Jigni
| Author:Laxman Burdak, IFS (R) |


Jigni (जिगनी) is a village in Tehsil Rath tahsil of District Hamirpur District in the state of Uttar Pradesh.
Location
Jigini is a village situated in the Rath tehsil of Hamirpur District, Uttar Pradesh. Jigini village is a designated Gram Panchayat.[1]
Jigni is located near the confluence of the Dhasan River and the Betwa River[2]
Origin
Variants
History
Jigni State was a princely state of the Bundelkhand Agency of the British Raj. Jigni State was founded as a jagir in 1730 by Rao Padam Singh, a Rajput of the Bundela clan. He was a son of Chhatrasal, the founder of Panna State. It was a small Sanad state of about 82.87 km2 with a population of 4,297 inhabitants in 1901. The state was surrounded by the Hamirpur[3]and Jhansi districts of the United Provinces.
Its capital was at Jigni, also known as Jigini.[4]
Jigni became a British protectorate in 1810 under the rule of Pirthi Singh.[5] Rao Bhupendra Vijai Singh, the last ruler of Jigni State signed the instrument of accession to India in 1947, the state becoming part of the Indian Union on 1 January 1950. The ruling family were members of the Bundela clan of Rajputs. The rulers used the title of Rao.
Col. G. B. Malleson[6] writes....Jigni, Rao of; likewise a descendant of Chattar Sal. His territory has an area of 27 square miles, with a population of 2,800, and a revenue of 12,500 rupees. The chief has been granted the privilege of adoption.
The present Rao, Bhopal Singh, is of unsound mind, and the state has been, since 1855, under the direct control of the British Government ; but its affairs are administered by a native superintendent.
जिगनी
विजयेन्द्र कुमार माथुर[7] ने लेख किया है ...जिगनी AS, p.366) बुंदेलखंड, मध्य प्रदेश में अंग्रेज़ शासन काल तक एक छोटी-सी रियासत थी। इसके संस्थापक बुंदेला नरेश महाराज छत्रसाल के पुत्र पदुमसिंह थे। पदुमसिंह को अपने पिता की ओर से कोई जागीर नहीं मिली थी, किंतु इनके सौभाग्य से इन्हें इनके मामा ने अपने यहाँ जिगनी की जागीर पर बुला लिया, जिसके फलस्वरूप उनकी मृत्यु के पश्चात् पदुमसिंह ही इस जागीर के स्वामी बने। 1703 ई. में इन्होंने बदौरा को जीतकर जिगनी में मिला लिया। इसके पश्चात् अनेक राजनीतिक उलट-फेरों के कारण इस रियासत में काफ़ी कांट-छांट हुई।
इतिहास
डॉ. अनुपम सिंह[8] ने लिखा है...इल्तुतमिश ने 1231 में ग्वालियर पर आक्रमण किया. दिल्ली की भारी सेना के सामने राजपूत सेना बहुत कम थी. किंतु ग्वालियर प्रतिहार राजाओं ने न तो हथियार डाले और न ही शत्रु को किले में घुसने दिया. प्रतिहारों की मोर्चाबंदी इतनी मजबूत थी कि कभी-कभी सुल्तान को अपने सैनिकों को मौलवियों के भाषणों और उपदेशों से प्रोत्साहित करना
