछ गांव पर आगे चलकर बालाजी ने अधिकार कर लिया था अतः संभवत: है उनके अधिकार में 25 गांव बताए गए हैं. बाला के दो रानियां से 12 पुत्र हुए - 1. मोकल, 2. खींवराज (बाला पोता), 3. खरथजी (करनावत), 4. मोकाजी (मोकावत), 5. भीलोजी (भीलावत), 6. झामाजी (झामावत), 7. डूंगरसिंह (जीवावत), 8. गोविन्द दास (बालापोता), 9. नाथाजी (बाला पोता), 10. बीझाजी (बीझाणी), 11. सान्गाजी (सान्गानी ), 12 चान्दाजी (निस्संतान)

बाला की मृत्यु पर इसका बड़ा पुत्र मोकल बरवाड़ा में गद्दी पर बैठा. मोकल एक धर्मात्मा वृत्ति का शासक था. इसने अपने पिता के जीवन काल में ही नाण गांवों को डाहलिया राजपूतों से जीतकर अपने अधिकार में कर लिया था. मोकल के वृद्धावस्था तक कोई पुत्र नहीं हुआ था. अतः मन से दुखी रहता था.

एक दिन उसकी भेंट शेख बुरहान चिश्ती से हुई. यह फकीर तैमूर लंग के साथ हिंदुस्तान में आया था और क्षत्रियों में इस्लाम का प्रचार करने के लिए यहां ठहर गया था. शेख के आशीर्वाद से मोकल को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ जिसका नाम शेख के नाम से साम्य रखते हुए शेखा रखा गया. वैसे राजपूतों में शेखा नाम असामान्य नहीं है. [12] इस वंश के बच्चे के गले में बद्दी तथा झंडे में नीला निशान भी कहते हैं इस फकीर की यादगार में है. शेख बुरहान का मकबरा अमरसर से 14 मील दूर टीला ढोला नामक स्थान में है जो शेखावतों की जियारतगाह है. कुछ लेखकों को मिथ्या जातीय अभियान के कारण शेख बुरहान की कृपा से शेखा की उत्पत्ति की बात स्वीकार्य नहीं लगती अतः वे तरह-तरह की कल्पना कर इसे हिंदू साधु की कृपा का फल बताते हैं.

शेखा के जन्म के कुछ वर्षों बाद मोकल की मृत्यु हो गई. माधो वंश प्रकाश में मोकल की मृत्यु संवत् 1502 में होने का उल्लेख है. 'केसरी सिंह समर', जो शेखावतों के इतिहास पर बड़ी प्रामाणिक पुस्तक है, में आमेर नरेश चंद्रसेन के समय में मोकल की उपस्थिति की बात कही गई है. चंद्रसेन का समय ई. 1467 से 1503 (विक्रम 1524 से 1560) माना जाता है. चंद्रसेन का मोकल पर क्रोध करना आदि बातों का उल्लेख समर में किया गया है. [13] इससे मोकल का विक्रम 1524 तक विद्यमान होना मानना पड़ेगा. यह तिथि असंगत नहीं है. इस पर किए गए एतराज सारहीन हैं. संभव प्रतीत होता है कि अपने वृद्धावस्था और धार्मिक प्रवृत्ति के कारण मोकल ने शेखा को वस्तुत: सारा राजकाज सौंप दिया था. इस तरह की बात के इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं. शेखा के काका खींवराज को इसका अभिभावक और संरक्षक बना दिया गया होगा. [14]


[पृ.132]: शेखा के जन्म की निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है. सामान्यतः शेखा का जन्म मोकल की निर्वाण रानी से आसोज सुदी 10 गुरुवार विक्रम संवत 1490 (1433 ई.) में माना जाता है. [15] इसका जन्म नाण के पास स्थित अमरा धाभाई के निवास स्थान पर हुआ था. इस अमरा को जाति का खासौदा जाट भी बताया गया है. राज्य गद्दी संभालने के समय शेखा की अवस्था 12 वर्ष की थी. ऐसी अवस्था में इसका काका खींवराज राज्य का भार संभालता था.

