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Unchehara

From Jatland Wiki
(Redirected from Uchchakalpa)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

District map of Satna
Bharhut - Naro Fort - Sonaura - Rampur - Unchehara - Kothi - Khoh in Satna
Gubraon Kalan- Unchehara- Amran Nadi in Satna

Unchehara (उंचेहरा) Uchehara (उचेहरा) or Unchahara (उन्चहरा) is a town and tahsil in Satna district in the Madhya Pradesh. Unchehara of present times was earlier known as Uchchakalpa (उच्चकल्प). It is located on Barua River, a tributary of Tons River.

Variants of name

Location

Unchehara is a historic town and tehsil headquarters in the Satna district of Madhya Pradesh, located roughly 25 km to 30 km from Satna city. It serves as an administrative block known for its scenic location near the Vindhya Range.

Origin

Being at a higher elevation compared to surroundings, it was called "Uchchakalpa". Earlier, Uchchakalpa was made capital of the Nagod State.

Jat Gotras Namesake

Villages in Unchehara tahsil

Akaha, Akahi, Alampur, Amdari, Amdari, Amgar, Amiliya, Amiliya Patha, Antarbediya Kalan, Antarbediya Khurd, Antarhar, Atra, Baboopur, Badgadi, Badhaw Patha, Badkhera, Badkhura, Bairagal, Bandhi Mohar, Bandraha, Banjhir, Bara, Barethiya Ubari, Barhata, Barre, Basaha, Basaura, Bataiya Khurd, Belhati, Bermay, Bharauli, Bharhata, Bharhut, Bharri, Bhatanwara, Bhitari, Bhummra, Bhuruhra, Bihata, Bijahara, Bijawah, Binchawa, Birpur, Brethiya Kothar, Chakahat, Chakahata, Chautariha, Chauthaha, Chauthar, Dabra, Dadhiya, Dadri, Dandi, Deogana, Deori, Dewar, Dhamanahai, Dhaneh, Dhaniya, Dhaura, Dhausad, Dinpura, Dongariya, Dudaha, Dudahi, Dwara Mugahani, Gadauli, Gadhaut, Gadhwa, Gadri, Gauriya, Ghoti, Gobrao Kalan, Govrao Khurd, Gudha, Gunjhir, Gutuva, Hardua Kalan, Harduwa Kothar, Harduwa Ubari, Ichoul, Itava Kalan, Itwan Sani, Jakhi, Jamuniya Kalan, Jhakhaur, Jhiriya, Jhurkhulu, Jiganhat, Kachhiwari, Kadiya, Kaitha, Kalawal (Patha), Kandehali, Karahi Kalan, Karahi Khurd, Karaundi, Karijhir, Karimati, Katar, Katariya, Katiya, Kenpura, Khairi, Khakhara, Khamha, Khamhariya, Khoh, Khokhari, Khujha, Kolgawan, Koluha, Koni, Koniya, Kordara, Kordari, Korwara, Kothi, Kotrahi Kalan, Kotrahi Khurd, Kudahari Kalan, Kudahari Khurd, Kulgarhi, Kulhariya Khurd, Kulpura, Kumhi, Kurehi, Kushali, Ladbad, Lakhamad, Lalpur, Langargava, Lanhagi, Lohraura, Madhau, Madphai, Maharaj, Mahdei, Mahrajpur, Mainaha, Majhakpa, Majhgawan, Majhgawan, Majhokhar, Malhan, Manikpur, Matri Barmendra, Matri Pataura, Mohnna, Mugahani Kalan, Nagjhir, Nandaha, Narhathi, Naugawan, Pahadi, Palhanpur, Pangara, Pangari, Panihai, Panna, Panni, Paprenga, Parasmaniya, Pataura, Pateri, Patharhata, Pathraudha, Patihat, Patouda, Pipariya, Pipra, Pipri Kalan, Piprokhar, Pithaura, Pithaurabad, Podi, Pondi, Puraina, Ragala, Ragauli, Rampur Patha, Rampurwa, Rar, Richhi, Sahijana Kothar, Sahijana Ubari, Sakhauha Kalan, Sakhauha Khurd, Saunta, Semri, Semri Dube, Semri Kurmahai, Semriha, Shivrampur, Shyamnagar, Sohariha, Sonkachar, Sonwarsa, Sukhsena, Tatiyajhir, Tighara, Tighra, Tikar, Titahidandi, Turkaha, Turri, Tusgawan, Umri, Unchahara (NP), Urai Chuwa, Urdana, Urdani,