[पृ.77]: पड़ता था. दृढ़ निश्चय के साथ किए जाने वाले युद्ध और सुल्तान के व्यक्तिगत नेतृत्व के कारण लगभग 11 महीने तक इल्तुतमिश घेरा डाले रहा परंतु किले में घुसने में सफल नहीं हो पाया. अंत में उसने चाल बाजी करने की सोची. रात्रि के अंधेरे में वह दूर्ग के पश्चिम की ओर से अंतरी बनाकर घुसा और वहीं से चोरों की भांति दुर्ग में सैनिकों को उतार दिया. चोरों ने दुर्ग का दक्षिण भाग भी खोल दिया. दुर्ग के अंदर भयानक मारकाट भोर होने तक चली. राजपूती सेना बाहर से आ गई. सुल्तान भाग निकला. रात में कैद किये सैनिकों व महिलाओं को दुर्ग से निकाल चुका था. उसमें 400 राजपूत और 200 महिलाएं थीं जिन्हें सुल्तान ने क़त्ल करवा दिया. [9]
सुल्तान का दूसरा आक्रमण भी विफल रहा. ग्वालियर के प्रतिहारों ने ग्वालियर गढ़ प्राप्त करने का प्रयास किया. कुरैठा के विक्रम संवत 1277 के ताम्रपत्र से प्रकट होता है कि उसे समय ग्वालियर गढ़ पर विग्रहराज कर्णदेव का बड़ा पुत्र सारंगदेव (मलयवर्मन) ग्वालियर का राजा था. वह बड़ा नीतिज्ञ था. सुल्तान का तीसरा और अंतिम आक्रमण 12 दिसंबर 1232 को हुआ. मलयवर्मन ने देश पर आई आपदा का भान अन्य राजाओं को कराया. उसके आह्वान पर यदुवंशी, तोमर, सिकरवार और सूर्यवंशी राजाओं ने एकत्र होकर एक सुगठित सेना बनाई. इस सेना और दिल्ली की तुर्क सेना के मध्य 11 माह तक भीषण संग्राम चलता रहा. तुर्क सेना लाख से भी ऊपर थी. उसने सारा ग्वालियर घेर लिया था और चारों ओर से दुर्ग के लिए रसद पानी पुनः बंद करवा दिया था. राजपूती ससेना दिन-ब-दिन घटी जा रही थी. उधर मेरठ, आगरा, दिल्ली, कानपुर से धन और जन दोनों आ रहे थे. किंतु फिर भी प्रतिहारों की स्थिति काफी जर्जर होती जा रही थी. अब युद्ध अवसान की ओर जा रहा था.
अंत में 20 नवंबर 1233 को ग्वालियर महारानी तोंवरि देवी ने राजपूतों को अंतिम समर में कूद पड़ने का संदेश भेज दिया. सभी रानियां व राजपूतानियों ने साज श्रृंगार किया. चंदन की विशाल चिता बनाई गई और "जय दुर्गे जय भवानी" कहते हुए हजारों ललनाएँ जौहर की धड़कती ज्वाला में स्वाहा हो गई. इस प्रकार कुछ प्रतिहार रानियां चिता में जौहर हुई और कुछ रानियां जौहर ताल में विलीन हुई.

[पृ.78]:जौहर ताल के लिए भाट बताते हैं कि प्रतिहार राजपूत स्त्रियों ने किस प्रकार जौहर कर अपने प्राणों की आहुति दी और राजा के सम्मुख जाकर विनती की.
- पहले हमें जु जौहर पारि। तब तुम जूझे कंध सम्हारि॥ [10]
इस घटना का उल्लेख एक शिलालेख में किया गया था, जिसे बाबर ने उरवाई द्वार के पास देखा था. किंतु अब यह गुम हो गया है. उरवाई घाट को घेरने वाली दीवार इल्तुतमिश के समय बनवाई गई थी. इस अंतिम युद्ध का सेनापतित्व तेजस्वी परिहार मलयवर्मन कर रहा था. तथा उसके पुत्र हरिवर्मा, अजय वर्मा और वीर वर्मा मारे गए. सारंगदेव के बच्चे मऊ सहानियां भेज दिए गए. अन्य भाई भी जिगनी-डुमराई चले गए. ग्वालियर में मलयवर्मा का सौतेला भाई नर वर्मा बच रहा था.
