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Pathan

From Jatland Wiki
(Redirected from Pathans)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Pathan (पठान) is the local Hindavi term for an individual who belongs to the Pashtun ethnic group, or descends from it. Pashtuns or the Pathans in India are citizens or residents in India who are of ethnic Pashtun ancestry.

Variants

Various definitions

Pashtun, also spelled Pushtun or Pakhtun, Hindustani Pathan, Persian Afghan, Pashto-speaking people residing primarily in the region that lies between the Hindu Kush in northeastern Afghanistan and the northern stretch of the Indus River in Pakistan.[1]

The term additionally finds mention among Western sources, mainly in the colonial-era literature of British India.[2] Historically, the term "Afghan" was also synonymous with the Pathans.[3]

Origin

The Pashtuns originate from the regions of eastern Afghanistan and northwestern Pakistan,[4] ethnolinguistically known as Pashtunistan.

Population in India

There are varying estimates of the population of Pathan descent living in India, ranging from 3.2 million people per the All India Pakhtoon Jirga-e-Hind[5] to "twice their population in Afghanistan" as per Khan Mohammad Atif, an academic at the University of Lucknow.[6] In the 2011 Census of India, 21,677 individuals reported Pashto as their mother tongue.[7]

Migration to India

Large-scale Pashtun migration began in the 11th and 12th centuries, as a result of the many Muslim empires and dynasties founded by Pashtuns in the Indian subcontinent.[8] Pashtuns also arrived as traders, officers, administrators, diplomats, travellers, religious saints and preachers,[9]students, and as soldiers serving in the armies of India's rulers. In many cases, migration and settlement occurred among whole clans.[10]

Today, the Pathans are a collection of diversely scattered communities present across the length and breadth of India, with the largest populations principally settled in the plains of northern India.[11] Following the partition of India in 1947, many of them migrated to Pakistan.[12]

The majority of Indian Pathans are Urdu-speaking communities,[13] who have assimilated into the local society over the course of generations.[14]

Pathans have influenced and contributed to various fields in India, particularly politics, the entertainment industry and sports.[15]

भारत में पठान

भारत में पठान उन नागरिक या निवासी को कहते हैं जो जातीय पठान वंश के हैं और भारत में रह रहे हैं। "पठान" एक स्थानीय हिन्दी-उर्दू शब्द है जो किसी ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो पठान जातीय समूह से संबंधित है या उनसे उसकी उत्पत्ति रही है। ऐतिहासिक रूप से "अफगान" शब्द भी पठानों का पर्याय था। पठान पूर्वी अफगानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान क्षेत्रों से आते हैं जिसे पठानिस्तान के रूप में जाना जाता है।

भारत में रहने वाले पठान वंश की आबादी के बारे में अलग-अलग अनुमान हैं। भारत की 2011 की जनगणना में 21,677 व्यक्तियों ने पश्तो को अपनी मातृभाषा बताया। भारतीय उपमहाद्वीप पर पश्तूनों द्वारा स्थापित कई मुस्लिम साम्राज्यों और राजवंशों के परिणामस्वरूप 11वीं और 12वीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर पश्तून प्रवास शुरू हुआ। पश्तून व्यापारी, अधिकारी, प्रशासक, राजनयिक, यात्री, धार्मिक संत, उपदेशक, छात्र और भारत के शासकों की सेनाओं में सेवा करने वाले सैनिकों के रूप में भी आए। कई मामलों में, पूरे कबीलों के बीच प्रवास और बसावट हुई।

आज पठान की भारत में सबसे बड़ी आबादी मुख्य रूप से उत्तरी और मध्य भारत के मैदानी इलाकों में बसी हुई है। 1947 में भारत के विभाजन के बाद उनमें से कई पाकिस्तान चले गए। अब अधिकांश भारतीय पठान उर्दू भाषी हैं। वह लोग पीढ़ियों से स्थानीय समाज में आत्मसात हो गए हैं। पठानों ने भारत में विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से राजनीति, मनोरंजन उद्योग और खेल में योगदान दिया है। पठान लोग भारत के मुसलमानों में उच्च सामाजिक दर्जा रखते हैं।