History

Unchehara Fort Satna

Unchehara Fort - Situated in the town of Unchehara in Satna district, Unchehara Fort is a historical monument known for its unique architecture, ancient history, and regional significance. This fort once served as the residence of local kings and stands as a testament to the architectural beauty and rich heritage of the region, attracting tourists and history enthusiasts alike.[1]

Unchehara Fort was established during the reign of Bundela and Nagavanshi rulers and served as a royal residence for the kings of this region. In 1932, Maharaja Lal Sahab Kumar Bhargava Mahendra Singh resided here while serving as the elected president of the local council. Under his leadership, the fort became a center of significant administrative activities, and its history was enriched by the residence of various other prominent kings and maharajas.[2]

The Unchehara town features in addition to the Unchehara Kila Gadhi (fortified palace), the Shankargarh Fort, the Kabir Math, and the historic Raj Mandir built by the Parihar Maharajas.

Some historians have identified Unchehara as ancient Uchchhakalpa town mentioned in the inscriptions of the Uchchhakalpa dynasty kings.[3]

In 1344, Uchchakalpa was made capital of the Nagod State.[4]

Pataini temple, near Unchehara, is a Jain temple constructed during the reign of Gupta Empire in 5th century.[5]

नागौद में प्राचीन स्थल: उचेहरा

डॉ. अनुपम सिंह[6] ने लेख किया है....4. उचेहरा - [पृ.120]: उचेहरा नगर सतना - मैहर मार्ग पर सतना से 22 किलोमीटर की दूरी पर बरुआ नदी के किनारे स्थित है. यह हाईवे रेलवे स्टेशन भी है. विद्वानों का कथन है कि उचेहरा का प्राचीन नाम उच्चकल्प था क्योंकि वीरराजदेव उच्चकल्प पहाड़ी पर अपनी राजधानी कायम की थी इसी कारण उच्चकल्प कहा जाता था. राजा भोजराज से राजा फकीरशाह के शासनकाल तक उचेहरा नागौद राज्य की राजधानी रहा. राजा चैनसिंह ने 1720 ई. में नागौद नगर बसाया. तदोपरांत से उचेहरा के स्थान पर नागौद को परिहार राज्य की राजधानी का दर्जा मिला.

नागौद में प्राचीन स्थल: खोह

डॉ. अनुपम सिंह[7] ने लेख किया है....3. खोह- [पृ.119]: प्राचीन खोह नगर अब पूर्ण रूपेण विलुप्त हो चुका है. उनके स्थान पर बरुआ नाले के किनारे एक छोटा सा ग्राम विद्यमान है. यह स्थान उचेहरा से 3 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित है. इस ग्राम में परिव्राजक और उच्चकल्प शासकों के अब तक आठ ताम्रपत्र प्राप्त हो चुके हैं. परिव्राजक वंश के महाराज हस्तिन (475-476 ई.) तथा महाराज संक्षोप (528-529 ई.) के ताम्र पत्रों पर 156, 163 और 209 की तिथियां अंकित हैं. ये सभी शासक गुप्तों के सामंत थे.

नागौद रियासत की गढ़ी

नागौद राज्य में 18 गढ़ियां थीं. इनमें से एक प्रतिहत कालीन गढ़ी अब भी यहाँ विद्यमान है किंतु उसकी अवस्था जर्जर है. [8] [9]

उच्छकल्प

उच्छकल्प दे. खोह (AS, p.86): खोह दानपट्टों के उल्लेख से जान पड़ता है कि महाराज जयनाथ तथा सर्वनाथ की राजधानी उच्छकल्प नामक स्थान पर छठी शती ई. में थी क्योंकि उनके कई दानपट्ट इसी स्थान से निकाले गए थे। उच्छकल्प खोह का अथवा उसके पास किसी स्थान का नाम रहा होगा। दानपट्ट खोह से प्राप्त हुए थे।[10]

विंध्य क्षेत्र में प्रतिहार सत्ता का विस्तार

स्रोत: लेखिका: डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.87-89


पृ.87]: विंध्य क्षेत्र में प्रतिहार सत्ता का विस्तार सर्वप्रथम ग्वालियर के शासन की स्थापना से है. ग्वालियर में कई वर्षों तक विंध्य क्षेत्र के परिहारों का राज्य