जिगनी के परिहार
डॉ. अनुपम सिंह[11] ने लिखा है...जिगनी के परिहार - [पृ.397]: जिगनी राज्य बेतवा नदी और धसान नदी के संगम स्थल के दक्षिणी पार्श्व में सरीला के निकट है. इसे रासिन बदौस के नाम से भी जाना जाता है. जिगनी रियासत वर्तमान उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में स्थित राठ से दूरी लगभग 22 किलोमीटर है. यह ग्राम ऐतिहासिक इस दृष्टि से है कि यहां प्रतिहार सबसे पहले माउंट आबू से आए. राजा उदय करण चंदेलों के समय में सन 1080 ई. में यहां ग्राम मुढारी गए जहां उन्होंने यह ग्राम बसाया. यहीं से 12वीं सदी के मध्य माहिल परिहार ने चंदेलों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए. परिहार सामंत राजाराम भी यही माउंट आबू से बसे. उनके तीन पुत्रों में से राजाराम के पुत्र बाब सिंह ने रामगढ़ में प्रथम दुर्ग बनवाया और इसी वंश का दूसरा दुर्ग जिगनी था. इस वंश में कई परिहार सामन्त हुए. जो धसान नदी के किनारे बस गए. बुंदेलखंड में शिवानंद जी का कहना है कि जिगनी स्टेट के अंतिम परिहार शासक श्री राव भूपेंद्र विजयसिंह थे.[12] जिगनी रियासत में ग्वालियर के तृतीय युद्ध में पराजित ग्वालियर के दसवें शासक कर्णदेव सिंह आए जो संतानहीन थे. संतानहीन होने से टाटी बंधानाधिपति राजा जुझार सिंह वंशज राजा माधव सिंह के बड़े पुत्र सारंगदेव जिन्हें मलय वर्मा भी कहा जाता था, उनको 1202 ईस्वी में गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी बनाया. राजा सारंगदेव सिंह के दो पुत्र हुए कुंवर मदन सिंह परिहार और कुंवर भैदसही सिंह परिहार जो अपने चाचार रामगढ़ के राघव देव जिन्हें घाव सिंह भी कहा जाता था, के पास चले गए. राघदेव जी ने अपने पास रखकर उनका प्रेम पूर्वक पालन पोषण किया और राव की उपाधि से विभूषित कर जागीर के साथ जिगनी ग्राम बैठका में दिया. [13]
जिगनी के बड़े राव मदन सिंह के सात पुत्र हुए. 1. राव जैत सिंह को जिगनी का तिलक मिला, 2. पहाड़ सिंह को मगरौठ, 3. बान सिंह को मझगवां, 4. रण सिंह को लिधौरा, 5. बल सिंह को चगवा, 6. सिंहं देव को अटलिया और 7. औझड़ सिंह को ग्राम मुढ़ा मिला. इस प्रकार सभी विकासी के अधिकारी हुए.
राजा सारंगदेव की मृत्यु युद्ध के समय 12 दिसंबर 1232 ईस्वी में हुई. यह तिथि गजनी के ग्वालियर पर चढ़ाई की तिथि पर आधारित है. इस प्रकार से मदन सिंह तथा भैद्शाही को जिगनी का ठिकाना 13 वीं सदी के चौथे दशक में मिला था. अभिलेख बताते हैं कि राव जैत सिंह के 10 पुत्र हुए. चार तो जिगनी ही रहे, अन्य 6 अन्यत्र चले गए, जो उपर्युक्त पंक्तियों में उल्लेख हो चुका है. इन्हीं के वंशजों ने मजहजनी का ठिकाना कायम किया. जिगनी के मगरौठ पाटी के वंशज इनसे जुड़े रहे. ये आयुधारी परिहार क्षत्रियोचित गुणों से परिपूर्ण फक्कड़ स्वभाव स्वतंत्र
[पृ.398]: रहने के आदि थे. ये अपना धर्म सैनिक जीवन ही मानते थे, जागीर ठिकानों के कतई लोभी नहीं थे. जब तक उनकी स्वतंत्रता पर आंच न आए जिनके साथ रहते मर मिटने को तत्पर, दीन दुनिया से बेखबर, खुशी-खुशी रह जाते. उनकी एक कहावत थी- "न उधव का लेना न माधव को देना".[14] इस उद्देश्य को लेकर जीवन यापन करते रहते थे.
18 वीं सदी के मध्य इन्हीं में से कुछ वंशज रीवा राज्य के तेंदुन इलाकेदार के यहां मुआर के रूप में बस गए. इस प्रकार इनके वंशज रीवा राज्य में बढ़ते गए, ठिकाने खोजते धीरे-धीरे बैकुंठपुर आदि गांवों में चले गए. कतिपय वर्तमान त्यौंहार तहसील के कोनिया गांव में जा बसे.[15]
पहाड़ सिंह का परिवार कालांतर में इतना विस्तृत और विशाल हो गया कि मगरुल में उनका समापाना संभव नहीं हो सका अस्तु देश में इधर-उधर गए और फले-फूले. कुछ बंधु शादी विवाह के संदर्भ में रीवा राज्य के इलाका तेंदुन में आकर बस गए.
