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Scindia Chhatri

From Jatland Wiki
(Redirected from Shindia Chhatri)
Author: Laxman Burdak IFS (R)

Chhatri of Madho Rao Sindhia, Shivpuri
Scindia Chhatri, Shivpuri

Scindia Chhatris are one of the important tourist attraction for visitors at Shivpuri in Madhya Pradesh. They were made during the ruling of Scindia dynasty in memory of Scindia rulers.

Variants

Chhatris of Scindias

Shivpuri is famous for graceful, intricately embellished marble chhatris erected by Scindia princes. The Chhatris are set in an elaborate Mughal Garden and are dedicated to Scindias. One of these belongs to Madhav Rao Scindia (20.6.1886 – 5.6.1925), and the other to his mother Maharani Sakhya Raje Scindia facing each other across a water tank. The Chhatris are spectacular fusion of Hindu and Islamic architecture styles with their Shikhara type spires and Rajput and Mughal pavilions. The white marble surface of Madhav Rao Sindhia Chhatri is carved to give a spectacularly rich effect. The Queen’s cenotaph has a superb structural harmony. Both memorials contain life-size images of the Sindhia’s.[1]


The Shivpuri Cenotaphs comprise a formal Mughal garden constructed under the rule of the Scindias, and the Chhatri is one of the spectacular monuments that stands as a fine blend of both Mughal and Hindu culture. The Hindu-Islamic fusion is such that there is a Mughal garden in the backyard that houses the majestic royal tombs of the Scindias. These tombs are surrounded by huge trees, green orchards and verdant bushes displaying Mughal architecture. The cenotaphs also stand as a testimony to the history of the Scindias and other known facets of the Scindia dynasty.[2]

सिंधिया शासकों की छतरियां

सिंधिया शासकों की छतरियां: शिवपुरी स्थित सिंधिया शासकों की छतरियां शाही विरासत की अनमोल धरोहर हैं। 19वीं से 20वीं शताब्दी के आरंभ में निर्मित ये समाधि स्थल स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। संगमरमर पर की गई बारीक नक्काशी और पच्चीकारी इन्हें और भी दर्शनीय बनाती है। छतरीबाग में स्थित ये छतरियां शिल्पकला के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।[3]

छतरी अलंकृत संगमरमर की कारीगरी का उत्कृष्ट नमूना है। छतरी में प्रवेश करते ही विधवा रानी महारानी सख्या राजे सिंधिया की स्मृति में समाधि स्थल है। उसके ठीक सामने तालाब और उसके बाद सामने ही पुत्र माधव राव सिंधिया प्रथम (20.6.1886 – 5.6.1925) का समाधि स्थल बना है। छत्रियां मुगल मंडप के साथ हिंदू और इस्लामी वास्तुकला शैलियों का शानदार संलयन हैं। इन समाधि स्थलों में संगमरमर और रंगीन पत्थरों की कारीगरी उत्कृष्ट एवं अद्वितीय है। सिर्फ़ इतिहास के शौकीन ही नहीं बल्कि भारत की समृद्ध संस्कृति के प्रतीकों के साथ रहना पसंद करने वालों को भी मध्य प्रदेश में छतरी का दौरा करना चाहिए। हिंदू-मुस्लिम वास्तुकला के मिश्रण में निर्मित, यह मुगल उद्यानों की शैली में एक विशाल उद्यान के बीच स्थित है, लेकिन इसे सिंधिया के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। इसमें शाही मकबरे हैं। विशाल पेड़, सुंदर बाग और हरी-भरी झाड़ियाँ छतरी को प्रकृति का एक खूबसूरत टुकड़ा बनाती हैं। विस्तृत रूप से सजाए गए और संगमरमर से बने, छतरियाँ न केवल उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रतीक हैं, बल्कि एक ही समय में प्रकृति के चमत्कार भी हैं।[4]

सख्या राजे सिंधिया की छतरी बलुआ पत्थर से बनी है जबकि माधव राव सिंधिया प्रथम की छतरी संगमरमर के पत्थर से बनी है।

सिंधिया शासकों की छतरियां मां बेटे के प्रेम की अनूठी मिसाल मानी जाती हैं। रात को जगमग प्रकाश में ये खिल उठती हैं। माधवराव प्रथम ने अपनी मां की याद में छतरी का निर्माण कराया था। उनकी इच्छा थी कि जब उनकी मृत्यु हो, तब उनकी छतरी भी उनकी मां की छतरी के ठीक सामने इस तरह से स्थापित की जाएं कि वह अपनी मां के दर्शन कर सकें। यही कारण हैं कि मां-बेटे की छतरियों को इस तरह से बनाया गया है ताकि एक छतरी से दूसरी छतरी को साफ देखा जा सके। पहली छतरी के निर्माण में स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण देखने को मिलता है। इसका निर्माण सफेद पत्थरों से कराया गया है। दूसरी छतरी का निर्माण पूरी तरह से संगमरमर से किया गया है। यहां संगमरमर के पत्थरों से ही प्रवेश द्वार भी बने हैं। 21 अगस्त, 1921 को राजमाता जीजाबाई की मूर्ति की स्थापना की गई थी, तो 6 जनवरी, 1926 को बेटे माधवराव प्रथम की मूर्ति की स्थापना की गई थी। प्रवेश द्वारों पर चांदी की परत भी चढ़ी हुई है। यहां हर सुबह आरती व शाम भजन भी प्रस्तुत किए जाते हैं।[5]

इसी तालाब के एक ओर राम, सीता और लक्ष्मण का मंदिर और मंदिर के बाहर हनुमान जी खड़े हैं। इस मंदिर के ठीक सामने तालाब के उस पार राधा-कृष्णा का मंदिर है।

छतरी के मुख्या द्वार पर हिंदी और अंग्रेजी में शिलालेख लगे हैं।

भारत का विशालतम कदम्ब वृक्ष

भारत का विशालतम कदम्ब वृक्ष: सिंधिया छतरी परिसर शिवपुरी में कदम्ब का एक विशाल वृक्ष है जिसको भारत का विशालतम कदम्ब वृक्ष होने का गौरव प्राप्त है। वर्ष 1996 के लिए कदम्ब के इस विशाल वृक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। इस कदम्ब के वृक्ष को पुरस्कृत करने का प्रस्ताव शासन को लेखक (लक्ष्मण बुरड़क) द्वारा ही वन संरक्षक शिवपुरी के रूप में भेजा गया था। वर्ष 1996 की स्थिति में इसकी आयु 125 वर्ष, ऊँचाई 20.70 मीटर और गोलाई 4.16 मीटर थी.

Gallery

Biggest Kadamba Tree of India in Sindhia Chhatri

External links

References