[पृ.88]: कायम रहा. ग्वालियर से परिहार (विजयपाल) तृतीय युद्ध (चंदेल आक्रमण के पश्चात ही पलायन हुए थे.[11] सन 1066 ई. के आसपास परिहारों का राज्य एक बहुत बड़े भारतीय भूभाग में फैला हुआ था. ग्वालियर से लेकर बुंदेलखंड जिसे पहले जेजाक भुक्ति कहा जाता था, जिसकी सीमाएं उत्तर में ग्वालियर क्षेत्र और दक्षिण में महाकौशल क्षेत्र हटा, दमोह, बटियागढ़, सिंगोरगढ़ तक फैला हुआ था. परिहारों के राज्य काल में कालिंजर का किला भी उनके अधिकार में था, जिसका कुछ निर्माण भी इन्होंने करवाया था. दसवींं शताब्दी में चंदेल वंश में यशोवर्मा, नाम का प्रतापी राजा हुआ जो कालिंजर पर अधिकार करना चाहता था.[12] उसकी पत्नी पुष्पा भी कालिंजर किला के अंदर स्थापित विष्णु प्रतिमा को पाने का प्रस्ताव रखी थी. जिसे परिहार राजा हेडम्बपाल उसके कश्मीरी मित्र तिम्बत के राजा मोटपाल ने दी थी. यशोवर्मा कालिंजर विजय के समय उसे वहां से उठा लाया था और खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर में स्थापित कराया था. खजुराहो का लक्ष्मण मंदिर इस क्षेत्र का प्रथम निर्माण है. [13] अतः ऐसी ही घटनाओं से यह प्रमाणित होता है कि जो एक विशाल किले का खंडहर राठ के समीप जंगलों में है उसकी मूर्तियों की आकृति एवं दीवारों की चित्रकारी बहुत कुछ खजुराहो की मूर्तियों और दीवारों जैसी हैं. इससे यह अनुमान होता है कि चंदेलों ने खजुराहो के मंदिरों का निर्माण राठ के समीप के उस पुराने किले के अनुकरण पर था उसे विशिष्ट कलाकृति की स्थापना की महत्वाकांक्षा लेकर करवाया होगा.

तुगलक सुल्तानों के समय में मऊ-कोटर के परिहार, टोंस (तमस नदी) की घाटी के आसपास कैमूर के पहाड़ी क्षेत्र में पुनः एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए जो चंदेरी और कड़ा के सूबेदारों की जानकारी के बाहर था. यहां पर परिहार राजा वीरराजदेव (वीर वर्मन) के कई शिलालेख पाए गए हैं. उनमें उचेहरा से प्राप्त शिलालेख में उसे वीरराजदेव महाराजधिराज अंकित किया गया है. शेष अन्य शिलालेख कारीतलाई (जबलपुर जिला की कटनी तहसील) रामपुर, गोबरी, रामपुर (कोठी), किरहाई (सतना जिला की क्रमश: मैहर, नागौद, रघुराज नगर, अमरपाटन तहसीलें) और भलुहा नामक स्थान में पाए गए हैं. किरहाई में शिलालेख की तिथि सं. 1402 और रामपुर के सती शिलालेख की तिथि संवत 1444 उल्लेखित हैं.[14] अतः वीरराजदेव की तिथियों और उचेहरा की परिहार वंशावलियों व स्थानीय अनुश्रुतियों के आधार पर कनिंघम ने उचेहरा में परिहार सत्ता की स्थापना का समय संवत 1344 निर्धारित किया है. इस स्थिति को उचेहरा के महाराजाधिराज वीरराजदेव की सफलता का प्रारंभिक बिंदु माना है. इस प्रकार वीरराजदेव अपनी मृत्युपर्यंत तक उचेहरा का शासक रहा.[15]

उचेहरा में परिहार सत्ता की स्थापना तिथि (1344 ई.) के संबंध में कनिंघम की धारणा की पुष्टि ककरेड़ी (जिला रीवा) में कौरववंशी महाराणक सामंतों के प्राप्त शिलालेखों-

[पृ.89] ताम्र पत्रों से होती है. जिनके मुताबिक 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक यहां के महाराणक सामंत त्रिपुरी के कल्चुरियों की अधीनता स्वीकार करते रहे. लेकिन जब जेजाकभुक्ति के चंदेलों ने कलचुरियों के विरुद्ध अपनी शक्ति को बढ़ाकर लगभग 100 वर्षों के अंदर ही अपने राज्य का विस्तार उत्तर में रीवा-पठार के टोंस की घाटी तक कर लिया तब वे (महाराणक) चंदेलों की अधीनता स्वीकार करने लगे. 14वीं शताब्दी में चंदेल सत्ता के कमजोर पड़ने पर उनके राज्य में शुरू होने वाले गृह युद्ध में वीरराजदेव परिहार जैसे शक्तिशाली एवं महत्वाकांक्षी शासक के साथ ककरेड़ी के महाराणक भी भागीदार हुए, जिनमें यह माना जा सकता है कि महाराणक, वीरराजदेव का मुकाबला नहीं कर पाए और ककरेड़ी से भगा दिए गए. क्योंकि 1341 ई. के पश्चात यहां पर महाराणकों का कोई शिलालेख नहीं पाया गया है. अतः स्पष्ट है कि 1341 ई. से 1345 ई. के मध्य वीरराजदेव ने उचेहरा में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया. उपरोक्त स्थानों में पाए गए उसके शिलालेखों के आधार पर उसका राज्य वर्तमान जबलपुर जिला की कटनी तहसील, सतना जिला की मैहर, रघुराजनगर और अमरपाटन तहसीलों (रघुवंशियों द्वारा अधिकृत बरौंधा-पठार कछार को छोड़कर) और रीवा पठार (सेंगरों द्वारा अधिकृत मऊगंज तहसील को छोड़कर) तक फैला हुआ था.