नरहड़ में पठान शासन

रतन लाल मिश्र[16] ने लिखा है...[पृ.54]: पिछले अध्याय में शेखावाटी के भूभाग पर कायमखानी शासन का उल्लेख किया गया है. इस समय कायमखानियों का अधिकांश भूभाग पर अधिकार था. समसखां, फतेहखां, अख्तियारखां, कुतुबखां और मोनखां विभिन्न भूभागों का शासन करते थे. कायमखानियों के पास ही झुंझुनू से कुछ उत्तर पूर्व में प्रसिद्ध नरहड़ के क्षेत्र पर पठानों का शासन था. यह शासन जोड़ चौहानों को विस्थापित करके स्थापित किया गया था. नरहड़ से दक्षिण पश्चिम का विस्तृत भूभाग उनके पास था. कायमखानियों से उनका सद्भाव था अतः सारा का सारा फतेहपुरवाटी, झुंझुनूवाटी क्षेत्र एकसूत्रता में बंधा हुआ था. कायमखानी शासन की तरह इस क्षेत्र में पठानों का शासन भी लंबे समय तक चलता रहा.

यहाँ पठानों के बारे में कुछ विचार करना संगत प्रतीत होता है. देश के इतिहास में अफ़गानों या पठानों की बड़ी महत्वपूर्ण स्थिति रही है. अपने पूर्व के तुर्की शासकों एवं अपने पश्चातवर्ती मुगलों से वे कई अर्थों में भिन्न थे. इनकी अपनी जाति एवं वंशगत विशेषताएं थी जो प्राय अन्य कबीलों में नहीं मिलती.

देश के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में एक पहाड़ी पंक्ति है जो रोह कहलाती है. यही रोह का पहाड़ी स्थल पठानों या अफ़गानों का आदि प्रदेश रहा है. यहीं से आगे चलकर वे समतल मैदानी प्रदेशों पर छा गए.

[पृ.55]: प्राकृतिक कठिनाइयों से भरे पूरे इस प्रदेश के निवासी होने के कारण पठान स्वभाव से ही कष्ट-सहिष्णु, बलवान एवं निर्भीक सिपाही थे. पठानों को विश्व की सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू कौम माना जाता रहा है.

लंबे चौड़े दीर्घ शरीरी, गौर वर्ण, शक्तिपुंज पठानों ने अनेकों लड़ाइयों में अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया है. वे अपने स्थान में विभिन्न कबीलों के रूप में जीवन व्यतीत करते थे अतः कबीलों के संगठन का स्वरूप उनके जीवन का आवश्यक अंग बन गया जो एक साथ शक्ति और कमजोरी के रूप में प्रकट हुआ.

[पृ.56]: पठान शब्द एक भाषाई आधार रखता है जो पश्तु बोलने वालों के लिए प्रयुक्त होता है. यह पश्तून या पश्चून शब्द से निकला है जो पश्तु का बहु वचन है. वस्तुत: पश्तु संस्कृत और फारसी भाषा का मेल है जो अफगानों के इन्डो-इरानियन उद्गम की बात मानता है.

फरिस्ता के अनुसार अफगान मिश्र के बादशाह फारोह के सरदार के वंशज हैं. ये लोग मूसा के धर्म को तिरस्कृत कर कोहिस्तान चले आये और वहीं बस गए.[17]


[पृ.57]: पठानों की मातृभूमि रोह प्रदेश था. रोह एक पश्तु भाषा का शब्द है जिसका अर्थ पहाड़ होता है.[18] दूसरी और ओलफ कैरो का कहना है कि रोह शब्द पश्तु भाषा का नहीं है. इसे बहुत से इतिहासकारों ने गलत समझ लिया है. पश्तु शब्द जो पहाड़ के लिए प्रयुक्त होता है वह घार है. रोह वस्तुत: पहाड़ के लिए प्रयुक्त दक्षिणी पंजाबी का शब्द है जो मुल्तान के जाट और पंजाबियों द्वारा प्रयुक्त होता है. अपने मैदानी भूभाग से इस पहाड़ी पंक्ति को वह आश्चर्य से रोह कहते थे. डेरा जाट के बलोच भी इस शब्द का प्रयोग करते हैं.[19] एलफिन्सटन (Elphinstone) की भी यही मान्यता है. [20]