जिगनी से तेंदुन होते हुए रायपुर आए परिहार परिवार के मूल पुरुष अदलीशाह थे. कर्चुलियों ने इन्हें अपनी गढ़ी के पार्श्व में ही आवास दिया था. अन्य परिहार परिवार खेरवा टोला में आबाद थे. कर्चुली एवं प्रतिहार परिवार दोनों के मैत्री संबंधों की प्रगाढ़ता की अलख पनपने लगी. अदलीशाह के आवास की ओर ही कर्चुली की गढ़ी का नारदा हुआ करता था. एक दिन ठिठोली में कलंदरशाह कर्चुली ने अदलीशाह परिवार को कहा कि "नदीतरीता बसेहया". फिर क्या था, दरबार में बैठे लोग हंस पड़े जब-तब इन्हें चिढाने के लिए नरदा तटी के परिहार कहकर मना लेते. अदलीशाह के मूल परिवार के वंशज, जिनमें अब तीन परिवार हैं, उसी स्थान पर आज भी आबाद है.
इस परिवार के भाई बंधु पूर्व ही में एक-एक कर टिकुरा टोला या खेरवा टोला में आवासित हुए. आगे चलकर रायपुर के इर्द-गिर्द अइतला, नाइन, खीरा, बरेही ग्रामों में अपने आवास निर्मित किये. कुछ भाई बंधु कुंवरी करहिया तहसील सिरमौर तथा अमरपुर जिला शहडोल में भी आबाद हुए[16]

सन 1796 में पेशवा के नायक यशवंत राव ने जिस समय रीवा पर चढ़ाई की कलंदर सिंह कर्चुली और अदलीशाह दोनों रीवा की फौज में ओहदेदार थे. रीवा की सेना ने नैकहाई (सतना जिले के रामपुर बघेलान तहसील के चोरहटा और बाबूपुर के पास स्थित है) के मैदान में जो प्रक्रम दिखाया वह अद्वितीय था. इसी युद्ध में कलंदर सिंह कर्चुली ने नायक का सर काटकर महारानी 'कुंदन कुंवरि' को भेंट किया था. [17]
- सहसा सेना के बीच घिरा नायक हाथी पर दीख पड़ा।
- ललकार रहा था सेना को अंबारी पर वह खड़ा-खड़ा॥[18]
- था पायदान पर एक पांव दूसरा पीठ पर जा न सका।
- कल्चुरी कलंदर का भाला उसके सीने पर जा चमका॥[19]
इस युद्ध में कलंदर और अदलीशाह दोनों घायल हो गए थे. उनकी मृत्यु रायपुर में हुई, जहां आज भी आसपास बनी दोनों की छतरियां उनके वीरता और मित्रता की कहानी कहती हैं. अदलीशाह के पुत्र सुरजन सिंह परिहार और पौत्र गणेश राज सिंह परिहार अपने समय के लड़ाका सरदार थे. इन्हें रीवा की सेना में बड़ा सम्मान प्राप्त था. अदलीशाह की छठवीं-सातवीं पीढ़ी में वज्रपाणि एवं कुंवर सूर्यबली सिंह का जन्म हुआ था. यह दोनों व्यक्ति अपने समय के महान पुरुष माने जाते थे. कुंवर सूर्य बली सिंह का विस्तृत वर्णन साहित्य के क्षेत्र में आगे किया गया है. इस प्रकार जिगनी स्टेट का इलाका रीवा राज्य तक फैला हुआ है.[20]
कालांतर में यहां बुंदेलों का अधिपत्य हुआ और उन्होंने उस पुराने दुर्ग का जीर्णोद्धार कर नया महल बनवाया. इसी बुंदेला परिवार से चरखारी की गद्दी में राजा गंगा सिंह व अरिमर्दन सिंह गए. इस क्षेत्र में अधिकांश लोग भारतीय सेना में कार्यरत हैं. अतः उपर्युक्त पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि जिगनी स्टेट की माटी ही इतनी तेज व यशश्वी है कि अपने पुत्रों को वीर सपूत पैदा करती है.[21]