वीरभानुदय काव्य के आधार पर नरो विजय, वीरसिंह देव के विजय-यात्रा का शुभारंभ था. [16] इसमें नरो नगरी में कुछ समय ठहरकर उसे सुसज्जित एवं व्यवस्थित किया और अपनी आगामी विजय अभियानों की संपूर्ण योजनाएं भी बनाई. इसने नरो से पूरी तैयारी करके गढ़ा-कटंगा विजय के लिए प्रस्थान किया था. [17] विक्रमादित्य के संबंध में प्रोफेसर ए एच निजामी का कथन है कि ऊंचेहरा की वंशावलियों में उल्लेखित वीरराजदेव परिहार के वंशज कृष्णदास (किशुनदास) की तरफ से यह नरो गढ़ी का अधिकारी था, जिसने बड़ी बहादुरी एवं साहस के साथ वीरसिंह देव का मुकाबला किया, परंतु असफलता ही उसके हाथ लगी. ऐसा कहा जाता है कि नरो की गढ़ी को वीररराज देव परिहार ने तेली राजा धार सिंह से छीन लिया था.[18] इस नरो गढ़ी में 13वीं शताब्दी विक्रम का एक शिलालेख पाया गया है, जिससे इसकी प्राचीनता प्रमाणित होती है. विश्वसनीय परंपराओं के अनुसार नरो को अधिकृत करने के लिए वीरसिंह देव बांधव से सोनोरा होकर नरो पहुंचा था. सौनैरा - नरो से 3 मील दूरी पर स्थित एक गाँव है.

इस प्रकार उपर्युक्त विवेचना के आधार पर ऊंचेहरा-नागौद के परिहार शासकों के साथ बघेल राजाओं के संबंध 16वीं शताब्दी के मध्य तक सौहार्दपूर्ण नहीं थे, किंतु इसके बाद दोनों में वैवाहिक संबंध भी स्थापित हुए, जो 19वीं शताब्दी तक होते रहे.[19]

उचेहरा में प्रतिहार सत्ता

स्रोत: लेखिका: डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.102-106


[पृ.102]: गुप्त शासकों की अधीनता में विंध्य क्षेत्र में विशेषकर उच्चकल्प (वर्तमान ऊंचेहरा) में उच्चकल्प महाराजों ने शासन किया, इनके दिए हुए अनेक ताम्रपत्र खोह में प्राप्त हुए हैं. उच्चकल्प में राजनीतिक केंद्र होने के कारण यहां शासन करने वाले शासक उच्चकल्प महाराजा कहलाए.[20]

उचेहरा स्टेट में परिहार सत्ता की स्थापना 14 वीं शताब्दी में हुई थी. 13वीं शताब्दी में यहां तैलव तेली राजाओं का राज्य था. वे प्रजा पर अत्याचार करते थे. उन्होंने प्रजा को आतंकित कर त्रस्त कर रखा था, रानियों के साथ भी अत्याचार किया जाता था, उन्हें सही सलामत नहीं बक्शा गया था. इनका सामना करने के लिए मंडोर राजा कक्कुक के सातवीं पीढ़ी में राजकुमार वीरराजदेव हुआ. वह बड़ा तेजस्वी एवं महत्वाकांक्षी था. उसे कन्नौज साम्राज्य के अधीन एक सामंत बनकर रहना पसंद नहीं था. वह साम्राज्य से विद्रोह करना तो नहीं चाहता था पर एक स्वतंत्र राजा बनकर राज करने की प्रबल आकांक्षा थी. उसने अपने इस निश्चय को साकार रूप देने का निश्चय किया और अपने साथ चुने हुए राजपूतों को लेकर सन 1320 में मंडोर छोड़ दिया और कैमूर की ओर एक नए राज्य की स्थापना के लिए चल पड़ा.[21]

