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Mandor

From Jatland Wiki
(Redirected from Mandore)
Author: Laxman Burdak IFS (R)

Location of Mandor in Jodhpur District

Mandor (मंडोर) (Mandore) is a Village in Phalaudi tahsil of Jodhpur district in Rajasthan. Its ancient name was Mandavyapura (माण्डव्यपुर) or Maddodara (मडड़ोदर).

Variants of name

Founders

It was founded by the Manda Jats and was their capital.

Jat Gotras

History

Historical records of the ancient period are not available. As per local tradition Mandor was ruled by Nagavanshi rulers. The River on which Mandor is situated is called Nagadri (नागाद्रि ). The ancient pond is known as Naga-kunda (नागकुण्ड) and the hill is called Ahi-shail (अहिशैल). These evidences show that it was under rule of Nagas in the past. It is believed that the town existed during the rule of Guptas. Later on it was ruled by Pratihara, Paramara, Chauhans and Rathores. [1]

James Tod writes that Bhatti Chief Jaitsi obtained the gadi of Jaisalmer in S. 1332 (A.D. 1276). He had two Sons, Mulraj and Rattansi. Deoraj, the son of Moolraj, espoused the daughter of the Sonigara chief of Jalore. Mahomed [khooni] Badsha invaded the dominions of Rana Rupsi, the Parihar prince of Mandor, who, when defeated, fled with his twelve daughters, and found refuge with the Rawal Jaitsi, who gave him Baroo as a residence. [2]

James Tod[3] writes that The warriors assembled under Visaladeva Chauhan against the Islam invader included the ruler of Mandor - Mansi Parihar, with the array of Mandore, touched his feet. This shows that the Parihars were subordinate to the Chohans of Ajmer.


Ram Swarup Joon[4] writes that The Balhara (Balahara) gotra is found among the Sikh, Muslim and Hindu Jats. In 900 A. D. a King of this gotra was a powerful ruler in the Western Punjab. He has been greatly praised by historian Sulaiman Nadwi, who came to India as a trader. According to him this ruler was one of the four big rulers of world at the time (857 A.D.). He was a friend of the Arabs and his army had a large number of elephants and camels. His country was called Kokan (Kaikan) 'near river Herat. The boundaries of this Kingdom extended from China to the Sea and his neighbors were the Takshak and Gujar kings. Their capital was Mankir.

मंडोदर - मंडौर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[5] ने लेख किया है ... मंडौर (AS, [p.687]) नामक वर्तमान ग्राम का प्राचीन नाम मंडोदर या मांडव्यपुर है। मंडौर मारवाड़ की जोधपुर से पहले की राजधानी है। कहा जाता है कि यहाँ मांडव्य ऋषि का आश्रम था। स्थानीय रूप से यह जनश्रुति है कि नगर का नाम रावण की रानी मंदोदरी के नाम पर प्रसिद्ध हुआ था और वह स्थान जहाँ लंकापति के साथ मंदोदरी का विवाह हुआ था वह आज भी मंडौर में स्थित बताया जाता है। 7वीं शती ई. के उपरान्त गुर्जर नरेशों ने मंडौर में अपनी राजधानी बनाई थी। मांडव्य ऋषि के आश्रम के समीप स्थित मांडव्यदुर्ग की गणना राजस्थान के महत्त्वशाली दुर्गों में की जाती है। मंडौर में प्राप्त एक शिलालेख में इस स्थान को मांडव्याश्रम कहा गया है और इसके निकट एक पुण्यशालिनी नदी का उल्लेख है जो सम्भवतः नागोदरी है, "मांडववस्थाश्रमे पुण्ये नदीनिर्झर शोभते।'

[p.688]: दुर्ग के अन्दर विष्णु तथा जैन मन्दिरों के खण्डहर हैं। 12वीं, 13वीं शतियों की कई मूर्तियाँ यहाँ से प्राप्त हुई हैं। मन्दिर यद्यपि खण्डहर की अवस्था में है किन्तु उसकी दीवारों पर बेल-बूटे, पशु-पक्षी, कीर्तिमुख आदि का तक्षण बड़ी सुन्दर रीति से किया गया है। आधुनिक मंडौर ग्राम तथा दुर्ग के मध्यवर्ती भाग में खुदाई में मिट्टी के कुम्भ मिले हैं, जिनमें से एक पर गुप्तलिपि में विखय (विषय) शब्द ख़ुदा है। दुर्ग के नीचे पंचकुंडा की ओर नरेशों की छतरियाँ, चूंडा जी का देवल तथा पंचकुंडा दर्शनीय हैं।

नागोदरी नदी

विजयेन्द्र कुमार माथुर[6] ने लेख किया है ...नागोदरी नदी (AS, p.491) जोधपुर ज़िला, राजस्थान में जोधपुर रियासत की प्राचीन राजधानी मंडोर के निकट बहने वाली नदी है। मंडोर या मांडव्याश्रम में प्राप्त एक अभिलेख में शायद इसी नदी का उल्लेख है- 'मांडवस्याश्रमे पुण्ये नदीनिर्झर शोभते'

मण्डा गोत्र का इतिहास और मण्डौर

मारवाड़ में राठोड़ों के आगमन के समय जोधपुर के उत्तर में बसे वर्तमान मण्डोर ग्राम व मण्डोर गारडन के पास मण्डा गोत्र के जाटों का दुर्ग था और मारवाड़ के बड़े भू-भाग पर मण्डा जाटों का गणराज्य था। इतिहासकारों की मान्यता है कि रावण के श्वसुर राजा मन्द से ही मण्डा गोत्र का विकास हुआ है। राजा मन्द की पुत्री मन्दोदरी रावण की चरित्रवान पत्नी थी। मण्डा गोत्र के जाट किसी समय सिंध-बलोच प्रदेश में शक्तिशाली शासक रहे और पश्चिमी एशिया और यूरोप तक उपनिवेश बसाये। ऐसी भी मान्यता है कि ब्रिटेन का जार्ज वंश मण्डा से सम्बंधित है। मारवाड़ में राठोड सर्वप्रथम पाली में पालीवालों के शरणागत के रूप में आये थे तथा जार-जार हो चुके मण्डोर के मण्डा जाटों पर आक्रमण करके उनको वहां से बेदखल कर दिया। मण्डा वासणी, चुण्डासरिया, धीरासर, मान्डेता आदि गाँव उस समय मण्डा गोत्र के जाटों ने आबाद किये थे। सुजानगढ़ के पास मान्डेता नामक गाँव है जिसकी थेह में एक खेजड़े का पेड़ था। इस पेड़ से मण्डा गोत्र के जाटों का हाथी बंधता था। इस कारण यह पेड़ हाथी वाला खेजड़ा कहलाता था जिसका व्यास पांच हाथ मोटाई का था और पंद्रह हाथ अर्थात 25 फुट लम्बी रस्सी की लपेट की मोटाई उस खेजड़े के पेड़ की थी।[7]