राव शेखा द्वारा राज्य विस्तार

शेखा वीर प्रकृति का महत्वकांक्षी पुरुष था. उसने 16 वर्ष की अवस्था होते-होते राज्य विस्तार की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी. उसने सर्वप्रथम निकटतम सांखलों के भूभाग पर आक्रमण किया जिनका राज्य नाण के आसपास था. जाजा पर भी उसका अधिकार हो गया. आगे चलकर सांईवाड़ ठाकुर नापा सांखला से उसका मुकाबला हुआ जिसमें भी शेख की विजय हुई. [16] शेखा ने मेंड और बैराठ के यादवों के ठिकानों पर भी हमला किया तथा टॉक राजपूतों के कुछ गांवों को दबा लिया.

इन आसपास के भूभागों पर कब्जा करने के बाद शेखा ने नाण के उत्तर में एक गांव बसाया जिसका नाम अमरसर रखा. संभव है अमरसर के वर्तमान स्थान पर कोई छोटा गांव पहले बसा हुआ हो और उसे सुव्यवस्थित कर शेखा ने उसको राजधानी बनाया हो. अमरा जाट के नाम पर इसे अमरसर नाम दिया गया.

शेखा की इन विजयों में उसके पठान सहायकों का बड़ा हाथ रहा है. 'केसरीसिंह समर' के अनुसार दावल पठान गुजरात के बादशाह के रुष्ट होकर मुल्तान जा रहे थे. इनकी संख्या 500 दी गई है. वे पठान अमरसर आकर ठहरे. इस पर शेखा उनसे मिला और उन्हें अपने पास रख लिया. पठान सदैव से पेशेवर लड़ाकू रहे हैं. उन्होंने शेखा की सेवा स्वीकार कर ली.[17] एक बार राजपूतों और इन पठानों में मोर को मारने के कारण संघर्ष की स्थिति बन गई थी पर इसे शांतिपूर्ण संभाल लिया गया.

शेखा के पिता एवं पितामह के समय से ही आमेर के मुख्य राज्य को कर स्वरूप घोड़े भेजने पड़ते थे. जागीर प्रथा की इस मूलभूत बात को ठीक तरह नहीं समझने के कारण भाटों और चरणों ने तरह-तरह की काल्पनिक बातें गढली और आगे के लेखकों ने उसका अंधानुकरण करना प्रारंभ कर दिया. राजपूतों में प्रचलित प्रथा के अनुसार पाटवी पुत्र को राजगद्दी मिलती थी. राजा के दूसरे पुत्रों को छुटभैया मानकर जीवन निर्वाह के लिए जागीर मिलती. यद्यपि इन छुटभैया का मान सम्मान अन्य जागीरदारों से अधिक रहता पर कर स्वरूप जागीर की आय के अनुपात में उन्हें घोड़े या हाथी राज्य की सेवा में भेजने पड़ते. एक हजार की आय पर एक हाथी और ₹500 की आय पर एक घोड़ा तय होता था. सबसे छोटी आय की जागीर 'डीलों' की जागीर कहलाती थी.


[पृ.133]: बाला एवं उसके पश्चात मोकल को भी इस कर के रूप में घोड़े भेजने पड़ते थे....शेखा ने इस कर को बंद कर दिया. यह केंद्रीय सत्ता को खुली चुनौती थी. इसके फल स्वरुप आमेर नरेश चंद्रसेन से उनकी कई लड़ाईयां हुई. शेखावाटी प्रकाश के अनुसार धोली गांव में तीन बार लड़ाईयां हुई जिसमें शेखा विजयी रहे. इन लड़ाईयों की संख्या 6 भी बताई गई है. [18] अंतिम लड़ाई कुकस के तट पर हुई. आगे चलकर दोनों में संधि हो गई जिसके फलस्वरुप शेखा की स्वतंत्रत सत्ता स्वीकार कर ली गई तथा जिन गांवों पर उसने अधिकार कर लिया था वह उसी के अधिकार में रहे.