इस समय चंदेलों का प्रभाव क्षीण हो रहा था. केन नदी के दाएं तट पर मऊ आदि गांवों में इधर-उधर से आकर अनेक परिहार परिवार बस गए थे. इन्हीं के संपर्क में आकर वीरराजदेव और साथियों के साथ कोट गांव में ठहर गए. सिंगोरगढ़ एक छोटा सा राज्य था, जिसका निर्माण गजसिंह ने करवाया था. वहीं के परिहार राजा कोतपाल देव ने वीरराजदेव को बुलाया. उसकी तेजस्विता और बुद्धि से कोतपाल ने पहले तो उसे अमात्य का पद दिया और उसके सभी साथियों को सेना में रख लिया.[22] कोतपाल देव नि:संतान था, अस्तु वीरराजदेव को अपना वारिस भी बना दिया. सत्ता हाथ में पाते ही मौका देखकर वीरराज देव और उसके साथियों ने नरो दुर्ग को अपने अधिकार में ले लिया और वहीं अपना आवास बनाया. वीर राजदेव ने (1330-1340) दस साल के अंतराल में सिंघौरगढ़ राज्य को व्यवस्थित किया और नरो दुर्ग की मरम्मत करा ली. उधर उत्तरी भारत में तुर्कों का उत्पात अपनी चरम सीमा पर

[पृ.103]: था वे सारे देश में लूट-पाट, मार काट मचा रहे थे. सन 1340 में मोहम्मद बिन तुगलक (r.1324-1351) ने सिंगोरगढ़ पर आक्रमण कर दिया - सारा राज्य लूट लिया, नगर जला दिया और नरो दुर्ग को तुर्कों ने अपने हवाले कर लिया.[23]

वीरराजदेव और उसकी छोटी सी राजपूती सेना, तुर्कों की विशाल सेवा का सामना न कर कैमूर तराई की ओर चली आई. इस समय लूक के राजा हम्मीरदेव और कणौली के राजा देवक के बीच लुका-छिपी लड़ाई चल रही थी. कैमूर क्षेत्र की ओर न तो किसी की दृष्टि थी और न ध्यान दिया गया. इसका लाभ उठाकर परिहार दल उचेहरा की ओर बढ़ा और अक्षय तृतीया सं. 1381 (1324 ई.) दिन सोमवार को प्रतापी राजा वीरराजदेव पुत्र विशालदेव ने मान्ध पिलासी राजा धारा सिंह का वध कर परिहार राज्य स्थापित किया.[24] वे उचेहरा राज्य के प्रथम शासक थे. उचेहरा विरासत की स्थापना का काल वीरता का युद्ध था. वीर पुरुष शासन के अधिकारी थे. बरछी, तीर, तलवार, कटार और गदा जैसे ही अनेक अस्त्र-शस्त्र प्रसिद्ध थे. हाथी, घोड़ा, पालकियां उस समय सवारी हुआ करती थी. आमने-सामने की लड़ाई में बाहुबल काम आता था. वीरता राजाओं का आभूषण हुआ करती थी. उचेहरा के परिहार शासको में महाराज वीरराजदेव सर्वाधिक शक्तिशाली राजा थे जिन्होंने एक विस्तृत भूभाग पर परिहार सत्ता स्थापित की.[25]

वीरराजदेव जब खोह राज्य अर्थात उचेहरा में जमाया तब उचेहरा के पास एक गढ़ में तेली (तैलव राजपूत) लोग जमे थे- उसे तेलियागढ़ नाम देकर स्वयं को राजा बना लिए थे. एक रात जब तेली लोग मदांध धोकर नाच गा रहे थे - वीरराजदेव ने अपने साथियों को लेकर उन पर आक्रमण कर दिया. परिहारों के डर से तेली लोग ऐसे भागे कि गढ़ से अपना डेरा-सामान भी नहीं ले सके. प्रातः काल तेलियागढ़ पर परिहार सरदार वीरराजदेव का झंडा लहरा उठा. यह राज्य बहुत छोटा था किंतु गढ़ में धन संपदा पर्याप्त थी. जिससे वीरराजदेव ने एक सेना का गठन कर लिया और धीरे-धीरे खोह राज्य का विस्तार कर लिया.[26] अतः इस प्रकार 1341-1345 ई. के मध्य वीरराज देव ने उचेहरा में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया. उपरोक्त स्थानों में पाए गए उसके शिलालेखों के आधार पर उसका राज्य महाकौशल वर्तमान जबलपुर जिला कटनी की तहसील सतना जिला की मैहर, नागौद, रघुराजनगर, अमरपाटन तहसीलें एवं रीवा पठार तक फैला हुआ था.[27]

वीरराज देव परिहार राजा भट्टा-गहोरा के राजा बुल्लारदेव बघेल का समकालिक था. लगभग 1357 ईस्वी में वीरराज देव की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी महाराज जुगराज देव हुए. इसके पश्चात क्रमश: महाराज धार सिंह जूदेव, महाराज किशन दास जूदेव (कृष्ण दास) का संवत 1423 में राज्य की सत्ता बाग़डोर संभाली थी, तब खोह एक वास्तविक राज्य था.