कसवां जाटों के भाटों तथा उनके पुरोहित दाहिमा ब्रह्मण की बही से ज्ञात होता है की कंसुपाल पड़िहार संघ में सम्मिलित था। वह 5000 फौज के साथ मंडोर छोड़कर पहले तालछापर पर आए, जहाँ मोहिलों का राज था. कंसुपाल ने मोहिलों को हराकर छापर पर अधिकार कर लिया. इसके बाद वह आसोज बदी 4 संवत 1125 मंगलवार (19 अगस्त 1068) को सीधमुख आया. वहां रणजीत जोहिया राज करता था जिसके अधिकार में 125 गाँव थे. लड़ाई हुई जिसमें 125 जोहिया तथा कंसुपाल के 70 लोग मारे गए. इस लड़ाई में कंसुपाल विजयी हुए. सीधमुख पर कंसुपाल का अधिकार हो गया और वहां पर भी अपने थाने स्थापित किए. सीधमुख विजय के बाद कंसुपाल सात्यूं (चुरू से 12 कोस उत्तर-पूर्व) आया, जहाँ चौहानों के सात भाई (सातू, सूरजमल, भोमानी, नरसी, तेजसी, कीरतसी और प्रतापसी) राज करते थे. कंसुपाल ने यहाँ उनसे लड़ाई की जिसमें सातों चौहान भाई मरे गए. चौहान भाइयों की सात स्त्रियाँ- भाटियाणी, नौरंगदे, पंवार तथा हीरू आदि सती हुई. कंसुपाल की संतान कसवां कहलाई. फाल्गुन सुदी 2 शनिवार, संवत 1150, 18 फरवरी, 1094, के दिन कंसुपाल का सात्यूं पर कब्जा हो गया. फ़िर सात्यूं से कसवां लोग समय-समय पर आस-पास के भिन्न-भिन्न स्थानों पर फ़ैल गए और उनके अपने-अपने ठिकाने स्थापित किए. [8] [9]

मण्डौर के परिहार

स्रोत: लेखिका: डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006,पृ.33-40


राजा हरिचंद्र (550) (पत्नि-भद्रा) → रज्जिल नरभट्ट (600-625) → नाहड़ रावनागभट (625-650 AD) → तातयशोवर्द्धन (690-740) → चंदुकशीलुक (725-730) → झोटभिल्लादित्यकक्क (पत्नी-पद्मिनी) → बाउक (837 AD)


(1) मण्डौर
मण्डौर के परिहारों की वंशावली [10]
मण्डौर के परिहारों की वंशावली [11]
Genealogy of Pratiharas of Mandor:Merta branch[12]

[पृ.33]: मण्डौर राजस्थान के जिला जोधपुर के अंतर्गत जिला मुख्यालय से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर बसा था. इस स्थान पर वर्तमान में मण्डौर नगर के अवशेष मात्र हैं. यह स्थान पौराणिक कल में लंका पति रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी का पीहर था, अर्थात रावण की ससुराल कहे जाने वाले मंडोर के भग्न किले की खुदाई में एक प्राचीन मंदिर का गर्भ गृह, सभा मंडप, परिक्रमा स्थल सहित नवी दसवीं सदी की दुर्लभ गजलक्ष्मी की प्रतिमा मिली है.[13]

इतिहासकार इसे प्रतिहारों का राज्य मानते हैं क्योंकि यहां सर्वाधिक प्रतिहार शासक ही रहे. मंडोर में सर्वप्रथम प्रतिहार राजा हरिचन्द्र प्रतिहार हुए. क्षत्राणी प्रतिहार रानी भद्रा से उत्पन्न पुत्र अपनी महत्वाकांक्षा को रोक न सके, चारों क्षत्रीय कुमारों ने मंडोर का दुर्ग जीतकर उसकी प्राचीरों को ऊंचा किया. इस प्रकार प्रतिहार सत्ता का प्रारंभ मेड़ता से हुआ. मंडोर - मेड़ता राज्य के नाम से स्थापित घटियाला अभिलेख से प्राप्त होता है.[14] कि प्रथम परिहार राज्य का संस्थापक रज्जिल परिहार था. उसने मेड़ता और मरूणाम में नवीन दुर्गों की रचना करवाई और अपने तीनों भाइयों की सहायता से सैन्य संगठन किया - समीपवर्ती 6 राज्यों को विजित कर लिया. शासन व्यवस्था सुदृढ़ हो जाने पर अपने जीवन काल में ही अपने पुत्र नरभट का राज्य तिलक बड़े समारोह के साथ करवाया.[15]

कर्नल टॉड ने अपने राजस्थान के इतिहास में इसका उल्लेख किया है कि प्रतिहारों का प्रादुर्भाव आदि में मंडोर से हुआ. किंतु बात तब की है जब मंडोर का राजा मुकुल परिहार था. उसकी सिसोंद में बाढ़ के राजा से प्रतिद्वन्दिता थी, उस समय शक्ति परीक्षण का युग था. "जिसकी लाठी उसकी भैंस" के चलते राहुप ने मंडोर पर चढ़ाई कर मुकुल परिहार को बंदी बना सिसोंद ले आया. मुकुल से राणा की उपाधि तथा एक नगर जोहबाढ़ लेकर उसे मुक्त कर दिया. स्वयं राहुप पर राणा की उपाधि धारण करने लगा. राहुप सिसोंद के जागीदार माहप का अनुज था.[16]

