Shekhawati Ka Navin Itihas/Bhumika
| Wikifier:Laxman Burdak, IFS (R) |
Ratan Lal Mishra - Shekhawati Ka Navin Itihas, Kutir Prakashan, Mandawa, Jhunjhunu, Rajasthan, 1998
रतन लाल मिश्र - शेखावाटी का नवीन इतिहास, कुटीर प्रकाशन, मंडावा, झुंझुनू, राजस्थान, 1998
[p.v]: शेखावाटी की भूमि अपनी सविशेषताओं से मंडित है. इस प्राचीन भूभाग ने अनेकों संस्कृतियों एवं सभ्यताओं के उत्थान-पतन देखे हैं. इसका कला-संभार, जीव दया की अनन्य भावना और धर्म-प्राणता तथा मानव जीवन के चरम प्राप्य की प्राप्ति के प्रयत्नों से संकुल सौम्यता एवं सरलता से परिपूर्ण इसका जन जीवन सदैव से स्पृहणीय रहा है.
इस विशिष्ट भूभाग के प्रति पिछले कुछ वर्षों में देश-विदेश का ध्यान सघन रूप से आकर्षित हुआ है. इसके कुछ क्षेत्रों की उपलब्धियों एवं विशेषताओं की कथाओं को मुखरित करने के प्रयत्न भी हुए हैं.
इस भूभाग की स्वीय प्रकृति, प्रवृत्ति और परिवेश तथा परंपराओं के उत्स को समझे बिना तथा इसकी आत्मा के स्पंदन को सहानुभूति पूर्वक सुने बिना जो कुछ कहा जा रहा है उसमें अंतस्थित आवश्यक गंभीरता एवं महत्व नहीं है.
भूमि के साथ मानसिक रूप से एकाकार हुए बिना यह बौद्धिक व्यापार केवल क्रय-विक्रय का एक सारहीन उपकरण मात्र बना रहता है. इसे इस भूमि के प्रति सच्चे स्नेह से स्निग्ध करना होगा तभी इस भूभाग की विस्मयजनक और अनिर्वचनीय कथा संपूर्ण रूप से कही जा सकेगी.
शेखावाटी का भूभाग अनेकों दृष्टियों से महत्वपूर्ण रहा है. इसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, कलात्मक एवं साहित्यिक धरोहर दीर्घ अवधि तक सुसंपन्न एवं संवर्धित होती रही है. अनेकों वर्षों तक विविध स्रोतों से संवर्धित होने वाला यह कला
[p.vi]: एवं संस्कृति का कोषागार प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण छिन्न-विछिन्न होता रहा और संग्रहणीय उपादान बिना देखभाल और संरक्षण के विलुप्त एवं विखंडित होते रहे. अनेकों पुरातत्वीय महत्व की वस्तुएं काल के गर्भ में समा गई या प्राकृतिक प्रकोप एवं मानव के निष्ठुर हाथों से भी नष्ट-भ्रष्ट होती रही. इस कला का जो कुछ शेष रहा है वह हर दृष्टि से उत्तम और उपादेय तथा इस भू भाग के सांस्कृतिक गौरव को प्रस्थापित करने में समर्थ है.
सांस्कृतिक, कलात्मक दृष्टि से सुसंपन्न इस भूखंड की अनेकों परंपराएं, रीति-रिवाज, धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएं, जीवन का प्रकार एवं पद्धति, जीवन-दर्शन एवं चिंतन अपनी मूलभूत वैयक्तिकता लिए हुए है. राजस्थान के अनेकों सांस्कृतिक खंड आसपास के भूभागों की सांस्कृतिक धाराओं से प्रभावित होते रहे पर शेखावाटी का प्राकृतिक संरक्षण इस सांस्कृतिक आक्रमण से बचाए रखता रहा. प्रकृति की विपरीतता इस भूभाग की सांस्कृतिक एकता को अक्षुण्ण बनाए रखने में निरंतर सहायक होती रही.
बालू रेत के उन्नत गोरे टीलों से आवृत्त इस भूभाग में बड़ी आक्रामक सेनाओं का अभियान नहीं हो सका. मरुधरा की निर्जलता, शुष्कता, जलवायु की असहनीयता और सूर्यताप से तपते बालू के टीलों के समूह इसे आक्रमणकारी सेना के प्रकोप से सुरक्षित रखते रहे. इसका शुभ परिणाम यह हुआ कि इस भूभाग की कला संपदा विनाश होने से बची. कालक्रम से पूर्व संचित भंडार की श्रीवृद्धि होती रही. इस प्रकार अनेकों शताब्दियों की नवीन पद्धति एवं प्रकार तथा कलात्मक एवं सांस्कृतिक संभार अपने विविध स्वरूप और प्रकारों को लिए हुए संवर्धित होते रहे और क्षेत्रीय विशेषताओं से अभिमंडित रहे.