[पृ.104]: किशनदास का एक राजा की भांति परंपरागत राज्याभिषेक किया गया था.[28]

सूरजपुर गो जब अवनिपति धारा सिंह सुरेश,
किशनदास राजा भयो तिहि को सभ्यत वेश ।
चौदह सौ तेईस में बैठयो जुकि गद्दिहि॥ [29]

राजा किशनदास के पश्चात् महाराज विक्रमादित्य देव राजा हुये. तत्पश्चात महाराज सूरजपाल जूदेव राजा हुए, जिन्हें सूरजमल भी कहा जाता था. इस समय तक उचेहरा राज्य वर्तमान उचेहरा से लगभग 3 किलोमीटर दूर था. जिसे उच्चकल्प कहा जाता था, आज जिसे खोह कहते हैं इसकी राजधानी कुटरा थी.

महाराज सूर्यपाल देव के पश्चात् महाराज भॊजपाल जूदेव (भोजराज) का शासन प्रारंभ होता है. राजा भोजराज ने 1478 ईस्वी में वर्तमान उचेहरा नगर स्थापित किया और इसे अपनी राजधानी बनाया. भोजराज का शासन काल व्यवस्था का काल है. उसने निष्कंटक शासन चलाया.[30] उसने उच्चकल्प के दुर्ग की मरम्मत कराई, बरुआ नदी के पश्चिम एक सुंदर गढ़ी का निर्माण करवाया - नगर में एक सरोवर और बावली बनवाई. गहोरा के तत्कालीन राजा भैदचंद बघेल ने एक अयुद्ध संधि कर ली जिसके अंतर्गत उसे घटैया की गढी मिल गई. भोजराज के शासन के अंतिम समय तक उचेहरा एक संपन्न और बड़ा राज्य बन गया था. भोजराज के सात पुत्र थे, जिनके बीच राज्य एवं इलाके का बंटवारा निम्न प्रकार से किया गया था:

  • 1. करण देव - उचेहरा के राजा
  • 2. दल्लू शाह - इलाका गोवरांव (उचेहरा) (गर्दिश पश्चात् जो जिला सीधी सेमरिया झगरहा चला गया. जिनकी वंशावली आगे प्रस्तुत है)
  • 3. मधुकर शाह - इलाका भरहुत (उचेहरा)
  • 4. महा सिंह - सितपुरा मौहानी (नागोद)
  • 5. भमरशाह (भवानी सिंह) - रीवा राज्य चले आए. (बरहटा शाखा के आदि पुरुष) और
  • 6-7: छठवें तथा सात वें पुत्र का नाबालिगी में स्वर्गवास हो गया.

भोजराज के पुत्र तथा करण देव के लघु भ्राता भवानी सिंह वीर पुरुष थे. उन्होंने यहां का इलाका लेना नामंजूर कर सेनापति होना पसंद किया. अपनी रण कुशलता और बहादुरी के कारण राज्य में उन्हें विशेष सम्मान प्राप्त था. भोजराज की पुत्री तथा भवानी शाह की अनुजा कृष्ण कुंवरि का विवाह रीवा के बघेल राजा अमर सिंह के द्वितीय पुत्र फतेह सिंह के

[पृ.105]: साथ हुआ था. रीवा महाराज ने फतेह सिंह को देवरा की गढ़ी और दुर्जनपुर (विजयराघवगढ़, कटनी) का इलाका गुजारे के लिए दिया था. साथ ही भवानी सिंह को बरहटा का इलाका दिया. तभी से बरहटा में परिहार वंश आबाद है. भोजराज के पश्चात महाराजा कर्ण सिंह जूदेव राजा हुए.[31]

महाराजा कर्ण सिंह: भोजराज की मृत्यु के बाद करण देव राजा हुए. इनका विवाह बांसी से सिरनेत राजा गोपाल देव की पुत्री से हुआ था. इस विवाह से प्रताप रुद्रदेव का जन्म हुआ था. इनका दूसरा विवाह माड़ा के गहरवार राजा चंद्रपाल देव की कन्या के साथ हुआ. इस विवाह से पांच पुत्र हुए: 1. भगतराय, 2. गुलाल सिंह, 3. मल्लू सिंह, 4. गणपतराय, 5. मेहरबान सिंह. इनमें से ज्येष्ठ पुत्र प्रताप रूद्र देव राजा हुए. शेष भाइयों में से भगतराय को बटैया (श्यामनगर) (उचेहरा), गुलाल सिंह को मौहारी (नागोद), मल्लू सिंह को भरहुत, गणपत राय को जाखी (उचेहरा) और मेहरबान सिंह को भाद (नागोद) गांव प्राप्त हुए.