अफ़गानों का यह प्रदेश लंबाई में उत्तर में स्वात एवं वज़ीरस्तान से सिंध के बुक्कुर रेगिस्तान तक एवं चौड़ाई में हसनअब्दाल से काबुल कंधार तक फैला हुआ है. सुलेमान पहाड़ रोह के अंतर्गत आता है. [21] दूसरे मत के अनुसार उत्तर से दक्षिण में कश्मीर के बाहरी भाग से बलूचिस्तान तक एवं पश्चिम पूर्व में गजनी की पहाड़ियों से लेकर सिंधु नदी तक फैला हुआ है. [22]

[पृ.58]: रोह का प्रदेश एक पहाड़ी अनउपजाऊ भूभाग है अतः जीवन यापन की कठिनाइयों के कारण पठान अपना मुल्क छोड़कर अन्य प्रदेशों में जाते रहे हैं. 766 ईस्वी में उन्होंने पेशावर पर कब्जा कर लिया था. पेशावर के पास ही उन्होंने खैबर नाम दुर्ग की रचना की थी. [23] जीवन यापन के लिए वे किसी बादशाह की सेना में मिल जाते. सुबुक्तुद्दीन गजनवी एवं गौरी के सैनिकों में अफगान लोग बड़ी संख्या में थे.

[पृ.59]: रोह से आने वाले अनेक दलों में विविध कबीलों के लोग थे. इसी समय अहमदखां नामक पठान बहलोल लोदी (r.1451-1489) के पास आया. वह बहलोल का उमरा था. जब सुल्तान बहलोल ने अफगानी कबीलों को अपनी सहायतार्थ बुलाया तो इस सिलसिले में नवाब यूनुसखां जो अहमदखां का पुत्र था कबीले नागड़ की जमीयत लेकर हिंदुस्तान में आया. [24] यह कबीला सन 1454 में शेखावाटी के नरहड़ पर काबिज हुआ. [25]

'कबीले नागड़' मैं कहा गया है कि घोरघुस्त (गोरगस्त) के तीन पुत्र दानी, वावी और मन्दू थे. 'शेखावाटी प्रकाश' में पंडित शास्त्री के अनुसार आदि पुरुष दानी हुई जिनके चार पुत्र थे. इनमें दूसरा नागड़ था. इसके दो पुत्र थे जिनमें बड़ा यूनुस था. आगे चलकर कुछ पीढियों बाद अकूलाखां का पुत्र युनूसखां हुआ. इसी का पुत्र मलिक दिलावरखां हुआ जिसने लोहारू के जोड़ चौहान राजा कीर्तिसिंह से युद्ध किया. [26] दिलावरखां का पुत्र इस्माइलखां था जो नरहड़ का नवाब हुआ. [27] 'कबीले नागड़' के अनुसार इस्माइलखां का ही दूसरा नाम या उपाधि दिलावरखां थी.[28] बहलोल लोदी के आमंत्रण पर आने वाले युनूसखां की शादी बहलोल ने

[पृ.60]: अपनी लड़की से की जिसका नाम हकीम खातून था. इसी से इस्माइलखां पैदा हुआ जो आगे चलकर दिलावर जंग के नाम से विख्यात हुआ. सुल्तान बहलोल लोदी ने देश में अमन-चैन कायम करने के लिए एवं विद्रोही सरदारों को दबाने के लिए अपने सरदारों को दलबल सहित रवाना किया. इसी सिलसिले में सरदार युनूसखां को मय जमीयत नारनौल की तरफ भेजा जहां चल रहे विद्रोह को शांत कर वह मुल्क शेखावाटी की ओर बढ़ा. यहां नरहड़ पर उस समय जोड़ चौहान काबिज थे. उनसे युनूसखां की कई लड़ाइयां हुई. अंत में नागड़ पठानों की विजय हुई और जोड़ों का अधिकार नरहड़ पर खत्म हो गया. बहलोल लोधी सन 1451 (1508 विक्रम) में गद्दी पर बैठा था. अतः इसी समय के आसपास नागड़ों की नरहड़ पर विजय मानी जा सकती है.