राणा की उपाधि की पुष्टि गौरीशंकर हरिश्चंद्र ओझा लिखित राजपूत इतिहास के इस अंश से भी होती है कि बाउक प्रतिहार को राजा की उपाधि से विभूषित किया गया था. मंडोर के प्रतिहारों से ली हुई राणा की पदवी के कारण ही कालांतर में चित्तौड़ के सिसोदिया

[पृ.34]: शासक महाराणा कहलाने लगे. अंतिम मंडोर शासक हम्मीर जिसे चारणों ने राणा लिखा है, राठौर चूड़ा ने 1394 ईस्वी में दुर्ग छीना था. अतः उपर्युक्त पंक्तियों में हम स्पष्ट कर चुके हैं कि प्रतिहार सत्ता का प्रादुर्भाव मंडौर से हुआ. मंडोर के प्रतिहारों की ज्येष्ठ शाखा गुजरत्रा क्षेत्र का जालौर था. भीनमाल में राजधानी स्थापित कर शासन करने की पुष्टि इतिहासकारों के मतानुसार होती है.[17]

डॉक्टर के सी जैन ने अपनी पुस्तक राजपूतों के इतिहास में मत लिखा है कि इस शाखा की स्थापना राजा हरिश्चंद्र के द्वारा की गई है. इसने अपना राज्य राजपूताना में जोधपुर के आसपास 550 ई. के लगभग स्थापित किया था. इससे लगभग 850 ई. के राजाओं का अल्प संक्षिप्त इतिहास प्राप्त होता है.

रामभद्र (रामचंद्र) के अनुज (लक्ष्मण) ने ही प्रतिहार का कार्य किया था. इसीलिए यह वंश परिहार नाम से विख्यात हुआ. यही तथ्य कक्कुक के घटियाली अभिलेख में भी दोहराए गए है. [18] उपर्युक्त दोनों अभिलेख से प्रतिहार वंश के आद्य पुरुष हरिश्चंद्र को विप्र कहा गया है. क्षत्रीय राजा हरिश्चंद्र के लिए 'विप्र' शब्द का उपयोग उल्लेखनीय है. वृहदोरण्य कोपनिषद[19] के अनुसार सबसे पहले क्षत्रीय हुए और उनके बाद अन्य वर्णों का जन्म हुआ. इसी प्रकार ब्रजसूचिकोपनिषद में निम्नलिखित श्लोक मिलता है[20] -

जन्मना जायते शुद्र संस्काराद्विज उच्यते।
वेदपाठ वदे:विप्र: ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: ॥

मण्डौर की परिहार शाखा का क्रमिक इतिहास

राजा हरिचंद्र: इस शाखा के आदि संस्थापक राजा हरिश्चंद्र थे. विप्र हरिश्चंद्र वेद शास्त्र पारंगत और परिहार वंश के गुरु अर्थशास्त्र पूर्वज थे. राजशेखर महेंद्रपाल [21] को 'रघुकुल तिलक' और 'रघुग्रामणी' तथा महिपाल [22] रघुवंशमुक्तमणि जैसे विशेषण देता है. श्री ए के व्साय [23] का कथन है कि विप्र शब्द क्षत्रीय राजाओं के लिए ऋषि अर्थ में प्रयोग किया गया है. यह ब्राह्मण वर्ण का था इसी वंश शाखा का इतिहास बाद के अभिलेखों में बाउक के जोधपुर अभिलेख और कक्कुक के घटियाला अभिलेखों [24] से प्राप्त होता है. इनमें दी गई वंशावलियों में अंतिम राजाओं में अवश्य अंतर है परंतु वंशावली समान है. हरिश्चंद्र बहुत योग्य और वीर था, इसने 550 ई. के लगभग राजस्थान में जोधपुर के पास के क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया और मंडोर को अपनी राजधानी बनाया. बाउक के जोधपुर अभिलेख के अनुसार हरिचंद ने मंडोर नामक स्थान पर शत्रु को आतंकित करने वाला दुर्ग भी बनवाया. हरिश्चंद्र की क्षत्रीय और ब्राह्मण दो पत्नियों थी. क्षत्राणी जीवन सहचरी से चार पुत्र- भोगभट्ट

[पृ.35]: कक्क, रज्जिल और दद्द उत्पन्न हुए. इन क्षत्रीय कुमारों ने मंडोर का दुर्ग जीत कर उसकी प्राचीरों को ऊंचा किया. घटियाला अभिलेख से ज्ञात होता है कि प्रतिहार वंश की परंपरा तीसरे भाई रज्जिल से प्रारंभ हुई. इस प्रकार प्रतिहार सत्ता का प्रारंभ मंडोर-मेड़ता से हुआ. [25]

रज्जिल: राजा हरिचन्द्र के तीसरे पुत्र रज्जिल से परिहार वंश का पुनरुत्थान होता है. रज्जिल को अपने पिता श्री हरिश्चंद्र के राज्य का उपभोग करने का अवसर काफी दिनों बाद प्राप्त हुआ था. राजा रज्जिल एक वीर योद्धा एवं महत्वाकांक्षी था, एक कुशल प्रशासक के रूप में अपने शासन का कार्य सुचारू रूप से चलाया था. तत्पश्चात राजा रज्जिल को प्रथम पुत्र (राजकुमार) की प्राप्ति हुई. पुत्र प्राप्ति का सन ज्ञात नहीं है, किंतु जब रज्जिल को पुत्र प्राप्ति हुई थी उस समय रज्जिल रणक्षेत्र में था. रज्जिल का पुत्र नरभट अपने पिता की ही भांति महत्वाकांक्षी था, अत्यधिक वीर होने के कारण उसे पेल्लापेल्ली कहा जाता था.

नरभट्ट: राजा हरिश्चंद्र को आगे बढ़ाने वाला राजा नरभट्ट था. यह राजा रज्जिल का पुत्र था. यह एक विद्वान एवं पराक्रमी नरेश था. उसकी वीरता के कारण ही उससे पेल्लापेल्ली कहा जाता था. बाउक अभिलेख में भी इसके लिए पेल्लापेल्ली उपाधि का प्रयोग किया गया है. [26] यह है शब्द विदेशी है ऐसा मानकर कुछ विद्वानों ने गुर्जर प्रतिहरों को विदेशी माना है. मंडोर (मांडव्यपुर) के राजाओं की स्थिति वैसे सामंतीय ही मानी जाती है. नरभट की रानी जज्जिका देवी से नागभट्ट का जन्म हुआ. [27] कुछ विद्वानों ने नागभट्ट को ही नाहड़ राव मान लिया है परंतु यह उचित नहीं है क्योंकि कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है जो नागभट्ट परिहारनाहड़ राव को एक ही व्यक्ति सिद्ध करता हो.