परिहार वंश - शाखा जिगनी
डॉ. अनुपम सिंह[22] ने लिखा है...[पृ.413]: ग्राम बरहटा मऊगंज में परिहार वंश की एक और शाखा से संबंधित क्षत्रिय आबाद हैं. इनका संबंध जिगनी - मलहटा परिहार वंश है. जिगनी ग्राम उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में है. हरपालपुर रेलवे स्टेशन से 40 किलोमीटर की दूरी पर एक ग्राम है राठ (प्राचीन नाम विराटनगर) राठ से 20 किलोमीटर उत्तर पश्चिम में जिगनी गांव है और इससे 30 किलोमीटर पर मलहटा नामक गांव है. पुराने समय में मलहटा जिगनी राज्य का अंग था. इसी आधार पर दोनों गांव जुड़कर प्रचलित है.[23]
परिहार राज्य स्थापित होने के पहले यहां पाल राजवंशी क्षत्रियों का शासन था. इन्होंने जिगनी नगर बसाया था और जिगनी को राज्य की राजधानी बनाया. तदन्तर ग्वालियर वंश के परिहार राजाओं ने अपने राज्य का अंग बना लिया. ग्वालियर के अंतिम राजा मलय वर्मन उर्फ सारंगदेव की दूसरी रानी ब्रह्म कुमारी से दो पुत्र थे. मदन सिंह और भेदशाह ग्वालियर विध्वंस के समय ब्रह्मकुमारी इन दोनों बालकों को लेकर रामगढ़ चली आई रामगढ़ (जिगनी) का इलाका सारंगदेव ने अपने छोटे भाई राघव देव को दिया था. राघवदेव ने दोनों नातियों का उचित पालन पोषण किया और अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया. वयस्क होने पर दोनों पुत्रों को इलाके के दो भाग कर इलाकेदार बना दिया- मदन सिंह को जिगनी समेत 12 गांव और भेदशाह को धनौरा सहित 12 गांव.
जिगनी परिहार वंश का रीवा आगमन
डॉ. अनुपम सिंह[24] ने लिखा है...[पृ.429]: जिगनी के प्रतिहार वंश ग्वालियर के युद्ध से विभाजित हुए थे. ग्वालियर के राजा मलयवर्मन देव और उनके तीनों राजकुमार 12 दिसंबर 1232 ई. के युद्ध में मारे गए और नरवर्मन प्रतिहार ने अपने भाइयों के साथ धोखा किया, जिससे पुरस्कार के रूप में तुर्कों के अधीन वर्तमान शिवपुरी का इलाका प्राप्त हुआ. अतः जिगनी के प्रतिहारों को ग्वालियर के राजा परमार्दीदेव व मलयवर्मन देव से संबंधित माना जाता है. जिगनी का वंश ग्वालियर के परिहार राज्य घराने का सबसे जेठ घराना है. माधव सिंह के दूसरे पुत्र राघव देव के वंशज अब मालाजनी में हैं. मालाजनी खरीदा हुआ गांव है क्योंकि सन 1754 ईस्वी में हृदयशाह बुंदेला के पुत्र हिंदूपति ने चढ़ाई कर राजा महा सिंह को मार डाला था. उनके पुत्र दीप सिंह मालाजनी छोड़कर अपने ननिहाल सितपुरा जिला जालौन में रहने लगे थे. बाद में उनके पुत्र महीपत सिंह को मालाजनी से लगाव हुआ तब उन्होंने अपना गांव पुनः खरीदा. संतान न होने से महीपत सिंह जी ने मझगवां हमीरपुर के विजय सिंह को गोद लिया, जिनके पुत्र प्रबल प्रताप सिंह थे. प्रबल प्रताप सिंह के चार पुत्र हुए-1. नारायण प्रताप सिंह, जो मालाजनी में है, 2. देवी नारायण सिंह (विवाह कसौटा),3. रामदेव सिंह, जो औरैया में है, 4. गूलर देव, डूमरई मिला.