सुल्तान बहलोल की मृत्यु के बाद उसका लड़का सिकंदर लोदी जुलाई 1489 को दिल्ली की गदी पर बैठा. [29] सुल्तान सिकंदर ने युनूसखां के मरने के बाद इस्माइलखां को दिल्ली बुलाया एवं मोअतमदी के बाद अपनी खिदमत में 15 वर्षों तक रखा. सिकंदर ने दिलावर खां की वीरता से प्रसन्न

[पृ.61]: होकर उसे दिलावर खां का खिताब दिया. सन 1504 में सिकंदर ने सभी उमरावों को अपनी जागीर में लौटने का आदेश दिया. [30] इसी सिलसिले में दिलावर खां भी नरहड़ लौट आया.

दिलावर खां नरहड़ की जागीर का फरमान लेकर लौटा था. यहां उसका बड़ा भाई मलिक तहीम खां काबिज था. उसने इस पर ऐतराज किया तो संघर्ष की स्थिति बन गई. बुजुर्गों ने इस आपसी संघर्ष को अपने हितों के विपरीत माना और दोनों को समझाया. यह तर्क दी गई की दिलावर खां बादशाह का संबंधी है अतः अगर लड़ाई हुई तो बादशाह उसी का पक्ष लेगा. फलस्वरुप समझौता हो गया और दिलावर खां की पुत्री की शादी ताहिम खां के पुत्र से कर दी. दहेज में जागीर भी दी गई. इस दहेज में पांच गांव जेई पहाड़ी, काली पहाड़ी, बुडाना, गोठड़ा और कोली (कासिमपुर) दिए गए थे. [31]

दिलावर खां के समय ही जोड़ चौहानों ने अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए नरहड़ पर हमला किया था पर वे सफल नहीं हुए. दिलावर खां की आगे उन्हें हार स्वीकार करनी पड़ी. [32] बीकानेर के संस्थापक राव बीका ने दिलावर खां के समय नरहड़ पर आक्रमण किया था. उस समय दिलावर खां को पराजय का मुंह देखना पड़ा और संभवत: थोड़े समय के लिए इस स्थान को छोड़ना भी पड़ा. [33] इसका उल्लेख 'छंद राव जैतसी' में मिलता है.

[पृ.62]: दिलावर खां के संबंध में अनेकों ग्रंथों में प्रसंग प्राप्त होते हैं. उसका अधीनस्थ भूभाग विस्तृत तथा जिसमें प्राय 175 गांव थे. पठानों ने इस रेगिस्तान प्रदेश को आए दिन की लूटमार से सुरक्षित किया एवं जगह-जगह कुए बनाकर कृषि की उन्नति में सहयोग दिया. नवाब दिलावर खां की मृत्यु नरहड़ में ही हुई.

इस प्रकार फतेहपुरवाटी, झुंझुनूवाटी के उत्तरी पूर्वी भाग में पठानों का दृढ़ राज्य पूरी तरह संस्थापित हो गया था. इन नवाबों को केंद्रीय शक्ति और सत्ता का समर्थन और सहयोग बराबर मिलता रहता था. जिससे उनकी स्थिति सुदृढतर होती चली जाती थी. जोड़ चौहान सत्ता खोकर निर्बल हो गए थे. उधर पड़ोस में राठौड़ों से भी उनका आगे चलकर सद्भाव हो गया था. बहलोल से संबंध के कारण कायमखानी (झुंझुनू) उनसे प्रेम संबंध रखते थे. इस प्रकार वे पूरी तरह सुरक्षित रहकर अपने अधीनस्थ प्रदेश को बराबर बढ़ाते रहते थे.