नाहड़ राव: इसके विपरीत बड़वों की बहियाँ, पृथ्वीराज रासो [28] नैणसी री ख्यात, बाँकीदास की ख्यात आदि ग्रंथ नाहड़ राव को नागभट्ट परिहार से भिन्न मानते हुए इसका वंश क्रम अलग से अंकित करते हैं. कहा जाता है कि पृथ्वीराज का समकालीन नाहड़ राव था. उसने पुष्कर में वाराह का मंदिर बनवाया. पृथ्वीराज द्वारा गुजरात पर आक्रमण करने के समय सोजत के पास धवलहरा गांव में मारा गया. यह घटना विक्रम संवत 1244 की है.

नाहड़ राव 14 वां वंश धर टोहा, चूंडा और राठौर के समय विक्रम संवत 1451 में मौजूद था. [29] नाहड़ राव और टोहा विक्रम 1451 के बीच का करीब 207 वर्ष का अंतर है जो 14 पीढ़ियों के लिए समाचीन है. अतः नाहड़ राव परिहार का अस्तित्व सही माना जाना चाहिए एवं इस पृथ्वीराज का समकालीन ही मानना चाहिए. बिना आधार के नाहड़ राव को नागभट्ट परिहार मानना उचित नहीं है. मंडोर पर पहले विप्र हरिश्चंद्र परिहार के वंशधरों का

[पृ.36]: राज्य था परंतु संभवत: 11वीं सदी में उनके वंशधरों से परमारों ने राज्य छीन लिया था.

कालिदास लिखते हैं कि- "परिहार नाहड़ राव मंडोरगढ़ करवायों पुष्कर बढायो."

अतः उपर्युक्त पंक्तियों से स्पष्ट किया जाता है कि नाहड़ राव मंडोर का प्रसिद्ध शासक था. इसने परमारों से अपना मंडोर राज्य पुन: वापस छीन लिया. नाहड़ राव के कई पुत्रों में रुपसी, महणसीआल्ह के नाम मिलते हैं. रूपसी की पांचवी पीढ़ी में अमायक हुआ.

अमायक व शोधक के पुत्र के वंशज इन्दा परिहार कहलाये. [30] इन्दा के पुत्र गोपाल को सुआ परिहार ने झामोरी स्थान पर मार डाला, उसके नाम से गोपालसर गांव बसा. इन्दा का छोटा पुत्र बीजल था. इसके बाद क्रमशः महासिंह, बूटासिंह, राणासिंह, भीमलिया सिंह और टोहो सिंह हुए. टोहो मंडोर का रावत था. इन्दा के वंशज उगमन के पुत्र सरवरा, गोगोदेव, रणधवल भी टोहो के समकालीन थे. [31] टोहो के समय तुर्कों ने भी मंडोर पर अधिकार कर लिया था. परिहारों ने अपनी चतुराई से तुर्कों से पुन: मंडोर जीता परंतु उन्हें फिर भी शत्रु का बराबरबे था. अतः इस प्रकार उपर्युक्त पंक्तियों से स्पष्ट किया जा सकता है कि नागभट्ट एवं नाहड़ राव दोनों अलग-अलग व्यक्ति हैं.

नागभट्ट: राजा नरभट्ट से नागभट्ट का जन्म हुआ था. नागभट्ट अपनी माता जज्जिका देवी की तरह साहसी और महत्वाकांक्षी था- वह असाधारण योद्धा था. नागभट राजा बनने के पश्चात अपने राज्य का विस्तार ठीक ढंग से किया था. उन्होंने मंडोर से 90 किलोमीटर उत्तर पूर्व में स्थित मेड़ता (मेदंतपुर) को अपनी मुख्य राजधानी बनाया. [32] मरुमंडल में उसकी विशेष धाक जम गई थी; एवं उसने मंडोर राज्य को दो राज्यों में बांट दिया. वह इसीलिए किया क्योंकि उसके दो पुत्र हुए दोनों पुत्रों को वह अपने जीवित बराबर राज्य देना चाहता था.[33] मंडोर का राज्य बड़े पुत्र तात और मेड़ता का राज्य छोटे पुत्र भोज को दे दिया. इस प्रकार मंडोर का विकास प्रतिहार वंश से होता चला गया.

भोज: नागभट्ट की रानी से उत्पन्न तात और भोज थे. ज्येष्ठ पुत्र तात सन्यासी बनकर अपने छोटे भाई भोज को राज्य सौंप कर मंडव्याश्रम में निवास करने लगा था. [34] राजा भोज ने अपने वंश के राज्य तत्परता से सुरक्षा की थी. भोज की मृत्यु के पश्चात भोज का पुत्र चंदूक शासक हुआ. यह भी अपने पितामह की भांति वीर शासक था, उसकी मृत्यु किस प्रकार हुई इसकी जानकारी प्राप्त नहीं है. इसके पश्चात यशोवर्धन, शीलुक, झोंट, और शिलादित्य आदि ने शासन किया. [35]

दूसरी शाखा अर्थात ज्येष्ठ पीढ़ी में नीलभट्ट, विन्जराज, नागभट्ट प्रथम, देवराज, वत्सराज, तथा नागभट्ट द्वितीय जैसे प्रतापी राजा हुए.

