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Mor Bundelkhand

From Jatland Wiki
(Redirected from Mor Pahadi)
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Chhatrasal Chabutara at Mor Pahadi

Mor hill or Mor Pahadi (मोर पहाड़ी) is near Kachar Kachnai village in Prithvipur tahsil Tikamgarh district, Madhya Pradesh where Bundela ruler Chhatrasal was born in 1649.

Origin

Variants

History

Bundela ruler Chhatrasal was born in Maur hill near Kachar Kachnai on 4 May 1649, present Tikamgarh district, Madhya Pradesh to Champat Rai and Lal Kunwar.[1] His father Champat Rai was fighting at that time with Aurangzeb and had taken shelter in the forests of Maur hill. Chhatrasal was 12 when his father Champat Rai of Mahoba was killed by the Mughals.

मोर (बुंदेलखंड)

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है .... मोर (बुंदेलखंड) (AS, p.763): बुंदेला नरेश छत्रसाल का जन्म इस स्थान पर 1649 ई.† में हुआ था. यह कटेरा नामक ग्राम से चार पांच मील दूर है. छत्रसाल के पिता चंपतराय इस समय औरंगजेब के साथ युद्ध कर रहे थे और उन्होंने मोर पहाड़ी के वनों में शरण ली थी.


† सुधारा गया है. इस पुस्तक में 1648 ई. लिखा है.

मोर पहाड़ी

टीकमगढ़ जिले की मोर पहाड़ी बयां करती है कि इस पहाड़ी पर एक वीर योद्धा ने किन विकट परिस्थियों में जन्म लिया और उसको जन्म लेने के बाद अपने माता-पिता से अलग होना पड़ा. जी हां हम बात कर रहे हैं, महाराजा छत्रसाल बुंदेला के बारे में जिन्होंने जन्म से ही कई परेशानियों का सामना किया और अंत तक करते रहे. स्थानीय लोगों का कहना है कि 400 साल पहले बुंदेलखंड पर मुगलों का शासन था और उस समय नुना और महेवा बहुत बड़ी जागीर हुआ करती थी. इस रियासत के जागीरदार चंपत राय बुंदेला थे. और वह काफी समय तक जागीरदारी करते रहे, मगर एक दिन मुगलों की सेना ने चंपत राय की जागीरदारी पर कब्जा करने के लिए हमला कर दिया. सेना के साथ चंपत राय अपनी गर्भवती पत्नी की जान बचाकर वहां से भाग निकले और जंगल में बनवाई गई एक हवेली में रुक गए. जिस जगह पर हवेली बनवाई गई, वहां काफी तादात में मोरें पाई जाती थीं, जिस वजह से इस पहाड़ी का नाम मोर पहाड़ी पड़ गया था. यह हवेली जंगल मे मोर पहाड़ी पर बनवाई गई थी.

छत्रसाल का जन्म: महाराजा छुपकर मोर पहाड़ी पर जीवन व्यतीत करते हुए भविष्य की प्लानिंग कर रहे थे. इसी दौरान उनकी पत्नी को प्रसव हुआ और उन्होंने एक लड़के को जन्म दिया, जिसका नाम छत्रसाल रखा गया. बेटा होने पर राजा-रानी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा और मौके पर मौजूद सहयोगियों के साथ राजा ने उत्सव मनाया. मोर पहाड़ी पर छत्रसाल का जन्म 1649 में हुआ था. कुछ दिन बाद मुगलों को उनके ठिकाने की भनक लग गई और उन्हें घेर लिया. राजा को बेटे की जान की चिंता सताने लगी, जिससे वे बेटे छत्रसाल को जंगल में एक पेड़ के नीचे छोड़कर मुगलों के चंगुल से भाग निकले. एक आदिवासी परिवार को जब यह बच्चा मिला, तो उन्होंने छत्रसाल का लालन-पालन किया. छत्रसाल बुंदेला की जानकारी उनके मामा को लगी और जब वे बड़े हुए तो उनके मामा छत्रसाल को ललितपुर के देलवारा गांव ले गए, जहां पर उनकी पढ़ाई हुई.

उसके बाद छत्रसाल इंदौर चले गए और वहां के होल्कर राजा के यहां पर काम करने लगे. छत्रसाल बुंदेला जब एक दिन जंगल मे आखेट पर गए थे, तब वे थककर जंगल में सो गए. इसी दौरान राजा के किसी सैनिक ने उनके दाएं पैर में पदम् का निशान देखा और इंदौर महाराज को बताया. पैर का पदम् इंदौर के राजा ने देखा तो वे समझ गए कि यह एक दिन महाराजा बनेगा. इंदौर नरेश ने अपनी आधी राजधानी छत्रसाल को दे दी, जिसके बाद छत्रसाल को पन्ना का महाराजा बनाया गया.

छत्रसाल ने पन्ना में काफी समय तक राज किया और उन्होंने छतरपुर को भी बसाया था. पहले छतरपुर का नाम छत्रसाल था. छत्रसाल एक महान, वीर योद्धा और समाज सेवी साबित हुए, जिनकी गाथा आज भी पूरे देश में प्रसिद्ध है. टीकमगढ़ से 60 किलोमीटर की दूरी पर लिधौरा तहसील के पास मोर पहाड़ी पर आज भी छत्रसाल के जन्म का चबूतरा बना हुआ है, जो इस महान योद्धा की यादें ताजा करता है.

मोर पहाड़ी पर अवशेष: मोर पहाड़ी पर बनी हवेली के अवशेष आज भी यहां हैं, जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस पहाड़ी पर महाराजा छत्रसाल की एक बड़ी मूर्ति लगाई जाना चाहिए. राजा छत्रसाल का जन्म टीकमगढ़ जिले में हुआ, लेकिन उन्होने शासन पन्ना और छतरपुर में किया था. आज भी लोग इस महान योद्धा के चबूतरे पर माथा टेकने आते हैं.

स्रोत: ETV Bharat, 21.07.2020

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External links

References