सन 1883 में एक रिपोर्ट तत्कालीन शेखावाटी के नाजिम हाजी मोहम्मद अली खां साहू ने पेश की थी. इसके अनुसार पठानों के पास 175 गांव का भूभाग था. [34] इस्माइल खां के चार स्त्रियां थी जिनसे 18 पुत्र हुए. इनमें सबसे बड़ा अलाउद्दीन खां पिता के मरने पर गद्दी नशीन हुआ.[35] अलाउद्दीन खां के राज्य की महत्वपूर्ण घटना नरहड़ से बगड़ राजधानी का परिवर्तन है.

[पृ.63]: अलाउद्दीन खां ने भी अपने पिता द्वारा प्रारंभ किया हुआ इस भूभाग के विकास का क्रम जारी रखा. एक और उसने अपनी अधीनस्थ भूभाग की सुरक्षा का पूरा प्रबंध किया तथा दूसरी ओर विभिन्न स्थानों पर कुवे बनाए.

पठानों द्वारा बनाए गए कुए आज भी अपने प्राचीन नामों से जाने जाते हैं. जयी पहाड़ी में चूड़खां का कुआं, करमूखां वाला, शाहबुद्दीन वाला, ताज मोहम्मदखां का कुआं अब भी प्राचीन नामों से जाने जाते हैं. पठानों ने मठ नामक वर्तमान स्थान के आसपास के क्षेत्र में 52 कुवों का निर्माण करवाया था. बगड़ में नगर के उत्तरी भाग में एक उठा हुआ पहाड़ी स्थान है. इसे समुचित मानकर वहां भवन आदि बनाए गए. यह स्थान पहाड़ी है तथा आसपास के स्थान से ऊपर उठा हुआ है. यहां पठान सरदारों के मुख्य भवन के चारों ओर अनेकों मकान बने हुए थे जिनके अवशेष आज भी पड़े हैं. एक बड़ी हवेली पठान काल के बाद की पश्चिम की ओर मुंह की आज भी अच्छी हालत में खड़ी है. स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ पूर्व इस स्थान पर स्थित के अशांत हो जाने के कारण अनेकों पठान अन्यत्र जा बसे थे. उनके भवनों के अवशेष दिखाई दे रहे हैं. पास ही एक लोहार का पुश्तैनी विशाल भवन है. बगड़ का यह उत्तरी-पूर्वी भाग नगर का सबसे प्राचीन निर्माण है.

पठानों में बड़े पुत्र को गद्दी मिलती थी तथा छोटी संतान को जीवन निर्वाह के लिए कुछ गांव दिए जाते थे. पठान नवाबों के अनेकों छोटे पुत्रों ने बगड़ के आसपास अपनी बस्तियां बसा ली थी. उन्होंने कई गांव एवं नगर बसाए तथा उनकी दृढ़ रक्षा व्यवस्था थी. ये सरदार एक तरह से राज्य के मूलभूत संरक्षक थे जिनके कारण

[पृ.64]: पठानों का शासन लंबी अवधि तक चलता रहा था. पठानों द्वारा बसाए हुए स्थानों का विवरण आगे के अध्याय में दिया जाएगा.

बगड़ के पठानों पर इस अध्याय को समाप्त करने के पूर्व एक बात का उल्लेख आवश्यक है. वह यह है कि शेखावाटी में पठानों के इतिहास के संबंध में अब तक प्रमाणिक वृत्त बहुत कम प्रकाश में आया है.

सुलाते अफगानी (जरदारखां) और कबीला नागड़ (यासीन खां) ने शोध पूर्ण सामग्री प्रस्तुत की है. सामान्य विसंगतियों को छोड़कर यह वृत्त ठीक है.