[पृ.37]: यशोवर्धन: राजा भोज के प्रथम पुत्र चंदुक के पश्चात मांडव्यपुर साम्राज्य की शासन सत्ता का सुख उपभोग करने का अवसर भोज के द्वितीय पुत्र यशोवर्धन को प्राप्त हुआ. [36] यशोवर्धन युद्ध प्रिया राजा था. इसे विदेशी शत्रुओं को युद्ध में पराभूत करने वाला बताया गया है. इसे कंटकों को विनाश करने वाला भी कहा गया है. [37] इन पंक्तियों से यह सिद्ध होता है कि वह राष्ट्र प्रेमी था. पुराणों में भी यशोवर्धन जैसे प्रतिहार राजाओं के वंश का उल्लेख मिलता है. [38]

शीलुक: यशोवर्धन के पश्चात उसका पुत्र शीलुक मांडव्यपुर (मंडोर) शाखा का राजा बना. शीलुक वीर प्रकृति का राजा था. इसने युद्ध का अवलंबन लिया था. इसने दो विशाल क्षेत्रों वल्ल और त्रवणी पर विजय पताका लहराया था. यहां तक प्रमाण उपलब्ध हैं कि बल्ल राज्य के पोषक भट्टी देवराज को युद्ध के मैदान में तारे दिखाकर गौरवशाली छत्र चिन्ह प्राप्त कर लिया था. [39] शीलुक ने वास्तव में विशिष्ट योग्यताओं का परिचय दिया था.

वस्तुत: इसे 'दुवरि विक्रय' की उपाधि से अलंकृत किया गया है. [40] अंत में शीलुक अपने शत्रुओं को सामना करते-करते बैकुंठ सिधार गया. उसके बाद उसका पुत्र झोट शासक हुआ जिसने कई स्थानों पर अपना राज्य स्थापित किया और राज्य सुख को भोगने के बाद गंगा नदी में मुक्त लाभ किया. [41] राजा झोंट के पश्चात उसका उत्तराधिकारी भिलादित्य ने राज्य किया. यह अपने वंश की परंपरा को आगे बढ़ने वाला व्यक्ति था, किंतु इसकी रुचि धर्म में अत्यधिक थी. भिलादित्य ने अपने यौवन काल में राज्य करते हुए संन्यास ले लिया और हरिद्वार चला गया. [42] जहां 18 वर्ष तक जीवित रहा अंत में व्रत उपवास करते हुए शरीर त्याग दिया.

राजा कक्क: मेड़ता के राजा भोज के वंश का बारहवां राजा कक्क गौरवपूर्ण होने के साथ-साथ प्रकांड पंडित था. वह व्याकरण ज्योतिष तथा तर्कशास्त्र का निष्णात विद्वान एवं 12 भाषाओं का ज्ञाता था. वह प्राकृत और वैदिक दोनों में समान रूप से कविता करता था. कक्क ने 10 ग्रंथों की रचना की है- इतिहास ने उसे कलम और तलवार का सम्मिलित सामान योद्धा लिखा है.

ततोपि श्रीयुत कक्क: पुसो जातो महामति:।
यशो मुदिगिरो ललधं - येन गौडे समं रणे॥[43]


अत: ऐतिहासिक साक्ष्यों का साम्य करने पर यह ध्वनित होता है कि कक्क , उज्जैन

[पृ.38]: कन्नौज शाखा के नागभट्ट द्वितीय गुर्जर-प्रतिहार का सहायक था. कक्क के पुत्र बाउक के जोधपुर अभिलेख [44] में इसके लिए लिखा गया है कि इसमें गोड़ों के विरुद्ध मुद्दगिरि (मुंगेर) से यश प्राप्त किया. इसका आशय यह है कि वह स्वयं अकेला बंगाल में नहीं जा सकता था. वह तो उज्जैन-कन्नौज के गुर्जर नरेश नागभट्ट द्वितीय के साथ उसकी सेवा में गया था. डॉक्टर वी सी पांडे तो यह मानते हैं कि "कक्क नागभट्ट द्वितीय के सामंत के रूप में राजस्थान में शासन कर रहा था. वह गोड़ों के विरुद्ध अपने स्वामी की सहायता करने के लिए गया था और यह गोड प्रतिहार युद्ध मुंगेर में हुआ था. [45] अत: कक्क के लिए यह गौरवशाली उपलब्धि थी, इसमें पराजित होने वाला राजा पाल नरेश धर्मपाल था. कक्क राजा का घटियाला अभिलेख भी प्राप्त है. [46] यह लेख अपने वंश की उत्पत्ति राम के भाई लक्ष्मण से बताता है.

राजा बाउक: [पृ.38]: कक्क राजा की दो पत्नियां थी - रानी पद्मावती (पद्मिनी) से बाउक और रानी दुर्लभादेवी से कक्कुक का जन्म हुआ. बाउक युद्ध प्रिय नहीं, अपितु एक कुशल प्रशासक था. उसने सेवा की ओर कम और राज्य की व्यवस्था की ओर ज्यादा ध्यान दिया. इसका लाभ उठाकर भाटी वंशी क्षत्रिय राजा मयूर ने मंडोर पर आक्रमण कर दिया. असंगठित मंडोर की सेना तीतर भीतर होने लगी. इस दुर्दशा को सहन न कर स्वयं बाउक घोड़े पर सवार होकर नंगी तलवार से मार काट करता हुआ भाटी सेना के मध्य तक घुस गया. उसकी प्रशंसा करते हुए जोधपुर प्रशस्ति में लिखा गया है कि जब नंदावल्ल को मारकर शत्रु सेना आगे बढ़ आई और स्वजनों के साथ छोड़ दिया तब राजा बाउक ने घोड़े से उतरकर नंगी तलवार द्वारा अपने शत्रु राजा मयूर को मार गिराया. [47]

नवमंडल नव निचय ह्त्या मयूर मति गहने ।
तदनु तासिरंगा श्रीमद बाउक नृसिंह न ॥[48]


भाटी राजा मयूर के निधन के बाद उसका राज्य भी परिहार राज्य में शामिल हो गया. इससे उसका क्षेत्र बढ़ गया एवं शक्ति भी बढ़ गई. इस विजय के उपरांत ही बाउक ने सन्यास ग्रहण कर लिया और राजपाट अपने छोटे भाई कक्कुक को सौंप दिया.

राजा कक्कुक: आठवीं सदी के प्रारंभ में कक्कुक का राज्य पश्चिम भारत में एक सफल राज्य के रूप में उभर कर आया था. इस समय तक भारू, मांड, बल्ल, तमण, अंग आर्य और गुर्जरत्रा राज्य भी परिहार राज्य में शामिल हो चुके थे. कक्कुक अपने युग का सबसे लोकप्रिय शासक था. उसने वडनाडय मंडल के पर्वतवासी आदिवासियों के ग्रामों का विध्वंस किया.