राजस्थान के अनेकों भूभाग विदेशी आक्रमण कारियों की निरंतर रौंद सहते रहे. इसके कारण उनकी प्राचीन संपदा विनाश होती रही. जो कुछ शताब्दी में सृजित एवं संकलित हुआ था वह कुछ दिनों में ही विनष्ट हो गया. इसके अतिरिक्त एक दूसरी तरह के आक्रमण का सामना भी इन भू भागों को करना पड़ा. आसपास की संस्कृति के प्रबल आघात से इन भू भागों के सांस्कृतिक जीवन की वैयक्तिकता एवं एकरूपता स्थित नहीं रह सकी और कालांतर में वे इस नई संस्कृति को अपनाने को बाध्य हुए.
राजस्थान का अलवर, भरतपुर का भूभाग निकटस्थ ब्रज संस्कृति से पूरी तरह प्रभावित रहा. इसी प्रकार गुजरात के पास लगते दोनों क्षेत्रों पर गुजराती संस्कृति एवं सभ्यता की पूरी छाप है. कुछ भूभाग पंजाब हरियाणा की जीवन पद्धति से अधिक साम्य रखते हैं. इस प्रकार राजस्थान में शेखावाटी को छोड़कर एक भी सांस्कृतिक इकाई ऐसी नहीं है जिसकी समूची जीवन पद्धति रीति-रिवाज और रहन-
[p.vii]: सहन, सदियों पुरानी परंपराओं को समाहित करती हुई विद्यमान है. साथ ही सभी प्रकार के प्रभाव से सर्वथा विर्निमुक्त जिसकी सांस्कृतिक वैयक्तिकता हो.
दीर्घकाल तक अनेकों उथल-पुथलों का सामना करता हुआ, शेखावाटी का सांस्कृतिक प्रदेश अपनी परिसीमा को बनाए रख सका. शेखावाटी के इस सांस्कृतिक भूभाग में झुंझुनू, सीकर के वर्तमान जिलों का भूभाग, चुरू जिले का कुछ भूभाग, बीकानेर एवं नागौर जिले के भूभाग, हरियाणा के भी कुछ भूभाग आते हैं. इसमें रहने वाले लोगों का रहन-सहन, रीति-रिवाज, रीतिनीति , पहराव आदि मूलभूत सामानता लिए हुए हैं.
इस विस्तृत क्षेत्र की धरोहर का परिरक्षण हमारा पुनीत कर्तव्य है. इसके लिए त्रिपक्षीय कार्यक्रम अपनाना होगा और संस्थागत प्रयत्न करना होगा. वे तीन पक्ष हैं संकलन, संरक्षण एवं प्रकाशन. बिखरी सामग्री को जिसमें पांडुलिपियों, पुराने कागजात, शिलालेख, ख्यातें, बातें, प्रवाद आदि आते हैं, संकलित कर उन्हें हमें भूभाग की गरिमा को समुचित महत्व के साथ देश के अन्य भाग के लोगों, विदेशियों आदि के समक्ष रखने के लिए ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सामग्री का प्रकाशन करना होगा.
संरक्षण के लिए वित्तीय साधनों को जुटाकर प्राचीन भवनों, देवालयों, मस्जिदों, मठों, छतरियों, दरगाहों, हवेलियों आदि को जिनका ऐतिहासिक महत्व है विनाश से बचाना होगा. साथ ही निरंतर मिटते भित्ति-चित्रों की संपदा को मानव और प्रकृति के क्रूर हाथों से बचाकर उसके प्राचीन रूप में बनाए रखना होगा.