[पृ.65]: अलाउद्दीन खां के मरने पर कासिमखां बगड़ में गद्दी पर बैठा. यह बुद्धिमान, वीर और उत्साही प्रकृति का नवाब था. इसने मालगुजारी के लिए निश्चित कानून

[पृ.66]: कायदे बनाए एवं खेती की उन्नति की और ध्यान दिया. इस नवाब ने जागीरदारों पर कुछ कर लगाए जिन्हें सिकंदर खां के लड़के फरीदखां ने मानने से इनकार कर दिया. इस पर इसने एक जमात खुडाना गांव पर भेजी थी.

इसने अपने सभी पुत्रों को जागीर दी थी पर एक पुत्र को किसी कारण नाराज होकर जागीर नहीं दी थी. इसका नाम बहलोलखां था. वह नारनौल के हकीम इस्लाम खां के पास चला गया. इस्लाम खां ने अपनी लड़की की शादी उससे कर दी. बहलोल ने ही इस्लामपुर गांव बसाया था. बहलोल का पुत्र ख्वाजाअली खां था जिसके आठ पुत्र थे. उनमें से चार की औलाद इस्लामपुर में आबाद है. जलाल खां, हसन खां, गालिबखां, मर्दानखां, रशीदखां, नासिरखां, और रहीमखां उनके नाम थे. नवाब ग़ालिबखां के नाम का एक कुआ जिस पर उसके बनाए जाने का संवत 1699 वैशाख बदि 7 बृहस्पतिवार अंकित है, अब भी इस्लामपुर में मौजूद है. इस प्रकार बहलोल खां का कुआं भी प्रसिद्ध है. [36]

नवाब कासिमखां के चार पुत्र हुए- हुसैनखां, सिकंदरखां, बहलोलखां और जैनुद्दीनखां. कासिमखां के इंतकाल पर बड़ा पुत्र हुसैनखां गद्दी पर बैठा. शेष भाइयों को जागीर मिली. इस नवाब के बारे में विशेष वृतांत कुछ भी प्राप्त नहीं है.

हाल ही में लेखक की खोज के प्रयत्नों के फलस्वरुप एक नए नाम की उपलब्धि हुई है. वह नाम है - नाहरखां. यह नवाब संवत 1672 (1615 ई.) के आसपास नरहड़ पर शासन कर रहा था. इसके प्रमाण उपलब्ध हैं. कुछ वर्ष पूर्व लेखक ने मंडेला से एक ताम्रपत्र प्राप्त किया था जिसके अनुसार एक और पठान नवाब महताबखां की बात ज्ञात हुई है. इस ताम्रपत्र के अनुसार महताबखां संवत 1621 (1564 ई.) में बगड़ में शासन कर रहा था.

जहांगीर ने अलफखां को नरहड़ आदि स्थानों का पट्टा दिया. [37] जब दौलतखां नरहड़ पहुंचा तो सैन्य सजाकर नाहरखां सामने आया. लड़ाई में नाहरखां न ठहर सका और उसने अपनी पुत्री देकर संधि कर ली. [38] इस तथ्य का समर्थन

[पृ.67]: फखरू तवारिख से भी होता है. इस तवारिख में लिखा है कि नरहड़ खानकाये हजरत हाफिज समसुद्दीन शकरवार वस्ती रहमतुल्ला अलये की है. यह परगना नाहरखां अफगान का था.[39]

संभवत: उसकी मृत्यु निसंतान होने पर उसका छोटा भाई बावनखां नरहड़ का नवाब बना. इसके पंच पुत्र थे- कुतुबखां, मुजफ्फरखां, हमीदखां, भीखनखां और लतीफखां. इनके वंशज बगड़, नूनिया गोठड़ा में बसे हुए थे. इनमें से कुछ फैजाबाद अवध में चले गए और कुछ दक्षिण में हैदराबाद में चले गए.