[पृ.39]: रोहिन्सकूप के निकट उसने एक हाट बसाया और व्यापारियों की सुविधा के लिए 20 वन मार्ग बनवाकर संपूर्ण राज्य को इस हाट से जोड़ दिया. मंडोर और रोहिन्सकूप में जय स्तंभ स्थापित किये. वह न्यायी प्रजापालक विद्वान तो था ही साथ ही संस्कृत भाषा का लोक विस्रुत कवि था. घटियाला शिलालेख के निम्न श्लोक की रचना उसी ने की थी-

यौवन विविधैमौ्र्ग्यध्य च वय: श्रिया।
वृदुभावश्य धम्मैन यस्य याति सा पुन्यावन् ॥
अयं श्लोक: श्रीकक्केन स्वयम कृत: ।॥

अतः कक्कुक राजा के बाद मंडोर के शासकों में करणोत खानदान का उत्कर्ष हुआ. मंडोर के शासक रिडमल के 12 वां पुत्र कर्ण था. [49] कर्ण के वंशज करणोत राठौर कहलाए. रिडमल के मारे जाने के बाद मंडोर पर सिसोदियों का अधिकार हो जाने के बाद राठौर ने जो संघर्ष किया उसमें प्रमुख भाग रिडमल के दूसरे पुत्र जोधा ने लिया था. इसलिए राव रिडमल के बड़े पुत्र अरबैराज ने मंडोर पर वापस राठौरों का कब्जा हो जाने पर खुद राजा बनने के बजाय जोधा को मंडोर की गद्दी पर बिठाया था. [50] इसी कारण जोधपुर राज्य में यह रिवाज है कि नए राजा के गद्दी पर बैठने पर बगड़ी ठाकुर जो अरबैराज के वंशज हैं वह अपना अंगूठा चीरकर खून से नए राजा का तिलक करता है तथा कहता है कि मैंने अपने जोधपुर का राज्य दिया. राव जोधा ने अपने भाई कर्ण को करनवास और लूणावास जागीर में दिया था. [51] कर्ण के सात पुत्र थे, लूणा जागीर का स्वामी हुआ. उसके बाद उसका पुत्र बीदा जागीर का स्वामी बना. जोधपुर के राजा सूरसिंह के समय में उनके बड़े पुत्र गजसिंह ने, आशकारण को, जो उनकी सेवा में था, शालबा जागीर में दिया था. [52] आशकरण के तीन विवाह हुए थे, जिनसे उनके तीन पुत्र हुए- जशकरण, दुर्गादास (दुर्लभ राज) और खेमकरण. आशकरण के बारे में किंवदंती है कि एक बार उन्होंने एक मागलियाणी कन्या की वीरता एवं साहस के बारे में किस्से सुने तब उसने विवाह किया, इसी कन्या के गर्भ से दुर्गादास ने जन्म लिया, कवि लिखता है कि[53]...

यह मांगलिया गोत्र की साधारण गृह नाम।
सुनत प्रशंसा मुग्ध भो अशकरण अभिराम॥ [54]

अशकरण का पुत्र जसकरण भी महाराजा जसवंत सिंह (1626-1678) जोधपुर की सेवा में रहा. उसे महाराजा ने पूना में 22 मेई 1662 को 9000 की जागीर दी. कहते हैं कि कुछ समय पश्चात दुर्गादास के माता-पिता में अनबन हो गई तब अशकरण ने अपनी पत्नी और बालक

[पृ.40]: दुर्गा दास को लूगवां ग्राम में अलग रहने को छोड़ दिया. [55] महाराजा जसवंत सिंह ने अपने लाहौर में निवास के समय अशकरण करणोत को मारवाड़ राज्य का प्रधानमंत्री 24 दिसंबर 1666 को बनाया. अशकरण इस उच्च पद पर पनी मृत्यु पर्यंत जोधपुर में नियुक्त रहा. उनकी मृत्यु 30 दिसंबर 1677 को हुई थी. इस प्रकार करीब 11 वर्ष अशकरण ने जोधपुर राज्य की प्रधानगी की. अतः इनकी जागीर करीब 17000 की थी.

इस प्रकार कुक्कुक के बाद मंडोर राजवंशावली है. जसकरण का सं. 993 का एक अभिलेख प्राप्त है. जिससे प्रतीत होता है कि यह जसकरण अर्थात करणोत खानदान बाउक अथवा कक्कुक के उत्तराधिकारियों में से है.

मंडोर का पतन

मंडोर राजधानी के पतन के पश्चात जब शत्रुओं ने वहां के राजा का वध कर दिया तब विधवा रानी ने "वर्मन आबू" के निकट शरण ली थी. [56] जिस समय वह शरण ली थी उस समय गर्भवती थी. यहां गर्भवती रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम नागभट्ट द्वितीय था. नागभट्ट द्वितीय ने सांचौर में एक जैन मंदिर बनवाया और अपने पूर्वज विजराज की प्रतिमा स्थापित की. [57] स्थानीय अनुश्रुति के अनुसार उसने पुष्कर के समीप एक तालाब का निर्माण करवाया था.

मंडोर पतन के उपरांत परिहार वंश की ज्येष्ठ शाखा (नील भट्ट और विंजराज) का अभ्युदय शुरू हो गया था. [58] मंडोर से आए अनेकों वीरों, सामंतो, सैनिकों ने नागभट्ट द्वितीय को अपना प्रधान मानकर एक सुसंगठित सेना का निर्माण किया एवं जालौर को अपना ठिकाना बनाया.