महाराज नरेंद्र शाह: महाराज प्रताप रुद्रदेव और महाराज नरेंद्र शाह जूदेव ये दोनों राजा मुगल बादशाह अकबर और हुमायूं के समकालीन थे. शाह के खिताब से इन्हें मुगल बादशाह ने ही नवाजा था. प्रताप रुद्रदेव की मृत्यु के प्रसाद कुंवर नरेंद्रशाह जूदेव का सन 1560 ईस्वी में सिंहासन रोहण हुआ. आपका विवाह शिवपुर के गौर क्षेत्रीय राजा हिम्मत सिंह की पुत्री के साथ संपन्न हुआ. इस विवाह से आपसे 6 पुत्र प्राप्त हुए: 1. भरत शाह, 2. अनीराय, 3. भाव सिंह, 4. स्वरूप सिंह, 5. मानसिंह और 6. कनक सिंह. इनमें से ज्येष्ठ पुत्र भरत शाह राजा हुए. शेष पुत्रों में से अनी राय को जिगनहट (उचेहरा), भाव सिंह को करही (उचेहरा), स्वरूप सिंह को रगला (उचेहरा), मानसिंह को उरदना (उचेहरा), और कनक सिंह को भटनवारा (उचेहरा) इलाका प्राप्त हुआ. बाद में कनक सिंह ला. फौत हुए.[32]

महाराज भारत शाह: नरेंद्र शाह की मृत्यु के बाद भारत शाह राजा हुए. उन्होंने उचेहरा और रहिकवारा (नागोद) की गढियां बनवाई. उनके रानी साहिबा ने रहिकवारा में एक तालाब का निर्माण कराया था. जिसे रानी तालाब कहा जाता है. राजा की मृत्यु पश्चात् रानी साहिबा सती हो गई. उनका मंदिर उचेहरा में विद्यमान है. भारत शाह के दो पुत्र हुए. जेष्ठ पुत्र पृथ्वीराज राजा हुए और दूसरे पुत्र मर्दन शाह को भटनवारा (उचेहरा) इलाका ₹2600/- का मिला. इसमें 12 गांव थे. यह इलाका कनक सिंह से जप्त किया गया था.

[पृ.106]: महाराजा पृथ्वीराज सिंह - राजा भारत शाह के बाद पृथ्वीराज शासक हुए. उनके तीन विवाह हुए थे. इन विवाहों से 18 पुत्र उत्पन्न हुए. इनमें से ज्येष्ठ पुत्र फकीर शाह राजा हुए. शेष पुत्रों में कीरतशाह को पिपरोखर (उचेहरा), ह्रदय शाह को चंदकुआं (नागोद), अतबल शाह को पथरहटा (उचेहरा), संग्राम सिंह को जाखी (उचेहरा), अर्जुन सिंह को बरकछी (नागोद), सभा सिंह को पौड़ी, फतेह सिंह को कुनिया (उचेहरा) (उचेहरा), दंगल सिंह को धनेह (उचेहरा) और पहाड़ सिंह को नरहठी (उचेहरा) इलाका प्राप्त हुआ. इस प्रकार 9 पुत्रों को हिस्सा मिला शेष आठ पुत्रों की बाल्यावस्था में मृत्यु हो गई. इस कारण से अठरहा 18वां बटवारा नाम से जाना जाता है.

महाराजा फकीर शाह: पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद फकीर शाह राजा हुए. आपके दो विवाह हुए. पहला विवाह बरदाडीह (रामपुर बघेलान) के ठाकुर साहब के यहां हुआ. इस विवाह के उपलक्ष में मुलनी और बरखेड़ा में दो ग्राम साले को प्रदान किए गए. दूसरा विवाह गुढ़ ग्राम में हुआ. आपने 1720 ईस्वी में नागौद किले का निर्माण प्रारंभ किया. किंतु मृत्यु हो जाने के कारण उनके जीवन काल में यह कार्य पूर्ण नहीं हो सका. उनके शासनकाल में सात भाइयों को इलाका गोबरांव (उचेहरा), पिपरी (उचेहरा), नीमी/पिथौराबाद (उचेहरा), बाबूपुर (उचेहरा), बटेया (उचेहरा), करही (उचेहरा), भरहुत (उचेहरा), उरदना (उचेहरा), जाखी (उचेहरा), भाद (नागोद) और हरदुआ के इलाके प्राप्त हुए. इसी समय से नीमी का नाम पिथौराबाद (उचेहरा) रखा गया है.