पठान नवाबों के नरहड़ क्षेत्र में कई गांवों को आबाद किया और उनकी सुरक्षा की. दिलावरखां की पुत्री जिया बीबी को दहेज में काली पहाड़ी, जयी पहाड़ी, बुडाना और गोठड़ा गांव मिले थे. अलाउद्दीनखां ने अपने भतीजे आदमखां को नारी, बारी, सारी गांव जागीर में दिए थे. नवाब कासिमखां ने अपने फजैन्द सिकंदर खां को खुडाना दिया और नरहड़ में जमीन दी. खाजूखां को सुल्ताना बतौर जागीर अता किया गया.

सिकंदरखां ने हिजरी 1029 में खुडाना की शहर पनाह तमिल करवाई. एदलखां वल्द अब्दुल्लाखां ने चिड़ावा की शहर पनाह 1118 हिजरी में बनवाई. [40] इस प्रकार इस काल में कई निर्माण कार्य संपन्न हुए.


रतन लाल मिश्र[41] ने लिखा है... [पृ.160]: नरहड में नवाब बावनखां के फौत होने पर उसका फर्जंद कुतुबखां पसमद नसीन हुआ. इसको बादशाह की ओर से दीवान का खिताब प्राप्त था. इसने अनेकों लड़ाईयों में भाग लिया था और अपनी वीरता की धाक जमाई थी. यह हिसार का हकीम भी रहा था.

जब बीकानेर का राजा अनूपसिंह दक्षिण में सरकारी मुहिम पर था तो जैसलमेर के भाटियों ने बीकानेर के कुछ भूभाग पर कब्जा कर लिया था. इसकी सूचना मिलने पर अनूप सिंह ने अपने सरदारों के नाम हुकुम भेजा कि आक्रमणकारियों को निकाल दें. उसने बादशाह से अर्ज कर एक फरमान हिसार के हकीम कुतुबखां को भी भिजवाया कि वह बीकानेर की सेना की मदद करें. [42]

फरमान मिलने पर कुतुबखां ने बीकानेर फौज की मदद से भाटी अमरसिंह को पराजित कर दिया. [43] इस लड़ाई का उल्लेख ओझा जी ने बीकानेर के इतिहास में किया है. गहलोत ने इस लड़ाई में हिसार के पठान सरदार का उल्लेख करते हुए राठौरों की हार बताई है.

[पृ.161]: कहते हैं कि नवाब कुतुबखां अपने पड़ोसी शेखावत जुझार सिंह पर भी विक्रम 1732 (1675 ई.) के लगभग हमला किया था. कुतुबखां की वीरता के अनेक पद्य प्रचलित हैं. [44]

कुतुबखां की मृत्यु पर उसका बड़ा लड़का अब्दुल करीमखां गद्दी नशीन हुआ. यह नरहड़ का अंतिम दबाव था. [45] कुतुबखां की मृत्यु संभवत: संवत 1752 (1695 ई.) के पूर्व ही हो चुकी थी. यासीनखां लिखित नागड़ पठानों के इतिहास के अनुसार बिना एक कतरा खून का बहाए शार्दुल सिंह के पुत्र ने झूठे वादे के जाल में फंसा कर नरहड़ पर कब्जा कर लिया था.

वस्तुत: नरहड के नवाब कुतुबखां के समय से ही नारनौल के शाही हाकिम अलीकुली खां से पठानों का मनमुटाव चला आ रहा था. एक उल्लेख के अनुसार शार्दुल सिंह के पुत्र जोरावर सिंह ने विक्रम 1794 (1737 ई.) में नरहड का पट्टा शार्दुल सिंह के नाम पर करवा लिया था. वस्तुत: यह अधिकार ई. 1732 (विक्रम 1789) में ही हो चुका था. संभवत: इस समय से पूर्व में ही नरहड़ पर शेखावतों का इजारेदार के रूप में अधिकार हो गया था. बगड़ के प्रसिद्द संत रूपादास को शार्दूल सिंह ने कार्तिक सुदि 15 वि. 1791 को बगड़ की 300 बीघा जमीन का पट्टा दिया था. मेजर यासीनखां की भी यही मान्यता है कि ई. 1732 (वि. 1789) के आस-पास नरहड़ शेखावतों को मिल गया था.