जाट इतिहास

इतिहासकार महिपाल आर्य एवं प्रताप सिंह शास्त्री [59] लिखते हैं .... महाराजा बाऊक की संतान बुरड़क कहलाई. बुरड़क जाट क्षत्रिय गोत्र के लोग राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में आबाद हैं. मारवाड़ में मंडोवर नगर है, इस पर नाग, मौर्य तथा प्रतिहार जाटों का आधिपत्य रहा है तथा मंडा/मुंड गोत्र के जाटों ने भी यहां शासन किया है. प्रतिहारों के अनेकों वंशज जाटों में इस समय बुरड़क (बाऊक की संतान वाले), कुकणा (कक्क के वंशज), राजलिए (राजल की संतान) आदि नामों से अभिहित होते हैं. यहां यह बताना भी आवश्यक समझते हैं कि इन्हीं प्रतिहारों का एक दल आबू में जाकर ब्राह्मण धर्म में दीक्षित हुआ था, तभी से मंडोवर के परिहारों/प्रतिहार की दो शाखाएं हो गई- एक जाट परिहांर और दूसरी राजपूत परिहार. मौर्यों से प्रतिहारों अथवा परिहारों के हाथ मंडोवर आठवीं सदी में आई. ऐसे प्रमाण इतिहास में मिलते हैं राजा मयूरध्वज से राजा भोगभट्ट प्रतिहार ने राज्य हथिया लिया था. विक्रम की 11वीं शताब्दी में मंडावर परिहांरों के हाथ से निकल गया और उस पर पवारों का आधिपत्य हो गया. पवार जाटों ने एक समय सारे ही मरुधर प्रांत मारवाड़ पर अधिकार कर लिया था. जो नव कोटि मारवाड़ के नाम से अभिहित होता था.

विक्रम संवत 1202 (1145 ई.) के पश्चात चौहान वंशीय (चौहान उपाधिधारी जाट) सहजपाल का आधिपत्य मंडोर पर हो गया और लगभग 100 वर्ष तक चौहान मंडोवर पर काबिज रहे.[60]

Ghatiyala (Mandor) Inscriptions of Kakkuka S.V. 918 (861 AD)

Verse 4 of our inscription tells us that Kakkuka erected two columns, one at Rohimsaka and the other at Maddodara (मडड़ोदर). Exactly the same information is conveyed by verse 21 of the Mata-ki-Sal record, excepting that for Rohimsaka we have there Rohimsakupa. Rohimsaka is undoubtedly the same as this Rohimsakupa or the Rohimsakupaka of our inscription. No.2 and is to be identified with Ghatiyala. Maddodara, it can scarcely be seriously doubted, is Mandor, five miles north of Jodhpur, which is locally believed to have been a seat of Pratihara power and is full of very ancient ruins, and where a fragment of a Pratihara inscription was discovered by me last season. The next verse informs us that the column on which the inscription has been incised was erected by Kakkuka. Precisely the same information is given by verse 21 of the Mata-ki-Sal inscription. Then follows the date Samvat 818, Chaitra-sudi a budhe Hasta-nakshatre, the same as that mentioned in the latter inscription. And further we are told that here a market was established, and the village peopled with mahajana, i.e. big folk. The very same thing is alluded to in verse 20 of the Mata-ki-Sal record. The inscription really ends here so far as the purport of it is concerned, but a verse follows which has something of the character of a subhashia. Its chief interest, however, lies in the fact that it was composed by Shri-Kakkuka himself, as the line in prose at the end informs us.

Another ancient name of Mandor is Mandavyapura mentioned in versa 10 of the Jodhpur inscription of the Pratihara Bauka. In the Progresst Report of the Archaeological Survey of India, Western Circle, for the just ending 31st March 1907, p. 80, I have said that though this inscription stone was found in the city wall of Jodhpur, it must originally have been at Mandor, as all stones for the fortification of the fort had been brought from the latter place. This conclusion is confirmed by the first pada of the verse just referred to, which is Mandavyapura. The word asmin show, that the stone originally was at Mandavyapura. Mandavyapura, again, is spoken of both as a city and fort, and Mandor remained so till the prince Jodha removed his capital from there to Jodhpur. Even to this day some of the portions of the ramparts of Mandor have been preserved. As the verse in question states that certain Pratihara brother princes erected ramparts round Mandavyapura fort, It is plain that it was in the possession of the feudatory Pratihara princes. This is also corroborated by the fact mentioned in the text that last season I found a part of a stone inscription belonging to the Pratiharas. In it the name of Kakka could be distinctly read, and some reference to his son made therein could also be traced. But who that son was KakkuKa or Bauka is not certain. The name Mandavyapura occurs even so late as V. 1319 in the Sundha Inscription of Chachigadeva.

Mandor Inscription of VS 1202

मंडोर के खंड लेख 12 वीं शताब्दी - मंडोर से प्राप्त 12 वीं शताब्दी के एक लेख के 17 टुकड़े जोधपुर संग्रहालय में रखे हैं. [61]लेख की तिथि का भाग अप्राप्त है पर अनुमान है कि यह वि.सं. 1202 के बाद रहा होगा. इस लेख में एक गांव दान दिया गया है जिसके उत्तर में सीयाहटी (सीहट - सोजत से 6 मील पूर्व) नामक गांव था. अभिलेख में विष्णु तथा लक्ष्मी की वन्दना की गई है. इसमें दान लेने वाले का नाम भट्ट स्वामी तथा देने वाले चौहान सहजपाल हैं.

Chittor Victory pillar Inscription of 1460 AD

चित्तौड़ के कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति १४६० ई. [62] में इस गाँव का उल्लेख है. जहां कुम्भा का वर्णन हमें मिलता है वहां यह उल्लिखित है कि माण्डव्यपुर (मंडोर) से हनुमान की मूर्ति लाया और १५१५ वि.सं. में उसकी स्थापना दुर्ग के प्रमुख द्वार पर की. इसके अनन्तर कुम्भा द्वारा सपादलक्ष, नराणा, वसंतपुर और आबू जीतने का वर्णन है. महाराणा ने एकलिंगजी के मन्दिर के पूर्व की ओर कुम्भ-मंडप का निर्माण कराया. आगे चलकर मालवा और गुजरात की और सेना के प्रयाण का वर्णन मिलता है जो बडा रोचक है. इसी तरह जांगल प्रदेश तथा धुंकराद्रि और खंडेला की विजय के उल्लेख के साथ लेखक ने उस भाग की नैसर्गिक स्थिति पर भी प्रकाश डाला है. श्लोक १४६ में किसी शत्रु के पुर से (?) गणेश -मूर्ति को यहां लाकर स्थापित करने का उल्लेख है. इसी में डीडवाना की नमक की खान से कर लेना तथा विशाल सैन्य से खंडेले को तोड़ना भी उल्लिखित है.