शेखा ने इसके पश्चात संवत 1530 (1473 ई.) में उत्तर की ओर बढ़ना आरंभ कर दिया. उस समय दादरी के क्षेत्र के आसपास जाटू तंवर बसे हुए थे. शेखा ने पठानों की सहायता से इनका दमन किया और हिसार के आसपास के क्षेत्र पर हमला कर अलफखां बागड़ी जो अखन खां का पुत्र था को हराया. इसी क्रम में शेखा ने नोप सिंह को हराकर दादरी को लूट लिया. [19] यह विजय अभियान सिर्फ अधिकार प्रदर्शन और लूट मार के लिए था. इससे इन गांवों पर स्थाई अधिकार नहीं हुआ था.

शेखा ने इस प्रकार अपनी स्थिति सुदृढ़ कर और लूटमार से धन प्राप्त कर अमरसर में शिखरगढ़ नामक सुदृढ़ दुर्ग बनवाया. शेखावाटी प्रकाश के अनुसार इस दुर्ग का निर्माण विक्रम संवत 1534 में हुआ था. [20]

राव शेखा की मृत्यु: राव शेखा ने अब पश्चिम के गौड़ावाटी प्रदेश की ओर बढ़ना आरंभ किया. इस पर गौडों से, जो उस समय इस गौड़ावाटी क्षेत्र में स्थित थे, उसकी 11 लड़ाइयां हुई. गौडों से हुई अंतिम लड़ाई में बुरी तरह घायल हो जाने पर जीणमाता के पास रलावता गांव में उसका देहांत हो गया. मृत्यु के समय उसका छोटा पुत्र रायमल सेना सहित उपस्थित था. शेखा की मृत्यु वैशाख सुदी तीज विक्रम 1545 में हुई थी. [21]

घाटवा युद्ध (1488 ई.) में राव शेखा अपने पुत्रों सहित वीरगति को प्राप्त हुए. इस युद्ध में गौड़ राजपूतों को भी भारी क्षति पहुँची.[22]

शेखावत शासन की नींव: राव शेखा ने अपने बाहुबल से कुछ ग्रामों पर अधिकार कर एक सुदृढ़ शासन की स्थापना की थी. वस्तुत: शेखा से ही शेखावत शासन की नींव पड़ी है. शेखा के अधीन भूभाग में गौड़ावाटी, तोरावती, आमेर आदि क्षेत्रों के कुछ गांव थे पर जिसे विशुद्ध रूप से शेखावाटी का भूभाग कहा गया है वहां उसका प्रवेश नहीं हुआ था. इस क्षेत्र में आगे चलकर उसके वंशजों ने अपना राज्य स्थापित किया.


[पृ.134]: राव शेखा के 5 रानियों से 12 पुत्र पैदा हुए.

1. टांकण जी - नगरकोट के किल्हन जी टांक की पुत्री,
2. तंवर जी - पाटन के राव गाहड़मल की पुत्री,
3. तंवर जी - गांवडी के पिचियान तंवर की पुत्री,
4. गौड़ जी - जून्थरी के जादम गौड़ की पुत्री,
5. चौहान जी - चौबारे के राव स्योबक्ष की पुत्री.

राव शेखा ने मृत्यु के पूर्व ही रायमल को अपनी ढाल लवार देदी थी जो राज्याधिकार का सूचक चिन्ह था. शेखा की मृत्यु के बाद उसका कनिष्ठ पुत्र रायमल गद्दी पर बैठा.