इस प्रकार विक्रम संवत 1521 से 1789 (1464-1732 ई.) विक्रम तक प्राय: 268 वर्ष तक चलकर पठान शासन शेखावाटी से मिट गया. पठान स्रोतों के अनुसार बिना लड़ाई के नरहड़ पर शेखावतों का अधिकार हुआ था जबकि अन्य स्रोत पठानों से एक लड़ाई होने और उसमें शार्दुल सिंह के पुत्र बहादुर सिंह के मारे जाने की बात कहते हैं. सर यदुनाथ सरकार के जयपुर के इतिहास में लिखा है कि बगड़ के अफगान और कायमखानी अभिमानी थे. वह बादशाह की बात नहीं मानते थे. इस पर मोहम्मदशाह ने सवाई जय सिंह को उनका मनसब और उनकी भूमि छीनने के लिए लिखा. जय सिंह ने शार्दुल सिंह को लिखा कि इस आज्ञा को पूरी करें.

जब तक दिल्ली पर बलवान शासन रहा तब तक प्रांतीय शासक काबू में रहे और उ सत्ता के निर्बल होते ही आसपास का राज्य हड़प जाने की एक होड़ सी लग गयी. केंद्रीय शक्ति का सहारा न रहने के कारण पठान शासन अधिक नहीं टिक सका और भूमिसात हो गया.

External links

References

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  21. Afghans in India, Muhammad Abdurrahim,p.30
  22. Shershah and his Times - Kalika Ranjan Kanungo, p.1
  23. Firishta, Vol.1,p.29; Grierson, p.7,10
  24. कबीला नागड़, मेजर यासीनखां जयीपहाड़ी हस्तलिखित नरहड़ के नवाब - पृ 59, मुहम्मद युसूफ खां
  25. मुर्तजाअलिखां नागड़ हैदराबाद से प्राप्त सूचना.
  26. शेखावाटी प्रकाश - पंडित राम शास्त्री,पृ. 18-19
  27. वही.पृ.19
  28. नरहड़ के नवाब - मुहम्मद यूसुफ़ खां पृ.59
  29. The Chronology of Indian History, Seambell Duff, p.265
  30. Firishta, Vol.2,p. 151
  31. कबीला नागड़, मेजर यासीन खां। सोलते अफगानी सफा 402
  32. सौलते अफगानी हाजी मोहम्मद जरदार खां, करोली पृ. 425 कबीला नागड़ हस्तलिखित
  33. कायम खां रासो, छंद 47 पृ. 40
  34. रिपोर्ट हालत शेखावाटी हाजी मोहम्मद अलीखां सन 1883
  35. शेखावाटी प्रकाश - पंडित शास्त्री पृ.19
  36. मरुभारती 1/3 पृ.13-14, 529 शार्दूलसिंह शेखावत, देवीसिंह पृ.123
  37. नरहड़ पाई आलिफखां, दीनी आप दिलेस । तबही चढ्यो दलसाजिके, दौलतखां नरेश । कायमखां रासा पद्य 783
  38. नरहड़ नाहर दल सजे लरि ना सके निदान । नाहरखां को दी सुता गहे चरन चौहान । कायमखां रासा पद्य 784
  39. फखरूतवारिख , फारुकी पृ. 10
  40. सौलते अफगानी, हाजी मो. जरदारखां करोली
  41. रतन लाल मिश्र:शेखावाटी का नवीन इतिहास, मंडावा, 1998, पृ.160-161
  42. टॉड राजस्थान उर्दू तर्जुमा-सफा 1505
  43. बीकानेर का इतिहास प्रथम भाग ओझा पृ. 260-62
  44. रोल पडयो रण वास में तोड़ रह्या गढ़ कोट। राणी बोली राव नै, गहो क़ुतुब की ओट॥
  45. शेखावाटी प्रकाश अध्याय 5 पृ. 9-10