Ranoli
| Author: Laxman Burdak, IFS (R) |



Ranoli (राणोली) is a large, ancient village in Danta Ramgarh tahsil of District Sikar in Rajasthan. Its ancient name, mentioned in Harsha Inscription 961 AD (L-23), was Ranapallika (राणपल्लिका).
Variants
- Rana-pallika/ Ranapallika (राणपल्लिका) (L.23,V.31) = Ranoli, mentioned in Harsha Inscription
- Ranapalika (राणापालिका)[1]
- Ranapadika (राणापादिका)[2]
Location
It is located on NH-11 between Sikar and Ringas, south of Sikar.
Origin
The Founders
In Harsha Inscription
In a paper read before the Asiatic Society on August 5, 1835, Sergeant E. Dean delivered the inglorious epitaph to an extraordinary tenth-century Indian temple - Harsha Mandir which he, along with Dr. G.E. Rankin had discovered previous year. This site of Harsha Inscription is known as Harshagiri, near the village of Harasnath about 7 miles south of Sikar in Rajasthan. This Inscription is very important for Chauhan history as it gives the genealogy of Chauhan rulers. In verse 48 it mentions names of villages donated by various Chauhan rulers for the temple of Harshanatha.
The Harshagiri Inscription refers to significant epigraphs of the years (961-973 AD) found at the ruined Harshnath Mandir complex on Harsha Hill (Harshagiri) in Sikar, Rajasthan, primarily detailing the construction of the Shiva temple by ascetic Bhuvirakta (भुविरक्त) named Allata (अल्लट) during the Chahamana (Chauhan) rule.
The Harshagiri Inscription gives the origin of Allata (अल्लट), sprang from a holy family of brahmans of the Vargatika (वार्गाटिक) tribe Whose origin was from the place which is known as a village in the neighbourhood of Harsh (हर्ष), called Rana-pallika (राणपल्लिका) (Ranoli).
Harsha Inscription 961-973 AD (L-35), mentions about Allata (अल्लट) (L.23,V.30) and Ranapallika (राणपल्लिका) (L.23,V.31):
Verse-30. — His disciple, twice received as such, was one attached to the earth (Bhuvirakta) (भुविरक्त), named Allata (अल्लट), sprang from a holy family of brahmans of the Vargatika (वार्गाटिक) tribe;
Verse-31. — Whose origin was from the place which is known as a village in the neighbourhood of Harsh (हर्ष), called Rana-pallika (राणपल्लिका), the received discipline of which is that of the worldly tribe. [3]
History
We find mention of this place in Harsh Inscription of year 961 AD as Rana-pallika. The spiritual teacher Visva-rupa's disciple Allata was Vargatika brahman who belonged to Rana-pallika village in neighbourhood of Harsha. Rana-pallika is identified as present Ranoli village.
राणोली का किला

राणोली राजस्थान के सीकर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक गाँव है, जो शेखावाटी क्षेत्र का हिस्सा है और अपने शानदार राणोली फोर्ट (Ranoli Fort) के लिए प्रसिद्ध है, जिसका निर्माण शम्भूसिंह ने करवाया था और यह आज भी अपनी स्थापत्य कला और इतिहास के लिए जाना जाता है। यह शेखावतों द्वारा शासित था और अपनी विशिष्ट विरासत को समेटे हुए है। यहाँ के किले और मंदिर आज भी अपने इतिहास और वास्तुकला को दर्शाते हैं, जो पर्यटकों और इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण हैं। राष्ट्रीय राजमार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
राणोली फोर्ट का इतिहास : शेखावाटी आँचल के सीकर जिले मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर है राणोली गांव। यह गांव सीकर जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग व रेलवे लाइन पर पड़ता है। रणोली शिशु के नाम से यहाँ रेलवे स्टेशन है। गांव में जाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग के पास रेलवे लाइन के अंडर ब्रिज से होकर जाना पड़ता है। गांव के मध्य ही बना है रियासती काल की यादें तरोताजा करता यह खुबसूरत गढ़। जिसकी नींव आज से लगभग साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व रखी गई थी | खंडेला के राजा सवाई सिंह के लघु पुत्र शम्भूसिंह को राणोली गांव की जागीर आजीविका में मिली थी।