शेखावाटी के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक महत्व के अनेकों संस्थान आज खंडहर हो चुके हैं, कुछ होते जा रहे हैं. अनेकों प्राचीन भवनों को मानव की अत्यधिक प्राप्ति की बढ़ी हुई भूख निगल गई है. अनेकों महत्वपूर्ण पांडुलिपियां या तो पैसे के लाभ में बेच दी गईं या फिर घोर उपेक्षा से कीड़ों का शिकार हो गईं. पैतृक संपत्ति के मोह से वशीभूत कुछ लोग इसे उचित संरक्षण नहीं दे पाए और अपने पास रखते रहे जिससे वह धीरे-धीरे विनष्ट हो गई. इस प्रकार विविध रूप में विनष्ट होती हुई यह सामग्री आज इस स्थिति में है कि अगर संरक्षण आदि का एक विस्तृत एवं त्वरित और सघन कार्यक्रम हाथ में नहीं लिया गया तो फिर यह सामग्री नाम-शेष ही हो जाएगी.
शेखावाटी के गौरव की स्पृहणीय कथा को हमें तार स्वर से उद्घोषित कर इसका ऊर्जस्वित नाद देश के अन्य भूभागों में निनादित करना है. इस भूखंड की भूमिसात होती हुई सामग्री को बचाना है. इसके लिए सभी जन्मभूमि प्रेमी सज्जनों के सहयोग की अपेक्षा और आवश्यकता है.
शेखावाटी वीर प्रसविनी भूमि है. यह सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्वकाल में बड़ी संपन्न रही है. जयपुर राज्य में क्षेत्र एवं जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ी इकाई रही है. प्राकृतिक द्वैदस्वरूप लिए हुए यह भूभाग वर्षों से आकर्षण का केंद्र बिंदु रहा है.
[p.viii]: ऐसे सुसंपन्न भूभाग का इतिहास नहीं होना एक सोचनीय स्थित है. कुछ स्फुट प्रकाशन इस क्षेत्र के बारे में हैं जो या तो एकांगी है या उन्हें शोध का संबल प्राप्त न होने के कारण वे वस्तु स्थिति का तथात्मक प्रस्तुतीकरण नहीं करते. इसके अतिरिक्त जातीय प्रेम के आग्रह के कारण अतिशयोक्तियों और तथ्यात्मक विसंगतियों से इस प्रकार के प्रकाशन ओतप्रोत हैं.
भाटों, चारणों के अतथ्यात्मक एवं अतिशयोक्तिपूर्ण वृत्त में वर्तमान पाठक की कोई दिलचस्पी नहीं है. वह शोध के आधार पर बिना किसी पूर्वाग्रह के प्रस्तुत किए गए इतिवृत्त के पढ़ने का आकांक्षी है.
प्रस्तुत इतिहास में प्रथम बार कायमखानियों और पठानों पर प्रामाणिक एवं तथ्यपूर्ण वुत्त दिया जा रहा है. कुछ वितथ्यपूर्ण धारणाओं के निराकरण का भी प्रयत्न किया गया है जिस वस्तु स्थिति का सही दिग्दर्शन हो सके.
पारंपरिक पद्धति की सबसे अखरने वाली बात वृत्त का तिथियुक्त नहीं होना है. अनेकों प्रश्नों में कथा-कहानी के रूप में फैले वृत्त में बहुत कम सन् संवत दिए जाते हैं. प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम बार अनेकों महत्वपूर्ण घटनाओं एवं युवतियों से संबंधित वृत्त को शोध के आधार पर तिथि-संयुक्त किया गया है.
वृत्त को कई कालों में विभाजित कर प्रस्तुत किया गया है ताकि एक और कथा का प्रभाव बना रहे और दूसरी ओर थकाने वाले दोहराव से बचा जा सके. इन कालों के नाम संस्थापन काल, संघर्ष काल, पराधीनता काल एवं आधुनिक काल रखे गए हैं.
यथास्थान समादृत सज्जनों, विद्वानों के मतों का निरीक्षण परीक्षण भी करना पड़ा है और विपरीत मत भी रखना पड़ा है. हम सब के पीछे कोई दुराग्रह, दुर्भावना या आत्मोनयन की प्रवृत्ति न होकर तथ्य पूर्ण वृत्त को लोक में उपस्थित करने की प्रबल कामना ही मुख्य रही है.
अंत में सभी ज्ञात, अज्ञात सहयोगियों, सुभाकांक्षियों एवं आत्मीयजनों को धन्यवाद देता हूं जिनके सतत सहयोग, प्रेरणा और समुत्साह से प्रस्तुत प्रकाशन संभव हुआ है.
मैं प्रोफेसर घासीराम वर्मा के प्रति अपने हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करता हूं जिनके उदार आर्थिक सहयोग से यह कृति दिन का प्रकाश देखने में समर्थ हुई है.