जिगनी के प्रतिहारों का रीवा की ओर बढ़ना: सन 1700 ई. के लगभग बुंदेला नरेश छत्रसाल के प्रभुत्व का काल था. जिगनी के राव जसकर्ण देव ने छात्रसाल के इच्छा अनुसार अपनी पुत्री का विवाह छात्रसाल के पुत्र हृदयशाह के साथ करने से इनकार कर दिया. अतः कुपित होकर छत्रसाल ने हमला कर जसकर्ण को मार डाला और जिगनी का ठिकाना अपने पुत्र को देकर वहां का राव बना दिया. जिगनी के पतन के पश्चात डुमरई, मालाजनी, जिगनी के कुछ प्रतिहार क्षत्रिय राजाश्रय ढूंढने के लिए रीवा राज्य आए. इनका रीवा आना स्वाभाविक था क्योंकि इनकी बघेल इलाकेदारों के यहां रिश्तेदारी थी. प्रतिहारों के संबंध में छत्रसाल की प्रतिज्ञा आज भी बुंदेलखंड में प्रचलित है कि
- "छत्रसाल के वंश में होव रकत को अंश, तो परिहारन के वंश को करिडारौ निर्वंश".
इस कहावत से ही बुंदेलों और परिहारों का वैमनस्य प्रकट होता है. ऐसे ही आने वालों में जिगनी की तीसरी पीढ़ी में डुमराई पट्टी से श्री भगवान सिंह जी थे, जो इलाका दुर्जनपुर वर्तमान (सज्जनपुर) आए जहां पर उनकी ननिहाल थी. दुर्जनपुर सोहावल राज्य का अंग था. कुछ दिन ननिहाल में रहने के पश्चात ही श्री भगवान सिंह नेबुआ गुड़हड़ू में पवाई पाकर आबाद हुए. सन 1700 ईस्वी में जन्मे भगवान सिंह 1732 ई की लड़ाई में जूझकर वीरगति को प्राप्त हुए. इन्हीं भगवान सिंह के वंशज वर्तमान में ग्राम सुजवार (Mangawan), लाभौली (Sirmour), जिला रीवा में व ग्राम पड़ैनियां, हिनौता, मड़रिया आदि गांव में जिला सीधी में आबाद हैं.
External links
References
- ↑ https://villageinfo.in/uttar-pradesh/hamirpur/rath/jigini/
- ↑ Imperial Gazetteer of India, v. 14, p. 165.
- ↑ Chisholm, Hugh, ed. (1911). "Hamirpur" . Encyclopædia Britannica. 12 (11th ed.). Cambridge University Press. p. 893.
- ↑ [1]
- ↑ Princely States of India A-J
- ↑ An historical sketch of the native states of India/Bundelkhand,p.362
- ↑ Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.366
- ↑ डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.76-78
- ↑ भारत का इतिहास, p. 49
- ↑ वही p.69
- ↑ डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.397-398
- ↑ विन्ध्य क्षेत्र का इतिहास-श्री शिवानन्द, p.29
- ↑ विन्ध्य क्षेत्र का सांस्कृतिक स्वरुप - स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री वी के सिंह, p.31
- ↑ विन्ध्य क्षेत्र के इतिहास का सौंदर्य प्रकाश - स्वतंत्रता सेनानी श्री जयेंद्र सिंह बुंदेलखंड , p.128
- ↑ वही, p.130
- ↑ विन्ध्य के गौरवशाली परिहार - रवि रंजन सिंह, p.29
- ↑ वही p.31
- ↑ नौसेरी ताम्रपत्र - एपी.इंडी . VII,p.21
- ↑ संजन ताम्रपत्र - एपी.इंडी.XI,p.29
- ↑ क्षत्रिय वंश वैभव - राम नरेश सिंह परिहार, p.181
- ↑ विन्ध्य क्षेत्र का सांस्कृतिक स्वरुप - स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री वी के सिंह, p.31
- ↑ डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.413
- ↑ परिहार वंश का प्रकाश - मुंशी देवी प्रसाद p.26
- ↑ डॉ. अनुपम सिंह - विंध्य क्षेत्र के प्रतिहार वंश का इतिहास (9वीं शताब्दी से वर्तमान तक), गुढुवा, जिला सतना (मध्य प्रदेश), प्रकाशक: अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा, प्रथम संस्करण: 2006, पृ.429