शम्भूसिंह ने ही इस जगह को उपयुक्त और शुभ समझकर यहाँ गढ़ की नींव रखी और निर्माण कराया। शम्भूसिंह ने गढ़ में एक मंदिर का भी निर्माण कराया था, जिसमें आज भी पूजा अर्चना होती है। शम्भूसिंह जी के उनके वंशजों ने समय समय पर इस गढ़ को विस्तार दिया। शम्भूसिंह का निधन वि.सं. 1817 पौष सुदी नवमी को हुआ था।
शम्भूसिंह के निधन के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीसिंह राणोली फोर्ट के स्वामी हुए। पृथ्वीसिंह बुद्धिमान व पटु कार्य सरदार थे। वि.सं. 1818 में पृथ्वी सिंह को जयपुर के महाराजा सवाई माधोसिंह ने अपनी सेना में नियुक्त किया और वेतन के बदले तीन गांवों की जागीर दी, जिनकी वार्षिक आय 17000 रूपये थे। इसके बदले पृथ्वीसिंह को दो बन्दूक धारी, बारह घुड़सवार और कुछ पैदल सैनिक रखने थे।
चूँकि पृथ्वीसिंह जी अपने पैतृक राज्य खंडेला के अधीन थे, पर उन्होंने जयपुर दरबार में अपनी कार्य कुशलता के बल पर खंडेला से अलग पूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था। इसलिए उन्हें भी राणोली राजा कहा जाने लगा। राजा पृथ्वीसिंह के तीन पुत्र थे जिनमें उनके ज्येष्ठ पुत्र सेवईसिंह जिन्हें इतिहास में शिवसिंह भी लिखा है ने अपने पिता के जीवनकाल में ही मावंडा मंडोली युद्ध लड़ा और वीरगति को प्राप्त हुए। मावंडा मंडोली युद्ध जयपुर व भरतपुर की सेनाओं के मध्य वि.सं. 1824 में लड़ा गया था। इस युद्ध में सेवईसिंह जुझार हुए यानी वे सिर कटने के बाद भी लड़े और वीरगति प्राप्त की। उनके जुंझार होने के बाद उनकी पत्नी कुंवरानी चाम्पावत सती हो गई। गिरधर वंश इतिहास पुस्तक में कुंवरानी चाम्पावत का नाम गुमानकुंवरी चाम्पावत लिखा है और उनके पिता का नाम चांपावत ठाकुर गिरधारीसिंह लिखा जो हरसोलाव गांव के थे। ज्ञात हो हरसोलाव में इतिहास प्रसिद्ध बल्लू जी चांपावत के वंशज निवास करते हैं।
राजा पृथ्वीसिंह का निधन वि.सं. 1846 में हुआ। उनकी याद में भी राणोली गांव में स्मारक रूपी छतरी बनी है। राजा पृथ्वीसिंहजी के बाद भी राणोली राजपरिवार ने जयपुर दरबार के लिए मामला गुजार सामंत यानी ट्रिब्यूट चीफ के रूप में कार्य किया। खंडेला इतिहास के अनुसार राणोली वाले 2100 रूपये वार्षिक मामले के जयपुर राजकोष में जमा करवाते थे।
वर्तमान में इस शानदार व खुबसूरत राणोली फोर्ट में यहाँ के आखिरी राजा आनन्दसिंह के तीन पुत्रों का परिवार निवास करता है। गढ़ के मुख्य दरवाजे में प्रवेश करते ही, एक बड़ा दालान है और सामने ही जनानाखाना का द्वार नजर आता है। मुख्य द्वार के बाजू में बड़े बरामदे व ऊपर झरोखों से सुसज्जित बड़ा हाल बना है, जिसमें बैठकर राणोली के मुख्य बाजार को निहारा जा सकता है। मुख्य द्वार की प्राचीर के एक पर एक शानदार झरोखेदार गोल आकृति वाली वुर्ज बनी है और इसी बुर्ज में यह शानदार और विशाल कक्ष बना है। किले के बाहर से इस गोलाकार बुर्ज का मनोरम दृश्य देखते ही बनता है।
राणोली फोर्ट के जनाना महल के बाहर भी दोनों ओर बड़े बरामदे व उनमें कक्ष बने हैं। दरवाजों व खिड़कियों पर आज भी पुराने ज़माने के खुबसूरत व मजबूत किंवाड़ लगे हैं। जनाना महल के प्रांगण में प्राचीन मंदिर बना है। जनाना महल में भी कई बड़े बड़े कक्ष दर्शनीय हैं। राणोली के पूर्व राजपरिवार की यह विरासत बेशक छोटी है पर है बहुत ही खुबसूरत। सबसे अच्छी बात यह है कि इस हैरिटेज धरोहर की सार संभाल बहुत अच्छी तरह से की गई है जिससे इसका मूल रूप आज भी बरक़रार है।
Source - https://www.gyandarpan.com/2023/08/history-of-ranoli-fort.html
Jat Gotras
Population
As per Census-2011 statistics, Ranoli village has the total population of 11902 (of which 6073 are males while 5829 are females as per Population Census 2011).[4]
Notable Persons
- Col. Pramod Kumar (Badsara) - Colonel Army, VPO - Ranoli, Distt. - Sikar, Rajasthan, Present Address : 309, Bala ji Tower I, Sect.5, Vidyadhar Nagar, Jaipur, Mob: 9899759259
- Vinod Badsara - Deputy Commandant (BSF).
External Links
References
- ↑ Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009, p. 20
- ↑ Sikar Ki Kahani, Captain Webb Ki Jubani, 2009, p. 20
- ↑ :अनन्त गोचरे श्रीमान पंडितश्चोतरेश्वर: ।
- पंचार्थलाकुलाम्याने विश्वरूपोअभवद्गुरु: ॥ ....२८
- प्रशस्ताख्योअभवच्छिष्यस्तस्य पाशुपत: कृती ॥.... २९
- भुवि रक्तो भवतस्य शिष्योद्वि नामतो अल्लट: ।
- वार्गाटिकान्वयोद्भूतसद्दिप्रकुलसंभव: ।.... ३०
- हर्षस्यासन्नतो ग्राम: प्रसिद्धो राणपल्लिका
- ↑ http://www.census2011.co.in/data/village/81756-ranoli-rajasthan.html
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