See also

External links

References

  1. ↑ Rima Hooja. A History Of Rajasthan. pp. 582–584.
  2. ↑ Rima Hooja. A History Of Rajasthan. p. 696. He followed up his campaign against the Mewatis into Kachchwaha-held lands and attacked Amarsar. Amarsar was then held by Raimal of the Shekhawat sub-branch of the Kachchwahas
  3. ↑ Dr Mahendra Singh Arya etc, : Ādhunik Jat Itihas, Agra 1998, p. 281
  4. ↑ Singh Shekhawat, Thakur Surjan. Rao Shekha.
  5. ↑ James tod (1873). Clear writing edition of - Annals & Antiquities of Rajasthan or the central & western Rajput states of India. madras Higginbotham and co 165 mount road. p. 360].
  6. ↑ Hooja, Rima (2006). A History of Rajasthan. Rupa & Company. ISBN 9788129115010.
  7. ↑ Hooja, Rima (2006). A History of Rajasthan. Rupa & Company. p. 499.
  8. ↑ Singh, Ranbir (2001). History Of Shekhawats. Jaipur: Publication Scheme. ISBN 8186782745.
  9. ↑ शेखावाटी प्रकाश में इससे दूसरा पुत्र माना गया है.पृ.6 ;माधो वंश प्रकाश में इसे तीसरा पुत्र माना गया है, पृ. 26
  10. ↑ शेखावाटी प्रकाश - पं. शास्त्री पृ.6 ; माधोवंश प्रकाश - जून्थाराम पृ.26; सीकर का इतिहास - झाबरमल शर्मा, पृ.7, शार्दूल प्रकाश - श्री सिंह, पृ.45
  11. ↑ Ruling Princes Chiefs and Leading Personages etc- C.S.Vele p.78;Jaipur Past and Present - Department of History 1976,p.9
  12. ↑ सीकर का इतिहास- झाबरमल शर्मा पृ.9; शार्दूल वंश प्रकाश - श्री सिंह, पृ.49; शेखावाटी प्रकाश अध्याय 4 पृ.7; माधोवंश प्रकाश-जून्थाराम पृ. 27-28 = बरदियो पीर भूरान; यक पुत्र होय सुजान, तिहि नाम रखियो शेख, अरू वंदिए मम भेष; केसरी सिंह समर पृ.2 हरिनाम उपाध्याय.
  13. ↑ केसरी सिंह समर -हरिनाम उपाध्याय पृ.6 - मोसों डरे दिल्लीस इतै माडू धर कम्पे। मोकल को बल कहा नृपति पुनि पुनि इमि जपै। पद्य 8
  14. ↑ सीकर के इतिहास में पं. झाबरमल शर्मा ने मोकल का समय संवत 1493 से 1554 दिया है. (पृ.10); माधो प्रकाश में मोकल की मृत्यु संवत 1502 में मानी है. (पृ.29). सीकर के इतिहास का समय स्पष्ट ही अशुद्ध है.
  15. ↑ शेखावाटी प्रकाश में शुभ घड़ी उत्तम लग्न संवत 1490 में शेखा का जन्म माना है (पृ.7) शिखर वंशोत्पत्ति में 1490 विजय दशमी रविवार को जन्म दिन माना गया है. माधोवंश प्रकाश में आसोज मॉस शुक्ल पक्ष 10 वीं तिथि और संवत 1490 माना गया है.
  16. ↑ जाजा जाण न आजे शेखा यो छै सांईवाडा। यो छै नापो हरिराम को देलो तने बीगाड़॥
  17. ↑ केसरीसिंह पृ.4,11,12
  18. ↑ शेखावाटी प्रकाश, पृ. 8; सीकर का इतिहास, पृ. 10-11
  19. ↑ राव शेखा सुरजन सिंह पृ.82; मधोप्रकाश-जून्थाराम पृ. 61
  20. ↑ शेखावाटी प्रकाश I, अध्याय 5, पृ.4
  21. ↑ पन्द्रसो चालीस पांच ऊपर परवाणों। शुक्ल पक्ष बैसाख तीज सुरगुर समजाणों॥ नगर घटवे आय गौड़ सेना बहु सज्जी। चढ़े अमरसर नाथ भेरि तामागल बज्जी ॥मरूभारती - राव शेखा रघुवीर सिंह; केसरी सिंह समर हरिनाथ, पृ.14 पद्य 55
  22. ↑ Indian warrior - भारतीय योद्धा army's Post, 4.1.2026