Notable persons

  • Baga Ram Beniwal - Oil India Ltd. Ph:2577553, Mob; 9928528928.[63]
  • Ram Niwas (Sengwa) - Astrawale, Resident Mandor, C/O Bhagyoday Chhatrawas, Lal Sagar Road, Mob: 9214663081

External links

References

  1. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010, pp. 125
  2. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II, Annals of Jaisalmer, p.225
  3. James Tod: Annals and Antiquities of Rajasthan, Volume II,Annals of Haravati,p.414-416
  4. Ram Swarup Joon| History of the Jats/Chapter V,p.73
  5. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.687-88
  6. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.491
  7. भीमसिंह आर्य:जुल्म की कहानी किसान की जबानी (2006), मरुधर प्रकाशन, सुजानगढ़ (चूरू),p.206-207
  8. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 115-116
  9. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203-204
  10. लेखिका: डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, p.41
  11. लेखिका: डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, p.47
  12. R.C.Majumdar: "The Gurjara Pratiharas", Journal of the Department of Letters Vol.X, Calcutta University Press, 1923
  13. दैनिक भास्कर 25/12/02 को टार्ड द्वारा संकलित लेख.
  14. Journal of Royal Asiatic Society, 1895, p.4-9
  15. Journal of Royal Asiatic Society, 1895,p.4
  16. कर्नल टॉड: राजस्थान का इतिहास, p. 132
  17. गौरीशंकर हरिश्चंद्र ओझा लिखित राजपूत इतिहास,p.59-60
  18. वही 1895, p. 516
  19. 1 4 11 "ब्रह्मा व इदमग्र असीद एकमेव तदेकं सन्नव्य भक्त तचछयो रुपमत्य सृजन क्षत्रम।"
  20. विद्धसाल मंजिका प्रथम श्लोक 6, बाल भारत, प्रथम श्लोक 11
  21. बाल भारत, प्रथम श्लोक 7 - देवायस्य महेन्द्रपाल नृपति शिष्यो रघुकुलग्रामिणी। तेन महिपाल देवेन च रघुवंशमुक्त मणिना।
  22. Epigraphia Indica Vol. 26, p.89-90
  23. JRAS1894,p.4-9
  24. JRAS 1895, p.516-18; Epigraphia Indica Vol. 9, p.279-80
  25. मंडोर के भग्नावशेष राजस्थान के जोधपुर जिला मुख्यालय से 6 किमी की दूरी पर विद्यमान है.
  26. JRAS 1894,p.4
  27. क्षत्रिय वंश वैभव , कुंवर राम नरेशसिंह परिहार, p.104
  28. Rajasthan Through Ages, Dashrath Sharma, p.440-441; क्षत्रिय राजवंश - रघुनाथ सिंह काली पहाड़ी, p.302
  29. Epigraphia Indica, Vol. 9, p. 281 - 83
  30. राजस्थान का इतिहास - कर्नल टॉड, p.137
  31. Rajasthan Through Ages, Dashrath Sharma, p.442-444; क्षत्रिय वंश वैभव, कुंवर राम नरेश सिंह, p.104
  32. सिरोही राज्य का इतिहास ,p.120; प्रतिहार राजपूतों का इतिहास, कुंवर राम लखन सिंह,p.9
  33. विश्वेश्वरानंद इन्लोडोजिकल जर्नल,खण्ड-2, p.386-87
  34. सिरोही राज्य का इतिहास, p.124
  35. Rajasthan Through Ages, Dashrath Sharma, p.153
  36. History of Rajasthan C.954,Col Tod
  37. विश्वेश्वरानंद इन्लोडोजिकल जर्नल,खण्ड-2, p.383
  38. वायु पुराण, 33-35
  39. History of Rajasthan, Col Tod, p. 152
  40. Rajasthan Through Ages, Dashrath Sharma, p.209
  41. Epigraphia Indica Vol. 2, p.232; प्राचीन भारत का इतिहास, डॉ पाण्डेय , p.20-21
  42. राजशेखर-काव्य मीमांसा और मजुमदार एंसियेंट इंडिया p.201
  43. ग्वालियर अभिलेख विक्रम संवत 932 तथा भिज्देव प्रबंध 164 JRAS, 1894,p.4
  44. प्राचीन भारत का इतिहास - गौरी शंकर ओझा ,p.469
  45. Rajasthan Through Ages, Dr Dasharath Sharma,p.156
  46. Epigraphia Indica, Vol. 9,p. 199
  47. नन्दा बघेल महत्वा रिपुवंतुलभ् भुअकूप प्रयान्त दृष्ट्वा भग्रां(न) स्वपक्षां(न) रिजनृपकुलजां(न) सन्तप्रतिहार भूपां(न) घिम्मूतैकेन तस्मिनप्रकटियशसा सीमता बाउकेन र्स्कूजन्हत्वा मयूरं तदनु नरमृगा घातिता हेतिनेव । कस्यानयान्य पृयग्र: ससिचिबहानुजं त्यज्य राज सुतंत्र: कनैकिनाति भते दशादिशितु बले स्तम्भ चात्मानमेकं। JRAS,1894, p.7-8; Jodhpur inscription of Pratihara Bauka VS 894 (837 AD) (Verse-27)
  48. JRAS,1894, p.4
  49. History of Gurjara Pratihara ,p.24. पंडित ओझा भी इस वाकया को स्पष्ट मानते हैं.
  50. पृथ्वीराज रासो में भी इसी प्रकार कि कल्पित कथाएं दी गयी हैं.
  51. मासिक पत्रिका - ऐतिहासिक व सांस्कृतिक "रणबांकुश" p. 19-20 डॉ इश्वर सिंह मढार
  52. वही p.21
  53. वही p.21-23; ओझा p. 169
  54. राजपूताने का इतिहास p.161
  55. राजस्थान का इतिहास कर्नल टॉड
  56. उत्तर भारत का राजनैतिक इतिहास,p. 136
  57. ASIR 1909-10,p.102-03
  58. ओझा p.170 रणबांकुश p.23
  59. महिपाल आर्य एवं प्रताप सिंह शास्त्री: जाट इतिहास (जाट गोत्रावली) समकालीन संदर्भ, 2019, पृ.482-483
  60. आधार मारवाड़ का जाट इतिहास लेखक ठाकुर देशराज, प्रकाशन 1954
  61. डा डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ.90
  62. डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ.146-147
  63. Jat Samaj, December 2009, p. 40

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