Sahajapala
| Author:Laxman Burdak, IFS (R) |
Sahajapala (सहजपाल) was a King of Chahamana Dynasty (Nadol). He was the son of Rayapala (c. 1132–1145 CE). He reportedly built the Sahajapaleshvara temple, named in his honour.
Variants
- Sahajpal (सहजपाल)
- Sahajpal Chauhan सहजपाल चौहान)
Mandor Inscription of Sahajapala V.S. 1202 (1145 CE)
The Mandor Inscription of Sahajapala V.S. 1202 (1145 CE) is a significant epigraphical record from Rajasthan, identifying Sahajapala as a Chahamana (Chauhan) ruler of the Naddula (Nadol) branch. It provides vital genealogical details of the Naddula Chahamanas and confirms the strengthening of the temple complex in Mandor during the 12th century. [1]
Mandor Inscription of VS 1202
मंडोर के खंड लेख 12 वीं शताब्दी - मंडोर से प्राप्त 12 वीं शताब्दी के एक लेख के 17 टुकड़े जोधपुर संग्रहालय में रखे हैं. [2]लेख की तिथि का भाग अप्राप्त है पर अनुमान है कि यह वि.सं. 1202 के बाद रहा होगा. इस लेख में एक गांव दान दिया गया है जिसके उत्तर में सीयाहटी (सीहट - सोजत से 6 मील पूर्व) नामक गांव था. अभिलेख में विष्णु तथा लक्ष्मी की वन्दना की गई है. इसमें दान लेने वाले का नाम भट्ट स्वामी तथा देने वाले चौहान सहजपाल हैं.
History
Rayapala was succeeded by his son Sahajapala for whom we have a fragmentary inscription from Mandor. He probably lost his throne as a result of the Chaulukya success in the first round of the war between Arnoraja of Sakambhari and Kumarapala of Gujarat, to which we have referred at some length in a previous chapter (Ch. V). He was replaced by Asaraja's son Alhana somewhere between V. 1202 and 1205. In the latter of these years Alhana is mentioned as Maharajadhiraja in a benefaction that he made to the temple of Tripurusha at Nadol. (Ojha Grant 3, Line23, See Appendix G (iii) for text – Nadana Jodhan. [3]
प्रतिहार वंश में बुरड़क गोत्र
इतिहासकार महिपाल आर्य एवं प्रताप सिंह शास्त्री [4] लिखते हैं .... महाराजा बाऊक की संतान बुरड़क कहलाई. बुरड़क जाट क्षत्रिय गोत्र के लोग राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में आबाद हैं. मारवाड़ में मंडोवर नगर है, इस पर नाग, मौर्य तथा प्रतिहार जाटों का आधिपत्य रहा है तथा मंडा/मुंड गोत्र के जाटों ने भी यहां शासन किया है. प्रतिहारों के अनेकों वंशज जाटों में इस समय बुरड़क (बाऊक की संतान वाले), कुकणा (कक्क के वंशज), राजलिए (राजल की संतान) आदि नामों से अभिहित होते हैं. यहां यह बताना भी आवश्यक समझते हैं कि इन्हीं प्रतिहारों का एक दल आबू में जाकर ब्राह्मण धर्म में दीक्षित हुआ था, तभी से मंडोवर के परिहारों/प्रतिहार की दो शाखाएं हो गई- एक जाट परिहांर और दूसरी राजपूत परिहार. मौर्यों से प्रतिहारों अथवा परिहारों के हाथ मंडोवर आठवीं सदी में आई. ऐसे प्रमाण इतिहास में मिलते हैं राजा मयूरध्वज से राजा भोगभट्ट प्रतिहार ने राज्य हथिया लिया था. विक्रम की 11वीं शताब्दी में मंडावर परिहांरों के हाथ से निकल गया और उस पर पवारों का आधिपत्य हो गया. पवार जाटों ने एक समय सारे ही मरुधर प्रांत मारवाड़ पर अधिकार कर लिया था. जो नव कोटि मारवाड़ के नाम से अभिहित होता था.
विक्रम संवत 1002 (945 ई.) के पश्चात चौहान वंशीय (चौहान उपाधिधारी जाट) सहजपाल का आधिपत्य मंडोर पर हो गया और लगभग 100 वर्ष तक चौहान मंडोवर पर काबिज रहे.[5]
External links
References
- ↑ https://ignca.gov.in/Asi_data/21704.pdf
- ↑ डा डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ.90
- ↑ "Early Chauhan Dynasties" by Dasharatha Sharma, pp. 151
- ↑ महिपाल आर्य एवं प्रताप सिंह शास्त्री: जाट इतिहास (जाट गोत्रावली) समकालीन संदर्भ, 2019, पृ.482-483
- ↑ आधार मारवाड़ का जाट इतिहास लेखक ठाकुर देशराज, प्रकाशन 1954