फकीर शाह के चार पुत्र हुए- 1. चेत सिंह, 2. चैन सिंह, 3. नरहर शाह और 4. बख्तावर सिंह (छोटेलाल सिंह). इनमें ज्येष्ठ पुत्र चेत सिंह की मृत्यु अवयस्क अवस्था में हो जाने पर चैन सिंह राजा हुए. नरहरशाह को जिगनहट (उचेहरा) इलाका 4250/- कमाल का हिस्सा मिला.[33] बख्तावर सिंह को कुन्दहरी (उचेहरा) के तीन गांव जमा कमाल 1350/- का इलाका मिला.[34] अतः इस प्रकार उचेहरा परिहार राजाओं की राजधानी रही.

वीरराजदेव → कर्ण सिंह → नरेंद्र शाह → भारत शाह → पृथ्वीराज सिंह → फकीर शाह

कुशला पहाड़

कुशला पहाड़ : यह पहाड़ उचेहरा के दक्षिण में राज्य का सबसे ऊंचा पहाड़ है. समुद्रतल से इसकी ऊंचाई 2078 फिट है. इस पहाड़ में तांबा, लोहा, रामरज आदि खनिज पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. [35]

बरुआ नदी

बरुआ नदी: यह नदी झुरही, मनमनियां पहाड़ से निकलती है. करही के समीप वह तमस नदी में मिल जाती है. इसकी सहायक नदी का नाम बसहिया है. मझकपा, खोह, उचेहरा, रगला, नरहठी, करही इसके तट पर स्थित हैं.[36]

नौगजा बाबा

नौगजा बाबा: नौगजा बाबा मुसलमान फकीर थे. उनकी समाधि उचेहरा में बनी है. समाधि 9 गज की है, इतनी बड़ी समाधि अन्य किसी फकीर की नहीं मिलती.[37]

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References

  1. https://newandolder.com/2024/09/29/unchehara-kila-satna/
  2. https://newandolder.com/2024/09/29/unchehara-kila-satna/
  3. A. M. Sinha, ed. (1994). Madhya Pradesh District Gazetteers: Satna. Bhopal: Government Central Press. p. 388.
  4. David P. Henige (2004). Princely states of India: a guide to chronology and rulers. Orchid Press. p. 22. ISBN 978-974-524-049-0.
  5. Cunningham, Alexander (1879). Report of a Tour in the Central Provinces in 1873-74 and 1874-75. Archaeological Survey of India. Vol. 9. Office of the Superintendent of Government Printing. p. 31.
  6. डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.120
  7. डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.119
  8. डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.116
  9. प्रतिहार राजपूतों का इतिहास, p.47
  10. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur,p. 86-87
  11. Gwalior Gazetteer, p.57
  12. Gwalior Gazetteer, p.61
  13. जबलपुर ज्योति,p.28
  14. चंदेरी:प्रो.ए एच निजामी , p.20
  15. चंदेरी:प्रो.ए एच निजामी , p.19-20
  16. वीरभानुदय :सर्ग-2/40-58:वीरसिंह देव:p.54
  17. वही,p.55
  18. Chanderi:p.22
  19. Chanderi, p.24-25
  20. प्रतिहारों का इतिहास/कनिंघम की डायरी/p.14
  21. वही p.15
  22. वही p.19
  23. वही p.23
  24. चंदेरी: p.29
  25. चंदेल कालीन इतिहास - डॉ बी सी मिश्र ,p.51
  26. प्रतिहार इतिहास/कनिंघम रिपोर्ट, p.55
  27. वही p.57 पैरा II
  28. राजपूतों का इतिहास, डॉ के सी जैन, p.71,
  29. ग्वालियर प्रशस्ति p.11 एपि. इन्डि. II
  30. कनिंघम रिपोर्ट डायरी p.89/प्रा. उचेहरा राजघराने से
  31. प्रतिहार राजपूतों का इतिहास,p.82
  32. उचेहरा प्रतिहार राज/कनिंघम रिपोर्ट/रोकोर्डेड केसेट
  33. वही p.91
  34. वही पृ.92
  35. डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.111
  36. डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.113
  37. डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.122

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